बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 50, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ेंइत्थं च राज्यं न सुखं न धर्मः पूर्वै यथा जातघृणा नरेन्द्रैः। वयःप्रकर्षेऽपरिहार्यदुःखे राज्यानि मुक्त्वा वनमेव जग्मुः ॥९.४२ इस प्रकार, राज्य से न सुख होता है, न धर्म; पूर्व में घृणा (=अरूचि) उत्पन्न होनेपर राजा लोग वृद्धावस्था में, जिसमें दुःख अवश्यम्भावी है, राज्य छोड़कर वन को ही गये ॥42॥ वरं हि भुक्तानि तृणान्यरण्ये तोषं परं रत्नमिवोपगृह्य। सहोषितं श्रीसुलभैर्न चैव दोषैर्दृश्यैरिव कृष्णसर्पैः ॥९.४३ जङ्गल में तृण खाकर मानो रत्न-स्पर्श का परम सन्तोष पाना अच्छा है, न कि श्री-सुलभ उन दोषों के साथ रहना जो कृष्ण-सर्पों के समान देखे जाने योग्य नही ॥43॥ श्लाघ्यं हि राज्यानि विहाय राज्ञां धर्माभिलाषेण वनं प्रवेष्टुम्। भग्नप्रतिज्ञस्य न तूपपन्नं वनं परित्यज्य गृहं प्रवेष्टुम् ॥९.४४ राज्य छोड़कर धर्म की अभिलाषा से राजाओं का वन में प्रवेश करना श्लाघ्य हैं; किन्तु प्रतिज्ञा तोड़ करके, वन छोड़कर, घर में प्रवेश करना उचित नहीं ॥44॥ जातः कुले को हि नरः ससत्त्वो धर्माभिलाषेण वनं प्रविष्टः। काषायमुत्सृज्य विमुक्तलज्जः पुरन्दरस्यापि पुरं श्रयेत ॥९.४५ (उत्तम) कुल में उत्पन्न कौन धैर्यशाली आदमी, जिसने धर्म की अभिलाषा से वन में प्रवेश किया है, काषाय-वस्त्र छोड़, निर्लज्ज हो इन्द्र के भी नगर में जायगा? ॥45॥ लोभाद्धि मोहादथवा भयेन यो वान्तमन्नं पुनराददीत। लोभात्स मोहादथवा भयेन सन्त्यज्य कामान् पुनराददीत ॥९.४६ लोभ से, मोह से अथवा भय से जो उगले हुए अन्न को फिर ग्रहण करेगा, वही लोभ से, मोह अथवा भय से काम-भोगों को छोड़कर फिर ग्रहण करेगा? ॥46॥ यश्च प्रदीप्ताच्छरणात्कथञ्चिन्निष्क्रम्य भूयः प्रविशेत्तदेव। गार्हस्थ्यमुत्सृज्य स दृष्टदोषो मोहेन भूयोऽभिलषेद्ग्रहीतुम् ॥९.४७ और, जो जलते घर से किसी प्रकार निकलकर फिर उसी में प्रवेश करे वही मनुष्य, दोष देखकर गार्हस्थ्य (= घर में रहना) छोड़ने के बाद, मोह से फिर उसे ग्रहण करना चाहेगा? ॥47॥⁴² ⁴²- नेपाल दरबार के हस्तलिखित ग्रन्थ में 47 के बाद और तिब्बती अनुवाद में 49 के बाद निम्नलिखित पद्य है— वह्नेश्च तोयस्य च नास्ति संधिः शठस्य सत्यस्य च नास्ति संधिः। आर्यस्य पापस्य च नास्ति संधिः शमस्य दण्डस्य च नास्ति संधिः॥ अग्नि और जल का मेल नहीं है, शठ और सत्य का मेल नहीं है, आर्य और पाप का मेल नहीं है, शम और दण्ड का मेल नहीं है। या च श्रुतिर्मोक्षमवाप्तवन्तो नृपा गृहस्था इति नैतदस्ति। शमप्रधानः क्व च मोक्षधर्मो दण्डप्रधानः क्व च राजधर्मः ॥९.४८ यह (जन-) श्रुति कि गृहस्थ (= घर में रहते हुए) राजाओं ने मोक्ष पाया, यह सच नही है, कहाँ शम- प्रधान मोक्ष-धर्म और कहाँ दण्ड-प्रधान राज-धर्म ॥48॥ शमे रतिश्चेच्छिथिलं च राज्यं राज्ये मतिश्चेच्छमविप्लवश्च। शमश्च तीक्ष्ण्यं च हि नोपपन्नं शीतोष्णयोरेक्यमिवोदकाग्न्योः ॥९.४९ यदि शम (= शान्ति) में रति हो, तो राज्य शिथिल होगा; यदि राज्य में मति हो, तो शान्ति में विप्लव होगा। शान्ति व तीक्ष्णता का मेल नही, जैसे शीतल जल व गर्म आग की एकता नही होती ॥49॥ तन्निश्चयाद्वा वसुधाधिपास्ते राज्यानि मुक्त्वा शममाप्तवन्तः। राज्याङ्गिता वा निभृतेन्द्रियत्वादन्नैष्ठिके मोक्षकृताभिमानाः ॥९.५० इसलिए उन वसुधाधिपों ने या तो निश्चय-पूर्वक राज्य छोड़कर शम प्राप्त किया, या राज्य के स्वामी होकर (केवल) इन्द्रिय-संयम होने के कारण अनैष्ठिक अवस्था में ही मोक्ष पाने का अभिमान किया ॥50॥⁴³ तेषां च राज्येऽस्तु शमो यथावत्प्राप्तो वनं नाहमनिश्चयेन। छित्त्वा हि पाशं गृहबन्धुसञ्ज्ञं मुक्तः पुनर्न प्रविविक्षुरस्मि ॥९.५१ उन्हें राज्य में सम्यक् शान्ति मिली हो, मैंने अनिश्चय से वन में प्रवेश नही किया है। गृह व बन्धु नामक बन्धन काटकर मुक्त हुआ मैं फिर (बन्धन में) प्रवेश करना नही चाहता हूँ।" ॥51॥ इत्यात्मविज्ञानगुणानुरूपं मुक्तस्पृहं हेतुमदूर्जितं च। श्रुत्वा नरेन्द्रात्मजमुक्तवन्तं प्रत्युत्तरं मन्त्रधरोऽप्युवाच ॥९.५२ इस तरह राजा के पुत्र का अपने ज्ञान व गुणों के अनुरूप निरभिलाष युक्तियुक्त व बलवान् उत्तर सुनकर, मन्त्री ने भी प्रति-उत्तर दिया:— ॥52॥ यो निश्चयो धर्मविधौ तवायं नायं न युक्तो न तु कालयुक्तः। शोकाय दत्वा पितरं वयःस्थं स्याद्धर्मकामस्य हि ते न धर्मः ॥९.५३ “धर्म के उपाय के लिए तुम्हारा जो यह निश्चय है, यह अनुचित नही; किन्तु यह समय इसके लिए उचित नही। वृद्ध पिता को शोक देकर, तुझ धर्माभिलाषी को धर्म नही हो सकता ॥53॥ नूनं च बुद्धिस्तव नातिसूक्ष्मा धर्मार्थकामेष्वविचक्षणा वा। हेतोरदृष्टस्य फलस्य यस्त्वं प्रत्यक्ष्रमर्थ परिभूय यासि ॥९.५४ अवश्य ही धर्म, अर्थ व काम में तुम्हारी बुद्धि या तो अति सूक्ष्म नही, या मन्द है, जो अदृष्ट फल के हेतु तुम प्रत्यक्ष अर्थ (वस्तु) का तिरस्कार करके जा रहे हो ॥54॥ ⁴³- ग-पा० 'राज्याश्रिता'-जौन्स्टन। 50 अश्वघोष