बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि शरीर व मन के लिए ऐसी विपत्तियाँ व पीड़ाएँ दी जा रही थीं, तो भी अपने निश्चय का बन्धु के समान आलिङ्गन कर शाक्यमुनि आसन से विचलित नहीं हुआ ॥४३ ॥ अथापरे निर्जिगिलुर्मुखेभ्यः सर्पान्विजीर्णेभ्य इव द्रुमेभ्यः । ते मन्त्रबद्धा इव तत्समीपे न श्वश्रसुर्नोत्ससृपुर्न चेलुः ॥१३.४४ तब दूसरों ने अपने मुखों से, जैसे जीर्ण वृक्षों से, साँप उगले। वे (सर्प) मानो मन्त्र-बद्ध होकर उसके समीप न फुफकारे, न ऊपर उठे और न चले ॥४४ ॥ भूत्वापरे वारिधरा बृहन्तः सविद्युतः साशनिचण्डघोषाः । तस्मिन्द्रुमे तत्ससृजुरश्मवर्षं तत्पुष्पवर्षं रुचिरं बभूव ॥१३.४५ वज्र के प्रचण्ड घोष तथा बिजली से युक्त विशाल बादल बनकर दूसरों ने उस वृक्ष पर अश्म-वृष्टि की, जो रुचिर पुष्प-वृष्टि (में परिणत) हो गई ॥४५ ॥ चापेऽथ बाणो निहितोऽपरेण जज्वल तत्रैव न निष्पपात । अनीश्वरस्यात्मनि धूयमानो दुर्मर्षणस्येव नरस्य मन्युः ॥१३.४६ दूसरे ने धनुष पर बाण रखा, जो वहीं प्रज्वलित हुआ, छूटा नहीं, जैसे ऐश्वर्य-रहित क्रोधी मनुष्य का क्रोध अपने में ही बीजित होता है, वहीं धधकता है, निकलता नहीं ॥४६ ॥ पञ्चेषवोऽन्येन तु विप्रमुक्तास्तस्थुर्नभस्येव मुनौ न पेतुः । संसारभीरोर्विषयप्रवृत्तौ पञ्चेन्द्रियाणीव परीक्षकस्य ॥१३.४७ दूसरे के द्वारा छोड़े गये पाँच बाण आकाश में ही रहे, मुनि पर गिरे नहीं, जैसे विषय उपस्थित होनेपर संसार (= जन्म-चक्र) से डरनेवाले पारखी की पाँचों इन्द्रियाँ स्थिर रहती हैं, पतित नहीं होती हैं ॥४७ ॥ जिघांसयान्यः प्रससार रुष्टो गदां गृहीत्वाभिमुखो महर्षेः । सोऽप्राप्तकामो विवशः पपात दोषेष्विवानर्थकरेषु लोकः ॥१३.४८ दूसरा हत्या करने की इच्छा से रुष्ट हो गदा लेकर महर्षि के सामने दौड़ पड़ा; वह विफल-मनोरथ विवश होकर गिर पड़ा, जैसे (विफल मनोरथ) जगत् (विवश होकर) अनर्थकारी दोषों में गिरता है ॥४८ ॥ स्त्री मेघकाली तु कपालहस्ता कर्तुं महर्षेः किल चित्तमोहम् । बभ्राम तत्रानियतं न तस्थौ चलात्मनो बुद्धिरिवागमेषु ॥१३.४९ मेघ के समान काली स्त्री हाथ में कपाल लेकर महर्षि का चित्त-मोह करने के लिए वहाँ अनियन्त्रित होकर घूमी, खड़ी नहीं रही, जैसे चञ्चल मनवाले की बुद्धि (विविध) शास्त्रों में अनिश्चित होकर भटकती है, स्थिर नहीं होती है ॥४९ ॥ कश्चित्प्रदीप्तं प्रणिधाय चक्षुर्नेत्राग्निनाशीविषवद्दिधक्षुः । तत्रैव नासीनमृषिं ददर्श कामात्मकः श्रेय इवोपदिष्टम् ॥१३.५० किसी ने जलती आँखें (उसकी ओर) स्थिर करके आँखों की अग्नि से साँप के समान उसे जलाना चाहा; किन्तु वहीं पर बैठे हुए ऋषि को देखा नहीं, जैसे कामात्मा पुरुष बताये हुए कल्याण को नहीं देखता है ॥५० ॥ गुर्वी शिलामुद्यमयंस्तथान्यः शश्राम मोघं विहतप्रयत्नः । निःश्रेयसं ज्ञानसमाधिगम्यं कायक्लमैरधर्ममिवाप्सुकामः ॥१३.५१ भारी शिला को उठाये हुए दूसरे ने व्यर्थ श्रम किया, उसका प्रयत्न नष्ट हुआ, जैसे ज्ञान व समाधि से प्राप्य धर्म को शारीरिक क्लेशों से पाने की इच्छा करनेवाला व्यर्थ श्रम करता है, उसका प्रयत्न नष्ट होता है ॥५१ ॥ तरक्षुसिंहाकृतयस्तथान्ये प्रणेदुरुच्चैर्महतः प्रणादान् । सत्त्वानि यैः सङ्कुचुः समन्ताद्बभ्राहाता द्यौः फलतीति मत्वा ॥१३.५२ तेंदुए और सिंह की आकृतिवाले दूसरों ने जोरों से महा-गर्जन किये, जिनसे जीव (डर के मारे) चारों-ओर सिकुड़ गये, यह समझकर कि वज्र से आहत होकर आकाश फट रहा है ॥५२ ॥ मृगा गजाश्चार्त्तरवान् सृजन्तो विदुद्रुवुश्चैव निलिल्यिरे च । रात्रौ च तस्यामहनीव दिग्भ्यः खगा रुवन्तः परिपेतुरात्ताः ॥१३.५३ मृग और हाथी आर्त-नाद करते हुए दौड़कर छिप गये और पक्षीगण आर्त होकर उस रात को दिन की तरह बोलते हुए चारों ओर घूमे ॥५३ ॥ तेषां प्रणादैस्तु तथाविधैस्तैः सर्वेषु भूतेष्वपि कम्पितेषु । मुनिर्न तत्रास न सङ्कोच रवैर्गरुत्मनिव वायसानाम् ॥१३.५४ किन्तु उनके वैसे उन शब्दों से सब जीवों के काँपने पर भी मुनि न डरा, न सिकुड़ा, जैसे कौओं के शब्दों से गरुड़ न डरता है, न सिकुड़ता है ॥५४ ॥ भयावहेभ्यः परिषद्गणेभ्यो यथा यथा नैव मुनिर्बिभाय । तथा तथा धर्मभृतां सपत्नः शोकाच्च रोषाच्च ससाद मारः ॥१३.५५ भय-प्रद परिषद्-गणों से जैसे-जैसे मुनि नहीं डरा, वैसे-वैसे धर्म-पालकों के शत्रु मार को शोक और रोष से ग्लानि हुई ॥५५ ॥ भूतं ततः किञ्चिददृश्यरूपं विशिष्टभूतं गगनस्थमेव । दृष्ट्वैष द्रुग्धमवैररुष्टं मारं बभाषे महता स्वरेण ॥१३.५६ तब अदृश्यरूप किसी विशिष्ट जीव ने आकाश से ही ऋषि के प्रति द्रोही व बिना वैर के ही रुष्ट हुए मार को देखकर गम्भीर स्वर में कहा - ॥५६ ॥ मोघं श्रमं नार्हसि मार कर्तुं हिंस्रात्मतामुत्सृज गच्छ शर्म । नैष त्वया कम्पयितुं हि शक्यो महागिरिर्मेरुरिवानिलेन ॥१३.५७ 72 अश्वघोष