बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुनर्भ वोऽस्तीति च केचिदाहुर्नास्तीति केचिन्नियतप्रतिज्ञाः । एवं यदा संशयितोऽयमर्थस्तस्मात्क्षमं भोक्तुमुपस्थिता श्रीः ॥९.५५ कुछ लोग कहते हैं कि पुनर्जन्म है, कुछ लोग प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं नहीं है। इस तरह जब यह बात संशय-युक्त है, तब उपस्थित श्री का भोग करना ही ठीक है ॥55॥ भूयः प्रवृत्तिर्यदि काचिदस्ति रंस्यामहे तत्र यथोपपत्तौ । अथ प्रवृत्तिः परतो न काचित्सिद्धोऽप्रयत्नाज्जगतोऽस्य मोक्षः ॥९.५६ यदि फिर कोई प्रवृत्ति है, तो वहाँ और कुछ मिलेगा उसी में हम रमेंगे। यदि इससे परे कोई प्रवृत्ति नहीं है, तो इस जगत् का मोक्ष अनायास ही सिद्ध है ॥56॥ अस्तीति केचित्परलोकमाहुर्मोक्षस्य योगं न तु वर्णयन्ति । अग्नेर्यथा ह्यौष्ण्यमपां द्रवत्वं तद्वत्प्रवृत्तौ प्रकृतिं वदन्ति ॥९.५७ कोई कहते हैं कि परलोक है, किन्तु मोक्ष का उपाय नहीं बताते हैं। वे कहते हैं जैसे अग्नि में उष्णता है, पानी में द्रवत्व है वैसे ही प्रवृत्ति में प्रकृति (=स्वभाव) है ॥57॥ केचित्स्वभावादिति वर्णयन्ति शुभाशुभं चैव भवाभवौ च । स्वाभाविकं सर्वमिदं च यस्मादतोऽपि मोघो भवति प्रयत्नः ॥९.५८ कोई बताते हैं कि शुभ-अशुभ और उत्पत्ति-अनुत्पत्ति स्वभाव से होती है। क्योंकि यह सब स्वाभाविक है, इसलिए भी प्रयत्न व्यर्थ है ॥58॥ यदिन्द्रियाणां नियतः प्रचारः प्रियाप्रियत्वं विषयेषु चैव। संयुज्यते यज्जरयार्तिभिश्च कस्तत्र यत्नो ननु स स्वभावः ॥९.५९ इन्द्रियों का चलना (=काम करना) नियत है, प्रिय व अप्रिय लगना (इन्द्रिय-) विषयों में हैं और लोग बुढ़ापे में व रोग से युक्त होते हैं। इन सबमें यत्न क्या? वह तो स्वभाव है ॥59॥ अद्भिर्हुताशः शममभ्युपैति तेजांसि चापो गमयन्ति शोषम् । भिन्नानि भूतानि शरीरसंस्थान्यैक्यं च गत्त्वा जगदुद्वहन्ति ॥९.६० जल में अग्नि शान्त होती है और तेज जल को सोखते हैं। शरीर में स्थित (पाँचों) तत्त्व (स्वभाव से) पृथक्-पृथक् हैं और एक होकर जगत् को बनाते हैं ॥60॥ यत्पाणिपादोदरपृष्ठमूर्ध्नां निर्वर्तते गर्भगतस्य भावः । यदात्मनस्तस्य च तेन योगः स्वाभाविकं तत्कथयन्ति तज्ज्ञाः ॥९.६१ गर्भ में जानेपर (व्यक्ति के) हाथ, पाँव, पेट व मस्तक होते हैं, आत्मा से उसका योग होता है, पण्डित यह सब स्वाभाविक बताते हैं ॥61॥ कः कण्टकस्य प्रकरोति तैक्ष्ण्यं विचित्रभावं मृगपक्षिणां वा । स्वभावतः सर्वमिदं प्रवृत्तं न कामकारोऽस्ति कुतः प्रयत्नः ॥