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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

तथैव शाल्वाधिपतिर्द्रुमाख्यो वनात्ससूनुर्नगरं विवेश । ब्रह्मर्षिभूतश्च मुनेर्वसिष्ठाद्रेभे श्रियं सांकृतिरन्तिदेवः ॥९.७० उसी प्रकार द्रुमनामक शाल्व-राज ने पुत्र के साथ वन से नगर में प्रवेश किया और ब्रह्मर्षि हुए सांकृति अन्तिदेव ने मुनि वसिष्ठ से राज्य-लक्ष्मी ग्रहण की ॥70 ॥ एवंविधा धर्मयशःप्रदीप्ता वनानि हित्वा भवनान्यतीयुः । तस्मान्न दोषोऽस्ति गृहं प्रयातु तपोवनाद्धर्मनिमित्तमेव ॥९.७१ धर्म के यश से जलते हुए ऐसे व्यक्ति वन छोड़कर घर गये। इसलिए धर्म के निमित्त ही तपोवन से घर जाने में दोष नहीं है।" ॥71 ॥ ततो वचस्तस्य निशम्य मन्त्रिणः प्रियं हितं चैव नृपस्य चक्षुषः । अनूनमव्यक्तमसक्तमद्रुतं धृतौ स्थितो राजसुतोऽब्रवीद्वचः ॥९.७२ तब राजा के नेत्रस्वरूप उस मन्त्री का प्रिय व हितकारी वचन सुनकर, राजा के पुत्र ने धैर्यपूर्वक परिपूर्ण, सुलझा हुआ, आसक्ति-रहित व ठोस उत्तर दियाः- ॥72 ॥ इहास्ति नास्तीति य एष संशयः परस्य वाक्यैर्न ममात्र निश्चयः । अवेत्य तत्त्वं तपसा शमेन च स्वयं ग्रहीष्यामि यदत्र निश्चितम् ॥९.७३ है, नहीं है, इस संसार में जो यह संशय है, इसमें दूसरों के वचन से मुझे निश्चय नहीं होगा। तपस्या और शान्ति से तत्त्व को जानकर इस विषय में जो निश्चय होगा वह मैं स्वयं ग्रहण करूँगा ॥73 ॥ न मे क्षमं संशयजं हि दर्शनं ग्रहीतुमव्यक्तपरस्पराहतम् । बुद्धः परप्रत्ययतो हि को व्रजेज्जनोऽन्धकारेऽन्ध इवान्धदेशिकः ॥९.७४ संशय से उत्पन्न, अस्पष्ट व परस्पर-विरोधी दर्शन ग्रहण करना मेरे लिए ठीक नहीं। अँधेरे में अन्धा गुरुवाले अन्धे के समान कौन बुद्धिमान् दूसरों पर विश्वास कर चलेगा? ॥74 ॥ अदृष्टतत्त्वस्य सतोऽपि किं तु मे शुभाशुभे संशयिते शुभे मतिः । वृथापि खेदो हि वरं शुभात्मनः सुखं न तत्त्वेऽपि विगर्हितातमनः ॥९.७५ यद्यपि मैंने तत्त्व को नहीं देखा है, तो भी शुभ व अशुभ संशययुक्त होनेपर शुभ में मेरी मति है। शुभात्मा (= शुभ में लगे हुए) का वृथा श्रम अच्छा है न कि अशुभात्मा का सुख, यदि वास्तव में वह सुख हो तो भी ॥75 ॥ इमं तु दृष्ट्वागममव्यवस्थितं यदुक्तमाप्तैस्तदवेहि साध्विति । प्रहीणदोषत्वमवेहि चासतां प्रहीणदोषो ह्यनृतं न वक्ष्यति ॥९.७६ इस शास्त्र को अव्यवस्थित देख रहे हैं, अतः आप्त-जनों ने जो कहा उसे ही ठीक समझिए और दोष- विनाश ही आप्तता है, क्योंकि जिसका दोष नष्ट हो गया है वह झूठ नहीं कहेगा ॥76 ॥ गृहप्रवेशं प्रति यच्च मे भवानुवाच रामप्रभृतिन्निदर्शनम् । न ते प्रमाणं न हि धर्मनिश्चयेष्वलं प्रमाणाय परिक्षतव्रताः ॥९.७७ घर जाने के बारे में आपने राम आदि के जो उदाहरण दिये वे प्रमाण नहीं हैं; क्योंकि धर्म के निश्चय में वे प्रमाण नहीं हो सकते जिनका व्रत भङ्ग हो गया ॥77 ॥ तदेवमप्येव रविर्महीं पतेदपि स्थिरत्वं हिमवान् गिरिस्त्यजेत् । अदृष्टतत्त्वो विषयोन्मुखेन्द्रियः श्रयेय न त्वेव गृहान् पृथग्जनः ॥९.७८ इसलिए यदि सूर्य पृथ्वी पर गिर पड़े, हिमालय पर्वत अपनी स्थिरता छोड़ दे, तो भी तत्त्व को देखे बिना इन्द्रियों को विषयाभिमुख कर, मैं अज्ञानी घर नहीं जा सकता ॥78 ॥ अहं विशेयं ज्वलितं हुताशनं न चाकृतार्थः प्रविशेयमालयम् । इति प्रतिज्ञां स चकार गर्वितो यथेष्टमुत्थाय च निर्ममो ययौ ॥९.७९ जलती आग में मैं प्रवेश करूँगा, किन्तु असफल होकर घर में प्रवेश नहीं करूँगा।" अभिमानपूर्वक उसने यह प्रतिज्ञा की और इच्छानुसार उठकर वह निर्मम चला गया ॥79 ॥ ततः सबाष्पौ सचिवद्विजावुभौ निशम्य तस्य स्थिरमेव निश्चयम् । विषण्णवक्त्रावनुगम्य दुःखितौ शनैर्गत्या पुरमेव जग्मतुः ॥९.८० तब उसका स्थिर निश्चय सुनकर, रोते हुए मन्त्री और विप्र विषण्ण-मुख व दुःखी होकर पीछे-पीछे गये, तब उपाय के अभाव में वे धीरे-धीरे नगर की ही ओर चले ॥80 ॥ तत्स्नेहादथ नृपतेश्च भक्तितस्तौ सापेक्षां प्रतिययतुश्च तस्थतुश्च । दुर्धर्षं रविमिव दीप्तमात्मभासा तं द्रष्टुं न हि पथि शेक्तुर्न मोक्तुम् ॥९.८१ तब उसके स्नेह से और राजा की भक्ति से वे दोनों उत्कण्ठित होकर लौटे और ठहर गये। आत्मतेज से चमकते सूर्य के समान उस दुर्धर्ष को रास्ते में वे न देख सकते थे, न छोड़ सकते थे ॥81 ॥ तौ ज्ञातुं परमगतेर्गतिं तु तस्य प्रच्छन्नांश्चरपुरुषान्शुचीन्विधाय । राजानं प्रियसुतलालसं नु गत्वा द्रक्ष्यावः कथमिति जग्मतुः कथञ्चित् ॥९.८२ उस परमगति की गति जानने के लिए उन्होंने पवित्र गुप्तचर रक्खे और "प्रिय पुत्र के लिए उत्सुक राजा को जाकर कैसे देखेंगे", यह सोचते हुए वे किसी-किसी तरह गये ॥82 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्ये कुमारान्वेषणो नाम नवमः सर्गः ॥९ ॥ दशम सर्ग श्रेण्य का आगमन स राजवत्सः पृथूपीनवक्षास्तौ हव्यमन्त्राधिकृतौ विहाय । उत्तीर्य गङ्गां प्रचलत्तरङ्गां श्रीमद्गृहं राजगृहं जगाम ॥१०.१ हवन और मन्त्रणा के उन अधिकारियों को छोड़कर, चौड़ी व मोटी छातीवाला वह राज-कुमार चञ्चल तरङ्गोंवाली गङ्गा को पारकर, श्रीसम्पन्न गृहों से युक्त राजगृह को गया ॥1 ॥

52 अश्वघोष

शैलैः सुगुप्तं च विभूषितं च धृतं च पूतं च शिवैस्तपोदैः । पञ्चाचलाङ्कं नगरं प्रपेदे शान्तः स्वयम्भूरिव नाकपृष्ठम् ॥१०.२ पर्वतों से सुरक्षित व विभूषित तथा कल्याण-कारी तपोदों (= गर्म जल के झरनों) से धारण और पवित्र किये गये नगर में, जो पाँच पहाड़ों से चिह्नित है, उसने शान्त होकर प्रवेश किया, जैसे स्वर्ग में स्वयंभू (प्रवेश कर रहा हो) ॥२॥ गाम्भीर्यमोजश्च निशाम्य तस्य वपुश्च दीप्तं पुरुषानतीत्य । विसिस्मिये तत्र जनस्तदानीं स्थाणुव्रतस्येव वृषध्वजस्य ॥१०.३ कठोर-व्रत धारी शिव का-सा उसका गाम्भीर्य, ओज तथा असाधारण दीप्त रूप देखकर लोग उस समय वहाँ विस्मित हुए ॥३॥ तं प्रेक्ष्य योऽन्येन ययौ स तस्थौ यस्तत्र तस्थौ पथि सोऽन्वगच्छत् । द्रुतं ययौ यः स जगाम धीरं यः कश्चिदास्ते स्म स चोत्पपात ॥१०.४ उसे देखकर, जो दूसरी ओर जा रहा था वह ठहर गया, जो वहाँ रास्ते में ठहरा हुआ था वह पीछे-पीछे गया, जो धीरे-धीरे जा रहा था वह शीघ्रता से गया, जो कोई बैठा हुआ था वह उछल पड़ा ॥४॥ कश्चित्त्मानर्च जनः कराभ्यां सत्कृत्य कश्चिच्छिरसा ववन्दे । स्निग्धेन कश्चिद्वचसाभ्यनन्दन्नैवं जगामाप्रतिपूज्य कश्चित् ॥१०.५ किसी ने हाथ जोड़कर उसकी पूजा की, किसी ने शिर से प्रणाम कर सत्कार किया, किसी ने स्नेह-भरे वचन से अभिनन्दन किया, उसकी पूजा किये बिना कोई नही गया ॥५॥ तं जिह्रियुः प्रेक्ष्य विचित्रवेषाः प्रकीर्णवाचः पथि मौनमीयुः । धर्मस्य साक्षादिव संनिकर्षं न कश्चिदन्यायमतिर्बभूव ॥१०.६ उसे देखकर विचित्र वेषवाले लज्जित हुए, रास्ते में बहुत बोलनेवाले चुप हो गये। साक्षात् धर्म के समान उसके समीप किसी की अन्यायबुद्धि नहीं हुई ॥६॥ अन्यक्रियाणामपि राजमार्गे स्त्रीणां नृणां वा बहुमानपूर्वम् । तं देवकल्पं नरदेवसूनुं निरीक्षमाणा न ततर्प दृष्टिः ॥१०.७ राज-मार्ग में अन्य कार्यों में व्यस्त रहनेपर भी स्त्रियों या पुरुषों की दृष्टि उस देव-तुल्य राज-कुमार का अति सम्मानपूर्वक देखती हुई तृप्त नहीं हुई ॥७॥ भ्रुवौ ललाटं मुखमीक्षणे वा वपुः करौ वा चरणौ गतिं वा । यदेव यस्तस्य ददर्श तत्र तदेव तस्याथ बबन्ध चक्षुः ॥१०.८ उसकी भौंहें, ललाट, मुख, आँखें, आकृति, हाथ, पाँव या गति जिसे ही जिसने देखा उसी में उसकी आँखें बँध गईं ॥८॥ दृष्ट्वा च सोर्णभ्रुवमायताक्षं ज्वलच्छरीरं शुभजालहस्तम् । तं भिक्षुवेशं क्षितिपालनाहं सञ्क्षुभ्ने राजगृहस्य लक्ष्मीः ॥१०.९ उसकी भौंहे लोमश थीं, आँखें लम्बी थीं, शरीर जल रहा था, हाथों में शुभसूचक (रेखा-) जाल थे, वह भिक्षु-वेष मे था, किन्तु पृथ्वी पालन के योग्य था; उसे देखकर राजगृह की लक्ष्मी संक्षुब्ध हुई ॥९॥ श्रेण्योऽथ भर्ता मगधाजिरस्य बाह्याद्रिमानाद्विपुलं जनौघम् । ददर्श पप्रच्छ च तस्य हेतुं ततस्तमस्मै पुरुषः शशंस ॥१०.१० तब मगध देश के स्वामी श्रेण्य (बिम्बसार) ने बाहरी महल से विशाल जन-समूहों को देखा और उसका कारण पूछा। तब किसी राजपुरुष ने उसे कहा:- ॥१०॥ ज्ञानं परं वा पृथिवीश्रियं वा विप्रैर्य उक्तोऽधिगमिष्यतीति । स एव शाक्याधिपतेस्तनूजो निरीक्ष्यते प्रव्रजितो जनेन ॥१०.११ “शाक्य-राज का वह यही पुत्र है, जो विप्रों के कथानुसार परम ज्ञान या पृथ्वी की लक्ष्मी प्राप्त करेगा। उसने प्रव्रज्या ली है, लोग उसे देख रहे हैं” ॥११॥ ततः श्रुतार्थो मनसागतास्थो राजा बभाषे पुरुषं तमेव । विज्ञायतां क्व प्रतिगच्छतीति तथेत्यथैनं पुरुषोऽन्वगच्छत् ॥१०.१२ तब कारण जानकर राजा के मन में आदर हुआ, उसने उसी राजपुरुष से कहा- “मालूम करो कि वह कहाँ जा रहा है।” “बहुत अच्छा” कहकर वह उसके पीछे-पीछे गया ॥१२॥ अलोलचक्षुर्युगमात्रदर्शी निवृत्तवाग्यन्त्रितमन्दगामी । चचार भिक्षां स तु भिक्षुवर्यो निधाय गात्राणि चलं च चेतः ॥१०.१३ उसकी आँखें स्थिर थीं, वह जुए की दूरी तक ही देखता था, वाणी बन्द थी, चाल मन्द व नियन्त्रित थी, गात्र व चञ्चल चित्त को वश में करके वह भिक्षु-श्रेष्ठ भिक्षा माँग रहा था ॥१३॥ आदाय भैक्षं च यथोपपन्नं ययौ गिरेः प्रस्रवणं विविक्तम् । न्यायेन तत्राभ्यवहृत्य चैनन्महीधरं पाण्डवमारुरोह ॥१०.१४ जो कुछ मिली भिक्षा को लेकर, वह पर्वत के एकान्त झरने की ओर गया। वहाँ उसे उचित रीति से खाकर, वह पाण्डव-पर्वत पर चढ़ गया ॥१४॥ तस्मिन्प्रवो लोध्रवनोपगूढे मयूरनादप्रतिपूर्णकुञ्जे । काषायवासाः स बभौ नृसूर्यो यथोदयस्योपरि बालसूर्यः ॥१०.१५ लोध्र-वन से युक्त उस पर्वत पर, जिसके कुञ्ज मोरों की ध्वनि से भर रहे थे, काषाय-वस्त्र-धारी वह नर-सूर्य इस प्रकार शोभित हुआ, जैसे उदयाचल पर बाल-सूर्य ॥१५॥ तत्रैनमालोक्य स राजभृत्यः श्रेण्याय राज्ञे कथयांचकार । संश्रुत्य राजा स च बाहुमान्यात्तत्र प्रतस्थे निभृतानुयात्रः ॥१०.१६ वहाँ उसे देखकर उस राजपुरुष ने राजा-श्रेण्य से यह सब निवेदन किया। यह सुनकर अति सम्मान के कारण विनीत अनुचरों के साथ वह राजा वहाँ चला ॥१६॥ बुद्धचरित 53

स पाण्डवं पाण्डवतुल्यवीर्यः शैलोत्तमं शैलसमानवर्मा। मौलिधरः सिंहगतिर्नृसिंहश्चलसटः सिंह इवारुरोह ॥१०.१७ पाण्डवों के समान उसकी वीरता थी, पर्वत के समान उसका शरीर था, वह पाण्डव नामक उत्तम पर्वत पर चढ़ा; वह नर-सिंह, जो मुकुट पहने हुआ था और जिसकी चाल सिंह की-सी थी, उस सिंह के समान था जिसके केसर हिल रहे हों ॥17॥ ततः स्म तस्योपरि शृङ्गभूतं शान्तेन्द्रियं पश्यति बोधिसत्त्वम्। पर्यङ्कमास्थाय विरोचमानं शशाङ्कमुद्यन्तमिवाभ्रकुञ्जात् ॥१०.१८ तब उस (पर्वत) के ऊपर शिखर-सदृश बोधिसत्त्व को देखा, जिसके इन्द्रिय शान्त थे; पर्यङ्क आसन में बैठा हुआ वह, मेघ कुञ्ज से उगते चाँद के समान चमक रहा था ॥18॥ तं रूपलक्ष्म्या च शमेन चैव धर्मस्य निर्माणमिवोपविष्टम्। सविस्मयः प्रश्रयवान्नरेन्द्रः स्वयम्भुवं शक्र इवोपतस्थे ॥१०.१९ रूप-सम्पत्ति व शान्ति से जान पड़ता था जैसे धर्म का बनाया हुआ कोई बैठा हो; विस्मय और विनयपूर्वक राजा उसके समीप उपस्थित हुआ, जैसे स्वयंभू के समीप इन्द्र (उपस्थित हो रहा हो) ॥19॥ तं न्यायतो न्यायविदां वरिष्ठः समेत्य पप्रच्छ च धातुसाम्यम्। स चाप्यवोचत्सद्देन साम्ना नृपं मनःस्वास्थ्यमनामयं च ॥१०.२० औचित्य जाननेवालों में वह श्रेष्ठ था, उसके समीप उचित रीति से जाकर उसका धातु-साम्य (= स्वास्थ्य) पूछा। उसने भी योग्य नम्रतापूर्वक राजा से मानसिक स्वास्थ्य और (शारीरिक) आरोग्य कहे ॥20॥ ततः शुचौ वारणकर्णनीले शिलातले संनिषसाद राजा। उपोपविश्यानुमतश्च तस्य भावं विजिज्ञासुरिदं बभाषे ॥१०.२१ तब स्वच्छ शिला-तलपर, जो हाथी के कान के समान नीला था, राजा बैठ गया। समीप में बैठकर और अनुमति पाकर उसका भाव जानने की इच्छा से यों कहा:- ॥21॥ प्रीतिः परा मे भवतः कुलेन क्रमागता चैव परीक्षिता च। जाता विवक्षा स्ववयो यतो मे तस्मादिदं स्नेहवचो निबोध ॥१०.२२ "आपके कुल से मेरी बड़ी प्रीति है, वह परम्परागत है और परीक्षित है; अतः हे मित्र, मुझे कुछ कहने की इच्छा हुई है। इसलिए यह स्नेह-वचन सुनिये:- ॥22॥ आदित्यपूर्वं विपुलं कुलं ते नवं वयो दीप्तमिदं वपुश्च। कस्मादियं ते मतिरक्रमेण भैक्षाक एवाभिरता न राज्ये ॥१०.२३ आपका कुल महान् है, सूर्य से उत्पन्न हुआ है, आपकी अवस्था नई है और यह दीप्त रूप है। किस कारण क्रम तोड़कर आपकी बुद्धि भिक्षावृत्ति में रत है, राज्य में नही ॥23॥ गात्रं हि ते लोहितचन्दनाहं काषायसंश्लेषमनर्हमेतत्। हस्तः प्रजापालनयोग्य एष भोक्तुं न चार्हः परदत्तमन्नम् ॥१०.२४


