भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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उसे वहाँ देखकर मोक्ष चाहनेवाले भिक्षु उसकी सेवा में उपस्थित हुए, जैसे इन्द्रिय-विषय उस ऐश्वर्यशाली की सेवा में उपस्थित होते हैं जिसने अपने पुण्यों से धन व आरोग्य अर्जित किये हों ॥92 ॥ सम्पूज्यमानस्तैः प्रह्वैर्विनयादनुवर्तिभिः । तद्वशस्थायिभिः शिष्यैर्लोलैर्मन इवेन्द्रियैः ॥१२.९३ अपने वश में रहनेवाले उन शिष्यों द्वारा, जो विनयी होने के कारण नम्र व आज्ञा-कारी थे, वह वैसे ही पूजित हुआ, जैसे चपल इन्द्रियों से चित्त पूजित (= सेवित) होता है ॥93 ॥ मृत्युजन्मान्तकरणे स्यादुपायोऽयमित्यथ । दुष्कराणि समारेभे तपांस्यनशनेन सः ॥१२.९४ तब उसने उपवास-द्वारा दुष्कर तप शुरू किये, यह सोचते हुए कि मृत्यु व जन्म का अन्त करने में यह उपाय होगा ॥94 ॥ उपवासविधीन्नैकान् कुर्वन्नरदुराचरान् । वर्षाणि षट् शमप्रेप्सुरकरोत्कार्श्यमात्मनः ॥१२.९५ भाँति-भाँति के उपवास, जो मनुष्य के लिए दुष्कर हैं; छः वर्षों तक करते हुए, शम प्राप्त करने की इच्छा से उसने अपने को कृश बनाया ॥95 ॥ अन्नकालेषु चैकैः स कोलतिलतण्डुलैः । अपारपारसंसारपारं प्रेप्सुरपारयत् ॥१२.९६ अपार-पार संसार का पार पाने की इच्छा से भोजन के समय एक एक बेर तिल व चावल से उसने पारण किया ॥96 ॥ देहादपचयस्तेन तपसा तस्य यः कृतः । स एवोपचयो भूयस्तेजसास्य कृतोऽभवत् ॥१२.९७ उस तप द्वारा उसके शरीर से जितना ही क्षय हुआ, फिर तेज द्वारा उसकी उतनी ही वृद्धि हुई ॥97 ॥ कृशोऽप्यकृशकीर्तिश्रीर्ह्लादं चक्रेऽन्यचक्षुषाम् । कुमुदानामिब शरच्छुक्लपक्षादिचन्द्रमाः ॥१२.९८ (शरीर से) क्षीण होनेपर भी उसकी श्री और कीर्ति क्षीण नहीं हुई और दूसरों की आँखों को उसने वैसे ही आनन्दित किया, जैसे शरद ऋतु के शुक्ल-पक्ष के आरम्भी का चन्द्रमा कुमुदों को आनन्दित करता है ॥98 ॥ त्वगस्थिशेषो निःशेषैर्मेदःपिशितशोणितैः । क्षीणोऽप्यक्षीणगाम्भीर्यः समुद्र इव स व्यभात् ॥१२.९९ उसकी त्वचा व हड्डियाँ शेष रह गईं, मेद-मांस व शोणित निःशेष हो गये; इस तरह क्षीण होनेपर भी वह अक्षीण-गाम्भीर्य (= जिसकी गम्भीरता क्षीण नहीं हुई) समुद्र के समान शोभित हुआ ॥99 ॥


अथ कष्टतपःस्पष्टव्यर्थक्लिष्टतनुर्मुनिः । भवभीरुरिमां चक्रे बुद्धिं बुद्धत्वकाङ्क्षया ॥१२.१०० तब कठोर-तप द्वारा, स्पष्ट ही, शरीर को व्यर्थ क्लेश देकर, जन्म से डरनेवाले मुनि ने बुद्धत्व (पाने) की आकाङ्क्षा से यह विचार किया:— ॥100 ॥ नायं धर्मो विरागाय न बोधाय न मुक्तये । जम्बूमूले मया प्राप्तो यस्तदा स विधिर्ध्रुवः ॥१२.१०१ “इस धर्म से न विराग होगा, न बोध, न मुक्ति। उस समय जम्बू-वृक्ष के मूल में मैंने जो विधि प्राप्त की थी वही ध्रुव है ॥101 ॥ न चासौ दुर्बलेनाप्तुं शक्यमित्यागतादरः । शरीरबलवृद्ध्यर्थमिदं भूयोऽन्वचिन्तयत् ॥१२.१०२ दुर्बल उसे प्राप्त नहीं कर सकता”, (शरीर के प्रति) ऐसा आदर होनेपर शरीर-बल की वृद्धि के लिए उसने फिर यह सोचा:— ॥102 ॥ क्षुत्पिपासाश्रमक्लान्तः श्रमादस्वस्थमानसः । प्राप्नुयान्मनसावाप्यं फलं कथमनिर्वृतः ॥ १२.१०३ “जो भूख प्यास व थकावट से ग्रस्त है, थकावट से अस्वस्थचित्त है अ-सुखी है, वह मन से प्राप्त होनेवाला फल कैसे पायेगा? ॥103 ॥ निर्वृतिः प्राप्यते सम्यक् सततेन्द्रियतर्पणात् । सन्तर्पितेन्द्रियतया मनःस्वास्थ्यमवाप्यते ॥१२.१०४ इन्द्रियों को निरन्तर तृप्त करने से सुख ठीक-ठीक प्राप्त होता है; इन्द्रियों को अच्छी तरह से तृप्त करने से मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है ॥104 ॥ स्वस्थप्रसन्नमनसः समाधिरुपपद्यते । समाधियुक्तचित्तस्य ध्यानयोगः प्रवर्तते ॥१२.१०५ जिसका मन स्वस्थ व प्रसन्न है उसे समाधि सिद्ध होती है, जिसका चित्त समाधि से युक्त है उसे ध्यान-योग होता है ॥105 ॥ ध्यानप्रवर्तनाद्धर्माः प्राप्यन्ते यैरवाप्यते । दुर्लभं शान्तमजरं परं तदमृतं पदम् ॥१२.१०६ ध्यान होने से धर्म प्राप्त होते हैं, जिनसे वह परम पद प्राप्त होता है जो दुर्लभ, शान्त, अजर और अमर है ॥106 ॥ तस्मादाहारमूलोऽयमुपाय इतिनिश्चयः । आहारकरणे धीरः कृत्वामितमतिर्मतिम् ॥१२.१०७

बुद्धचरित 67