बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 71, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ेंरात्रि के आरम्भ में मार व शाक्य-ऋषभ का युद्ध-काल देखकर, आकाश चमका नही, पृथ्वी काँपी, एवं शब्द करती हुई दिशाएँ प्रज्वलित हुई ॥२८ ॥ विष्वग्ववौ वायुरुदीर्णवेगस्तारा न रेजुर्न बभौ शशाङ्कः । तमश्च भूयो विततान रात्रिः सर्वे च सञ्चुक्षुभिरे समुद्राः ॥१३.२९ खुले वेग से हवा चारों ओर बही, न तारे शोभित हुए और न चन्द्रमा। रात्रि ने और भी अन्धकार फैलाया और सब समुद्रों में क्षोभ हुआ ॥२९ ॥ महीभृतो धर्मपराश्च नागा महामुनेर्विघ्नममृष्यमाणाः । मारं प्रति क्रोधविवृत्तनेत्रा निःशश्वसुश्चैव जजृम्भिरे च ॥१३.३० और पृथ्वी को धारण करनेवाले धर्मपरायण नागों ने महामुनि का विघ्न नहीं सहा; मार के प्रति क्रोध से आँखें घुमाकर उन्होंने फुंकार किया और जँभाई ली ॥३० ॥ शुद्धाधिवासा विबुधर्षयस्तु सद्धर्मसिद्धयर्थमभिप्रवृत्ताः । मारेऽनुकम्पां मनसा प्रचक्रुर्वैराग्यभावात्तु न रोषमीयुः ॥१३.३१ किन्तु शुद्धाधिवास देवों ने, जो सद्धर्म की सिद्धि में लगे हुए थे, मार के ऊपर मन में अनुकम्पा की, राग- रहित होने के कारण उन्होंने क्रोध नही किया ॥३१ ॥ तद्बोधिमूलं समवेक्ष्य कीर्णं हिंसात्मना मारबलेन तेन । धर्मात्मभिर्लोकविमोक्षकामैर्बभूव हाहाकृतमन्तरिक्षे ॥१३.३२ उस हिंसात्मक मार बल से उस बोधि-वृक्ष के मूल को भरा हुआ देखकर संसार का मोक्ष चाहनेवाले धर्मात्माओं ने अन्तरिक्ष में हाहाकार किया ॥३२ ॥ उपप्लुतं धर्मविधेस्तु तस्य दृष्ट्वा स्थितं मारबलं महर्षिः । न चुक्षुभे नापि ययौ विकारं मध्ये गवां सिंह इवोपविष्टः ॥१३.३३ वहाँ पर स्थित मार-बल उस धर्म-विधि में बाधक है, यह देखकर गौओं के बीच बैठे हुए सिंह के समान, महर्षि को न क्षोभ हुआ, न विकार (= भय) ॥३३ ॥ मारस्ततो भूतचमूसुदीर्णामाज्ञापयामास भयात तस्य । स्वैः स्वैः प्रभावैश्च सास्य सेना तद्धैर्यभेदाय मतिं चकार ॥१३.३४ तब खुली हुई भूत-सेना को मार ने उसे डराने की आज्ञा दी और उसकी उस सेना ने अपने अपने प्रभावों से उसका धैर्य भङ्ग करने का निश्चय किया ॥३४ ॥ केचिच्चलन्नैकविलम्बिजिह्वास्तीक्ष्णोग्रदंष्ट्रा हरिमण्डलाक्षाः । विदारितास्याः स्थिरशङ्कुकर्णाः सन्त्रासयन्तः किल नाम तस्थुः ॥१३.३५ कुछ (भूत) उसे डराने की कोशिश करते हुए खड़े रहे; उनकी लटकती हुई अनेक जीभें हिल रही थीं, दाँतों के अग्रभाग तेज थे, आँखें सूर्य-मण्डल के समान थीं, मुँह खुले हुए थे और कान बर्छी के समान कठोर थे ॥