आपका शरीर लाल चन्दन के योग्य है, काषाय-स्पर्श के योग्य यह नही। यह हाथ प्रजा-पालन के योग्य है, दूसरों का दिया अन्न खाने योग्य नही ॥24॥ तत्सौम्य राज्यं यदि पैतृकं त्वं स्नेहात्पितुर्नैच्छसि विक्रमेण। न च क्रमं मर्षयितुं मतिस्ते बुद्ध्यार्धमस्मद्विषयस्य शीघ्रम् ॥१०.२५ इसलिए, हे सौम्य, यदि आप स्नेह-वश पिता से पैतृक राज्य पराक्रमपूर्वक नही (लेना) चाहते हैं और यदि क्रम को सहने का (= क्रम से राज्य प्राप्ति तक ठहरने का) विचार आपका नही है, तो शीघ्र ही मेरे आधे राज्य का आप पालन करें ॥25॥ एवं हि न स्यात्स्वजनापमर्दः कालक्रमेणापि शमश्रया श्रीः। तस्मात्कुरुष्व प्रणयं मयि त्वं सद्भिः सहीया हि सतां समृद्धिः ॥१०.२६ इस प्रकार स्वजन का उत्पीड़न नही होगा, काल-क्रम से शान्ति में रहनेवाली सम्पत्ति भी मिलेगी। इसलिए आप मुझसे प्रीति करें, क्योंकि सज्जनों की सङ्गति से सज्जनों की समृद्धि होती है ॥26॥ अथ त्विदानीं कुलगर्वितत्वादस्मासु विश्रम्भगुणो न तेऽस्ति। व्यूहान्यनीकानि विगाह्य बाणैर्मया सहायेन परान् जिगीष ॥१०.२७ यदि इस समय कुल के गर्व के कारण हमारे ऊपर आपका विश्वास नही है, तो मुझ सहायक के साथ बाणों से सैन्य-समूहों में प्रवेश कर शत्रुओं को जीतिये ॥27॥ तद्बुद्धिमन्त्रान्यतरां वृणीष्व धर्मार्थकामान्विधिवद्भजस्व। व्यत्यस्य रागादिह हि त्रिवर्गं प्रेत्येह भ्रंशमवाप्नुवन्ति ॥१०.२८ इसलिए दो में से एक विचार स्वीकार कीजिये। धर्म, अर्थ और काम का विधिवत् सेवन कीजिए, क्योंकि राग-वश यहाँ त्रिवर्ग का उलट-पुलट होने से लोग यहाँ और परलोक में भी भ्रष्ट होते हैं ॥28॥ यो ह्यर्थधर्मौ परिपीड्य कामः स्याद्धर्मकामौ परिभूय चार्थः। कामार्थयोश्चोपरमेन धर्मस्त्याज्यः स कृत्स्नो यदि काङ्क्षितोऽर्थः ॥१०.२९ अर्थ और धर्म को परिपीड़ित कर जो काम होगा, धर्म व काम को दबाकर जो अर्थ होगा और काम व अर्थ के विनाश से जो धर्म होगा उसे छोड़िये, यदि आप सम्पूर्ण लक्ष्य (की सिद्धि) चाहते हैं ॥29॥ तस्मात्त्रिवर्गस्य निषेवणेन त्वं रूपमेतत्स्फलं कुरुष्व। धर्मार्थकामाधिगमं ह्यनूनं नृणामनूनं पुरुषार्थमाहुः ॥१०.३० इसलिए त्रिवर्ग के सेवन से आप इस रूप को सफल कीजिए; क्योंकि कहते हैं कि धर्म, अर्थ व काम की सम्पूर्ण प्राप्ति ही मनुष्यों का सम्पूर्ण पुरुषार्थ है ॥30॥ तन्निष्फलौ नार्हसि कर्तुमेतौ पीनौ भुजौ चापविकर्षणार्हौ। मान्धातृवज्जेतुम इमौ हि योग्यौ लोकानपि त्रीनिह किं पुनर्गाम् ॥१०.३१ इसलिए धनुष खींचने योग्य इन मोटी भुजाओं को आपको निष्फल नही करना चाहिएय क्योंकि मान्धाता के समान ये तीनों लोक जीतने योग्य हैं, फिर इस पृथ्वी का क्या कहना ॥31॥


54 अश्वघोष

स्नेहेन खल्वेतदहं ब्रवीमि नैश्वर्यरोगेण न विस्मयेन । इमं हि दृष्ट्वा तव भिक्षुवेषं जातानुकम्पोऽस्म्यपि चागताश्रुः ॥१०.३२ स्नेह से मैं यह कह रहा हूँ, ऐश्वर्य के अनुराग से नहीं, विस्मय (औद्धत्य ?) से नहीं। आपका यह भिक्षु-वेष देखकर मुझे अनुकम्पा हो गई है, और आँसू आ गये हैं ॥३२॥ तद्भुङ्क्ष्व भिक्षाश्रमकाम कामान् कालेऽसि कर्ता प्रियधर्म धर्मम् । यावत्स्वंशप्रतिरूपरूपं न ते जराब्येत्यभिभूय भूयः ॥१०.३३ हे स्व-वंश-प्रतिबिम्ब, जबतक आपके रूप को दबाकर बुढ़ापा फिर नहीं आता, तबतक, हे भिक्षु-आश्रम के इच्छुक, कामोपभोग कीजिए। हे प्रियधर्म, समय पर धर्म कीजिएगा ॥३३॥ शक्नोति जीर्णः खलु धर्ममाप्तुं कामोपभोगेष्वगतिर्जरायाः । अतश्च यूनः कथयन्ति काममध्यस्य वित्तं स्थविरस्य धर्मम् ॥१०.३४ वृद्ध धर्म प्राप्त कर सकता है, कामोपभोग में बुढ़ापे की गति नहीं है। और इस कारण युवक के लिए काम, मध्य के लिए वित्त, और बूढ़े के लिए धर्म बताते हैं ॥३४॥ धर्मस्य चार्थस्य च जीवलोके प्रत्यर्थिभूतानि हि यौवनानि । संरक्ष्यमाणान्यपि दुर्ग्रहाणि कामा यतस्तेन यथा हरन्ति ॥१०.३५ जीव-लोक में धर्म और अर्थ का शत्रु यौवन है। यत्न करनेपर भी उसे पकड़ रखना कठिन है; क्योंकि काम अपने मार्ग से उसे ले जाते हैं ॥३५॥ वयांसि जीर्णानि विमर्शयन्ति धीराण्यवस्थाानपरायणानि । अल्पेन यत्नेन शमात्मकानि भवन्त्यगत्यैव च लज्जया च ॥१०.३६ वृद्धावस्था विचारवती धीर और स्थिरता परायण होती है। उपायहीनता और लज्जा के कारण अल्प यत्न से ही उसमें शान्ति मिलती है ॥३६॥ अतश्च लोलं विषयप्रधानं प्रमत्तमक्षान्तमदीर्घदर्शि । बहुच्छलं यौवनमभ्यतीत्य निस्तीर्य कान्तारमिवाश्वसन्ति ॥१०.३७ अतः चञ्चल, विषय-प्रधान, प्रमत्त (= प्रमादपूर्ण) असहनशील, अदीर्घ-दर्शी और अनेक छलों से युक्त यौवन को बिताकर लोग वैसे ही आश्वस्त होते हैं, जैसे जङ्गल को पार कर ॥३७॥ तस्मादधीरं चपलप्रमादि नवं वयस्तावदिदं व्यपैतु । कामस्य पूर्वं हि वयः शरव्यं न शक्यते रक्षितुमिन्द्रियेभ्यः ॥१०.३८ इसलिए अधीर, चपल और प्रमादपूर्ण यह नई वयस तबतक बीते; क्योकि कामदेव का लक्ष्य नई जवानी है, जिसकी इन्द्रियों से रक्षा नहीं की जा सकती ॥३८॥ अथौ चिकीर्षा तव धर्म एव यजस्व यज्ञं कुलधर्म एषः । यज्ञैरधिष्ठाय हि नागपृष्ठं ययौ मरुत्वानपि नाकपृष्ठम् ॥१०.३९⁴⁴ यदि आपको इच्छा कर्म करना ही है, तो यज्ञ कीजिए, यह आपका कुलधर्म है। यज्ञों द्वारा हाथी की पीठ पर चढ़कर इन्द्र भी स्वर्ग गया था ॥३९॥ सुवर्णकेयूरविदग्धबाहवो मणिप्रदीपोज्ज्वलचित्रमौलयः । नृपर्षयस्तां हि गतिं गता मखैः श्रमेण यामेव महर्षयो ययुः ॥१०.४० राजर्षि-गण, जिनकी भुजाएँ सुवर्ण केयूरों से बँधी थीं और जिनके रङ्ग-बिरङ्गे मुकुट मणि-प्रदीपों से उज्ज्वल थे, यज्ञों द्वारा उस गति को प्राप्त हुए, जिसको ही महर्षि-गण तपस्या द्वारा प्राप्त हुए।” ॥४०॥ इत्येवं मगधपतिर्वचो बभाषे यः सम्यग्वलभिदिव ब्रुवन् बभाषे । तच्छ्रुत्वा न स विचचाल राजसूनूः कैलासो गिरिरिव नैकचित्रसानुः ॥१०.४१ इस प्रकार मगध-राज ने वह वचन कहा। वह ठीक-ठीक बोलने में इन्द्र के समान शोभित हुआ। यह सुनकर वह राज-पुत्र विचलित नहीं हुआ, जैसे अनेक रङ्ग-बिरङ्गी चोटियों से युक्त कैलाश पर्वत (विचलित नहीं होता है) ॥४१॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृते श्रेण्याभिगमनो नाम दशमः सर्गः ॥१०॥ एकादश सर्ग काम-निन्दा अथैवमुक्तो मगधाधिपेन सुहृन्मुखेन प्रतिकूलमर्थम् । स्वस्थोऽविकारः कुलशौचशुद्धः शौद्धोदनिर्वाक्यमिदं जगाद ॥११.१ तब मगध-राज के द्वारा अपने मित्र-मुख से इस तरह प्रतिकूल बात कही जानेपर, अपने कुल की पवित्रता से पवित्र शौद्धोदनि (=शुद्धोदन के पुत्र) ने शान्ति और धैर्यपूर्वक यह वचन कहा:- ॥१॥ नाश्चर्यमेतद्भवतो विधानं जातस्य हर्यङ्ककुले विशाले । यन्मित्रपक्षे तव मित्रकाम स्याद्वृत्तिरेषा परिशुद्धवृत्तेः ॥११.२ “आप विशाल हर्यङ्क-कुल में पैदा हुए हैं, अतः आपके लिए ऐसा कहना आश्चर्यजनक नहीं; हे मित्रेच्छु, मित्रों के प्रति आप शुद्धाचार का यह व्यवहार आश्चर्यजनक नहीं ॥२॥⁴⁵ असत्सु मैत्री स्वकुलानुरूपा न तिष्ठति श्रीरिव विक्लवेषु । पूर्वैः कृतां प्रीतिपरम्पराभिस्तामेव सन्तस्तु विवर्धयन्ति ॥११.३ ⁴⁴ - “नाक” की जगह “नाग” रक्खा गया है। नमुचि के वध के बाद, यज्ञ द्वारा ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्त होकर, इन्द्र स्वर्ग को लौटा था। ⁴⁵- हर्यङ्क = उस कुल के किसी राजा का नाम, या वह कुल जिसका चिह्न सिंह है। बुद्धचरित 55

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[Left Column]

अपने कुल में (पूर्वजों द्वारा) पालित मैत्री असज्जनों के पास नही रहती, जैसे (अपने कुल में पालित) लक्ष्मी विह्वलों के पास नहीं रहती; किन्तु सज्जन पूर्वजों द्वारा की गई उसी (मैत्री) को प्रीतिपरम्परा से बढ़ाते हैं ॥3॥

ये चार्थकृच्छ्रेषु भवन्ति लोके समानकार्याः सुहृदां मनुष्याः । मित्राणि तानीति परैमि बुद्ध्या स्वस्थस्य वृद्धौष्विह को हि न स्यात् ॥११.४ धन कम होनेपर संसार में जो मनुष्य मित्रों के काम में हाथ बँटाते हैं, अपनी बुद्धि से मैं उन्हीं को मित्र समझता हूँ; क्योंकि जो स्वस्थ है (=अच्छी अवस्था में है) उसकी बढ़ती में कौन (साथ) नहीं रहेगा? ॥4॥

एवं च ये द्रव्यमवाप्य लोके मित्रेषु धर्मे च नियोजयन्ति । अवाप्तसाराणि धनानि तेषां भ्रष्टानि नान्ते जनयन्ति तापम् ॥११.५ इस प्रकार संसार में धन पाकर जो लोग मित्रों और धर्म में लगाते हैं, उनके धन सारवान् हैं, नष्ट होनेपर अन्त में वे (धन) ताप नहीं पैदा करते ॥5॥

सुहृत्तया चार्यतया च राजन् खल्वेष यो मां प्रति निश्चयस्ते । अत्रानुनेष्यामि सुहृत्तयैव ब्रूयामहं नोत्तरमन्यदत्र ॥११.६ मित्रता और आर्यता (सज्जनता, उदारता) से, हे राजन्, मेरे प्रति आपका जो यह निश्चय हुआ है, इसमें मित्रता से ही अनुनय करूँगा, इसमें दूसरा उत्तर नहीं दूँगा ॥6॥

अहं जरामृत्युभयं विदित्वा मुमुक्षया धर्ममिमं प्रपन्नः । बन्धून् प्रियानश्रुमुखान्विहाय प्रागेव कामानशुभस्य हेतून् ॥११.७ जरा और मृत्यु का भय जानकर मोक्ष की इच्छा से मैं इस धर्म की शरण में, अश्रु-मुख प्रिय बन्धुओं को छोड़कर, अशुभ के कारण-स्वरूप काम को तो पहले ही (छोड़कर), आया हूँ ॥7॥

नाशीविषेभ्यो हि तथा बिभेमि नैवाशनिभ्यो गगनाच्च्युतेभ्यः । न पावकेभ्योऽनिलसंहितेभ्यो यथा भयं मे विषयेभ्य एव ॥११.८ सर्पों से मैं उतना नहीं डरता, न आकाश से गिरे वज्रों से, न हवा से मिली आग से, जितना कि विषयों से डरता हूँ ॥8॥

कामा ह्यनित्याः कुशलार्थचौरा रिक्ताश्च मायासदृशाश्च लोके । आशास्यमाना अपि मोहयन्ति चित्तं नृणां किं पुनरात्मसंस्थाः ॥११.९ काम अनित्य है, कुशलरूप धन के चोर हैं, खाली हैं और संसार में माया के समान हैं। उनकी चिन्ता करनेपर भी वे मनुष्यों के चित्त मूढ़ करते हैं, फिर अपने में उनके स्थित रहनेपर क्या कहना? ॥9॥

कामाभिभूता हि न यान्ति शर्म त्रिविष्टपे किं बत मर्त्यलोके । कामैः सतृष्णस्य हि नास्ति तृप्तिरिन्धनैर्वातसखस्य वह्नेः ॥११.१०


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जो काम से अभिभूत हैं वे, मर्त्य-लोक में क्या, स्वर्ग में भी शान्ति नहीं पाते। तृष्णावान् को काम से तृप्ति नहीं होती, जैसे हवा का साथ पाकर आग को इन्धन से (तृप्ति नहीं होती) ॥10॥

जगत्यनर्थो न समोऽस्ति कामैर्मोहाच्च तेष्वेव जनः प्रसक्तः । तत्त्वं विदित्वैवमनर्थभीरुः प्राज्ञः स्वयं कोऽभिलषेदनर्थम् ॥११.११ जगत् में काम (=विषय) के समान अनर्थ (बुराई, विपत्ति) नहीं और मोह से आदमी उसी में आसक्त होता है। तत्त्व को जानकर अनर्थ से डरनेवाला कौन बुद्धिमान् स्वयं अनर्थ की अभिलाषा करे? ॥11॥

समुद्रवस्त्रामापि गामवाप्य पारं जिगीषन्ति महार्णवस्य । लोकस्य कामैर्न वितृप्तिरस्ति पतद्भिरम्भोभिरिवार्णवस्य ॥११.१२ समुद्र-वसना पृथिवी को भी पाकर लोग महासागर के पार जीतने की इच्छा करते हैं। संसार का काम (- उपभोग) से तृप्ति नहीं होती, जैसे गिरती जल राशि से महासागर की (तृप्ति नहीं होती) ॥12॥

