भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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त्रयोदश सर्ग मार की पराजय तस्मिन्विमोक्षाय कृतप्रतिज्ञे राजर्षिवंशप्रभवे महर्षौ । तत्रोपविष्टे प्रजहर्ष लोकस्तत्रास सद्धर्मरिपुस्तु मारः ॥१३.१ मोक्ष के लिए प्रतिज्ञा कर राजर्षि-वंश में उत्पन्न वह महर्षि वहाँ बैठ गया, तब संसार को हर्ष हुआ, किन्तु सद्धर्म-शत्रु मार को भय हुआ ॥1॥ यं कामदेवं प्रवदन्ति लोके चित्रायुधं पुष्पशरं तथैव । कामप्रचाराधिपतिं तमेव मोक्षद्विषं मारमुदाहरन्ति ॥१३.२ संसार में जिसे कामदेव, चित्रायुध तथा पुष्पशर कहते हैं उसी मोक्ष-शत्रु को जो काम-संचार का अधिपति है, मार कहते हैं ॥2॥ तस्यात्मजा विभ्रमहर्षदर्पास्तिस्रोऽरतिप्रीतिवृषश्च कन्याः । पप्रच्छुरेनं मनसो विकारं स तांश्च ताश्चैव वचोऽभ्युवाच ॥१३.३ विभ्रम, हर्ष व दर्प नामक उसके पुत्रों ने तथा अरति, प्रीति व तृष्णा (=प्यास) उसकी तीन कन्याओं ने उससे मानसिक विकार (का कारण) पूछा। उसने उन पुत्रों व कन्याओं से यह वचन कहा:- ॥3॥ असौ मुनिर्निश्चयवर्म बिभ्रत्सत्त्वायुधं बुद्धिशरं विकृष्य । जिगीषुरास्ते विषयान्मदीयान्तस्मादयं मे मनसो विषादः ॥१३.४ “निश्चयरूप कवच धारण कर, बुद्धिरूप तीरवाला सत्त्वरूप अस्त्र (=धनुष) खींचकर, वह मुनि मेरा राज्य जीतना चाहता है; इसलिए मेरा यह मेरा मानसिक विषाद है ॥4॥ यदि ह्यसौ मामभिभूय याति लोकाय चाख्यात्यपवर्गमार्गम् । शून्यस्ततोऽयं विषयो ममाद्य वृत्ताच्च्युतस्येव विदेहभर्तुः ॥१३.५ यदि वह मुझे जीत जाता है और जगत् को अपवर्ग का मार्ग बताता है, तो मेरा वह राज्य आज उसी प्रकार सूना हो जायगा जिस प्रकार सदाचार से च्युत होनेपर विदेह-राज (=कराल जनक या निमि विदेह) का राज्य (सूना हो गया था) ॥5॥ तद्यावदेवैष न लब्धचक्षुर्मद्गोचरे तिष्ठति यावदेव । यास्यामि तावद्द्रतमस्य भेत्तुं सेतुं नदीवेग इवातिवृद्धः ॥१३.६ इसलिए जबतक यह ज्ञान-चक्षु नहीं प्राप्त करता है; जबतक मेरे ही क्षेत्र में रहता है, तबतक इसका व्रत भङ्ग करने के लिए जाऊँगा जैसे नदी का अत्यन्त बढ़ा हुआ वेग पुल को तोड़ता है।" ॥6॥ ततो धनुः पुष्पमयं गृहीत्वा शरान् जगन्मोहकरांश्च पञ्च । सोऽश्वत्थमूलं समुतोऽभ्यगच्छदस्वास्थ्यकारी मनसः प्रजानाम् ॥१३.७


तब फूलों का धनुष तथा जगत् को मूढ़ करनेवाले पाँच तीर लेकर, प्रजाओं के मन को अस्वस्थ करनेवाला वह मार अपनी सन्तानों के साथ अश्वत्थ वृक्ष के नीचे गया ॥7॥ अथ प्रशान्तं मुनिमासनस्थं पारं तितीर्षुं भवसागरस्य । विष्यज्य सव्यं करमायुधाग्रे क्रीडन् शरेणेदमुवाच मारः ॥१३.८ तब अस्त्र के अग्रभाग पर बाँया हाथ रखकर, तीर से खेलते हुए मार ने आसन पर स्थित प्रशान्त मुनि से, जो भव-सागर के पार तक तैरने को इच्छुक था, यह कहा:- ॥8॥ उत्तिष्ठ भोः क्षत्रिय मृत्युभीत चर स्वधर्मं त्यज मोक्षधर्मम् । बाणैश्च यज्ञैश्च विनीय लोकं लोकात्पदं प्राप्नुहि वासवस्य ॥१३.९ “ऐ मौत से डरनेवाले क्षत्रिय, उठो, स्वधर्म का आचरण करो, मोक्ष-धर्म का त्याग करो। बाणों व यज्ञों से संसार को जीतो और संसार से इन्द्र का पद प्राप्त करो ॥9॥ पन्था हि निर्यातुमयं यशस्यो यो वाहितः पूर्वतमैर्नरेन्द्रैः । जातस्य राजर्षिकुले विशाले भैक्षाकमश्लाघ्यमिदं प्रपत्तुम् ॥१३.१० (संसार से) निकलने का मार्ग यही है, यश देनेवाला मार्ग है, जिसपर पूर्व के राजा लोग चले थे। जो विशाल राजर्षि-कुल में उत्पन्न हुआ है, उसके लिए इस भिक्षा-वृत्ति का अवलम्बन करना श्लाघ्य नहीं ॥10॥ अथाद्य नोत्तिष्ठसि निश्चितात्मन् भव स्थिरो मा विमुचः प्रतिज्ञाम् । मयोद्यतो ह्येष शरः स एव यः शूर्पके मीनरिपौ विमुक्तः ॥१३.११ या यदि, हे स्थिरात्मन्, आज नहीं उठते हो, तो स्थिर हो जाओ, प्रतिज्ञा मत छोड़ो। मैंने यह वही तीर उठाया है, जो मछलियों के शत्रु (=मछुए) शूर्पक पर छोड़ा गया था ॥11 ॥⁵² स्पृष्टः स चानेन कथञ्चिदैडः सोमस्य नप्ताप्यभवद्विचित्तः । स चाभवच्छान्तनुरस्वतन्त्रः क्षीणे युगे किं बत दुर्बलोऽन्यः ॥१३.१२ इसके स्पर्श मात्र से चन्द्रमा के नाती ऐड़का भी चित्त विचलित हो गया और वह शान्तनु अपने वश में नहीं रहा, फिर (इस) क्षीण युग में दूसरे दुर्बल का क्या कहना? ॥12॥ तत्क्षिप्रमुत्तिष्ठ लभस्व सञ्ज्ञां बाणो ह्ययं तिष्ठति लेलिहानः । प्रियाविधेयेषु रतिप्रियेषु च चक्रवाकेष्विव नोत्सृजामि ॥१३.१३ इसलिए शीघ्र उठो, होश संभालो; क्योंकि बार-बार विनाश करनेवाला यह बाण तैयार है। इसे मैं उनपर नही छोड़ता जो चक्रवाकों के समान अपनी प्रियाओं के अनुकूल हैं और रति-प्रिय हैं।" ॥13॥ इत्येवमुक्तोऽपि यदा निरास्थो नैवासनं शाक्यमुनिर्विभेद । शरं ततोऽस्मै विससर्ज मारः कन्याश्च कृत्वा पुरतः सुतांश्च ॥१३.१४


⁵² - शूर्पक के लिए देखिए—सौ० आठ 44, और दस 53। बुद्धचरित 69

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