बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार कहे जानेपर भी जब शाक्य-मुनि ने न ध्यान दिया और न आसन तोड़ा, तब अपनी कन्याओं और पुत्रों को आगे कर मार ने उसके ऊपर तीर छोड़ा ॥14 ॥ तस्मिंस्तु बाणेऽपि स विप्रमुक्ते चकार नास्थां न धृतेश्चचाल । दृष्ट्वा तथैनं विषसाद मारश्चिन्तापरीतश्च शनैर्जगाद ॥१३.१५ किन्तु उस बाण के छोड़े जानेपर भी उसने न ध्यान दिया और न वह धैर्य से ही विचलित हुआ। उस प्रकार उसे देखकर, मार को विषाद हुआ और चिन्तित होकर उसने धीरे-धीरे कहा:- ॥15 ॥ शैलेन्द्रपुत्रीं प्रति येन विद्धो देवोऽपि शम्भुश्चलितो बभूव । न चिन्तयत्येष तमेव बाणं किं स्यादचित्तो न शरः स एषः ॥१३.१६ “जिससे विद्ध होकर महादेव भी शैलेन्द्र-पुत्री (पार्वती) के प्रति चलायमान हुआ, उसी बाण की यह चिन्ता नहीं कर रहा है। क्या इसे चित्त ही नहीं है या यह वह तीर ही नहीं है? ॥16 ॥ तस्मादयं नार्हति पुष्पबाणं न हर्षणं नापि रतेर्नियोगम् । अर्हत्ययं भूतगणैरसौम्यैः सन्त्रासनातर्जनताडनानि ॥१३.१७ इसलिए यह (मुनि) पुष्प-बाण, प्रसन्न करने, या रति-प्रयोग के योग्य नहीं। यह असौम्य भूतों द्वारा डराये, धमकाये और पीटे जाने योग्य है" ॥17 ॥ सस्मार मारश्च ततः स्वसैन्यं विघ्नं शमे शाक्यमुनेश्चिकीर्षन् । नानाश्रयाश्चानुचराः परीयुः शलद्रुमप्रासगदासिशस्ताः ॥१३.१८ तब शाक्य-मुनि की शान्ति में विघ्न करने की इच्छा से मार ने अपनी सेना का स्मरण किया और विविध रूपों में अनुचरगण उसके चारों ओर आ गये; उनके हाथों में त्रिशूल, वृक्ष, भाले, गदाएँ और तलवारें थीं ॥18 ॥ वराहमीनाश्वरखरोष्ट्रवक्त्रा व्याघ्रर्क्षसिंहद्विरदाननाश्च । एकेक्षणा नैकमुखास्त्रिशीर्षा लम्बोदराश्चैव पृषोदराश्च ॥१३.१९ सूअर, मछली, घोड़े, गधे, ऊँट, बाघ, रीच्छ, सिंह और हाथी के-से उनके मुख थे। वे एक आँखवाले थे, उनके अनेक मुख थे, तीन तीन शिर थे, उदर लम्बे थे, पेटों पर धब्बे थे ॥19 ॥ अजानुसक्था घटजानवश्च दंष्ट्रायुधाश्चैव नखायुधाश्च । करङ्कवक्त्रा बहुमूर्त्तयश्च भग्नार्धवक्त्राश्च महामुखाश्च ॥१३.२० उनके घुटने व जाँघें नहीं थीं, या घड़ों के समान घुटने थे, दाँत ही उनके अस्त्र थे, नख ही हथियार थे, मस्तक-खप्पर ही मुँह थे, अनेक शरीर थे मुखों के आधे भाग भग्न थे, या बड़े-बड़े मुख थे ॥20 ॥ भस्मारुणा लोहितबिन्दुचित्राः खट्वाङ्गहस्ता हरिधूम्रकेशाः । लम्बस्रजो वारणलम्बकर्णाश्चर्माम्बराश्चैव निरम्बराश्च ॥१३.