देवेन वृष्टेऽपि हिरण्यवर्षे द्वीपान्समग्रांश्चतुरोऽपि जित्वा । शक्रस्य चार्धासनमप्यवाप्य मान्धातुरासीद्विषयेष्वतृप्तिः ॥११.१३ देव द्वारा सुवर्ण-वृष्टि की जानेपर भी, चारों समग्र द्वीपों को जीतकर भी और इन्द्र का आधा आसन पाकर भी, मान्धाता को विषयों में तृप्ति नहीं हुई ॥13॥

भुक्त्वापि राज्यं दिवि देवतानां शतक्रतौ वृत्रभयात्प्रनष्टे । दर्पान्महर्षीनपि वाहयित्वा कामेष्वतृप्तो नहुषः पपात ॥११.१४ वृत्र के भय से इन्द्र के छिपनेपर, स्वर्ग में देवताओं का राज्य भोगकर भी, दर्प से महर्षियों द्वारा भी (अपने को) वहन कराकर, नहुष (स्वर्ग से) गिर पड़ा, विषयों में अतृप्त ही रहा ॥14॥

ऐडश्च राजा त्रिदिवं विगाह्य नीत्वापि देवीं वशमुर्वशीं ताम् । लोभादृषिभ्यः कनकं जिहीर्षुर्जगाम नाशं विषयेष्वतृप्तः ॥११.१५ और, राजा ऐड (इडा का पुत्र पुरूरवा) स्वर्ग में प्रवेश कर, उस देवी उर्वशी को वश में लाकर भी, लोभवश ऋषियों से सुवर्ण हरण करने की इच्छा से नाश को प्राप्त हुआ, विषयों में अतृप्त ही रहा ॥15॥

बलेर्महेन्द्रं नहुषं महेन्द्रादिन्द्रं पुनर्यै नहुषादुपैयुः । स्वर्गे क्षितौ वा विषयेषु तेषु को विश्वसेद्भाग्यकुलाकुलेषु ॥११.१६ जो विषय बलि से महेन्द्र के पास, महेन्द्र से नहुष के पास, फिर नहुष से (महा-) इन्द्र के पास गये, भाग्य से परेशान रहनेवाले उन विषयों में, स्वर्ग में या पृथिवी पर, कौन विश्वास करे? ॥16॥

चीराम्बरा मूलफलाम्बुभक्षा जटा वहन्तोऽपि भुजङ्गदीर्घाः । यैर्नान्यकार्या मुनयोऽपि भग्नाः कः कामसञ्ज्ञान्मृगयेत शत्रून् ॥११.१७ वल्कल-वस्त्र पहननेवाले, जल-फल-मूल भक्षण करनेवाले, साँप से समान लक्ष्मी जटा धारण करनेवाले मुनि लोग भी, जिन्हें (तप आदि के अतिरिक्त) दूसरा काम नहीं था, जिनके द्वारा भग्न किए गये, उन कामसंज्ञक शत्रुओं की कौन खोज करे? ॥17॥


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56 अश्वघोष

उग्रायुधश्चौग्रधृतायुधोऽपि येषां कृते मृत्युमवाप भीष्मात् । चिन्तापि तेषामशिवा वधाय तद्व्रत्तिनां किं पुनरव्रतानाम् ॥११.१८ उग्र अस्त्र धारण करनेवाले, उग्रायुध ने भी जिनके कारण भीष्म से मौत पाई, उनकी चिन्ता भी अमङ्गलजनक है, और सदाचारियों के लिए भी घातक है, फिर अव्रतियों का क्या कहना? ॥18॥ आस्वादमल्पं विषयेषु मत्वा संयोजनोत्कर्षमतृप्तिमेव । सद्द्र्यश्च गर्हा नियतं च पापं कः कामसञ्ज्ञं विषमाददीत ॥११.१९ विषयों में स्वाद कम है, बन्धन अधिक हैं, केवल अतृप्ति है, सज्जनों द्वारा निन्दा होती है, और पाप नियत है—ऐसा समझकर कौन कामनामक विषयों को ग्रहण करे? ॥19॥ कृष्यादिभिः कर्मभिरर्दितानां कामात्मकानां च निशम्य दुःखम् । स्वास्थ्यं च कामेष्वकुतूहलानां काममन्विहातुं क्षममात्मवद्भिः ॥११.२० कृषि आदि कर्मों से पीड़ित रहनेवालों का स्वास्थ्य (= सुख, शान्ति, प्रसन्नता) देखकर, आत्मवान् (= संयतात्मा) लोगों के लिए काम का त्याग करना ही उचित है ॥20॥ ज्ञेया विपत्कामिनि कामसम्पत्सिद्धेषु कामेषु मदं ह्युपैति । मदादकार्यं कुरुते न कार्यं येन क्षतो दुर्गतिमभ्युपैति ॥११.२१ कामी व्यक्ति में कामरूपी सम्पत्ति को विपत्ति ही समझना चाहिए; क्योंकि काम सिद्ध होनेपर मद होता है। मद से मनुष्य अकार्य करता है, कार्य नहीं, जिससे घायल होकर वह दुर्गति को प्राप्त होता है ॥21॥ यत्नेन लब्धाः परिरक्षिताश्च ये विप्रलभ्य प्रतियान्ति भूयः । तेष्वात्मवान्याचितकोपमेषु कामेषु विद्वानिह को रमेत ॥११.२२ यत्नपूर्वक पाये गये और रखे गये जो (काम) ठगकर फिर चले जाते हैं, इस संसार मे माँगी गई वस्तुओं के समान उन कामों (= विषयों) में कौन आत्मवान् (= संयतात्मा) बुद्धिमान् रत होगा? ॥22॥ अन्विष्य चादाय च जाततर्षा यानत्यजन्तः परियान्ति दुःखम् । लोके तृणोल्कासदृशेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२३ जिन्हें खोजकर और पाकर तृष्णा होती है, जिन्हें नही छोड़ने में (लोग) दुःख पाते हैं, संसार मे तृणों की उल्का के समान उन कामों (= विषयों) में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥23॥ अनात्मवन्तो हृदि यैर्विदग्धा विनाशमर्च्छन्ति न यान्ति शर्म । क्रुद्धोग्रसर्पप्रतिमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२४ अनात्मवान् (= असंयतात्मा) जिनके द्वारा हृदय में डँसे जानेपर नष्ट हो जाते हैं, शान्ति नही पाते, क्रुद्ध उग्र साँपों के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥24॥ अस्थि क्षुधार्त्ता इव सारमेया भुक्त्वापि यान्नैव भवन्ति तृप्ताः । जीर्णास्थिकङ्कालसमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२५ जैसे हड्डी चबाकर भी भूखे कुत्ते तृप्त नही होते हैं वैसे ही जिन्हें भोगकर भी (लोग) तृप्त नही होते हैं, जीर्ण अस्थि-पञ्जर (= पुरानी ठठरी) के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥25॥ ये राजचोरोदकपावकेभ्यः साधारणत्वान्नजयन्ति दुःखम् । तेषु प्रविद्धाभिषसन्निभेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२६ राजा चोर जल व अग्नि का समान अधिकार होने के कारण जो (काम) दुःख पैदा करते हैं, फेके हुए मांस के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥26॥⁴⁶ यत्र स्थितानामभितो विपत्तिः शत्रोः सकाशादपि बान्धवेभ्यः । हिंस्रेषु तेष्वायतनोपमेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२७ जहाँ रहनेवालों (जिनमें रमनेवालों) पर चारों ओर से विपत्ति है, शत्रु के समीप से, और बन्धुओं के समीप से, यज्ञशालाओं के समान उन हिंसक कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥27॥ गिरौ वने चाप्सु च सागरे च यान् भ्रंशमर्च्छन्ति विलङ्घमानाः । तेषु द्रुमप्राग्रफलोपमेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२८ पर्वत पर, वन में, जल में और सागर में जिन्हें खोजते हुए भ्रष्ट होते हैं, वृक्ष-शिखर पर के फलों के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥28॥ तीव्रैः प्रयत्नैर्विविधैर्हवाप्ताः क्षणेन ये नाशमिह प्रयान्ति । स्वप्नोपभोगप्रतिमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.२९ विविध तीव्र प्रयत्नों से प्राप्त होकर जो क्षण-भर में इस संसार में नष्ट हो जाते हैं, स्वप्न-उपभोग के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥29॥ यानर्जयित्वापि न यान्ति शर्म विवर्धयित्वा परिपालयित्वा । अङ्गारकर्षूंप्रतिमेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३० जिन्हें अर्जन कर, बढ़ाकर और पालकर भी (लोग) शान्ति नही पाते, अङ्गारे की आग के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥30॥ विनाशमीयुः कुरवो यदर्थं वृष्ण्यन्धका मेखलदण्डकाश्च । शूनासिकाहप्रतिमेषु तेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३१ जिनके लिए कौरव वृष्ण्यन्धक व मेखलदण्डक विनाश को प्राप्त हुए, वध-स्थल के छुरे व काठ के समान उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥31॥⁴⁷ ⁴⁶ - (26, 27) काम = उपभोग की वस्तुएँ। सोने चाँदी लाखों-करोड़ों सिक्कों को मैं श्रेष्ठ धन नही कहता। उसमें तो भय-ही-भय है—राजा का, अग्नि का, जल का, चोर का, लुटेरे का और अपने सगे सम्बन्धियों तक का भय है= बु० वा०। ⁴⁷ - (31-32) जुए के लिए कौरवों का, मद्यपान के लिए वृष्ण्यन्धकों का और स्त्री के लिए सुन्द-उपसुन्द का विनाश हुआ। बुद्धचरित 57

सुन्दोपसुन्दावसुराँ यदर्थमन्योन्यवैरप्रसृतौ विनष्टौ । सौहार्दविश्लेषकरेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३२ जिनके लिए सुन्द और उपसुन्द नामक दो असुर, एक दूसरे के प्रति वैर बढ़नेपर, नष्ट हुए, मैत्री विलगानवाले उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥३२॥ येषां कृते वारिणि पावके च क्रव्यात्सु चात्मानमिहोत्सृजन्ति । सपत्नभूतेष्वशिवेषु तेषु कामेषु कस्यात्मवतो रतिः स्यात् ॥११.३३ जिनके लिए जल में, अग्नि में, व हिंसक जीवों के आगे (लोग) अपने को उत्सर्ग (= समर्पित) कर देते हैं, शत्रु-सदृश व अमङ्गलजनक उन कामों में किस आत्मवान् को आनन्द होगा? ॥३३॥ कामार्थमज्ञः कृपणं करोति प्राप्नोति दुःखं वधबन्धनादि । कामार्थमाशाकृपणस्तपस्वी मृत्युं श्रमं चार्छति जीवलोके ॥११.३४ काम (= विषय) के लिए अज्ञानी क्षुद्रता करता है और वध-बन्धन आदि दुःख पाता है। तृष्णा से दीन हुआ बेचारा प्राणि-जगत् काम के लिए मौत व थकावट पाता है ॥३४॥ गीतैर्हियन्ते हि मृगा वधाय रूपार्थमग्नौ शलभाः पतन्ति । मत्स्यो गिरत्यायसमामिषार्थी तस्मादनर्थं विषयाः फलन्ति ॥११.३५ गीतों से मृग वध के लिए अपहृत होते हैं; रूप के लिए पतङ्ग अग्नि में गिरते हैं; मांस चाहनेवाली मछली लोहे की कँटिया निगलती है; इसलिए विषयों का फल विपत्ति है ॥३५॥ कामास्तु भोगा इति यन्मतिः स्याद्भोगो न केचित्परिगण्यमानाः । वस्त्रादयो द्रव्यगुणा हि लोके दुःखप्रतीकार इति प्रथायाः ॥११.३६ काम भोग हैं, ऐसा जो विचार है सो कोई भी काम भोग नही गिने जा सकते; क्योंकि वस्त्र आदि विषय दुःख के प्रतीकार हैं, ऐसा समझना चाहिए ॥३६॥ इष्टं हि तर्षप्रशमाय तोयं क्षुन्नाशहेतोरशनं तथैव । वातातपाम्ब्वावरणाय वेश्म कौपीनशीतावरणाय वासः ॥११.३७ प्यास मिटाने के लिए पानी इष्ट (= चाहा जाता है) है, उसी प्रकार भूख मिटाने के लिए भोजन, हवा धूप व पानी से बचने के लिए घर, शीत-निवारण और लङ्गोते के लिए वस्त्र ॥३७॥ निद्राविघाताय तथैव शय्या यानं तथाध्वश्रमनाशनाय । तथासनं स्थानविनोदनाय स्नानं मृजारोग्यबलाश्रयाय ॥११.३८ उसी प्रकार नींद (की बाधा) दूर करने के लिए शय्या, उसी तरह रास्ते की थकावट नष्ट करने के लिए गाड़ी, उसी तरह खड़ा रहना दूर करने के लिए आसन और मार्जन आरोग्य व बल प्राप्त करने के लिए स्नान (इष्ट है) ॥३८॥ दुःखप्रतीकारनिमित्तभूतास्तस्मात्प्रजानां विषया न भोगाः । अश्नामि भोगानिति कोऽभ्युपेयात्प्राज्ञः प्रतीकारविधौ प्रवृत्तः ॥११.३९ इसलिए दुःख-प्रतीकार के कारणस्वरूप विषय लोगों के लिए भोग नहीं हो सकते। (दुःख) प्रतिकार-विधि में लगा हुआ कौन बुद्धिमान् यह मानेगा—"मैं भोग कर रहा हूँ" ॥३९॥ यः पित्तदाहेन विदह्यमानः शीतक्रियां भोग इति व्यवस्येत् । दुःखप्रतीकारविधौ प्रवृत्तः कामेषु कुर्यात्स हि भोगसञ्ज्ञाम् ॥११.४० पित्तज्वर से जलता हुआ जो (आदमी) शीतोपचार को भोग समझेगा, दुःख-प्रतीकार-उपाय में लगा हुआ वही (आदमी) कामों (= विषयों) को भोग समझेगा ॥४०॥ कामेष्वनैकान्तिकता च यस्मात्ततोऽपि मे तेषु न भोगसञ्ज्ञा । य एव भावा हि सुखं दिशन्ति त एव दुःखं पुनरावहन्ति ॥११.४१ क्योंकि कामों (विषयों) में ऐकान्तिकता (= एक अन्त) नही है, इसलिए भी मैं कामों को भोग नहीं समझता। जो ही पदार्थ सुख देते हैं, वे ही फिर दुःख लाते हैं ॥४१॥ गुरूणि वासांस्यगुरुणि चैव सुखाय शीते ह्यसुखाय घर्मे । चन्द्रांशवश्चन्दनमेव चोष्णे सुखाय दुःखाय भवन्ति शीते ॥११.४२ क्योंकि, भारी वस्त्र और अगुरु से जाड़े में सुख होता है और गर्मी में असुख; चन्द्र किरणों व चन्दन से गर्मी में सुख होता है और जाड़े में असुख ॥४२॥ द्वन्द्वानि सर्वस्य यतः प्रसक्तान्यलाभलाभप्रभृतीनि लोके । अतोऽपि नैकान्तसुखोऽस्ति कश्चिन्नैकान्तदुःखः पुरुषः पृथिव्याम् ॥११.४३ क्योंकि संसार मे हानि-लाभ आदि द्वन्द्व सबमें लगे हुए हैं, इसलिए भी पृथिवी पर कोई पुरुष न तो एकान्त (= केवल) सुखी है और न एकान्त दुःखी है ॥४३॥ दृष्ट्वा च विमिश्रां सुखदुःखतां मे राज्यं च दास्यं च मतं समानम् । नित्यं हसत्येव हि नैव राजा न चापि सन्तप्यत एव दासः ॥११.४४ दुःख व सुख को मिला हुआ देखकर, राज्य व दासत्व को मैं समान मानता हूँ। न तो राजा ही नित्य हँसता है और न दास ही नित्य संतप्त होता है ॥४४॥ आज्ञा नृपत्वेऽभ्यधिकेति यत्स्यान्महान्ति दुःखान्यत एव राज्ञः । आसङ्गकाष्ठप्रतिमो हि राजा लोकस्य हेतोः परिखेदमति ॥११.४५ यह कि राजत्व में आज्ञा अधिक है, इसलिए तो राज को बड़े-बड़े दुःख होते हैं। आसङ्ग-काष्ठ (?) के समान राजा संसार के लिए थकता है ॥४५॥ राज्ये नृपस्त्यागिनि बह्वमित्रे विश्वासमागच्छति चेद्विपन्नः । अथापि विश्रम्भमुपैति नेह किं नाम सौख्यं चकितस्य राज्ञः ॥११.४६ त्याग करनेवाले (= क्षण-भङ्गुर) व बहुत शत्रुओं से भरे राज्य में यदि (राजा) विश्वास करता है, तो मरता है और यदि उस (राज्य) में विश्वास नहीं करता है, तो भय-भीत रहनेवाले राजा को सुख क्या है? ॥४६॥ 58 अश्वघोष

