भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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हंस से वियुक्त हंसी के समान, हाथी से वन में परित्यक्त हथिनी के समान, आर्त पत्नी को, जो सनाथा होनेपर भी अनाथा है, तुम्हें दर्शन देकर बचाना चाहिए ॥२7 ॥ एकं सुतं बालमनर्हदुःखं सन्तापमन्तर्गतमुद्वहन्तम् । तं राहुलं मोक्षय बन्धुशोकाद्ग्राहूपसर्गादिव पूर्णचन्द्रम् ॥९.२८ एकमात्र बाल-पुत्र, जो दुःख के योग्य नही है, भीतरी सन्ताप वहन कर रहा है। उस राहुल को पितृ-शोक से मुक्त करो, जैसे राहु के ग्रहण से पूर्ण चन्द्र को (मुक्त किया जाय) ॥२8 ॥ शोकाग्निना त्वद्विरहेन्धनेन निःश्वासधूमेन तमःशिखेन। त्वद्दर्शनाम्ब्विच्छति दह्यमानमन्तःपुरं चैव पुरं च कृत्स्नम् ॥९.२९ शोकरूप अग्नि से, जिसका ईंधन तुम्हारा विरह है, जिसका धुआँ लम्बी साँसें हैं, जिसकी शिखा अन्धकार है, जलता हुआ अन्तःपुर और सम्पूर्ण नगर तुम्हारे दर्शन-जल की इच्छा कर रहे हैं।" ॥२9 ॥ स बोधिसत्त्वः परिपूर्णसत्त्वः श्रुत्वा वचस्तस्य पुरोहितस्य । ध्यात्वा मुहूर्तं गुणवद्गुणज्ञः प्रत्युत्तरं प्रश्रितमित्युवाच ॥९.३० उस पुरोहित का वचन सुनकर धैर्यशाली, गुणवान् व गुणज्ञ बोधिसत्त्व ने मुहूर्त भर ध्यान किया और विनय-युक्त यह उत्तर दियाः— ॥30 ॥ अवैमि भावं तनये पितॄणां विशेषतो यो मयि भूमिपस्य । जानन्नपि व्याधिजराविपद्भ्यो भीतस्त्वगत्या स्वजनं त्यजामि ॥९.३१ “पुत्र के प्रति पिता का भाव जानता हूँ, विशेषकर मेरे प्रति राजा का जो (भाव) है; यह जानता हुआ भी मैं रोग, बुढ़ापे व मौत से डरकर, (अन्य) उपाय के अभाव में स्वजन को छोड़ रहा हूँ ॥31 ॥ द्रष्टुं प्रियं कः स्वजनं हि नेच्छेन्नान्ते यदि स्यात्प्रियविप्रयोगः । यदा तु भूत्वापि चिरं वियोगस्ततो गुरुं स्निग्धमपि त्यजामि ॥९.३२ यदि अन्त में वियोग न हो, तो प्यारे स्वजन को देखना कौन नही चाहेगा? जब कि देर होकर भी वियोग होता ही है, इसलिए स्नेही पिता को भी छोड़ रहा हूँ ॥32 ॥ मद्धेतुकं यत्तु नराधिपस्य शोकं भवानह न तत्प्रियं मे । यत्स्वप्नभूतेषु समागमेषु सन्तप्यते भाविनि विप्रयोगे ॥९.३३ मेरे कारण हुआ राजा का शोक आपने जो कहा वह मुझे प्रिय नही; क्योंकि समागम स्वप्न-सदृश होनेपर और वियोग अवश्यम्भावी होनेपर वह सन्ताप कर रहे हैं ॥33 ॥ एवं च ते निश्चयमेतु बुद्धिर्दृष्ट्वा विचित्रं जगतः प्रचारम् । सन्तापहेतुर्न सुतो न बन्धुरज्ञाननैमित्तिक एष तापः ॥९.३४ जगत् की विचित्र गति देखकर, आपकी बुद्धि इस प्रकार निश्चय करे—सन्ताप का कारण न पुत्र है न पिता, इस सन्ताप का कारण निमित्त अज्ञान है ॥