बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशैलैः सुगुप्तं च विभूषितं च धृतं च पूतं च शिवैस्तपोदैः । पञ्चाचलाङ्कं नगरं प्रपेदे शान्तः स्वयम्भूरिव नाकपृष्ठम् ॥१०.२ पर्वतों से सुरक्षित व विभूषित तथा कल्याण-कारी तपोदों (= गर्म जल के झरनों) से धारण और पवित्र किये गये नगर में, जो पाँच पहाड़ों से चिह्नित है, उसने शान्त होकर प्रवेश किया, जैसे स्वर्ग में स्वयंभू (प्रवेश कर रहा हो) ॥२॥ गाम्भीर्यमोजश्च निशाम्य तस्य वपुश्च दीप्तं पुरुषानतीत्य । विसिस्मिये तत्र जनस्तदानीं स्थाणुव्रतस्येव वृषध्वजस्य ॥१०.३ कठोर-व्रत धारी शिव का-सा उसका गाम्भीर्य, ओज तथा असाधारण दीप्त रूप देखकर लोग उस समय वहाँ विस्मित हुए ॥३॥ तं प्रेक्ष्य योऽन्येन ययौ स तस्थौ यस्तत्र तस्थौ पथि सोऽन्वगच्छत् । द्रुतं ययौ यः स जगाम धीरं यः कश्चिदास्ते स्म स चोत्पपात ॥१०.४ उसे देखकर, जो दूसरी ओर जा रहा था वह ठहर गया, जो वहाँ रास्ते में ठहरा हुआ था वह पीछे-पीछे गया, जो धीरे-धीरे जा रहा था वह शीघ्रता से गया, जो कोई बैठा हुआ था वह उछल पड़ा ॥४॥ कश्चित्त्मानर्च जनः कराभ्यां सत्कृत्य कश्चिच्छिरसा ववन्दे । स्निग्धेन कश्चिद्वचसाभ्यनन्दन्नैवं जगामाप्रतिपूज्य कश्चित् ॥१०.५ किसी ने हाथ जोड़कर उसकी पूजा की, किसी ने शिर से प्रणाम कर सत्कार किया, किसी ने स्नेह-भरे वचन से अभिनन्दन किया, उसकी पूजा किये बिना कोई नही गया ॥५॥ तं जिह्रियुः प्रेक्ष्य विचित्रवेषाः प्रकीर्णवाचः पथि मौनमीयुः । धर्मस्य साक्षादिव संनिकर्षं न कश्चिदन्यायमतिर्बभूव ॥१०.६ उसे देखकर विचित्र वेषवाले लज्जित हुए, रास्ते में बहुत बोलनेवाले चुप हो गये। साक्षात् धर्म के समान उसके समीप किसी की अन्यायबुद्धि नहीं हुई ॥६॥ अन्यक्रियाणामपि राजमार्गे स्त्रीणां नृणां वा बहुमानपूर्वम् । तं देवकल्पं नरदेवसूनुं निरीक्षमाणा न ततर्प दृष्टिः ॥१०.७ राज-मार्ग में अन्य कार्यों में व्यस्त रहनेपर भी स्त्रियों या पुरुषों की दृष्टि उस देव-तुल्य राज-कुमार का अति सम्मानपूर्वक देखती हुई तृप्त नहीं हुई ॥७॥ भ्रुवौ ललाटं मुखमीक्षणे वा वपुः करौ वा चरणौ गतिं वा । यदेव यस्तस्य ददर्श तत्र तदेव तस्याथ बबन्ध चक्षुः ॥१०.८ उसकी भौंहें, ललाट, मुख, आँखें, आकृति, हाथ, पाँव या गति जिसे ही जिसने देखा उसी में उसकी आँखें बँध गईं ॥८॥ दृष्ट्वा च सोर्णभ्रुवमायताक्षं ज्वलच्छरीरं शुभजालहस्तम् । तं भिक्षुवेशं क्षितिपालनाहं सञ्क्षुभ्ने राजगृहस्य लक्ष्मीः ॥