यदा च जित्वापि महीं समग्रां वासय दृष्टं पुरमेकमेव । तत्रापि चैकं भवनं निषेव्यं श्रमः परार्थे ननु राजभावः ॥११.४७ और जब कि सारी पृथ्वी को जीतकर भी रहने के लिए वह एक ही नगर को देखता है, और उसमें भी उसे एक ही महल का सेवन करना पड़ता है, तब अवश्य ही राजत्व दूसरों के लिए (परि-) श्रम (करना) है ॥४७ ॥ राज्ञोऽपि वासोयुगमेकमेव क्षुत्सन्निरोधाय तथान्नमात्रा । शय्या तथैकासनमेकमेव शेषा विशेषा नृपतेर्मदाय ॥११.४८ राजा के लिए भी एक ही जोड़ा वस्त्र, उसी तरह क्षुधा-निवृत्ति के लिए कुछ अन्न, उसी तरह एक शय्या और एक ही आसन (आवश्यक है); राजा की शेष विशेषताएँ तो मद (पैदा करने) के लिए हैं ॥४८ ॥ तुष्ट्यर्थमेतच्च फलं यदिष्टमुपैषि राज्यान्मम तुष्टिरस्ति । तुष्टौ च सत्यां पुरुषस्य लोके सर्वे विशेषा ननु निर्विशेषाः ॥११.४९ और यदि सन्तोष के लिए यह फल इष्ट है, तो राज्य के बिना भी मुझे सन्तोष है। संसार में मनुष्य को सन्तोष होनेपर सब विशेषताएँ विशेषता-रहित हैं ॥४९ ॥ तन्नास्मि कामान् प्रति सम्प्रतार्यः क्षेमं शिवं मार्गमनुप्रपन्नः । स्मृत्वा सुहृत्त्वं तु पुनः पुनर्मां ब्रूहि प्रतिज्ञां खलु पालयति ॥११.५० इसलिए कर्मों के प्रति मैं बहकाया नहीं जा सकता; मङ्गलमय व कल्याणकारी मार्ग की शरण में हूँ। मित्रता का स्मरण कर आप बार-बार मुझसे कहें- "अवश्य प्रतिज्ञा पालन करो" ॥५० ॥ न ह्यस्म्यमर्षेण वनं प्रविष्टो न शत्रुबाणैरवधूतमौलिः । कृतस्पृहो नापि फलाधिकेभ्यो गृह्णामि नैतद्वचनं यतस्ते ॥११.५१ न तो क्रोध से मैंने वन में प्रवेश किया है, और न शत्रु के बाणों से मुकुट कँपाये जानेपर ही। न तो अधिक फल के लिए अभिलाषा करता हूँ, जिससे आपकी यह बात न मान रहा हूँ ॥५१ ॥ यो दन्दशूकं कुपितं भुजङ्गं मुक्त्वा व्यवस्येद्धि पुनर्गृहीतुम् । दाहात्मिकां वा ज्वलितां तृणोल्कां सन्त्यज्य कामान् स पुनर्भजेत ॥११.५२ जो डँसनेवाले कुपित साँपों को, या जलानेवाली जलती उल्का को छोड़कर फिर से पकड़ने का विचार करे, वही कर्मों को छोड़कर फिर उनका सेवन करे ॥५२ ॥ अन्धाय यश्च स्पृहयेदनन्धो बद्धाय मुक्तो विधनाय चाढ्यः । उन्मत्तचित्ताय च कल्पचित्तः स्पृहां स कुर्याद्विषयात्मकाय ॥११.५३ जो दृष्टिमान् दृष्टि-हीन (होने के) लिए और जो मुक्त (पुरुष) बन्दी (होने के) लिए, और जो धनी निर्धन (होने के) लिए और जो स्वस्थ-चित्त उन्मत्त-चित्त (होने के) लिए अभिलाषा करे, वही विषयी (होने के) लिए अभिलाषा करे ॥५३ ॥


भैक्षोपभोगीति च नानुकम्प्यः कृती जरामृत्युभयं तितीर्षुः । इहोत्तमं शान्तिसुखं च यस्य परत्र दुःखानि च संवृतानि ॥११.५४ "भिक्षा पर रहता है" इसलिए वह बुद्धिमान् अनुकम्पा के योग्य नहीं जो जरा व मृत्यु का भय पार करना चाहता है, जिसका इस संसार में उत्तम शान्ति सुख प्राप्त है और परलोक में जिसके दुःख नष्ट हैं ॥५४ ॥ लक्ष्म्यां महत्यामपि वर्तमानस्तृष्णाभिभूतस्त्वनुकम्पितव्यः । प्राप्नोति यः शान्तिसुखं न चेह परत्र दुःखं प्रतिगृह्यते च ॥११.५५ महती लक्ष्मी की (गोद में) रहता हुआ भी तृष्णा से अभिभूत पुरुष अनुकम्पा के योग्य है, जो इस लोक में शान्ति-सुख नहीं पाता और जो परलोक में दुःखों से प्राप्त होता है ॥५५ ॥ एवं तु वक्तुं भवतोऽनुरूपं सत्त्वस्य वृत्तस्य कुलस्य चैव । ममापि वोढुं सदृशं प्रतिज्ञां सत्त्वस्य वृत्तस्य कुलस्य चैव ॥११.५६ ऐसा कहना आपके सत्त्व आचार और कुल के अनुरूप है, मेरे लिए भी प्रतिज्ञा पालन करना मेरे सत्त्व, आचार और कुल के योग्य है ॥५६ ॥ अहं हि संसारशरेण विद्धो विनिःसृतः शान्तिमवाप्तुकामः । नेच्छेयमाप्तुं त्रिदिवेऽपि राज्यं निरामयं किं बत मानुषेषु ॥११.५७ संसाररूप तीर से विद्ध होकर शान्ति पाने की इच्छा से मैं (घर से) निकला हूँ, स्वर्ग का भी निष्कण्टक राज्य नहीं पाना चाहता हूँ, मर्त्यलोक का क्या कहना? ॥५७ ॥ त्रिवर्गसेवां नृप यत्तु कृत्स्नतः परो मनुष्यर्थ इति त्वमात्थ माम् । अनर्थ इत्येव ममात्र दर्शनं क्षयी त्रिवर्गो हि न चापि तर्पकः ॥११.५८ पूरा-पूरा त्रिवर्ग सेवन परम पुरुषार्थ है, हे राजन्, यह जो आपने मुझे कहा, इसमें मैं अनर्थ ही देखता हूँ क्योंकि त्रिवर्ग नाशवान् है और तृप्तिदायक भी नहीं है ॥५८ ॥ पदे तु यस्मिन्न जरा न भीर्न रुङ् न जन्म नैवोपरमो न चाधयः । तमेव मन्ये पुरुषार्थमुत्तमं न विद्यते यत्र पुनः पुनः क्रिया ॥११.५९ जिसमें न जरा है, न भय, न रोग, न जन्म, न मृत्यु, और न आधि, उसी पद को मैं उत्तम पुरुषार्थ मानता हूँ जिसमें बार-बार कर्म नहीं करना पड़ता ॥५९ ॥ यदप्यवोचः परिपाल्यतां जरा नवं वयो गच्छति विक्रियामिति । अनिश्चयोऽयं बहुशो हि दृश्यते जराप्यधीरा धृतिमच्च यौवनम् ॥११.६० यह जो कहा कि जरा की प्रतीक्षा करो, नई वयस में विकार होता है, यह निश्चित नहीं है; क्योंकि बहुधा देखा जाता है कि बुढ़ापे में भी अधैर्य है और जवानी में भी धैर्य ॥६० ॥⁴⁸


⁴⁸- "चपलं" की जगह "बहुशः" रक्खा गया है। बुद्धचरित 59

स्वकर्मदक्षश्च यदान्तको जगद् वयःसु सर्वेष्ववशं विकर्षति। विनाशकाले कथमव्यवस्थिते जरा प्रतीक्ष्या विदुषा शमेप्सुना ॥११.६१ जब कि अपने कर्म में निपुण यम विवश जगत् को सब अवस्थाओं में दूर खींच रहा है, तब विनाश-काल अनिश्चित होनेपर शान्ति पाने का इच्छुक बुद्धिमान् क्यों बुढ़ापे की प्रतीक्षा करे? ॥61 ॥ जरायुधो व्याधिविकीर्णसायको यदान्तको व्याध इवाशिवः स्थितः। प्रजामृगान् भाग्यवनाश्रितांस्तुदन् वयःप्रकर्षं प्रति को मनोरथः ॥११.६२ जब कि जरा-रूप-शस्त्र धारी यम अमङ्गल व्याध के समान खड़ा होकर व्याधिरूप तीरों को बिखेरता हुआ भाग्य-रूप वन में आश्रित प्रजा रूप मृगों को पीड़ित कर रहा है, तब बुढ़ापे (में धर्म करने) की क्या चाह हो सकती है? ॥62 ॥ अतो युवा वा स्थविरोऽथवा शिशुस्तथा त्वरावानिह कर्तुमर्हति । यथा भवेद्धर्मवतः कृपात्मनः प्रवृत्तिरिष्टा विनिवृत्तिरेव वा ॥११.६३ इसलिए युवा हो, या वृद्ध या शिशु, वह यहाँ शीघ्र ऐसा करे, जिससे धर्मात्मा व शुद्धात्मा होकर (स्वर्ग- प्राप्ति-द्वारा) इष्ट प्रवृत्ति या (मोक्ष-प्राप्ति-द्वारा) इष्ट निवृत्ति प्राप्त करे ॥63 ॥ यदात्थ चापीष्टफलां कुलोचितां कुरुष्व धर्म्याय मखक्रियामिति । नमो मखेभ्यो न हि कामये सुखं परस्य दुःखक्रियया यदिष्यते ॥११.६४ यह जो कहा कि इष्ट फल देनेवाली कुलोचित यज्ञ-क्रिया धर्म के लिए करो; यज्ञों को प्रणाम है, मैं वह सुख नही चाहता, जो दूसरों को दुःख देकर चाहा जाता है ॥64 ॥ परं हि हन्तुं विवशं फलेप्सया न युक्तरूपं करुणात्मनः सतः। क्रतोः फलं यद्यपि शाश्वतं भवेत्तथापि कृत्वा किमु यत्क्षयात्मकम् ॥११.६५ जो दयावान् है उसके लिए फल पाने की इच्छा से दूसरे विवश जीव की हत्या करना ठीक नहीं। यदि यज्ञ का फल शाश्वत भी हो, तो भी वह करके क्या जो हिंसात्मक है? ॥65 ॥ भवेच्च धर्मो यदि नापरो विधिर्व्रतेन शीलेन मनःशमेन वा । तथापि नैवार्हति सेवितुं क्रतुं विशस्य यस्मिन् परमुच्यते फलम् ॥११.६६ यदि व्रत, शील या मानसिक शान्ति द्वारा धर्म प्राप्त होने का दूसरा उपाय न हो, तो भी यज्ञ का सेवन नही करना चाहिए, जिसमें दूसरे को मारकर फल प्राप्त होता है ऐसा कहा जाता है ॥66 ॥ इहापि तावत्पुरुषस्य तिष्ठतः प्रवर्त्तते यत्परहिंसया सुखम् । तदप्यनिष्टं सघृणस्य धीमतो भवान्तरे किं बत यन्न दृश्यते ॥११.६७ इस लोक में रहते हुए पुरुष को पर-हिंसा से जो सुख होता है, वह भी दयावान् बुद्धिमान् के लिए इष्ट (वांछनीय) नहीं; दूसरे जन्म में जो दिखाई नहीं पड़ रहा है उसका क्या? ॥67 ॥ न च प्रतार्योऽस्मि फलप्रवृत्तये भवेषु राजन् रमते न मे मनः। लता इवाम्भोधरवृष्टिताडिताः प्रवृत्तयः सर्वगता हि चञ्चला ॥११.६८ 60 अश्वघोष और फल के लिए प्रवृत्ति की ओर मैं नही बहकाया जा सकता हूँ, जन्म-चक्र में, हे राजन्, मेरा मन नही लग रहा है। बादल की वृष्टि से ताड़ित लता के समान यह सर्वव्यापी प्रवृत्ति चञ्चल है ॥68 ॥⁴⁹ इहागतश्चाहमितो दिदृक्षया मुनेरराडस्य विमोक्षवादिनः । प्रयामि चाद्यैव नृपास्तु ते शिवं वचः क्षमेथाः मम तत्त्वनिष्ठुरम् ॥११.६९ यहाँ आया हूँ और मोक्ष-वादी मुनि अराड को देखने की इच्छा से आज ही यहाँ से जा रहा हूँ। हे राजन्, आपका कल्याण हो, मेरे सत्यनिष्ठुर वचन को क्षमा कीजिए ॥69 ॥ अवेन्द्रवद्विध्यव शश्वदर्कवद्गुणैरव श्रेय इहाव गामव । अवायुरार्यैरव सत्सुतानव श्रियञ्च राजन्नव धर्ममात्मनः ॥११.७० इन्द्र के समान रक्षा कीजिए, आकाश के सूर्य के समान सदा रक्षा कीजिए, अपने आर्य (= उत्तम) गुणों से इस लोक में कल्याण की रक्षा कीजिए, पृथ्वी की रक्षा कीजिए, आयु की रक्षा कीजिए, सत्पुत्रों की रक्षा कीजिए, हे राजन्, लक्ष्मी व अपने धर्म की रक्षा कीजिए ॥70 ॥ हिमारिकेतुद्भवसंभवान्तरे यथा द्विजो याति विमोक्ष्यवंस्तनुम् । हिमारिशत्रुक्षयशत्रुघातने तथान्तरे याहि विमोक्ष्यन्मनः ॥११.७१ जैसे अग्नि-पताका (= धूम) से उत्पन्न होनेवाले (= बादल) से वृष्टि होनेपर अग्नि अपनी बाहरी आकृति को छोड़ देती है (या साँप अपनी केंचुल छोड़ता है), वैसे ही सूर्य-शत्रु (= तम) का विनाश करने में जो शत्रु (= विघ्न) हैं उनकी हत्या करके अपना मन मुक्त कीजिए" ॥71 ॥ नृपोऽब्रवीत्साञ्जलिरागतस्पृहो यथेष्टमाप्नोतु भवानविघ्नतः । अवाप्य काले कृतकृत्यतामिमां ममापि कार्यो भवता त्वनुग्रहः ॥११.७२ राजा ने हाथ जोड़कर अभिलाषापूर्वक कहा- "आप यथेष्ट सफलता निर्विघ्न प्राप्त करें और इसे प्राप्त कर समय पर मेरे ऊपर भी आप अनुग्रह कीजिएगा" ॥72 ॥ स्थिरं प्रतिज्ञाय तथेति पार्थिवे ततः स वैश्वन्तरमाश्रमं ययौ । परिव्रजन्तं समुदीक्ष्य विस्मितो नृपोऽपि वव्राज पुरिं गिरिव्रजम् ॥११.७३ तब, “वैसा ही हो" इस तरह राजा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा कर, वह वैश्वंतर-आश्रम की ओर गया। उसे जाते देखकर विस्मित हुआ राजा भी गिरि-वज्र पुरी (= राजगृह) को चला गया ॥73 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृते कामविगर्हणो नामैकादशः सर्गः ॥११॥ ⁴⁹ - किसी जीव का जन्म बराबर एक ही योनि में नहीं होता है, वह भिन्न-भिन्न योनि में पैदा होता रहता है, और कभी वह स्वर्ग में रहता है तो कभी नरक में; इसलिए प्रवृत्ति का सर्वव्यापी और चञ्चल कहा गया है।

द्वादश सर्ग अराड-दर्शन ततः शमविहारस्य मुनेरिक्षवाकुचन्द्रमाः । अराडस्याश्रमं भेजे वपुषा पूरयन्निव ॥१२.१ तब इक्ष्वाकु (-वंश का) चन्द्रमा शम-धर्म में विहार करनेवाले अराड के आश्रम में गया, उस (आश्रम) को वह (राज-कुमार) अपने रूप से मानो भर रहा था ॥1 ॥ स कालामसगोत्रेण तेनालोक्यैव दूरतः । उच्चैः स्वागतमित्युक्तः समीपमुपजग्मिवान् ॥१२.२ कालाम गोत्र के उस मुनि ने दूर से ही उसे देखकर जोर से 'स्वागत' शब्द कहा, और वह (कुमार) उसके समीप गया ॥2 ॥ तावुभौ न्यायतः पृष्ट्वा धातुसाम्यं परस्परम् । दारव्योर्मेध्ययोर्वृष्योः शुचौ देशे निषेदतुः ॥१२.३ वे दोनों न्यायपूर्वक परस्पर धातु-साम्य (= स्वास्थ्य) पूछकर पवित्र स्थान में काठ के दो पवित्र आसनों पर बैठ गये ॥3 ॥ तमासीनं नृपसुतं सोऽब्रवीन्मुनिसत्तमः । बहुमानविशालाभ्यां दर्शनाभ्यां पिबन्निव ॥१२.४ उस मुनि-श्रेष्ठ ने, सम्मान के कारण अपनी विकसित आँखों से, बैठे हुए उस राज कुमार को मानो पीते हुए कहा:— ॥4 ॥ विदितं मे यथा सौम्य निष्क्रान्तो भवनादसि । छित्त्वा स्नेहमयं पाशं पाशं दृप्त इव द्विपः ॥१२.५ “हे सौम्य, मुझे मालूम है कि आप किस प्रकार घर से निकले हैं। जैसे गर्वीला हाथी बन्धन को काटकर (निकलता है), वैसे ही स्नेहमय बन्धन को काटकर आप निकले हैं ॥5 ॥ सर्वथा धृतिमच्चैव प्राज्ञं चैव मनस्तव । यस्त्वं प्राप्तः श्रियं त्यक्त्वा लतां विषफलामिव ॥१२.६ आपका मन सब प्रकार से धैर्यवान् व ज्ञानवान् है जो आप विषाक्त फलवाली लता की तरह लक्ष्मी को तजकर आये हैं ॥6 ॥ नाश्चर्यं जीर्णवयसो यज्जग्मुः पार्थिवा वनम् । अपत्येभ्यः श्रियं दत्त्वा भुक्तोच्छिष्टामिव स्रजम् ॥१२.७ (इसमें कुछ) आश्चर्य नहीं कि बूढ़े होनेपर राजा लोग अपनी सन्तानों को उपभोग की गई झूठी माला की तरह राज्य-लक्ष्मी सौंपकर वन गये हैं ॥7 ॥