34 ॥ यथाध्वगानामिहं सङ्गतानां काले वियोगो नियतः प्रजानाम् । प्राज्ञो जनः को नु भजेत शोकं बन्धुप्रतिज्ञातजनैर्विहीनः ॥९.३५ पथिकों के समान, इस संसार में, सम्मिलित हुए लोगों का वियोग नियत है; अतः बन्धु समझे जानेवाले लोगों से वियुक्त होकर कौन ज्ञानीजन शोक करे ॥35 ॥ इहैति हित्वा स्वजनं परत्र प्रलभ्य चेहापि पुनः प्रयाति । गत्वापि तत्राप्यपरत्र गच्छत्येवं जने त्यागिनि कोऽनुरोधः ॥९.३६ पूर्व जन्म में स्वजन को छोड़कर मनुष्य यहाँ आता है और फिर यहाँ से भी (स्वजन को) ठगकर वह यहाँ से (परलोक) चला जाता है, वहाँ भी जाकर वहाँ से अन्यत्र चला जाता है; इस प्रकार परित्याग करनेवाले आदमी में आसक्ति क्यों की जाय? ॥36 ॥ यदा च गर्भात्प्रभृति प्रवृत्तः सर्वास्ववस्थासु वधाय मृत्युः । कस्मादकाले वनसंश्रयं मे पुत्रप्रियस्तत्प्रभवानवोचत् ॥९.३७ और जब गर्भ से लेकर सब अवस्थाओं में मौत मारने के लिए तैयार रहती है, तब क्यों पुत्र-प्रिय पूज्य (पिताजी) ने कहा कि मैं अकाल में वन का आश्रय ले रहा हूँ ॥37 ॥ भवत्यकालो विषयाभिपत्तौ कालस्तथैवार्थविधौ प्रदिष्टः । कालो जगत्कर्षति सर्वकालान्निर्वाहके श्रेयसि नास्ति कालः ॥९.३८ विषय-सेवन के लिए अकाल होता है, उसी प्रकार धन (= अर्जन) के उपाय के लिए समय निर्दिष्ट है, सब समय में काल संसार को लाचार करता रहा है, मोक्ष-प्रद कल्याण के लिए (कोई निश्चित) समय नही है ॥38 ॥ राज्यं मुमुक्षुर्मयि यच्च राजा तदप्युदारं सदृशं पितुश्च । प्रतिग्रहीतुं मम न क्षमं तु लोभादपथ्यान्नमिवातुरस्य ॥९.३९ मेरे ऊपर राजा राज्य छोड़ना चाहते हैं यह उनकी उदारता है और पिता के अनुरूप है; किन्तु मेरे लिए इसे ग्रहण करना ठीक नही, जैसे रोगी के लिए लोभ से अपथ्य अन्न ग्रहण करना ठीक नही ॥39 ॥ कथं नु मोहायतनं नृपत्वं क्षमं प्रपत्तुं विदुषा नरेण । सोद्वेगता यत्र मदः श्रमश्च परापचारेण च धर्मपीडा ॥९.४० किस प्रकार विद्वान् आदमी के लिए उस राजत्व का सेवन करना उचित नही है, जो मोह का मन्दिर है, जहाँ उद्वेग, मद व थकावट हैं, और जहाँ दूसरों पर अनाचार करने से धर्म में बाधा होती है? ॥40 ॥ जाम्बूनदं हर्म्यमिव प्रदीप्तं विषेण संयुक्तमिवोत्तमान्नम् । ग्राहकुलं चाम्ब्विव सारविन्दं राज्यं हि रम्यं व्यसनाश्रयं च ॥९.४१ सोने के जलते महल के समान, विष-युक्त उत्तम भोजन के समान, घडियालों से भरे कमल-युक्त जलाशय के समान, राज्य रमणीय है और विपत्तियों का आश्रय है ॥41 ॥ बुद्धचरित 49