भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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“हे मार तुम्हें व्यर्थ श्रम नहीं करना चाहिए, हिंसा-भाव छोड़ो और शान्त हो जाओ; क्योंकि तुम इसे कँपा नहीं सकते, जैसे हवा से महापर्वत मेरु नहीं कँपाया जा सकता ॥57॥ अप्युष्णभावं ज्वलनः प्रजह्यादपो द्रवत्वं पृथिवी स्थिरत्वम् । अनेककल्पाचितपुण्यकर्मा न त्वेव जह्याद्व्यवसायमेषः ॥१३.५८ अग्नि उष्णता छोड़ दे, पानी द्रवत्व छोड़ दे, पृथिवी स्थिरता छोड़ दे; किन्तु यह, जिसने अनेक कल्पों में पुण्य एकत्र किये हैं, अपना निश्चय न छोड़ेगा ॥58॥ यो निश्चयो ह्यस्य पराक्रमश्च तेजश्च यच्चा च दया प्रजासु । अप्राप्य नोत्थास्यति तत्त्वमेष तमांस्यहत्वेव सहस्ररश्मिः ॥१३.५९ क्योंकि इसका जो निश्चय है, जो पराक्रम है, जो तेज है और जीवों के प्रति जो दया है, (उससे तो यही जान पड़ता है कि) तत्त्व को प्राप्त किये यह नहीं उठेगा जैसे अन्धकार को नष्ट किये बिना सूर्य नहीं उगता है ॥59॥ काष्ठं हि मथ्नन् लभते हुताशं भूमिं खन्विन्दति चापि तोयम् । निर्बन्धिनः किञ्चन नास्त्यसाध्यं न्यायेन युक्तं च कृतं च सर्वम् ॥१३.६० काठ को रगड़नेवाल (आदमी) अग्नि प्राप्त करता है और पृथिवी को खोदनेवाला जल प्राप्त करता है। हठी (=आग्रही) के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है। उचित तरीके के साथ करने पर सब कुछ किया जा सकता है ॥60॥ तल्लोकमार्तं करुणायमानो रोगेषु रागादिषु वर्तमानम् । महाभिषङ् नार्हति विघ्नमेष ज्ञानौषधार्थं परिखिद्यमानः ॥१३.६१ राग आदि रोगों में पड़े हुए आर्त जगत के ऊपर करुणा करनेवाला महावैद्य ज्ञानरूप औषध के लिए कष्ट उठा रहा है, इसलिए यह विघ्न के योग्य नहीं है ॥61॥ हृते च लोके बहुभिः कुमार्गैः सन्मार्गमन्विच्छति यः श्रमेण । स दैशिकः क्षोभयितुं न युक्तं सुदेशिकः सार्थ इव प्रनष्टे ॥१३.६२ अनेक कुमार्गों द्वारा संसार का अपहरण होनेपर जो श्रमपूर्वक सन्मार्ग को खोज रहा है उस उपदेशक (=पथ-प्रदर्शक) को क्षुब्ध करना ठीक नहीं ॥62॥ सत्त्वेषु नष्टेषु महान्धकारे ज्ञानप्रदीपः क्रियमाण एषः । आर्यस्य निर्वापयितुं न साधु प्रज्वाल्यमानस्तमसीव दीपः ॥१३.६३ महा-अन्धकार में जीवों के भटकने पर यह ज्ञान-प्रदीप हो रहा है; अँधेरे में जलाये जाते दीप के समान उसे निर्वापित करना (=शान्त करना, मार डालना, बुझाना) आर्य के लिए ठीक नहीं ॥63॥ दृष्ट्वा च संसारमये महौघे मग्नं जगत्पारमविन्दमानम् । यश्चेदमृत्तारयितुं प्रवृत्तः कश्चिन्तयेत्तस्य तु पापमार्यः ॥