बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथैव शाल्वाधिपतिर्द्रुमाख्यो वनात्ससूनुर्नगरं विवेश । ब्रह्मर्षिभूतश्च मुनेर्वसिष्ठाद्रेभे श्रियं सांकृतिरन्तिदेवः ॥९.७० उसी प्रकार द्रुमनामक शाल्व-राज ने पुत्र के साथ वन से नगर में प्रवेश किया और ब्रह्मर्षि हुए सांकृति अन्तिदेव ने मुनि वसिष्ठ से राज्य-लक्ष्मी ग्रहण की ॥70 ॥ एवंविधा धर्मयशःप्रदीप्ता वनानि हित्वा भवनान्यतीयुः । तस्मान्न दोषोऽस्ति गृहं प्रयातु तपोवनाद्धर्मनिमित्तमेव ॥९.७१ धर्म के यश से जलते हुए ऐसे व्यक्ति वन छोड़कर घर गये। इसलिए धर्म के निमित्त ही तपोवन से घर जाने में दोष नहीं है।" ॥71 ॥ ततो वचस्तस्य निशम्य मन्त्रिणः प्रियं हितं चैव नृपस्य चक्षुषः । अनूनमव्यक्तमसक्तमद्रुतं धृतौ स्थितो राजसुतोऽब्रवीद्वचः ॥९.७२ तब राजा के नेत्रस्वरूप उस मन्त्री का प्रिय व हितकारी वचन सुनकर, राजा के पुत्र ने धैर्यपूर्वक परिपूर्ण, सुलझा हुआ, आसक्ति-रहित व ठोस उत्तर दियाः- ॥72 ॥ इहास्ति नास्तीति य एष संशयः परस्य वाक्यैर्न ममात्र निश्चयः । अवेत्य तत्त्वं तपसा शमेन च स्वयं ग्रहीष्यामि यदत्र निश्चितम् ॥९.७३ है, नहीं है, इस संसार में जो यह संशय है, इसमें दूसरों के वचन से मुझे निश्चय नहीं होगा। तपस्या और शान्ति से तत्त्व को जानकर इस विषय में जो निश्चय होगा वह मैं स्वयं ग्रहण करूँगा ॥73 ॥ न मे क्षमं संशयजं हि दर्शनं ग्रहीतुमव्यक्तपरस्पराहतम् । बुद्धः परप्रत्ययतो हि को व्रजेज्जनोऽन्धकारेऽन्ध इवान्धदेशिकः ॥९.७४ संशय से उत्पन्न, अस्पष्ट व परस्पर-विरोधी दर्शन ग्रहण करना मेरे लिए ठीक नहीं। अँधेरे में अन्धा गुरुवाले अन्धे के समान कौन बुद्धिमान् दूसरों पर विश्वास कर चलेगा? ॥74 ॥ अदृष्टतत्त्वस्य सतोऽपि किं तु मे शुभाशुभे संशयिते शुभे मतिः । वृथापि खेदो हि वरं शुभात्मनः सुखं न तत्त्वेऽपि विगर्हितातमनः ॥९.७५ यद्यपि मैंने तत्त्व को नहीं देखा है, तो भी शुभ व अशुभ संशययुक्त होनेपर शुभ में मेरी मति है। शुभात्मा (= शुभ में लगे हुए) का वृथा श्रम अच्छा है न कि अशुभात्मा का सुख, यदि वास्तव में वह सुख हो तो भी ॥75 ॥ इमं तु दृष्ट्वागममव्यवस्थितं यदुक्तमाप्तैस्तदवेहि साध्विति । प्रहीणदोषत्वमवेहि चासतां प्रहीणदोषो ह्यनृतं न वक्ष्यति ॥९.७६ इस शास्त्र को अव्यवस्थित देख रहे हैं, अतः आप्त-जनों ने जो कहा उसे ही ठीक समझिए और दोष- विनाश ही आप्तता है, क्योंकि जिसका दोष नष्ट हो गया है वह झूठ नहीं कहेगा ॥76 ॥ गृहप्रवेशं प्रति यच्च मे भवानुवाच रामप्रभृतिन्निदर्शनम् । न ते प्रमाणं न हि धर्मनिश्चयेष्वलं प्रमाणाय परिक्षतव्रताः ॥९.७७ घर जाने के बारे में आपने राम आदि के जो उदाहरण दिये वे प्रमाण नहीं हैं; क्योंकि धर्म के निश्चय में वे प्रमाण नहीं हो सकते जिनका व्रत भङ्ग हो गया ॥77 ॥ तदेवमप्येव रविर्महीं पतेदपि स्थिरत्वं हिमवान् गिरिस्त्यजेत् । अदृष्टतत्त्वो विषयोन्मुखेन्द्रियः श्रयेय न त्वेव गृहान् पृथग्जनः ॥९.७८ इसलिए यदि सूर्य पृथ्वी पर गिर पड़े, हिमालय पर्वत अपनी स्थिरता छोड़ दे, तो भी तत्त्व को देखे बिना इन्द्रियों को विषयाभिमुख कर, मैं अज्ञानी घर नहीं जा सकता ॥78 ॥ अहं विशेयं ज्वलितं हुताशनं न चाकृतार्थः प्रविशेयमालयम् । इति प्रतिज्ञां स चकार गर्वितो यथेष्टमुत्थाय च निर्ममो ययौ ॥९.७९ जलती आग में मैं प्रवेश करूँगा, किन्तु असफल होकर घर में प्रवेश नहीं करूँगा।" अभिमानपूर्वक उसने यह प्रतिज्ञा की और इच्छानुसार उठकर वह निर्मम चला गया ॥79 ॥ ततः सबाष्पौ सचिवद्विजावुभौ निशम्य तस्य स्थिरमेव निश्चयम् । विषण्णवक्त्रावनुगम्य दुःखितौ शनैर्गत्या पुरमेव जग्मतुः ॥९.८० तब उसका स्थिर निश्चय सुनकर, रोते हुए मन्त्री और विप्र विषण्ण-मुख व दुःखी होकर पीछे-पीछे गये, तब उपाय के अभाव में वे धीरे-धीरे नगर की ही ओर चले ॥80 ॥ तत्स्नेहादथ नृपतेश्च भक्तितस्तौ सापेक्षां प्रतिययतुश्च तस्थतुश्च । दुर्धर्षं रविमिव दीप्तमात्मभासा तं द्रष्टुं न हि पथि शेक्तुर्न मोक्तुम् ॥९.८१ तब उसके स्नेह से और राजा की भक्ति से वे दोनों उत्कण्ठित होकर लौटे और ठहर गये। आत्मतेज से चमकते सूर्य के समान उस दुर्धर्ष को रास्ते में वे न देख सकते थे, न छोड़ सकते थे ॥81 ॥ तौ ज्ञातुं परमगतेर्गतिं तु तस्य प्रच्छन्नांश्चरपुरुषान्शुचीन्विधाय । राजानं प्रियसुतलालसं नु गत्वा द्रक्ष्यावः कथमिति जग्मतुः कथञ्चित् ॥९.८२ उस परमगति की गति जानने के लिए उन्होंने पवित्र गुप्तचर रक्खे और "प्रिय पुत्र के लिए उत्सुक राजा को जाकर कैसे देखेंगे", यह सोचते हुए वे किसी-किसी तरह गये ॥82 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्ये कुमारान्वेषणो नाम नवमः सर्गः ॥९ ॥ दशम सर्ग श्रेण्य का आगमन स राजवत्सः पृथूपीनवक्षास्तौ हव्यमन्त्राधिकृतौ विहाय । उत्तीर्य गङ्गां प्रचलत्तरङ्गां श्रीमद्गृहं राजगृहं जगाम ॥१०.१ हवन और मन्त्रणा के उन अधिकारियों को छोड़कर, चौड़ी व मोटी छातीवाला वह राज-कुमार चञ्चल तरङ्गोंवाली गङ्गा को पारकर, श्रीसम्पन्न गृहों से युक्त राजगृह को गया ॥1 ॥
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