१०.९ उसकी भौंहे लोमश थीं, आँखें लम्बी थीं, शरीर जल रहा था, हाथों में शुभसूचक (रेखा-) जाल थे, वह भिक्षु-वेष मे था, किन्तु पृथ्वी पालन के योग्य था; उसे देखकर राजगृह की लक्ष्मी संक्षुब्ध हुई ॥९॥ श्रेण्योऽथ भर्ता मगधाजिरस्य बाह्याद्रिमानाद्विपुलं जनौघम् । ददर्श पप्रच्छ च तस्य हेतुं ततस्तमस्मै पुरुषः शशंस ॥१०.१० तब मगध देश के स्वामी श्रेण्य (बिम्बसार) ने बाहरी महल से विशाल जन-समूहों को देखा और उसका कारण पूछा। तब किसी राजपुरुष ने उसे कहा:- ॥१०॥ ज्ञानं परं वा पृथिवीश्रियं वा विप्रैर्य उक्तोऽधिगमिष्यतीति । स एव शाक्याधिपतेस्तनूजो निरीक्ष्यते प्रव्रजितो जनेन ॥१०.११ “शाक्य-राज का वह यही पुत्र है, जो विप्रों के कथानुसार परम ज्ञान या पृथ्वी की लक्ष्मी प्राप्त करेगा। उसने प्रव्रज्या ली है, लोग उसे देख रहे हैं” ॥११॥ ततः श्रुतार्थो मनसागतास्थो राजा बभाषे पुरुषं तमेव । विज्ञायतां क्व प्रतिगच्छतीति तथेत्यथैनं पुरुषोऽन्वगच्छत् ॥१०.१२ तब कारण जानकर राजा के मन में आदर हुआ, उसने उसी राजपुरुष से कहा- “मालूम करो कि वह कहाँ जा रहा है।” “बहुत अच्छा” कहकर वह उसके पीछे-पीछे गया ॥१२॥ अलोलचक्षुर्युगमात्रदर्शी निवृत्तवाग्यन्त्रितमन्दगामी । चचार भिक्षां स तु भिक्षुवर्यो निधाय गात्राणि चलं च चेतः ॥१०.१३ उसकी आँखें स्थिर थीं, वह जुए की दूरी तक ही देखता था, वाणी बन्द थी, चाल मन्द व नियन्त्रित थी, गात्र व चञ्चल चित्त को वश में करके वह भिक्षु-श्रेष्ठ भिक्षा माँग रहा था ॥१३॥ आदाय भैक्षं च यथोपपन्नं ययौ गिरेः प्रस्रवणं विविक्तम् । न्यायेन तत्राभ्यवहृत्य चैनन्महीधरं पाण्डवमारुरोह ॥१०.१४ जो कुछ मिली भिक्षा को लेकर, वह पर्वत के एकान्त झरने की ओर गया। वहाँ उसे उचित रीति से खाकर, वह पाण्डव-पर्वत पर चढ़ गया ॥१४॥ तस्मिन्प्रवो लोध्रवनोपगूढे मयूरनादप्रतिपूर्णकुञ्जे । काषायवासाः स बभौ नृसूर्यो यथोदयस्योपरि बालसूर्यः ॥१०.१५ लोध्र-वन से युक्त उस पर्वत पर, जिसके कुञ्ज मोरों की ध्वनि से भर रहे थे, काषाय-वस्त्र-धारी वह नर-सूर्य इस प्रकार शोभित हुआ, जैसे उदयाचल पर बाल-सूर्य ॥१५॥ तत्रैनमालोक्य स राजभृत्यः श्रेण्याय राज्ञे कथयांचकार । संश्रुत्य राजा स च बाहुमान्यात्तत्र प्रतस्थे निभृतानुयात्रः ॥१०.१६ वहाँ उसे देखकर उस राजपुरुष ने राजा-श्रेण्य से यह सब निवेदन किया। यह सुनकर अति सम्मान के कारण विनीत अनुचरों के साथ वह राजा वहाँ चला ॥१६॥ बुद्धचरित 53