२१ वे भस्म से रङ्गे थे, लाल बिन्दुओं से रङ्ग-बिरङ्गे थे, उनके हाथों में खट्वाङ्ग (=खाट के अङ्ग या नर-पञ्जर) थे, केश वानर के समान धूम्रवर्ण थे, लम्बी (मुण्ड-) मालाएँ थीं, हाथी के समान लम्बे कान थे, वे चमड़े के कपड़े पहने हुए थे या वस्त्र-हीन थे ॥21 ॥ श्वेता र्धवक्त्रा हरितार्धकायास्ताम्राश्च धूस्रा हरयोऽसिताश्च । व्यालोत्तरासङ्गभुजास्तथैव प्रघुष्टघण्टाकुलमेखलाश्च ॥१३.२२ उनके आधे मुँह सफेद थे, आधे शरीर हरे थे, वे ताम्र-वर्ण व धूम्र-वर्ण थे, पीले व काले थे, उनकी भुँजाएँ साँपों से ढकी थीं, बजती घण्टियों से उनके कटि-सूत्र आकुल थे ॥22 ॥ तालप्रमाणाश्च गृहीतशूला दंष्ट्राकरालाश्च शिशुप्रमाणाः । उरभ्रवक्त्राश्च विहङ्गमाक्षा मार्जारवक्त्राश्च मनुष्यकायाः ॥१३.२३ वे तालवृक्ष के समान लम्बे थे और शूल पकड़े हुए थे, बच्चों के आकार के थे और दाढ़ों से भयानक लगते थे। भेड़ों के-से उनके मुँह थे और चिड़ियों की-सी आँखें थीं, बिलाड़ों के-से मुँह थे और मनुष्य के-से शरीर थे ॥23 ॥ प्रकीर्णकेशाः शिखिनोऽर्धमुण्डा रक्ताम्बरा व्याकुलवेष्टनाश्च । प्रहृष्टवक्त्रा भ्रुकुटीमुखाश्च तेजोहराश्चैव मनोहराश्च ॥१३.२४ उनके बाल बिखरे हुए थे, वे शिखा-धारी थे, अधमुण्डे थे, लाल वस्त्र पहने थे, उनकी पगड़ियाँ उलट- पुलटी थीं। उनके मुख उत्साहित थे, मुखों पर भृकुटी थी, वे तेज हरण करनेवाले थे और मन हरण करनेवाले थे ॥24 ॥ केचिद्व्रजन्तो भृशमाववल्गुरन्योऽन्यमापुप्लुविरे तथान्ये । चिक्रीडुराकाशगताश्च केचित्केचिच्च चेरुस्तरुमस्तकेषु ॥१३.२५ कोई-कोई जाते हुए जोरों से कूदते थे और दूसरे एक-दूसरे पर उछलते थे। कोई आकाश में जाकर खेलते थे और कोई वृक्ष-शिखरों पर चलते थे ॥25 ॥ ननर्त कश्चिद्भ्रमयंस्त्रिशूलं कश्चिद्वपुस्फूर्ज गदां विकर्षन् । हर्षेण कश्चिद्वृषवच्चनर्द कश्चित्प्रजज्वाल तनूरुहेभ्यः ॥१३.२६ कोई त्रिशूल घुमाता नाचता था, कोई गदा खींचता हुआ गरजता था। कोई हर्ष से साँड के समान गरजा और किसी के रोम से ज्वाला निकली ॥26 ॥ एवंविधा भूतगणाः समन्तात्तद्बोधिमूलं परिवार्य तस्थुः । जिघृक्षवश्चैव जिघांसवश्च भर्तुर्नियोगं परिपालयन्तः ॥१३.२७ इस प्रकार के भूत उस बोधि-वृक्ष के मूल को चारों से घेरकर खड़े हो गये। वे पकड़ना चाहते थे और हत्या करना चाहते थे, स्वामी की आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे थे ॥27 ॥ तं प्रेक्ष्य मारस्य च पूर्वरात्रे शाक्यर्षभस्यैव च युद्धकालम् । न द्यौश्चकाशे पृथिवी चकम्पे प्रजज्वलुश्चैव दिशः सशब्दाः ॥१३.२८ 70 अश्वघोष