इदं मे मतमाश्चर्यं नवे वयसि यद्भवान् । अभुक्त्वाैव श्रियं प्राप्तः स्थितो विषयगोचरे ॥१२.८ इसे मैं आश्चर्य मानता हूँ कि आप, नई वयस में विषयों की गोचर-भूमि में रहते हुए, लक्ष्मी का उपभोग किए बिना ही आ गये हैं ॥8 ॥ तद्विज्ञातुमिमं धर्मं परमं भाजनं भवान् । ज्ञानप्लवमधिष्ठाय शीघ्रं दुःखार्णवं तर ॥१२.९ इसलिए इस परम धर्म को जानने के लिए आप उत्तम पात्र हैं; ज्ञानरूप नाव पर चढ़कर दुःखरूप सागर को शीघ्र पार कीजिए ॥9 ॥ शिष्ये यद्यपि विज्ञाते शास्त्रं कालेन वर्ण्यते । गाम्भीर्याद्व्यवसायाच्च न परीक्ष्यो भवान्मम ॥१२.१० यद्यपि शिष्य को जानने के बाद समय पर शास्त्र बताया जाता है, किन्तु आपकी गम्भीरता व निश्चय के कारण मैं आपकी परीक्षा नहीं करूँगा" ॥10 ॥ इति वाक्यमराडस्य विज्ञाय स नरर्षभः । बभूव परमप्रीतः प्रोवाचोत्तरमेव च ॥१२.११ अराड की यह बात जानकर वह नर-श्रेष्ठ परम प्रसन्न हुआ और उत्तर दिया:— ॥11 ॥ विरक्तस्यापि यदिदं सौमुख्यं भवतः परम् । अकृतार्थोऽप्यनेनास्मि कृतार्थ इव सम्प्रति ॥१२.१२ “विरक्त होनेपर भी आपकी जो यह अत्यन्त अनुकूलता है, अकृतार्थ होनेपर भी मैं इससे इस समय कृतार्थ-सा हूँ ॥12 ॥ दिदृक्षुरिव हि ज्योतिर्याियासुरिव दैशिकम् । त्वद्दर्शनमहं मन्ये तितीर्षुरिव च प्लवम् ॥१२.१३ आपके दर्शन को मैं वैसा ही मान रहा हूँ, जैसा कि देखने की इच्छा करनेवला प्रकाश को, यात्रा की इच्छा करनेवाला (मार्ग) बतानेवाले को, और (नदी) पार करने की इच्छा करनेवाला नाव को मानता है ॥13 ॥ तस्मादर्हसि तद्वक्तुं वक्तव्यं यदि मन्यसे । जरामरणरोगेभ्यो यथायं परिमुच्यते ॥१२.१४ इसलिए यदि आप कहने योग्य समझें, तो आपको वह कहना चाहिए जिससे यह व्यक्ति जरा मरण व रोग से मुक्त हो जाय" ॥14 ॥ इत्यराडः कुमारस्य माहात्म्यादेव चोदितः । सङ्क्षिप्तं कथयांचक्रे स्वस्य शास्त्रस्य निश्चयम् ॥१२.१५ बुद्धचरित 61

कुमार के माहात्म्य से ही प्रेरित होकर, अराड ने अपने शास्त्र का सङ्क्षिप्त निश्चय इस प्रकार कहा:- ॥15 ॥ श्रूयतामयमस्माकं सिद्धान्तः शृण्वतां वर । यथा भवति संसारो यथा चैव निवर्तते ॥१२.१६ “हे श्रोताओं में श्रेष्ठ, हमारा यह सिद्धान्त सुनिये कि कैसे यह संसार प्रवृत्त होता है और कैसे निवृत्त होता है ॥16 ॥ प्रकृतिश्च विकारश्च जन्म मृत्युर्जरेव च । तत्तावत्सत्त्वमित्युक्तं स्थिरसत्त्व परेहि तत् ॥१२.१७ हे स्थिर-सत्त्व, इसे समझिये; प्रकृति, विकार, जन्म, जरा व मृत्यु को ही सत्त्व कहा गया है ॥17 ॥ तत्र तु प्रकृतिं नाम विद्धि प्रकृतिकौविद । पञ्च भूतान्यहङ्कारं बुद्धिमव्यक्तमेव च ॥१२.१८ हे प्रकृति को जाननेवाले, उसमें पाँच (महा-) भूतों, अहङ्कार, बुद्धि और अव्यक्त को प्रकृति जानिये ॥18 ॥ विकार इति बुध्यस्व विषयानिन्द्रियाणि च । पाणिपादं च वाचं च पायूपस्थं तथा मनः ॥१२.१९ विषयों, इन्द्रियों, हाथ-पाँव, वाणी, गुदा, जननेन्द्रिय व मन को विकार समझिये ॥19 ॥ अस्य क्षेत्रस्य विज्ञानात्क्षेत्रज्ञ इति सञ्ज्ञि च । क्षेत्रज्ञ इति चात्मानं कथयन्त्यात्मचिन्तकाः ॥१२.२० और सञ्ज्ञावान् (= चेतनावान्, होशवाला) इस क्षेत्र को जानने के कारण क्षेत्रज्ञ है। और आत्मा की चिन्ता करनेवाले लोग आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं ॥20 ॥ सशिष्यः कपिलश्चेह प्रतिबुद्ध इति स्मृतः । सपुत्रः प्रतिबुद्धस्तु प्रजापतिरिहोच्यते ॥१२.२१ और इस संसार में शिष्यों-सहित कपिल ज्ञानी स्मरण किया गया है, उसने पुत्रों सहित ज्ञान प्राप्त किया और वह इस संसार में प्रजापति कहा जाता है ॥21 ॥⁵⁰ जायते जीर्यते चैव बाध्यते म्रियते च यत् । तद्व्यक्तमिति विज्ञेयमव्यक्तं तु विपर्ययात् ॥१२.२२ जो जन्म लेता है, बूढ़ा होता है, पीड़ित होता है और मरता है उसे व्यक्त समझना चाहिए और जो इसका विपरीत (उलटा) है उसे अव्यक्त समझना चाहिए ॥22 ॥ अज्ञानं कर्म तृष्णा च ज्ञेयाः संसारहेतवः । स्थितोऽस्मिंस्त्रितये जन्तुस्तत्सत्त्वं नातिवर्तते ॥१२.२३ अज्ञान, कर्म व तृष्णा संसार के कारण-स्वरूप हैं। इन तीनों गुणों में रहनेवाला प्राणी उस सत्त्व (= प्रकृति विकार जन्म जरा व मृत्यु) के पार नहीं जा सकता ॥23 ॥ विप्रत्ययादहङ्कारात्सन्देहादभिसम्प्लवात् । अविशेषानुपायभ्यां सङ्गादभ्यवपाततः ॥१२.२४ विप्रत्यय, अहङ्कार, सन्देह अभिसम्प्लव, अविशेष, अनुपाय, सङ्ग और अभ्यवपात के कारण (प्राणी उस सत्त्व के पार नहीं जा सकता) ॥24 ॥ तत्र विप्रत्ययो नाम विपरीतं प्रवर्तते । अन्यथा कुरुते कार्यं मन्तव्यं मन्यतेऽन्यथा ॥१२.२५ उसमें विप्रत्यय (= अविश्वास, मिथ्या विश्वास) विपरीत आचरण करता है, जो करना है उसे अन्यथा करता है, जो विचारना है उसे अन्यथा विचारता है ॥25 ॥ ब्रवीम्यहमहं वेद्मि गच्छाम्यहमहं स्थितः । इतीहैवमहङ्कारस्त्वनहङ्कार वर्तते ॥१२.२६ हे अहङ्कार-रहित, मैं बोलता हूँ, मैं जानता हूँ, मैं जाता हूँ, मैं खड़ा हूँ, इस प्रकार इस संसार में अहङ्कार होता है ॥26 ॥ यस्तु भावानसन्दिग्धानेकीभावेन पश्यति । मृत्पिण्डवदसन्देहे स इहोच्यते ॥१२.२७ हे सन्देह-रहित, जो परस्पर नहीं मिली हुई चीजों को मिट्टी के ढेले के समान एक (=ठोस) देखता है, वह इस संसार में सन्देह कहा जाता है ॥27 ॥ य एवाहं स एवेदं मनो बुद्धिश्च कर्म च । यश्चैवैष गणः सोऽहमिति यः सोऽभिसम्प्लवः ॥१२.२८ जो ही मैं हूँ वही यह मन बुद्धि कर्म है, और (मन बुद्धि व कर्म का) जो यह समूह है वहीं मैं हूँ, ऐसा जो है वह अभिसम्प्लव है ॥28 ॥ अविशेषं विशेषज्ञ प्रतिबुद्धाप्रबुद्धयोः । प्रकृतीनां च यो वेद सोऽविशेष इति स्मृतः ॥१२.२९ हे विशेषज्ञ, जो ज्ञानी व अज्ञानी के बीच तथा प्रकृति के बीच अविशेष (= अभेद, भेद नहीं) जानता है वह अविशेष स्मरण किया गया है ॥29 ॥

⁵⁰- “प्रतिबुद्धिरिति स्मृतिः” के स्थान में “प्रतिबुद्ध इति स्मृतः” रक्खा गया है। यह एक दुर्बोध श्लोक है। इस दुर्बोधता का कारण पाठ-दोष ही जान पड़ता है। श्लोक-संख्या 29, 40 और 22 को देखते हुए, इसके तीसरे चरण में “प्रतिबुद्ध” की जगह “अप्रतिबुद्ध” पढ़ना ठीक होगा। तब अर्थ यों हो—“और, इस संसार में शिष्यों- सहित कपिल ज्ञानी स्मरण किया गया है और पुत्रों सहित प्रजापति (भूतात्मा, मार) अज्ञानी कहा जाता है।” 62 अश्वघोष

नमस्कारवषट्कारौ प्रोक्षणाभ्युक्षणादयः । अनुपाय इति प्राज्ञैरुपायज्ञ प्रवेदितः ॥१२.३० नमस्कार, वषट्कार (= आहुति), सिञ्चन-आदि को, हे उपायज्ञ, बुद्धिमानों ने अनुपाय (= अनुचित उपाय) बताया है ॥३०॥ सज्जते येन दुर्मेधा मनोवाग्बुद्धिकर्मभिः । विषयेष्वनभिष्वङ्ग सोऽभिष्वङ्ग इति स्मृतः ॥१२.३१ जिससे दुर्बुद्धि पुरुष मन वाणी बुद्धि व कर्म द्वारा विषयों में आसक्त होता है, वह, हे आसक्ति-रहित, सङ्ग (= आसक्ति) स्मरण किया गया है ॥३१॥ ममेदमहमत्येति यद्दुःखमभिमन्यते । विज्ञेयोऽभ्यवपातः स संसारे येन पात्यते ॥१२.३२ “मेरा यह है, मैं इसका हूँ” इस दुःख के अभिमान को अभ्यवपात जानना चाहिए जिसके द्वारा संसार में पतन होता है ॥३२॥ इत्यविद्या हि विद्वांसः पञ्चपर्वां समीहते । तमो मोहं महामोहं तामिस्रद्वयमेव च ॥१२.३३ वह विद्वान् कहता है कि अविद्या पाँच पर्वों (= ग्रन्थियों) की होती है—तम, मोह, महामोह, और तामिस्र ॥३३॥ तत्रालस्यं तमो विद्धि मोहं मृत्युं च जन्म च । महामोहस्त्वसम्मोह काम इत्येव गम्यताम् ॥१२.३४ उनमें आलस्य को तम, जन्म व मृत्यु को मोह जानिये। हे मोह-रहित, काम ही महामोह है, ऐसा समझिये ॥३४॥ यस्मादत्र च भूतानि प्रमुह्यन्ति महान्त्यपि । तस्मादेष महाबाहो महामोह इति स्मृतः ॥१२.३५ जिस कारण इस (काम) में बड़े-बड़े प्राणी भी मूढ़ हो जाते हैं, इस कारण हे महाबाहो, यह महामोह स्मरण किया गया है ॥३५॥ तामिस्रमिति चाक्रोध क्रोधमेवाधिकुर्वते । विषादं चान्धतामिस्रमविषाद प्रचक्षते ॥१२.३६ हे क्रोध-रहित, क्रोध को तामिस्र कहते हैं और हे विषाद-रहित, विषाद को अन्ध-तामिस्र कहते हैं ॥३६॥ अनयाविद्यया बालः संयुक्तः पञ्चपर्वया । संसारे दुःखभूयिष्ठे जन्मस्वभिनिषिच्यते ॥१२.३७ पाँच पर्वोंवाली इस अविद्या से युक्त होकर मूर्ख मनुष्य दुःख-बहुल संसार में बार-बार जन्म लेता है ॥३७॥ द्रष्टा श्रोता च मन्ता च कार्यकारणमेव च । अहमित्येवमागम्य संसारे परिवर्तते ॥१२.३८ “द्रष्टा श्रोता चिन्तक व कार्य का साधक मैं ही हूँ” ऐसा समझकर वह संसार में भटकता है ॥३८॥ इहैभिर्हेतुभिर्धीमन् जन्मःश्रोतः प्रवर्तते । हेत्वभावात्फलाभाव इति विज्ञातुमर्हसि ॥१२.३९ इस संसार में इन कारणों से, हे धीमन्, जन्म को सोता चलता रहता है। कारण नही होने से फल नही हो सकता, ऐसा आपको जानना चाहिए ॥३९॥ तत्र सम्यङ्गतिर्विद्वान्मोक्षकाम चतुष्टयम् । प्रतिबुद्धाप्रबुद्धौ च व्यक्तमव्यक्तमेव च ॥१२.४० इसमें, हे मोक्ष के इच्छुक, सम्यक् बुद्धिवाले को (यह) चार जानना चाहिए-ज्ञानी-अज्ञानी और व्यक्त- अव्यक्त ॥४०॥ यथावदेतद्विज्ञाय क्षेत्रज्ञो हि चतुष्टयम् । आजवंजवतां हित्वा प्राप्नोति पदमक्षरम् ॥१२.४१ इन चारों को ठीक ठीक जानकर क्षेत्रज्ञ जन्म-मरण की वेगवती धारा को छोड़ देता है और अविनाशी पद प्राप्त करता है ॥४१॥ इत्यर्थं ब्राह्मणा लोके परमब्रह्मवादिनः । ब्रह्मचर्यं चरन्तीह ब्राह्मणांन्वासयन्ति च ॥१२.४२ इसके लिए संसार में परमब्रह्म-वादी ब्राह्मण ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं और ब्राह्मणों को इसकी शिक्षा देते हैं” ॥४२॥ इति वाक्यमिदं श्रुत्वा मुनेस्तस्य नृपात्मजः । अभ्युपायं च पप्रच्छ पदमेव च नैष्ठिकम् ॥१२.४३ उस मुनि की यह बात सुनकर राजा के पुत्र ने उपाय और नैष्ठिक पद के बारे में पूछा:- ॥४३॥ ब्रह्मचर्यमिदं चर्यं यथा यावच्च यत्र च । धर्मस्यास्य च पर्यन्तं भवान्व्याख्यातुमर्हति ॥१२.४४ “इस ब्रह्मचर्य का आचरण जैसे जितना और जहाँ करना चाहिए, और इस धर्म का जो अन्त है उसकी आप व्याख्या कीजिए।” ॥४४॥ इत्यराडो यथाशास्त्रं विस्पष्टार्थं समासतः । तमेवान्येन कल्पेन धर्ममस्मै व्यभाषत ॥१२.४५ अराड ने शास्त्रानुसार उसी धर्म को उसके लिए अन्य तरीके से सङ्क्षेप में स्पष्ट शब्दों में कहा:- ॥४५॥ अयमादौ गृहान्मुक्त्वा भैक्षाकं लिङ्गमाश्रितः । समुदाचारविस्तीर्णं शीलमादाय वर्तते ॥१२.४६ बुद्धचरित 63

