बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 42, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब वे बोले—“आज ही हम उस वन में जा रहे हैं, जहाँ गजराज के समान पराक्रमी वह (राजकुमार) गया है। उसके बिना हमारी जीने की इच्छा नहीं है, जैसे इन्द्रियों (की शक्ति) के नष्ट होनेपर देह-धारियों की (जीने की इच्छा नहीं होती) ॥12॥ इदं पुरं तेन विवर्जितं वनं वनं च तत्तेन समन्वितं पुरम्। न शोभते तेन हि नो विना पुरं मरुत्वता वृत्रवधे यथा दिवम् ॥८.१३ उससे रहित यह नगर वन है और उससे युक्त वह वन नगर है; क्योंकि उसके बिना हमारा नगर उसी प्रकार शोभा-हीन है, जिस प्रकार वृत्र-वध के समय इन्द्र के बिना स्वर्ग” ॥13॥ पुनः कुमारो विनिवृत्त इत्यथो गवाक्षमालाः प्रतिपेदिरेऽङ्गनाः। विविक्तपृष्ठं च निशम्य वाजिनं पुनर्गवाक्षाणि पिधाय चुक्रुशुः ॥८.१४ “कुमार फिर लौट आये हैं” यह सोचकर स्त्रियाँ खिड़कियों के सामने आ गईं; और घोड़े की पीठ खाली देखकर फिर खिड़कियों को बन्द कर के रोने लगीं ॥14॥ प्रविष्टदीक्षस्तु सुतोपलब्धये व्रतेन शोकेन च खिन्नमानसः। जजाप देवायतने नराधिपश्चकार तास्ताश्च यथाशयाः क्रियाः ॥८.१५ पुत्र की प्राप्ति के लिए दीक्षा ग्रहण कर, व्रत व शोक से खिन्नचित्त राजा ने देव-मन्दिर में जप किया और अपने आशय के अनुरूप भाँति-भाँति की क्रियाएँ कीं ॥15॥ ततः स बाष्पप्रतिपूर्णलोचनस्तुरङ्गमादाय तुरङ्गमानुसः। विवेश शोकाभिहतो नृपक्षयं युधापिनीते रिपुणेव भर्तरि ॥८.१६ तब आँसू-भरी आँखों से उस अश्वरक्षक ने घोड़े को लिवाते हुए कातर होकर राज-महल में प्रवेश किया, जैसे योद्धा शत्रु के द्वारा उसके स्वामी का अपहरण कर लिया गया हो ॥16॥ विगाहमानश्च नरेन्द्रमन्दिरं विलोकयन्नश्रुवहेन चक्षुषा। स्वरेण पुष्टेन रुराव कन्थको जनाय दुःखं प्रतिवेदयन्निव ॥८.१७ राज-महल में प्रवेश करता हुआ, आँसू-भरी आँखों से देखता हुआ कन्थक जोर से हिनहिनाया, मानो लोगों से वह (अपना) दुःख निवेदन कर रहा हो ॥17॥ ततः खगाश्च क्षयमध्यगोचराः समीपबद्धास्तुरगाश्च सत्कृताः। हयस्य तस्य प्रतिसस्वनुः स्वनं नरेन्द्रसूनोरुपयानशङ्किनः ॥८.१८ तब महल के बीच रहनेवाले पक्षियों ने और समीप में बँधे हुए सत्कृत (=प्रिय) घोड़ों ने उस घोड़े के हिनहिनाने के प्रति शब्द किया, यह जानकर कि शायद राजकुमार आ रहा है ॥18॥ जनाश्च हर्षातिशयेन वञ्चिता जनाधिपान्तःपुरसन्मिकर्षगाः। यथा हयः कन्थक एष हेषते ध्रुवं कुमारो विशतीति मेनिरे ॥८.१९ “यह कन्थक घोड़ा जिस प्रकार से हिनहिना रहा है, इससे यह प्रकट है कि कुमार निश्चय ही प्रवेश कर रहा है”—ऐसा मानकर राजा के अन्तःपुर के समीप जानेवाले लोग अतिशय हर्ष से उछलने लगे ॥