९.६२ कौन काँटे की तीक्ष्णता या पशु-पक्षियों की विचित्रता (का सृजन) करता है? यह सब स्वभाव से हुआ है, अपनी इच्छा काम नहीं करती, प्रयत्न कहाँ से? ॥62॥ सर्गं वदन्तीश्वरतस्तथान्ये तत्र प्रयत्ने पुरुषस्य कोऽर्थः । य एव हेतुर्जगतः प्रवृत्तौ हेतुर्निवृत्तौ नियतः स एव ॥९.६३ उसी तरह दूसरे कहते हैं ईश्वर से सृष्टि होती है, उसमें पुरुष के प्रयत्न का क्या प्रयोजन? जगत् की प्रवृत्ति में जो कोई भी हेतु है, निश्चय ही उसकी निवृत्ति में भी वही हेतु है ॥63॥ केचिद्वदन्त्यात्मनिमित्तमेव प्रादुर्भवं चैव भवक्षयं च । प्रादुर्भवं तु प्रवदन्त्यनाद्यत्नेन मोक्षाधिगमं ब्रुवन्ति ॥९.६४ कोई कहते हैं जन्म व विनाश का निमित्त आत्मा ही है। वे कहते हैं कि जन्म बिना यत्न के होता है और मोक्ष-प्राप्ति यत्न से होती है ॥64॥ नरः पितॄणामनृणः प्रजाभिर्वेदर्ऋषीणां ऋतुभिः सुराणाम् । उत्पद्यत सार्धमृणैस्त्रिभिस्तैर्यस्यास्ति मोक्षः किल तस्य मोक्षः ॥९.६५ मनुष्य सन्तान द्वारा पितृ-ऋण से, वेद द्वारा ऋषि-ऋण से और यज्ञ द्वारा देव-ऋण से मुक्त होता है, वह तीन ऋणों के साथ उत्पन्न होता है, जो उनसे मुक्त होता है उसी को मोक्ष है ॥65॥ इत्येवमेतेन विधिक्रमेण मोक्षं सयत्नस्य वदन्ति तज्ज्ञाः । प्रयत्नवन्तोऽपि हि विक्रमेण मुमुक्षवः खेदमवाप्नुवन्ति ॥९.६६ इस प्रकार इस विधि-क्रम से यत्न करनेवाले को मोक्ष मिलता है, ऐसा पण्डित कहते हैं, अपनी शक्ति से मोक्ष चाहनेवाले प्रयत्न करनेपर भी थकावट ही पाते हैं ॥66॥ तत्सौम्य मोक्षे यदि भक्तिरस्ति न्यायेन सेवस्व विधिं यथोक्तम् । एवं भविष्यत्युपपत्तिरस्य सन्तापनाशश्च नराधिपस्य ॥९.६७ इसलिए हे सौम्य, यदि मोक्ष में भक्ति हो, तो कही गई विधि का उचित रीति से सेवन करो; इस प्रकार इसकी प्राप्ति होगी और राजा का सन्ताप-नाश होगा ॥67॥ या च प्रवृत्ता तव दोषबुद्धिस्तपोवनेभ्यो भवनं प्रवेष्टुम् । तत्रापि चिन्ता तव तात मा भूत् पूर्वेऽपि जग्मुः स्वगृहान्वनेभ्यः ॥९.६८ तपोवन से घर प्रवेश करने में तुम जो दोष समझते हो, उसके लिए भी, हे तात, तुम्हें चिन्ता न करनी चाहिए; पूर्व में भी लोग वन से अपने घर गये हैं ॥68॥ तपोवनस्थोऽपि वृतः प्रजाभिर्जगाम राजा पुरमम्बरीषः । तथा महीँ विप्रकृतामनायैस्तपोवनादेत्य ररक्ष रामः ॥९.६९ तपोवन में रहनेपर भी राजा अम्बरीष प्रजाओं से घिरकर नगर को गया। उसी प्रकार अनार्यों से सताई जाती पृथ्वी की रक्षा राम ने वन से आकर की ॥69॥ बुद्धचरित 51