भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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इसलिए, यह उपाय आहार-मूलक है", ऐसा निश्चय कर अपरिमित बुद्धिवाले उस धीर ने भोजन करने का विचार किया ॥107 ॥ स्नातो नैरञ्जनातीरादुत्ततार शनैः कृशः । भक्त्यावनतशाखाग्रैर्दत्तहस्तस्तटद्रुमैः ॥१२.१०८ स्नान कर, वह कृश-तनु-नैरञ्जना नदी के तीर से धीरे-धीरे ऊपर चढ़ा; उस समय शाखाओं के अग्रभागों को भक्तिपूर्वक झुकाकर तटवर्ती वृक्षों ने हाथ (= सहारा) दिया ॥108 ॥ अथ गोपाधिपसुता दैवतैरभिचोदिता । उद्भूतहृदयानन्दा तत्र नन्दबलागमत् ॥१२.१०९ तब देवताओं से प्रेरित होकर गोप-राज की पुत्री नन्दबला आनन्दित हृदय से वहाँ गई ॥109 ॥ सितशङ्खोज्ज्वलभुजा नीलकम्बलवासिनी । सफेनमालानीलाम्बुर्यमुनेव सरिद्वरा ॥१२.११० उसकी भुजाएँ श्वेत शङ्खों से उज्जवल थीं, वह नीला वस्त्र पहने हुई थी, जैसे फेन-मालाओं से युक्त नील जलवाली सरिता-श्रेष्ठ यमुना (उपस्थित हुई) हो ॥110 ॥ सा श्रद्धावर्धितप्रीतिर्विकसल्लोचनोत्पला । शिरसा प्रणिपत्यैनं ग्राहयामास पायसम् ॥१२.१११ श्रद्धा से उसकी प्रीति बढ़ी, नेत्ररूप उत्पल विकसित हुए। शिर से प्रणाम कर उस (मुनि) के द्वारा उसने पायस ग्रहण कराया ॥111 ॥ कृत्वा तदुपभोगेन प्राप्तजन्मफलां स ताम् । बोधिप्राप्तौ समर्थोऽभूत्सन्तर्पितषडिन्द्रियः ॥१२.११२ उस (पायस) का उपभोग कर उसने उस (कन्या) का जन्म सफल किया और छः इन्द्रियों को अच्छी तरह तृप्त कर बोधि-प्राप्ति में समर्थ हुआ ॥112 ॥ पर्याप्ताप्यायनामूर्तिश्च सार्धं स्वयशसा मुनिः । कान्तिधैर्ये बभारैकः शशाङ्कार्णवयोर्द्वयोः ॥१२.११३ अपने यश के साथ वह मुनि शरीर से पर्याप्त वृद्धि को प्राप्त हुआ। उस एक ने ही चन्द्रमा और सागर दोनों की (क्रमशः) कान्ति व धैर्य धारण किये ॥113 ॥ आवृत्त इति विज्ञाय तं जहुः पञ्च भिक्षवः । मनीषिणमिवात्मानं निर्मुक्तं पञ्च धातवः ॥१२.११४ वह (धर्म से) निवृत्त हो गया, ऐसा जानकर पाँचों भिक्षुओं ने उसे छोड़ दिया, जैसे मुक्त हुए मनीषी आत्मा को पाँचों धातु छोड़ देते हैं ॥114 ॥ व्यवसायद्वितीयोऽथ शाद्वलास्तीर्णभूतलम् । सोऽश्वत्थमूलं प्रययौ बोधाय कृतनिश्चयः ॥१२.११५ तब बुद्धत्व के लिए निश्चय कर, (अपने एकमात्र साथी) निश्चय के साथ वह पीपल वृक्ष के नीचे गया, जहाँ की भूमि हरे तृणों से ढकी थी ॥115 ॥ ततस्तदानीं गजराजविक्रमः पदस्स्वनेनानुपमेन बोधितः । महामुनेरागतबोधिनिश्चयो जगाद कालो भुजगोत्तमः स्तुतिम् ॥१२.११६ तब उस समय काल नामक उत्तम सर्प, जो गजराज के समान पराक्रमी था, अनुपम पद-ध्वनि द्वारा जगाया गया; बोधि (-प्राप्ति) के लिए निश्चय किया है, ऐसा जानकर उनसे महामुनि की स्तुति कीः- ॥116 ॥ यथा मुने त्वच्चरणावपीडिता मुहुर्मुहुर्निष्टनतीव मेदिनी । यथा च ते राजति सूर्यवत्प्रभा ध्रुवं त्वमिष्टं फलमद्य भोक्ष्यसे ॥१२.११७ “हे मुनि, आपके चरणों से पीड़ित होकर जिस प्रकार पृथ्वी मानो बार-बार गरज रही है और जिस प्रकार आपकी प्रभा सूर्य के समान चमक रही है, अवश्य ही आज आप इच्छित फल भोगेंगे ॥117 ॥ यथा भ्रमन्त्यो दिवि चाषपङ्क्तयः प्रदक्षिणं त्वां कमलाक्ष कुर्वते । यथा च सौम्या दिवि वान्ति वायवस्त्वमद्य बुद्धो नियतं भविष्यसि ॥१२.११८ हे कमल-लोचन, जिस प्रकार आकाश में मँडराते हुए चाष (= नीलकण्ठ) पक्षियों के झुण्ड आपकी प्रदक्षिणा कर रहे हैं और जिस प्रकार आकाश में सुन्दर हवा बह रही है, अवश्य ही आज आप बुद्ध होंगे" ॥118 ॥ ततो भुजङ्गप्रवरेण संस्तुतस्तृणान्युपादाय शुचीनि लावकात् । कृतप्रतिज्ञो निषसाद बोधये महारोर्मूलमुपाश्रितः शुचेः ॥१२.११९ तब सर्प-श्रेष्ठ द्वारा स्तुति की जानेपर, उसने (तृण) काटनेवाले से पवित्र तृण ले लिया और बोधि (-प्राप्ति) के लिए प्रतिज्ञा कर, पवित्र महारु के नीचे आश्रय लेकर बैठ गया ॥119 ॥ ततः स पर्यङ्कमकम्प्यमुत्तमं बबन्ध सुप्तोरगभोगपिण्डितम् । भिनद्मि तावद्भुवि नैतदासनं न यामि तावत्कृतकृत्यतामिति ॥१२.१२० तब उसने उत्तम अविचल पर्यङ्क आसन बाँधा, जो सोये हुए साँप के शरीर के समान पुञ्जीभूत था। (और कहा)- "तबतक पृथिवी पर इस आसन को नही तोडूंगा, जबतक कि सफलता नही प्राप्त करूँगा" ॥120 ॥ ततो ययुर्मुदमतुलां दिवौकसो ववाशिरे न मृगगणा न पक्षिणः । न सस्वनुर्वन्तरवोऽनिलाहताः कृतासने भगवति निश्चितात्मनि ॥१२.१२१ जब दृढ़ निश्चय करके भगवान् ने आसन ग्रहण किया, तब देवों ने अतुल आनन्द पाया, पशु-पक्षी बोले नहीं, और हवा से आहत होनेपर भी जङ्गल के पेड़ों से शब्द नहीं हुआ ॥121 ॥ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृतेऽराडदर्शनो नाम द्वादशः सर्गः ॥१२ ॥ 68 अश्वघोष