“आरम्भ में घर छोड़कर वह भिक्षु-वेश धारण करता है और सदाचार-व्यापी शील ग्रहण करता है ॥46 ॥ सन्तोषं परमास्थाय येन तेन यतस्ततः । विविक्तं सेवते वासं निर्द्वन्द्वः शास्त्रवित्कृती ॥१२.४७ जहाँ-तहाँ से जो कुछ मिल जाता है उसी से परम सन्तोष पाकर वह निर्द्वन्द्व शास्त्रज्ञ व बुद्धिमान् एकान्त निवास का सेवन करता है ॥47 ॥ ततो रागाद्भयं दृष्ट्वा वैराग्याच्च परं शिवम् । निगृह्णन्निन्द्रियग्रामं यतते मनसः श्रमे ॥१२.४८ तब राग से भय की (उत्पत्ति) और वैराग्य से परम कल्याण की (उत्पत्ति) देखकर इन्द्रिय-समूह का निग्रह करता हुआ वह मानसिक शान्ति के लिए यत्न करता है ॥48 ॥ अथो विविक्तं कामेभ्यो व्यापादादिभ्य एव च । विवेकजमवाप्नोति पूर्वध्यानं वितर्कवत् ॥१२.४९ तब वह काम व व्यापद (= पर-द्रोह-चिन्तन, क्रोध) आदि से रहित, विवेक-जन्य और वितर्क-युक्त पूर्व ध्यान प्राप्त करता है ॥49 ॥ तच्च ध्यानसुखं प्राप्य तत्तदेव वितर्कयन् । अपूर्वसुखलाभेन ह्रियते बालिशो जनः ॥१२.५० और उस ध्यान-सुख को पाकर, उसी की चिन्ता करता हुआ, मूर्ख आदमी अपूर्व सुख की प्राप्ति द्वारा अपहृत (पथभ्रष्ट) होता है ॥50 ॥ शमेनैवंविधेनायं कामद्वेषविगर्हिणा । ब्रह्मलोकमवाप्नोति परितोषेण वञ्चितः ॥१२.५१ काम-द्वेष-विरोधिनी ऐसी शान्ति द्वारा वह सन्तुष्ट होकर ब्रह्म-लोक प्राप्त करता है ॥51 ॥⁵¹ ज्ञात्वा विद्वान्वितर्कांस्तु मनःसङ्क्षोभकारकान् । तद्वियुक्तमवाप्नोति ध्यानं प्रीतिसुखान्वितम् ॥१२.५२ किन्तु वितर्क (= विचार) मन को क्षुब्ध करते हैं, ऐसा जानकर विद्वान् उन (वितर्कों) से वियुक्त और प्रीति-सुख से युक्त ध्यान प्राप्त करता है ॥52 ॥ ह्रियमाणस्तया प्रीत्या यो विशेषं न पश्यति । स्थानं भास्वरमाप्नोति देवेष्वाभास्वरेषु सः ॥१२.५३ उस प्रीति द्वारा हरण किया जाता हुआ जो विशेष को नहीं देखता है वह, आभास्वर देवों के बीच भास्वर (= उज्ज्वल) स्थान प्राप्त करता है ॥53 ॥ ⁵¹- = “वञ्चित” के स्थान में “सज्जितः” या “युक्त” बोधक कोई दूसरा शब्द होगा । यस्तु प्रीतिसुखात्तस्माद्विवेचयति मानसम् । तृतीयं लभते ध्यानं सुखं प्रीतिविवर्जितम् ॥१२.५४ जो उस प्रीति-सुख (प्रीति के सुख से) अपने मन को अलग करता है वह, सुखमय, किन्तु प्रीति-रहित तृतीय ध्यान प्राप्त करता है ॥54 ॥ यस्तु तस्मिन्सुखे मग्नो न विशेषाय यत्नवान् । शुभकृत्स्नैः स सामान्यं सुखं प्राप्नोति दैवतैः ॥१२.५५ जो उस सुख में मग्न होकर विशेष के लिए यत्न नही करता हे वह शुभकृत्स्न देवताओं के साथ सामान्य सुख प्राप्त करता है ॥55 ॥ तादृशं सुखमासाद्य यो न रज्यत्युपेक्षकः । चतुर्थं ध्यानमाप्नोति सुखदुःखविवर्जितम् ॥१२.५६ वैसा सुख पाकर जो अनुरक्त नही होता है, उदासीन रहता है, वह सुख-दुःख से रहित चतुर्थ ध्यान प्राप्त करता है ॥56 ॥ तत्र केचिद्व्यवस्यन्ति मोक्ष इत्यभिमानिनः । सुखदुःखपरित्यागादव्यापाराच्च चेतसः ॥१२.५७ उसमें सुख-दुःख का परित्याग होने से और चित्त का व्यापार नही होने से कुछ अभिमानी निश्चय करते हैं कि मोक्ष यही है ॥57 ॥ अस्य ध्यानस्य तु फलं समं देवैर्बृहत्फलैः । कथयन्ति बृहत्कालं बृहत्प्रज्ञापरीक्षकाः ॥१२.५८ ब्रह्म-ज्ञान के परीक्षक कहते हैं कि इस ध्यान का फल बृहत्फल देवों के साथ दीर्घ कालतक रहता है ॥58 ॥ समाधेर्व्युत्थितस्तस्माद्दृष्ट्वा दोषांश्शरीरिणाम् । ज्ञानमारोहति प्राज्ञः शरीरविनिवृत्तये ॥१२.५९ उस समाधि से उठकर, शरीर-धारियों के दोष देखकर बुद्धिमान् पुरुष शरीर-निवृत्ति के लिए ज्ञान (-मार्ग) पर आरूढ़ होता है ॥59 ॥ ततस्तद्ध्यानमुत्सृज्य विशेषे कृतनिश्चयः । कामेभ्य इव स प्राज्ञो रूपादपि विरज्यते ॥१२.६० तब उस ध्यान को छोड़कर, विशेष के लिए निश्चय कर बुद्धिमान् (पुरुष) काम की तरह रूप से भी विरक्त होता है ॥60 ॥ शरीरे खानि यान्यस्मिन्तान्यादौ परिकल्पयन् । घनेष्वपि ततो द्रव्येष्वाकाशमधिमुच्यते ॥१२.६१ 64 अश्वघोष

इस शरीर में जो शून्य स्थान हैं पहले उनकी कल्पना करता है, तब (इसके) ठोस पदार्थों को भी शून्य समझता है ॥61 ॥ आकाशगतमात्मानं सङ्क्षिप्त्य त्वपरो बुधः । तदेवानन्ततः पश्यन्विशेषमधिगच्छति ॥१२.६२ दूसरा बुद्धिमान् पुरुष आकाश में स्थित अपने को (या आकाश में व्याप्त आत्मा को) सङ्क्षिप्त (= सङ्कुचित) कर, उसी को अनन्त की तरह देखता हुआ विशेष को प्राप्त करता है ॥62 ॥ अध्यात्मकुशलस्त्वन्यो निवर्त्यात्मानमात्मना । किञ्चिन्नास्तीति सम्पश्यन्नाकिञ्चन्य इति स्मृतः ॥१२.६३ अध्यात्म-कुशल दूसरा पुरुष आत्मा द्वारा आत्मा को निवृत्त कर “कुछ भी नही है” ऐसा देखता हुआ आकिञ्चन्य (=अकिञ्चन ?) स्मरण किया गया है ॥63 ॥ ततो मुञ्जादिषीकेव शकुनिः पञ्जरादिव । क्षेत्रज्ञो निःसृतो देहान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥१२.६४ तब मुञ्ज से (निकली) सींक के समान, पिंजड़े से (निकले) पक्षी के समान, देह से निकला हुआ क्षेत्रज्ञ मुक्त कहा जाता है ॥64 ॥ एतत्परमं ब्रह्म निर्लिङ्गं ध्रुवमक्षरम् । यन्मोक्ष इति तत्त्वज्ञाः कथयन्ति मनीषिणः ॥१२.६५ यह परम ब्रह्म है, चिह्न-रहित, ध्रुव और अविनाशी है, जिसे तत्त्वज्ञ मनीषी मोक्ष कहते हैं ॥65 ॥ इत्युपायश्च मोक्षश्च मया सन्दर्शितस्तव । यदि ज्ञातं यदि रुचैर्यथावत्प्रतिपद्यताम् ॥१२.६६ इस तरह मोक्ष और उपाय मैंने आपको बतला दिये हैं; यदि इसे समझा और यदि रुचि हो, तो उचित रीति से इसे प्राप्त कीजिए ॥66 ॥ जैगीषव्योऽथ जनको वृद्धश्चैव पराशरः । इमं पन्थानमासाद्य मुक्ता ह्यन्ये च मोक्षिणः ॥१२.६७ जैगीषव्य, जनक, वृद्ध पराशर और दूसरे मोक्षवाले इस मार्ग से चलकर मुक्त हुए” ॥67 ॥ इति तस्य स तद्वाक्यं गृहीत्वा तु विचार्य च । पूर्वहेतुबलप्राप्तः प्रत्युत्तरमुवाच ह ॥१२.६८ उसका यह वचन सुनकर और विचार करके पूर्व जन्मों के हेतु-बल (=तीन कुशल-मूलों की शक्ति) से युक्त कुमार ने उत्तर दिया:- ॥68 ॥ श्रुतं ज्ञानमिदं सूक्ष्मं परतः परतः शिवम् । क्षेत्रज्ञस्यापरित्यागाद्वैम्येतन्नैष्ठिकम् ॥१२.६९


“यह सूक्ष्म ज्ञान सुना, जो उत्तरोत्तर कल्याण-कारी होता गया है। क्षेत्रज्ञ का परित्याग नही होने से इसे मैं नैष्ठिक नही समझता हूँ ॥69 ॥ विकारप्रकृतिभ्यो हि क्षेत्रज्ञं मुक्तमप्यहम् । मन्ये प्रसवधर्माणं बीजधर्माणमेव च ॥१२.७० विकार और प्रकृति से युक्त होनेपर भी क्षेत्रज्ञ में उत्पत्ति करने का धर्म (=गुण, स्वभाव) और बीज होने का धर्म रहता है, ऐसा मैं मानता हूँ ॥70 ॥ विशुद्धो यद्यपि ह्यात्मा निर्मुक्त इति कल्प्यते । भूयः प्रत्ययसद्भावादमुक्तः स भविष्यति ॥१२.७१ यद्यपि विशुद्ध आत्मा मुक्त समझा जाता है, प्रत्ययों (कारणों) के विद्यमान होने से वह फिर अमुक्त (=बद्ध) हो जायगा ॥71 ॥ ऋतुभूम्यम्बुविरहाद्यथा बीजं न रोहति । रोहति प्रत्ययैस्तैस्तैस्तद्वत्सोऽपि मतो मम ॥१२.७२ जैसे ऋतु भूमि व जल के अभाव से बीज अङ्कुरित नही होता है और उन उन प्रत्ययों के होने से अङ्कुरित होता है, वैसे ही मैं उसे भी मानता हूँ ॥72 ॥ यत्कर्माज्ञानतृष्णानां त्यागान्मोक्षश्च कल्प्यते । अत्यन्तस्तत्परित्यागः सत्यात्मनि न विद्यते ॥१२.७३ यह कि कर्म अज्ञान व तृष्णा के त्याग से मोक्ष पाने की कल्पना की जाती है, सो आत्मा के रहनेपर उसका अत्यन्त (=सम्पूर्ण) त्याग नही हो सकता ॥73 ॥ हित्वा हित्वा त्रयमिदं विशेषस्तूपलभ्यते । आत्मनस्तु स्थितियंत्र तत्र सूक्ष्ममिदं त्रयम् ॥१२.७४ इन तीनों को धीरे-धीरे छोड़ने से विशेष की प्राप्ति होती है, किन्तु जहाँ आत्मा की स्थिति है वहाँ ये तीनों सूक्ष्म रूप में रहते ही हैं ॥74 ॥ सूक्ष्मत्वाच्चैव दोषाणामव्यापाराच्च चेतसः । दीर्घत्वायुषश्चैव मोक्षस्तु परिकल्प्यते ॥१२.७५ दोषों के सूक्ष्म होने से, चित्त का व्यापार नही होने से, और (उस अवस्था में) आयु लम्बी होने से मोक्ष की (केवल) कल्पना कर ली जाती है ॥75 ॥ अहङ्कारपरित्यागो यश्चैष परिकल्प्यते । सत्यात्मनि परित्यागो नाहङ्कारस्य विद्यते ॥१२.७६ और अहङ्कार-परित्याग की जो यह कल्पना की जाती है, सो आत्मा के रहनेपर अहङ्कार का परित्याग नही हो सकता ॥76 ॥

बुद्धचरित 65

सङ्ख्यादिभिर्मुक्तश्च निर्गुणो न भवत्ययम्। तस्मादसति नैर्गुण्ये नास्य मोक्षोऽभिधीयते ॥१२.७७ और सङ्ख्या आदि से मुक्त नही होनेपर वह (=आत्मा) निर्गुण नही होता है, इसलिए निर्गुण न होनेपर इसे मोक्ष हुआ, ऐसा नहीं कह सकते ॥77॥ गुणिनो हि गुणानां च व्यतिरेको न विद्यते। रूपोष्णाभ्यां विरहितो न ह्यग्निरुपलभ्यते ॥१२.७८ गुणी व गुण जुदा-जुदा नही रह सकते। रूप व गर्मी से रहित अग्नि नही पाई जाती ॥78॥ प्राग्देहान्न भवेद्देही प्राग्गुणेभ्यस्तथा गुणी। तस्मादादौ विमुक्तः सन् शरीरी बध्यते पुनः ॥१२.७९ देह से पूर्व देही नही, उसी तरह गुणों से पूर्व गुणी नही, इसलिए शुरु में मुक्त होनेपर भी शरीरी (=आत्मा) फिर (शरीर में) बद्ध होता है ॥79॥ क्षेत्रज्ञो विशरीरश्च ज्ञो वा स्यादज्ञ एव वा। यदि ज्ञो ज्ञेयमस्यास्ति ज्ञेये सति न मुच्यते ॥१२.८० और शरीर-रहित क्षेत्रज्ञ ज्ञ (=जाननेवाला) या अज्ञ है। यदि ज्ञ है, तो इसके लिए ज्ञेय (जानने को शेष) है और ज्ञेय होनेपर यह मुक्त नहीं हैं ॥80॥ अथाज्ञ इति सिद्धो वः कल्पितेन किमात्मना। विनापि ह्यात्मनाऽज्ञानं प्रसिद्धं काष्ठकुड्यवत् ॥१२.८१ यदि आपके अनुसार अज्ञ साबित होता है, तो आत्मा की कल्पना करने से क्या (प्रयोजन)? आत्मा के बिना भी अज्ञान (का अस्तित्व) काठ व दीवार के समान सिद्ध है ॥81॥ परतः परतस्त्यागो यस्मात्तु गुणवान् स्मृतः। तस्मात्सर्वपरित्यागान्मन्थे कृत्स्नां कृतार्थताम् ॥१२.८२ क्योंकि एक एक करके त्याग करना गुणवान स्मरण किया गया है, इसलिए सर्व-त्याग से पूर्ण कृतार्थता होती है, ऐसा मैं मानता हूँ" ॥82॥ इति धर्ममराडस्य विदित्वा न तुतोष सः। अकृत्स्नमिति विज्ञाय ततः प्रतिजगाम ह ॥१२.८३ अराड का यह धर्म जानकर वह सन्तुष्ट नही हुआ, यह (धर्म) अपूर्ण है ऐसा जानकर वहाँ से चला गया ॥83॥ विशेषमथ शुश्रूषुरुद्रकस्याश्रमं ययौ। आत्मग्राहाच्च तस्यापि जगृहे न स दर्शनम् ॥१२.८४ तब विशेष सुनने की इच्छा से वह उद्रक के आश्रम में गया और आत्मा (के सिद्धान्त) को मानने के कारण उसका भी दर्शन उसने ग्रहण नही किया ॥84॥


सञ्ज्ञासञ्ज्ञित्वयोर्दोषं ज्ञात्वा हि मुनिरुद्रकः। आकिञ्चन्यात्परं लेभेऽसञ्ज्ञासञ्ज्ञात्मिकां गतिम् ॥१२.८५ सञ्ज्ञा (=चेतना) व असञ्ज्ञा (=अचेतना) का दोष जानकर उद्रक मुनि ने अञ्चिनता से परे सञ्ज्ञा असञ्ज्ञा-रहित मार्ग को प्राप्त किया ॥85॥ यस्माच्चालम्बने सूक्ष्मे सञ्ज्ञासञ्ज्ञे ततः परम्। नासञ्ज्ञी नैव सञ्ज्ञीति तस्मात्तत्रगतस्पृहः ॥१२.८६ क्योंकि सूक्ष्म सञ्ज्ञा-असञ्ज्ञा भी आलम्बन (=मानसिक या शारीरिक कर्म का आधार) है, उस (सूक्ष्म सञ्ज्ञा-असञ्ज्ञा) से परे न असञ्ज्ञा-युक्त और न सञ्ज्ञा-युक्त अवस्था है, इसलिए वह (उद्रक) उस (अवस्था) का अभिलाषी हुआ ॥86॥ यतश्च बुद्धिस्तत्रैव स्थितान्यत्राप्रचारिणी। सूक्ष्मापादी ततस्तत्र नासञ्ज्ञित्वं न सञ्ज्ञिता ॥१२.८७ और क्योंकि बुद्धि सूक्ष्म व अपटु (=कर्म रहित) होकर वहाँ रहती है, अन्यत्र नही जाती; इसलिए वहाँ न असञ्ज्ञा है, न सञ्ज्ञा ॥87॥ यस्माच्च तदपि प्राप्य पुनरावर्तते जगत्। बोधिसत्त्वः परं प्रेप्सुस्तस्मादुद्रकमत्यजत् ॥१२.८८ और क्योंकि उसे भी प्राप्त कर आदमी फिर संसार में लौट आता है, इसलिए परम पद पाने के इच्छुक बोधिसत्त्व ने उद्रक का त्याग किया ॥88॥ ततो हित्वाश्रमं तस्य श्रेयोऽर्थी कृतनिश्चयः। भेजे गयस्य राजर्षेर्नगरीसञ्ज्ञमाश्रमम् ॥१२.८९ तब श्रेय पाने की इच्छा से निश्चय कर, उसका आश्रम छोड़, उसने राजर्षि गय के नगरी नामक आश्रम का सेवन किया ॥89॥ अथ नैरञ्जनातीरे शुचौ शुचिपराक्रमः। चकार वासमेकान्तविहाराभिरतिर्मुनिः ॥१२.९० तब पवित्र पराक्रमवाले, एकान्त-विहार में आनन्द पानेवाले उस मुनि ने नैरञ्जना नदी के पवित्र तीर पर निवास किया ॥90॥ (आगतान् तत्र) तत्पूर्वं पञ्चेन्द्रियवशोड्ढतान्। तपः (-प्रवृत्तान्) व्रतिनो भिक्षून् पञ्च निरैक्षत ॥१२.९१ अपने से पहले ही वहाँ आये हुए पाँच भिक्षुओं को देखा; वे तपस्वी और व्रती थे, पाँच इन्द्रियों को वश करने के अभिमानी थे ॥91॥ ते चोपतस्थुर्दृष्ट्वात्र भिक्षवस्तं मुमुक्षवः। पुण्यार्जितधनारोग्यमिन्द्रियार्था इवेश्वरम् ॥१२.९२