19॥ अतिप्रहर्षादथ शोकमूर्च्छिताः कुमारसन्दर्शनलोललोचनाः। गृहाद्विनिश्चक्रमुरशया स्त्रियः शरदपयोदादिव विद्युतश्चलाः ॥८.२० स्त्रियाँ, जो शोक से मूर्च्छित थीं, अति आनन्दित हुईं। कुमार को देखने की लालसा से उनकी आँखें चञ्चल हो उठीं, आशा के साथ वे घर से निकल आईं, जैसे शरत्काल के बादल से चपल बिजली (निकल आवे) ॥20॥ विलम्बवेश्यो मलिनांशुकाम्बरा निरञ्जनैर्बाष्पहतेक्षणैर्मुखैः। स्त्रियो न रेजुर्मृजया विनाकृता दिवीव तारा रजनीक्षयारुणाः ॥८.२१ उनके केशपाश लटक रहे थे, बारीक कपड़े मलिन थे, मुखों में अंजन नहीं था, आँखें आँसुओं से आकुल थीं; सिङ्गार किये बिना स्त्रियाँ शोभित नहीं हुईं, जैसे रात बीतनेपर आकाश में फीके तारे ॥21॥ अरक्ताम्रैश्चरणैरनूपुरैर्मुखैरजकुण्डलैरवज्रकुण्डलैश्चरैर्मुखैः। स्वभावपीनैर्जघनैरमेखलैर्हरहारयोक्तैर्मुषितैरिव स्तनैः ॥८.२२ उनके पाँव महावर से रङ्गे नहीं थे, उनके नूपुर भी नहीं थे, मुख (कानों के) कुण्डलों से रहित थे, गले अनलङ्कृत थे, स्वभाव से मोटी जाँघें मेखला रहित थीं, हार व योक्त (=सूत्र ?) से रहित स्तन लुटे-से थे ॥22॥ निरीक्ष्य ता बाष्परीतलोचना निराश्रयं छन्दकमश्वमेव च। विषण्णवक्त्रा रुरुदुर्वरस्त्रियः वनान्तरे गाव इवर्षभोझिताः ॥८.२३ अश्रु-पूर्ण आँखों से छन्दक और घोड़े को स्वामी के बिना देखकर वे उत्तम स्त्रियाँ विषण्णवदन होकर रोईं, जैसे वन के भीतर साँड़ से परित्यक्त गाएँ ॥23॥ ततः सबाष्पा महिषी महीपतेः प्रनष्टवत्सा महिषीव वत्सला। प्रगृह्य बाहू निपपात गौतमी विलोलपर्णा कदलीव काञ्चनी ॥८.२४ तब रोती हुई राजा की पटरानी गौतमी, जो उस महिषी के समान (अपने पुत्र के लिए) वत्सल थी जिसका बछड़ा नष्ट हो गया हो, भुजाएँ फेंककर, हिलते पत्तेवाली सोने की कदली के समान गिर पड़ी ॥24॥ हतात्विषोऽन्याः शिथिलांसबाहवः स्त्रियो विषादेन विचेतना इव। न चुक्रुशुर्नाश्रु जहुर्न शश्वसुर्न चेलुरासूर्लिखिता इव स्थिताः ॥८.२५ अन्य निष्प्रभ स्त्रियों ने, जिनके कन्धे व भुजाएँ शिथिल थीं, विषाद से मानो बेहोश होकर न विलाप किया, न आँसू बहाये, न साँसें लीं, और न हिली-डुलीं ही; केवल चित्रित-सी खड़ी रहीं ॥25॥ अधीरमन्याः पतिशोकमूर्च्छिता विलोचनप्रस्रवणैर्मुखैः स्त्रियः। सिषिञ्चिरे प्रोषितचन्दनान् स्तनान्धराधरः प्रस्रवणैरिवोपलान् ॥८.२६ दूसरी स्त्रियों ने, जो अधीर होकर पति के शोक से मूर्च्छित थीं, नेत्र-निर्झर मुखों से चन्दन-शून्य स्तनों को सींचा, जैसे पर्वत अपने झरनों से शिलाओं को (सींचता है) ॥26॥
42 अश्वघोष