३५ ॥ तेभ्यः स्थितेभ्यः स तथाविधेभ्यः रूपेण भावेन च दारुणेभ्यः । न विव्यथे नोद्विविजे महर्षिः क्रीडत्सुबालेष्व इवोद्धतेभ्यः ॥१३.३६ खड़े हुए वैसे उन (भूतों) से, जो रूप व भाव से दारुण थे, महर्षि को न व्यथा हुई न भय, जैसे खेल में उत्तेजित बालकों से (न व्यथा होती है, न भय) ॥३६ ॥ कश्चित्ततो रोषविवृत्तदृष्टिस्तस्मै गदामुद्यमयाञ्चकार । तस्तम्भ बाहुः सगदस्ततोऽस्य पुरन्दरस्येव पुरा सवज्रः ॥१३.३७ तब किसी ने रोष से आँखें घुमाकर उसके ऊपर गदा उठाई; किन्तु गदा-सहित उसकी बाहु वैसे ही स्तम्भित हो गई, जैसे प्राचीन समय में इन्द्र की वज्र-युक्त बाहु ॥३७ ॥ केचित्समुद्यम्य शिलास्तरुंश्च विषेहिरे नैव मुनौ विमोक्तुम् । पेतुः सवृक्षाः सशिलास्तथैव वज्रावभग्ना इव विन्ध्यपादाः ॥१३.३८ कतिपयों ने शिलाएँ व वृक्ष उठाये, किन्तु मुनि पर छोड़ न सके। वृक्षों व शिलाओं के साथ वे वैसे ही गिरे जैसे वज्र से भग्न हुए विन्ध्याचल के पाद ॥३८ ॥ कैश्चित्समुत्पत्य नभो विमुक्ताः शिलाश्च वृक्षाश्च परश्वधाश्च । तस्थुर्नभस्येव न चावपेतुः सन्ध्याभ्रपादा इव नैकवर्णाः ॥१३.३९ कतिपयों ने आकाश में उड़कर जो शिलाएँ, वृक्ष व कुठार छोड़े, वे गिरे नहीं, आकाश में ही रहे, जैसे संध्याकालीन बादलों के रङ्ग-बिरङ्गे टुकड़े हों ॥३९ ॥ चिक्षेप तस्योपरि दीप्तमन्यः कडङ्गरं पर्वतशृङ्गमात्रम् । यन्मुक्तमात्रं गगनस्थमेव तस्यानुभावाच्छतधा पफाल ॥१३.४० दूसरे ने उसके ऊपर पहाड़ की चोटी के बराबर जलता कुंदा फेंका; जैसे ही यह फेंका गया कि उस (मुनि) के प्रभाव से आकाश में ही इसके सौ टुकड़े हो गये ॥४० ॥ कश्चिज्ज्वलन्नर्क इवोदितः खादङ्गारवर्षं महदुत्ससर्ज । चूर्णानि चामीकरकन्दराणां कल्पात्यये मेरुरिव प्रदीप्तः ॥१३.४१ उदय होते सूर्य के समान जलते हुए किसी ने आकाश से अङ्गारों की झड़ी लगा दी, जैसे कल्प के अन्त में जलता हुआ मेरु पर्वत सुवर्ण-कन्दराओं के चूर्ण बरसा रहा हो ॥४१ ॥ तद्बोधिमूले प्रविकीर्यमाणमङ्गारवर्षं तु सविस्फुलिङ्गम् । मैत्रीविहारादृषिसत्तमस्य बभूव रक्तोत्पलपत्रवर्षः ॥१३.४२ उस बोधि-वृक्ष के मूल में स्फुलिङ्गों के साथ जो अङ्गार-वृष्टि की जा रही थी, वह ऋषि श्रेष्ठ के मैत्री में विहार करने के कारण (= सबके प्रति मैत्री-भाव रखने के कारण) लाल कमलों के पत्तों की वृष्टि (में परिणत) हो गई ॥४२ ॥ शरीरचित्तव्यसनातपैस्तैरेवंविधैस्तैश्च निपत्यमानैः । नैवासनाच्छाक्यमुनिश्चचाल स्वनिश्श्रयं बन्धुमिवोपगृह्य ॥१३.४३ बुद्धचरित 71