66 अश्वघोष

उसे वहाँ देखकर मोक्ष चाहनेवाले भिक्षु उसकी सेवा में उपस्थित हुए, जैसे इन्द्रिय-विषय उस ऐश्वर्यशाली की सेवा में उपस्थित होते हैं जिसने अपने पुण्यों से धन व आरोग्य अर्जित किये हों ॥92 ॥ सम्पूज्यमानस्तैः प्रह्वैर्विनयादनुवर्तिभिः । तद्वशस्थायिभिः शिष्यैर्लोलैर्मन इवेन्द्रियैः ॥१२.९३ अपने वश में रहनेवाले उन शिष्यों द्वारा, जो विनयी होने के कारण नम्र व आज्ञा-कारी थे, वह वैसे ही पूजित हुआ, जैसे चपल इन्द्रियों से चित्त पूजित (= सेवित) होता है ॥93 ॥ मृत्युजन्मान्तकरणे स्यादुपायोऽयमित्यथ । दुष्कराणि समारेभे तपांस्यनशनेन सः ॥१२.९४ तब उसने उपवास-द्वारा दुष्कर तप शुरू किये, यह सोचते हुए कि मृत्यु व जन्म का अन्त करने में यह उपाय होगा ॥94 ॥ उपवासविधीन्नैकान् कुर्वन्नरदुराचरान् । वर्षाणि षट् शमप्रेप्सुरकरोत्कार्श्यमात्मनः ॥१२.९५ भाँति-भाँति के उपवास, जो मनुष्य के लिए दुष्कर हैं; छः वर्षों तक करते हुए, शम प्राप्त करने की इच्छा से उसने अपने को कृश बनाया ॥95 ॥ अन्नकालेषु चैकैः स कोलतिलतण्डुलैः । अपारपारसंसारपारं प्रेप्सुरपारयत् ॥१२.९६ अपार-पार संसार का पार पाने की इच्छा से भोजन के समय एक एक बेर तिल व चावल से उसने पारण किया ॥96 ॥ देहादपचयस्तेन तपसा तस्य यः कृतः । स एवोपचयो भूयस्तेजसास्य कृतोऽभवत् ॥१२.९७ उस तप द्वारा उसके शरीर से जितना ही क्षय हुआ, फिर तेज द्वारा उसकी उतनी ही वृद्धि हुई ॥97 ॥ कृशोऽप्यकृशकीर्तिश्रीर्ह्लादं चक्रेऽन्यचक्षुषाम् । कुमुदानामिब शरच्छुक्लपक्षादिचन्द्रमाः ॥१२.९८ (शरीर से) क्षीण होनेपर भी उसकी श्री और कीर्ति क्षीण नहीं हुई और दूसरों की आँखों को उसने वैसे ही आनन्दित किया, जैसे शरद ऋतु के शुक्ल-पक्ष के आरम्भी का चन्द्रमा कुमुदों को आनन्दित करता है ॥98 ॥ त्वगस्थिशेषो निःशेषैर्मेदःपिशितशोणितैः । क्षीणोऽप्यक्षीणगाम्भीर्यः समुद्र इव स व्यभात् ॥१२.९९ उसकी त्वचा व हड्डियाँ शेष रह गईं, मेद-मांस व शोणित निःशेष हो गये; इस तरह क्षीण होनेपर भी वह अक्षीण-गाम्भीर्य (= जिसकी गम्भीरता क्षीण नहीं हुई) समुद्र के समान शोभित हुआ ॥99 ॥


अथ कष्टतपःस्पष्टव्यर्थक्लिष्टतनुर्मुनिः । भवभीरुरिमां चक्रे बुद्धिं बुद्धत्वकाङ्क्षया ॥१२.१०० तब कठोर-तप द्वारा, स्पष्ट ही, शरीर को व्यर्थ क्लेश देकर, जन्म से डरनेवाले मुनि ने बुद्धत्व (पाने) की आकाङ्क्षा से यह विचार किया:— ॥100 ॥ नायं धर्मो विरागाय न बोधाय न मुक्तये । जम्बूमूले मया प्राप्तो यस्तदा स विधिर्ध्रुवः ॥१२.१०१ “इस धर्म से न विराग होगा, न बोध, न मुक्ति। उस समय जम्बू-वृक्ष के मूल में मैंने जो विधि प्राप्त की थी वही ध्रुव है ॥101 ॥ न चासौ दुर्बलेनाप्तुं शक्यमित्यागतादरः । शरीरबलवृद्ध्यर्थमिदं भूयोऽन्वचिन्तयत् ॥१२.१०२ दुर्बल उसे प्राप्त नहीं कर सकता”, (शरीर के प्रति) ऐसा आदर होनेपर शरीर-बल की वृद्धि के लिए उसने फिर यह सोचा:— ॥102 ॥ क्षुत्पिपासाश्रमक्लान्तः श्रमादस्वस्थमानसः । प्राप्नुयान्मनसावाप्यं फलं कथमनिर्वृतः ॥ १२.१०३ “जो भूख प्यास व थकावट से ग्रस्त है, थकावट से अस्वस्थचित्त है अ-सुखी है, वह मन से प्राप्त होनेवाला फल कैसे पायेगा? ॥103 ॥ निर्वृतिः प्राप्यते सम्यक् सततेन्द्रियतर्पणात् । सन्तर्पितेन्द्रियतया मनःस्वास्थ्यमवाप्यते ॥१२.१०४ इन्द्रियों को निरन्तर तृप्त करने से सुख ठीक-ठीक प्राप्त होता है; इन्द्रियों को अच्छी तरह से तृप्त करने से मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है ॥104 ॥ स्वस्थप्रसन्नमनसः समाधिरुपपद्यते । समाधियुक्तचित्तस्य ध्यानयोगः प्रवर्तते ॥१२.१०५ जिसका मन स्वस्थ व प्रसन्न है उसे समाधि सिद्ध होती है, जिसका चित्त समाधि से युक्त है उसे ध्यान-योग होता है ॥105 ॥ ध्यानप्रवर्तनाद्धर्माः प्राप्यन्ते यैरवाप्यते । दुर्लभं शान्तमजरं परं तदमृतं पदम् ॥१२.१०६ ध्यान होने से धर्म प्राप्त होते हैं, जिनसे वह परम पद प्राप्त होता है जो दुर्लभ, शान्त, अजर और अमर है ॥106 ॥ तस्मादाहारमूलोऽयमुपाय इतिनिश्चयः । आहारकरणे धीरः कृत्वामितमतिर्मतिम् ॥१२.१०७

बुद्धचरित 67

इसलिए, यह उपाय आहार-मूलक है", ऐसा निश्चय कर अपरिमित बुद्धिवाले उस धीर ने भोजन करने का विचार किया ॥107 ॥ स्नातो नैरञ्जनातीरादुत्ततार शनैः कृशः । भक्त्यावनतशाखाग्रैर्दत्तहस्तस्तटद्रुमैः ॥१२.१०८ स्नान कर, वह कृश-तनु-नैरञ्जना नदी के तीर से धीरे-धीरे ऊपर चढ़ा; उस समय शाखाओं के अग्रभागों को भक्तिपूर्वक झुकाकर तटवर्ती वृक्षों ने हाथ (= सहारा) दिया ॥108 ॥ अथ गोपाधिपसुता दैवतैरभिचोदिता । उद्भूतहृदयानन्दा तत्र नन्दबलागमत् ॥१२.१०९ तब देवताओं से प्रेरित होकर गोप-राज की पुत्री नन्दबला आनन्दित हृदय से वहाँ गई ॥109 ॥ सितशङ्खोज्ज्वलभुजा नीलकम्बलवासिनी । सफेनमालानीलाम्बुर्यमुनेव सरिद्वरा ॥१२.११० उसकी भुजाएँ श्वेत शङ्खों से उज्जवल थीं, वह नीला वस्त्र पहने हुई थी, जैसे फेन-मालाओं से युक्त नील जलवाली सरिता-श्रेष्ठ यमुना (उपस्थित हुई) हो ॥110 ॥ सा श्रद्धावर्धितप्रीतिर्विकसल्लोचनोत्पला । शिरसा प्रणिपत्यैनं ग्राहयामास पायसम् ॥१२.१११ श्रद्धा से उसकी प्रीति बढ़ी, नेत्ररूप उत्पल विकसित हुए। शिर से प्रणाम कर उस (मुनि) के द्वारा उसने पायस ग्रहण कराया ॥111 ॥ कृत्वा तदुपभोगेन प्राप्तजन्मफलां स ताम् । बोधिप्राप्तौ समर्थोऽभूत्सन्तर्पितषडिन्द्रियः ॥१२.११२ उस (पायस) का उपभोग कर उसने उस (कन्या) का जन्म सफल किया और छः इन्द्रियों को अच्छी तरह तृप्त कर बोधि-प्राप्ति में समर्थ हुआ ॥112 ॥ पर्याप्ताप्यायनामूर्तिश्च सार्धं स्वयशसा मुनिः । कान्तिधैर्ये बभारैकः शशाङ्कार्णवयोर्द्वयोः ॥१२.११३ अपने यश के साथ वह मुनि शरीर से पर्याप्त वृद्धि को प्राप्त हुआ। उस एक ने ही चन्द्रमा और सागर दोनों की (क्रमशः) कान्ति व धैर्य धारण किये ॥113 ॥ आवृत्त इति विज्ञाय तं जहुः पञ्च भिक्षवः । मनीषिणमिवात्मानं निर्मुक्तं पञ्च धातवः ॥१२.११४ वह (धर्म से) निवृत्त हो गया, ऐसा जानकर पाँचों भिक्षुओं ने उसे छोड़ दिया, जैसे मुक्त हुए मनीषी आत्मा को पाँचों धातु छोड़ देते हैं ॥114 ॥ व्यवसायद्वितीयोऽथ शाद्वलास्तीर्णभूतलम् । सोऽश्वत्थमूलं प्रययौ बोधाय कृतनिश्चयः ॥१२.११५ तब बुद्धत्व के लिए निश्चय कर, (अपने एकमात्र साथी) निश्चय के साथ वह पीपल वृक्ष के नीचे गया, जहाँ की भूमि हरे तृणों से ढकी थी ॥115 ॥ ततस्तदानीं गजराजविक्रमः पदस्स्वनेनानुपमेन बोधितः । महामुनेरागतबोधिनिश्चयो जगाद कालो भुजगोत्तमः स्तुतिम् ॥१२.११६ तब उस समय काल नामक उत्तम सर्प, जो गजराज के समान पराक्रमी था, अनुपम पद-ध्वनि द्वारा जगाया गया; बोधि (-प्राप्ति) के लिए निश्चय किया है, ऐसा जानकर उनसे महामुनि की स्तुति कीः- ॥116 ॥ यथा मुने त्वच्चरणावपीडिता मुहुर्मुहुर्निष्टनतीव मेदिनी । यथा च ते राजति सूर्यवत्प्रभा ध्रुवं त्वमिष्टं फलमद्य भोक्ष्यसे ॥१२.११७ “हे मुनि, आपके चरणों से पीड़ित होकर जिस प्रकार पृथ्वी मानो बार-बार गरज रही है और जिस प्रकार आपकी प्रभा सूर्य के समान चमक रही है, अवश्य ही आज आप इच्छित फल भोगेंगे ॥117 ॥ यथा भ्रमन्त्यो दिवि चाषपङ्क्तयः प्रदक्षिणं त्वां कमलाक्ष कुर्वते । यथा च सौम्या दिवि वान्ति वायवस्त्वमद्य बुद्धो नियतं भविष्यसि ॥१२.११८ हे कमल-लोचन, जिस प्रकार आकाश में मँडराते हुए चाष (= नीलकण्ठ) पक्षियों के झुण्ड आपकी प्रदक्षिणा कर रहे हैं और जिस प्रकार आकाश में सुन्दर हवा बह रही है, अवश्य ही आज आप बुद्ध होंगे" ॥118 ॥ ततो भुजङ्गप्रवरेण संस्तुतस्तृणान्युपादाय शुचीनि लावकात् । कृतप्रतिज्ञो निषसाद बोधये महारोर्मूलमुपाश्रितः शुचेः ॥१२.११९ तब सर्प-श्रेष्ठ द्वारा स्तुति की जानेपर, उसने (तृण) काटनेवाले से पवित्र तृण ले लिया और बोधि (-प्राप्ति) के लिए प्रतिज्ञा कर, पवित्र महारु के नीचे आश्रय लेकर बैठ गया ॥119 ॥ ततः स पर्यङ्कमकम्प्यमुत्तमं बबन्ध सुप्तोरगभोगपिण्डितम् । भिनद्मि तावद्भुवि नैतदासनं न यामि तावत्कृतकृत्यतामिति ॥१२.१२० तब उसने उत्तम अविचल पर्यङ्क आसन बाँधा, जो सोये हुए साँप के शरीर के समान पुञ्जीभूत था। (और कहा)- "तबतक पृथिवी पर इस आसन को नही तोडूंगा, जबतक कि सफलता नही प्राप्त करूँगा" ॥120 ॥ ततो ययुर्मुदमतुलां दिवौकसो ववाशिरे न मृगगणा न पक्षिणः । न सस्वनुर्वन्तरवोऽनिलाहताः कृतासने भगवति निश्चितात्मनि ॥१२.१२१ जब दृढ़ निश्चय करके भगवान् ने आसन ग्रहण किया, तब देवों ने अतुल आनन्द पाया, पशु-पक्षी बोले नहीं, और हवा से आहत होनेपर भी जङ्गल के पेड़ों से शब्द नहीं हुआ ॥121 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृतेऽराडदर्शनो नाम द्वादशः सर्गः ॥१२ ॥ 68 अश्वघोष

त्रयोदश सर्ग मार की पराजय तस्मिन्विमोक्षाय कृतप्रतिज्ञे राजर्षिवंशप्रभवे महर्षौ । तत्रोपविष्टे प्रजहर्ष लोकस्तत्रास सद्धर्मरिपुस्तु मारः ॥१३.१ मोक्ष के लिए प्रतिज्ञा कर राजर्षि-वंश में उत्पन्न वह महर्षि वहाँ बैठ गया, तब संसार को हर्ष हुआ, किन्तु सद्धर्म-शत्रु मार को भय हुआ ॥1॥ यं कामदेवं प्रवदन्ति लोके चित्रायुधं पुष्पशरं तथैव । कामप्रचाराधिपतिं तमेव मोक्षद्विषं मारमुदाहरन्ति ॥१३.२ संसार में जिसे कामदेव, चित्रायुध तथा पुष्पशर कहते हैं उसी मोक्ष-शत्रु को जो काम-संचार का अधिपति है, मार कहते हैं ॥2॥ तस्यात्मजा विभ्रमहर्षदर्पास्तिस्रोऽरतिप्रीतिवृषश्च कन्याः । पप्रच्छुरेनं मनसो विकारं स तांश्च ताश्चैव वचोऽभ्युवाच ॥१३.३ विभ्रम, हर्ष व दर्प नामक उसके पुत्रों ने तथा अरति, प्रीति व तृष्णा (=प्यास) उसकी तीन कन्याओं ने उससे मानसिक विकार (का कारण) पूछा। उसने उन पुत्रों व कन्याओं से यह वचन कहा:- ॥3॥ असौ मुनिर्निश्चयवर्म बिभ्रत्सत्त्वायुधं बुद्धिशरं विकृष्य । जिगीषुरास्ते विषयान्मदीयान्तस्मादयं मे मनसो विषादः ॥१३.४ “निश्चयरूप कवच धारण कर, बुद्धिरूप तीरवाला सत्त्वरूप अस्त्र (=धनुष) खींचकर, वह मुनि मेरा राज्य जीतना चाहता है; इसलिए मेरा यह मेरा मानसिक विषाद है ॥4॥ यदि ह्यसौ मामभिभूय याति लोकाय चाख्यात्यपवर्गमार्गम् । शून्यस्ततोऽयं विषयो ममाद्य वृत्ताच्च्युतस्येव विदेहभर्तुः ॥१३.५ यदि वह मुझे जीत जाता है और जगत् को अपवर्ग का मार्ग बताता है, तो मेरा वह राज्य आज उसी प्रकार सूना हो जायगा जिस प्रकार सदाचार से च्युत होनेपर विदेह-राज (=कराल जनक या निमि विदेह) का राज्य (सूना हो गया था) ॥5॥ तद्यावदेवैष न लब्धचक्षुर्मद्गोचरे तिष्ठति यावदेव । यास्यामि तावद्द्रतमस्य भेत्तुं सेतुं नदीवेग इवातिवृद्धः ॥१३.६ इसलिए जबतक यह ज्ञान-चक्षु नहीं प्राप्त करता है; जबतक मेरे ही क्षेत्र में रहता है, तबतक इसका व्रत भङ्ग करने के लिए जाऊँगा जैसे नदी का अत्यन्त बढ़ा हुआ वेग पुल को तोड़ता है।" ॥6॥ ततो धनुः पुष्पमयं गृहीत्वा शरान् जगन्मोहकरांश्च पञ्च । सोऽश्वत्थमूलं समुतोऽभ्यगच्छदस्वास्थ्यकारी मनसः प्रजानाम् ॥१३.७