१३.६४ जन्म-चक्ररूपी महाबाढ़ में डूबा हुआ जगत् पार नहीं पा रहा है, यह देखकर इसे उबारने में जो लगा हुआ है उसके प्रति पाप-कर्म की चिन्ता कौन आर्य पुरुष करेगा? ॥64॥ क्षमाशिखो धैर्यविगाढमूलश्चारित्रपुष्पः स्मृतिबुद्धिशाखः । ज्ञानद्रुमो धर्मफलप्रदाता नोत्पाटनं ह्यर्हति वर्धमानः ॥१३.६५ यह बढ़ता हुआ ज्ञान-वृक्ष–क्षमा ही जिसकी जटा है, धैर्य ही जिसका गहरा मूल है, चरित्र ही जिसके फूल हैं, स्मृति व बुद्धि ही जिसकी शाखाएँ हैं और जो धर्मरूपी फल देता है–काटा जाने योग्य नहीं ॥65॥ बद्धां दृढैश्चेतसि मोहपाशैर्यस्य प्रजां मोक्षयितुं मनीषा । तस्मिन् जिघांसा तव नोपपन्ना श्रान्ते जगद्बन्धनमोक्षहेतोः ॥१३.६६ मन में मोह के दृढ़ बन्धनों के बँधे हुए जीवों को यह मुक्त करना चाहता है; जगत् का बन्धन खोलने के लिए श्रम करनेवाले उस मुनि को मार डालने की तुम्हारी इच्छा उचित नहीं ॥66॥ बोधाय कर्माणि हि यान्यनेन कृतानि तेषां नियतोऽद्य कालः । स्थाने तथास्मिन्नुपविष्ट एष यथैव पूर्वे मुनयस्तथैव ॥१३.६७ इसने बुद्धत्व के लिए जो कर्म किये, उनके पकने का आज नियत समय है। इस स्थान पर यह उसी प्रकार बैठा हुआ है, जिस प्रकार पूर्व के मुनि बैठे थे ॥67॥ एषा हि नाभिर्वसुधातलस्य कृत्स्नेन युक्ता परमेण धाम्ना । भूमेरतोऽन्योऽस्ति हि न प्रदेशो वेशं समाधेर्विषहेत योऽस्य ॥१३.६८ यह भूतल की नाभि है, जो समस्त उत्तम प्रभाव से युक्त है; क्योंकि इस भूमि के अतिरिक्त दूसरा स्थान नहीं, जो इसकी समाधि का वेग सह सके ॥68॥ तन्मा कृथाः शोकमुपेहि शान्तिं मा भून्महिम्ना तव मार मानः । विश्रम्भितुं न क्षममध्रुवा श्रीश्चले पदे किं मदमभ्युपैषि ॥१३.६९ इसलिए शोक मत करो, शान्त हो जाओ; हे मार, अपनी महिमा का अभिमान मत करो। चपल श्री पर विश्वास करना उचित नहीं; अपनी स्थिति अस्थिर होनेपर क्यों मद कर रहे हो?” ॥69॥⁵³ ततः स संश्रुत्य च तस्य तद्वचो महामुनेः प्रेक्ष्य च निष्प्रकम्पताम् । जगाम मारो विमना हतोद्यमः शरैरजस्रैश्चेतसि यैर्विहन्यते ॥१३.७० तब उसकी यह बात सुनकर और महामुनि की स्थिरता देखकर विफल-प्रयत्न मार, उदास होकर अपने उन तीरों के साथ, जिनसे लोगों का चित्त घायल किया जाता है, चला गया ॥70॥ गतप्रहर्षा विफलीकृतश्रमा प्रविद्धपाषाणकडङ्गरद्रुमा । दिशः प्रदुद्राव ततोऽस्य सा चमूर्हताश्रयेव द्विषता द्विषच्चमूः ॥१३.७१ 53. “विस्मय” के स्थान में “किं मद” रक्खा गया है। बुद्धचरित 73