तब फूलों का धनुष तथा जगत् को मूढ़ करनेवाले पाँच तीर लेकर, प्रजाओं के मन को अस्वस्थ करनेवाला वह मार अपनी सन्तानों के साथ अश्वत्थ वृक्ष के नीचे गया ॥7॥ अथ प्रशान्तं मुनिमासनस्थं पारं तितीर्षुं भवसागरस्य । विष्यज्य सव्यं करमायुधाग्रे क्रीडन् शरेणेदमुवाच मारः ॥१३.८ तब अस्त्र के अग्रभाग पर बाँया हाथ रखकर, तीर से खेलते हुए मार ने आसन पर स्थित प्रशान्त मुनि से, जो भव-सागर के पार तक तैरने को इच्छुक था, यह कहा:- ॥8॥ उत्तिष्ठ भोः क्षत्रिय मृत्युभीत चर स्वधर्मं त्यज मोक्षधर्मम् । बाणैश्च यज्ञैश्च विनीय लोकं लोकात्पदं प्राप्नुहि वासवस्य ॥१३.९ “ऐ मौत से डरनेवाले क्षत्रिय, उठो, स्वधर्म का आचरण करो, मोक्ष-धर्म का त्याग करो। बाणों व यज्ञों से संसार को जीतो और संसार से इन्द्र का पद प्राप्त करो ॥9॥ पन्था हि निर्यातुमयं यशस्यो यो वाहितः पूर्वतमैर्नरेन्द्रैः । जातस्य राजर्षिकुले विशाले भैक्षाकमश्लाघ्यमिदं प्रपत्तुम् ॥१३.१० (संसार से) निकलने का मार्ग यही है, यश देनेवाला मार्ग है, जिसपर पूर्व के राजा लोग चले थे। जो विशाल राजर्षि-कुल में उत्पन्न हुआ है, उसके लिए इस भिक्षा-वृत्ति का अवलम्बन करना श्लाघ्य नहीं ॥10॥ अथाद्य नोत्तिष्ठसि निश्चितात्मन् भव स्थिरो मा विमुचः प्रतिज्ञाम् । मयोद्यतो ह्येष शरः स एव यः शूर्पके मीनरिपौ विमुक्तः ॥१३.११ या यदि, हे स्थिरात्मन्, आज नहीं उठते हो, तो स्थिर हो जाओ, प्रतिज्ञा मत छोड़ो। मैंने यह वही तीर उठाया है, जो मछलियों के शत्रु (=मछुए) शूर्पक पर छोड़ा गया था ॥11 ॥⁵² स्पृष्टः स चानेन कथञ्चिदैडः सोमस्य नप्ताप्यभवद्विचित्तः । स चाभवच्छान्तनुरस्वतन्त्रः क्षीणे युगे किं बत दुर्बलोऽन्यः ॥१३.१२ इसके स्पर्श मात्र से चन्द्रमा के नाती ऐड़का भी चित्त विचलित हो गया और वह शान्तनु अपने वश में नहीं रहा, फिर (इस) क्षीण युग में दूसरे दुर्बल का क्या कहना? ॥12॥ तत्क्षिप्रमुत्तिष्ठ लभस्व सञ्ज्ञां बाणो ह्ययं तिष्ठति लेलिहानः । प्रियाविधेयेषु रतिप्रियेषु च चक्रवाकेष्विव नोत्सृजामि ॥१३.१३ इसलिए शीघ्र उठो, होश संभालो; क्योंकि बार-बार विनाश करनेवाला यह बाण तैयार है। इसे मैं उनपर नही छोड़ता जो चक्रवाकों के समान अपनी प्रियाओं के अनुकूल हैं और रति-प्रिय हैं।" ॥13॥ इत्येवमुक्तोऽपि यदा निरास्थो नैवासनं शाक्यमुनिर्विभेद । शरं ततोऽस्मै विससर्ज मारः कन्याश्च कृत्वा पुरतः सुतांश्च ॥१३.१४


⁵² - शूर्पक के लिए देखिए—सौ० आठ 44, और दस 53। बुद्धचरित 69

इस प्रकार कहे जानेपर भी जब शाक्य-मुनि ने न ध्यान दिया और न आसन तोड़ा, तब अपनी कन्याओं और पुत्रों को आगे कर मार ने उसके ऊपर तीर छोड़ा ॥14 ॥ तस्मिंस्तु बाणेऽपि स विप्रमुक्ते चकार नास्थां न धृतेश्चचाल । दृष्ट्वा तथैनं विषसाद मारश्चिन्तापरीतश्च शनैर्जगाद ॥१३.१५ किन्तु उस बाण के छोड़े जानेपर भी उसने न ध्यान दिया और न वह धैर्य से ही विचलित हुआ। उस प्रकार उसे देखकर, मार को विषाद हुआ और चिन्तित होकर उसने धीरे-धीरे कहा:- ॥15 ॥ शैलेन्द्रपुत्रीं प्रति येन विद्धो देवोऽपि शम्भुश्चलितो बभूव । न चिन्तयत्येष तमेव बाणं किं स्यादचित्तो न शरः स एषः ॥१३.१६ “जिससे विद्ध होकर महादेव भी शैलेन्द्र-पुत्री (पार्वती) के प्रति चलायमान हुआ, उसी बाण की यह चिन्ता नहीं कर रहा है। क्या इसे चित्त ही नहीं है या यह वह तीर ही नहीं है? ॥16 ॥ तस्मादयं नार्हति पुष्पबाणं न हर्षणं नापि रतेर्नियोगम् । अर्हत्ययं भूतगणैरसौम्यैः सन्त्रासनातर्जनताडनानि ॥१३.१७ इसलिए यह (मुनि) पुष्प-बाण, प्रसन्न करने, या रति-प्रयोग के योग्य नहीं। यह असौम्य भूतों द्वारा डराये, धमकाये और पीटे जाने योग्य है" ॥17 ॥ सस्मार मारश्च ततः स्वसैन्यं विघ्नं शमे शाक्यमुनेश्चिकीर्षन् । नानाश्रयाश्चानुचराः परीयुः शलद्रुमप्रासगदासिशस्ताः ॥१३.१८ तब शाक्य-मुनि की शान्ति में विघ्न करने की इच्छा से मार ने अपनी सेना का स्मरण किया और विविध रूपों में अनुचरगण उसके चारों ओर आ गये; उनके हाथों में त्रिशूल, वृक्ष, भाले, गदाएँ और तलवारें थीं ॥18 ॥ वराहमीनाश्वरखरोष्ट्रवक्त्रा व्याघ्रर्क्षसिंहद्विरदाननाश्च । एकेक्षणा नैकमुखास्त्रिशीर्षा लम्बोदराश्चैव पृषोदराश्च ॥१३.१९ सूअर, मछली, घोड़े, गधे, ऊँट, बाघ, रीच्छ, सिंह और हाथी के-से उनके मुख थे। वे एक आँखवाले थे, उनके अनेक मुख थे, तीन तीन शिर थे, उदर लम्बे थे, पेटों पर धब्बे थे ॥19 ॥ अजानुसक्था घटजानवश्च दंष्ट्रायुधाश्चैव नखायुधाश्च । करङ्कवक्त्रा बहुमूर्त्तयश्च भग्नार्धवक्त्राश्च महामुखाश्च ॥१३.२० उनके घुटने व जाँघें नहीं थीं, या घड़ों के समान घुटने थे, दाँत ही उनके अस्त्र थे, नख ही हथियार थे, मस्तक-खप्पर ही मुँह थे, अनेक शरीर थे मुखों के आधे भाग भग्न थे, या बड़े-बड़े मुख थे ॥20 ॥ भस्मारुणा लोहितबिन्दुचित्राः खट्वाङ्गहस्ता हरिधूम्रकेशाः । लम्बस्रजो वारणलम्बकर्णाश्चर्माम्बराश्चैव निरम्बराश्च ॥१३.२१ वे भस्म से रङ्गे थे, लाल बिन्दुओं से रङ्ग-बिरङ्गे थे, उनके हाथों में खट्वाङ्ग (=खाट के अङ्ग या नर-पञ्जर) थे, केश वानर के समान धूम्रवर्ण थे, लम्बी (मुण्ड-) मालाएँ थीं, हाथी के समान लम्बे कान थे, वे चमड़े के कपड़े पहने हुए थे या वस्त्र-हीन थे ॥21 ॥ श्वेता र्धवक्त्रा हरितार्धकायास्ताम्राश्च धूस्रा हरयोऽसिताश्च । व्यालोत्तरासङ्गभुजास्तथैव प्रघुष्टघण्टाकुलमेखलाश्च ॥१३.२२ उनके आधे मुँह सफेद थे, आधे शरीर हरे थे, वे ताम्र-वर्ण व धूम्र-वर्ण थे, पीले व काले थे, उनकी भुँजाएँ साँपों से ढकी थीं, बजती घण्टियों से उनके कटि-सूत्र आकुल थे ॥22 ॥ तालप्रमाणाश्च गृहीतशूला दंष्ट्राकरालाश्च शिशुप्रमाणाः । उरभ्रवक्त्राश्च विहङ्गमाक्षा मार्जारवक्त्राश्च मनुष्यकायाः ॥१३.२३ वे तालवृक्ष के समान लम्बे थे और शूल पकड़े हुए थे, बच्चों के आकार के थे और दाढ़ों से भयानक लगते थे। भेड़ों के-से उनके मुँह थे और चिड़ियों की-सी आँखें थीं, बिलाड़ों के-से मुँह थे और मनुष्य के-से शरीर थे ॥23 ॥ प्रकीर्णकेशाः शिखिनोऽर्धमुण्डा रक्ताम्बरा व्याकुलवेष्टनाश्च । प्रहृष्टवक्त्रा भ्रुकुटीमुखाश्च तेजोहराश्चैव मनोहराश्च ॥१३.२४ उनके बाल बिखरे हुए थे, वे शिखा-धारी थे, अधमुण्डे थे, लाल वस्त्र पहने थे, उनकी पगड़ियाँ उलट- पुलटी थीं। उनके मुख उत्साहित थे, मुखों पर भृकुटी थी, वे तेज हरण करनेवाले थे और मन हरण करनेवाले थे ॥24 ॥ केचिद्व्रजन्तो भृशमाववल्गुरन्योऽन्यमापुप्लुविरे तथान्ये । चिक्रीडुराकाशगताश्च केचित्केचिच्च चेरुस्तरुमस्तकेषु ॥१३.२५ कोई-कोई जाते हुए जोरों से कूदते थे और दूसरे एक-दूसरे पर उछलते थे। कोई आकाश में जाकर खेलते थे और कोई वृक्ष-शिखरों पर चलते थे ॥25 ॥ ननर्त कश्चिद्भ्रमयंस्त्रिशूलं कश्चिद्वपुस्फूर्ज गदां विकर्षन् । हर्षेण कश्चिद्वृषवच्चनर्द कश्चित्प्रजज्वाल तनूरुहेभ्यः ॥१३.२६ कोई त्रिशूल घुमाता नाचता था, कोई गदा खींचता हुआ गरजता था। कोई हर्ष से साँड के समान गरजा और किसी के रोम से ज्वाला निकली ॥26 ॥ एवंविधा भूतगणाः समन्तात्तद्बोधिमूलं परिवार्य तस्थुः । जिघृक्षवश्चैव जिघांसवश्च भर्तुर्नियोगं परिपालयन्तः ॥१३.२७ इस प्रकार के भूत उस बोधि-वृक्ष के मूल को चारों से घेरकर खड़े हो गये। वे पकड़ना चाहते थे और हत्या करना चाहते थे, स्वामी की आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे थे ॥27 ॥ तं प्रेक्ष्य मारस्य च पूर्वरात्रे शाक्यर्षभस्यैव च युद्धकालम् । न द्यौश्चकाशे पृथिवी चकम्पे प्रजज्वलुश्चैव दिशः सशब्दाः ॥१३.२८ 70 अश्वघोष

३. सप्तम-नवम सर्ग: तपोवन-प्रवेश, बिम्बिसार-अभ्युद्गमन एवं काम-विगर्हण

रात्रि के आरम्भ में मार व शाक्य-ऋषभ का युद्ध-काल देखकर, आकाश चमका नही, पृथ्वी काँपी, एवं शब्द करती हुई दिशाएँ प्रज्वलित हुई ॥२८ ॥ विष्वग्ववौ वायुरुदीर्णवेगस्तारा न रेजुर्न बभौ शशाङ्कः । तमश्च भूयो विततान रात्रिः सर्वे च सञ्चुक्षुभिरे समुद्राः ॥१३.२९ खुले वेग से हवा चारों ओर बही, न तारे शोभित हुए और न चन्द्रमा। रात्रि ने और भी अन्धकार फैलाया और सब समुद्रों में क्षोभ हुआ ॥२९ ॥ महीभृतो धर्मपराश्च नागा महामुनेर्विघ्नममृष्यमाणाः । मारं प्रति क्रोधविवृत्तनेत्रा निःशश्वसुश्चैव जजृम्भिरे च ॥१३.३० और पृथ्वी को धारण करनेवाले धर्मपरायण नागों ने महामुनि का विघ्न नहीं सहा; मार के प्रति क्रोध से आँखें घुमाकर उन्होंने फुंकार किया और जँभाई ली ॥३० ॥ शुद्धाधिवासा विबुधर्षयस्तु सद्धर्मसिद्धयर्थमभिप्रवृत्ताः । मारेऽनुकम्पां मनसा प्रचक्रुर्वैराग्यभावात्तु न रोषमीयुः ॥१३.३१ किन्तु शुद्धाधिवास देवों ने, जो सद्धर्म की सिद्धि में लगे हुए थे, मार के ऊपर मन में अनुकम्पा की, राग- रहित होने के कारण उन्होंने क्रोध नही किया ॥३१ ॥ तद्बोधिमूलं समवेक्ष्य कीर्णं हिंसात्मना मारबलेन तेन । धर्मात्मभिर्लोकविमोक्षकामैर्बभूव हाहाकृतमन्तरिक्षे ॥१३.३२ उस हिंसात्मक मार बल से उस बोधि-वृक्ष के मूल को भरा हुआ देखकर संसार का मोक्ष चाहनेवाले धर्मात्माओं ने अन्तरिक्ष में हाहाकार किया ॥३२ ॥ उपप्लुतं धर्मविधेस्तु तस्य दृष्ट्वा स्थितं मारबलं महर्षिः । न चुक्षुभे नापि ययौ विकारं मध्ये गवां सिंह इवोपविष्टः ॥१३.३३ वहाँ पर स्थित मार-बल उस धर्म-विधि में बाधक है, यह देखकर गौओं के बीच बैठे हुए सिंह के समान, महर्षि को न क्षोभ हुआ, न विकार (= भय) ॥३३ ॥ मारस्ततो भूतचमूसुदीर्णामाज्ञापयामास भयात तस्य । स्वैः स्वैः प्रभावैश्च सास्य सेना तद्धैर्यभेदाय मतिं चकार ॥१३.३४ तब खुली हुई भूत-सेना को मार ने उसे डराने की आज्ञा दी और उसकी उस सेना ने अपने अपने प्रभावों से उसका धैर्य भङ्ग करने का निश्चय किया ॥३४ ॥ केचिच्चलन्नैकविलम्बिजिह्वास्तीक्ष्णोग्रदंष्ट्रा हरिमण्डलाक्षाः । विदारितास्याः स्थिरशङ्कुकर्णाः सन्त्रासयन्तः किल नाम तस्थुः ॥१३.३५ कुछ (भूत) उसे डराने की कोशिश करते हुए खड़े रहे; उनकी लटकती हुई अनेक जीभें हिल रही थीं, दाँतों के अग्रभाग तेज थे, आँखें सूर्य-मण्डल के समान थीं, मुँह खुले हुए थे और कान बर्छी के समान कठोर थे ॥३५ ॥ तेभ्यः स्थितेभ्यः स तथाविधेभ्यः रूपेण भावेन च दारुणेभ्यः । न विव्यथे नोद्विविजे महर्षिः क्रीडत्सुबालेष्व इवोद्धतेभ्यः ॥१३.३६ खड़े हुए वैसे उन (भूतों) से, जो रूप व भाव से दारुण थे, महर्षि को न व्यथा हुई न भय, जैसे खेल में उत्तेजित बालकों से (न व्यथा होती है, न भय) ॥३६ ॥ कश्चित्ततो रोषविवृत्तदृष्टिस्तस्मै गदामुद्यमयाञ्चकार । तस्तम्भ बाहुः सगदस्ततोऽस्य पुरन्दरस्येव पुरा सवज्रः ॥१३.३७ तब किसी ने रोष से आँखें घुमाकर उसके ऊपर गदा उठाई; किन्तु गदा-सहित उसकी बाहु वैसे ही स्तम्भित हो गई, जैसे प्राचीन समय में इन्द्र की वज्र-युक्त बाहु ॥३७ ॥ केचित्समुद्यम्य शिलास्तरुंश्च विषेहिरे नैव मुनौ विमोक्तुम् । पेतुः सवृक्षाः सशिलास्तथैव वज्रावभग्ना इव विन्ध्यपादाः ॥१३.३८ कतिपयों ने शिलाएँ व वृक्ष उठाये, किन्तु मुनि पर छोड़ न सके। वृक्षों व शिलाओं के साथ वे वैसे ही गिरे जैसे वज्र से भग्न हुए विन्ध्याचल के पाद ॥३८ ॥ कैश्चित्समुत्पत्य नभो विमुक्ताः शिलाश्च वृक्षाश्च परश्वधाश्च । तस्थुर्नभस्येव न चावपेतुः सन्ध्याभ्रपादा इव नैकवर्णाः ॥१३.३९ कतिपयों ने आकाश में उड़कर जो शिलाएँ, वृक्ष व कुठार छोड़े, वे गिरे नहीं, आकाश में ही रहे, जैसे संध्याकालीन बादलों के रङ्ग-बिरङ्गे टुकड़े हों ॥३९ ॥ चिक्षेप तस्योपरि दीप्तमन्यः कडङ्गरं पर्वतशृङ्गमात्रम् । यन्मुक्तमात्रं गगनस्थमेव तस्यानुभावाच्छतधा पफाल ॥१३.४० दूसरे ने उसके ऊपर पहाड़ की चोटी के बराबर जलता कुंदा फेंका; जैसे ही यह फेंका गया कि उस (मुनि) के प्रभाव से आकाश में ही इसके सौ टुकड़े हो गये ॥४० ॥ कश्चिज्ज्वलन्नर्क इवोदितः खादङ्गारवर्षं महदुत्ससर्ज । चूर्णानि चामीकरकन्दराणां कल्पात्यये मेरुरिव प्रदीप्तः ॥१३.४१ उदय होते सूर्य के समान जलते हुए किसी ने आकाश से अङ्गारों की झड़ी लगा दी, जैसे कल्प के अन्त में जलता हुआ मेरु पर्वत सुवर्ण-कन्दराओं के चूर्ण बरसा रहा हो ॥४१ ॥ तद्बोधिमूले प्रविकीर्यमाणमङ्गारवर्षं तु सविस्फुलिङ्गम् । मैत्रीविहारादृषिसत्तमस्य बभूव रक्तोत्पलपत्रवर्षः ॥१३.४२ उस बोधि-वृक्ष के मूल में स्फुलिङ्गों के साथ जो अङ्गार-वृष्टि की जा रही थी, वह ऋषि श्रेष्ठ के मैत्री में विहार करने के कारण (= सबके प्रति मैत्री-भाव रखने के कारण) लाल कमलों के पत्तों की वृष्टि (में परिणत) हो गई ॥४२ ॥ शरीरचित्तव्यसनातपैस्तैरेवंविधैस्तैश्च निपत्यमानैः । नैवासनाच्छाक्यमुनिश्चचाल स्वनिश्श्रयं बन्धुमिवोपगृह्य ॥१३.४३ बुद्धचरित 71