भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 122 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 74

वाम पृष्ठ (Left Column)

तब उसकी वह सेना, जिसका आनन्द दूर हो गया था, जिसका श्रम विफल कर दिया गया था, जिसके पत्थर कुन्दे और वृक्ष बिखरे पड़े थे, चारों-ओर वैसे भी भाग गई जैसे शत्रु-द्वारा नायक के मारे जानेपर विपक्षी सेना (भाग जाती है) ॥71 ॥ द्रवति सपरिपक्षे निर्जिते पुष्पकेतौ जयति जिततमस्के नीरजस्के महर्षौ । युवतिरिव सहासा द्यौश्चकाशे सचन्द्रा सुरभि च जलगर्भं पुष्पवर्षं पपात ॥१३.७२ जब अपने पक्ष के साथ पराजित होकर, मार भाग गया और जब (अज्ञानरूपी) अन्धकार को जीतनेवाला निर्मल (= राग-रहित) महर्षि विजयी हुआ, तब चन्द्रयुक्त आकाश हँसती युवती के समान शोभित हुआ और सुगन्धित जल-पूर्ण पुष्प-वृष्टि हुई ॥72 ॥ तथापि पापीयसि निर्जिते गते दिशः प्रसेदुः प्रबभौ निशाकरः । दिवो निपेतुर्भुवि पुष्पवृष्टयो रराज योषेव विकल्मषा निशा ॥१३.७३ उस प्रकार वह पापी जब हारकर चला गया, तब दिशाएँ प्रसन्न हुईं, चन्द्रमा शोभित हुआ, आकाश से पृथ्वी पर पुष्प-वृष्टि हुई और निष्पाप स्त्री के समान निर्मल रात्रि की शोभा हुई ॥73 ॥$^{54}$ इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽश्वघोषकृते मारविजयो नाम त्रयोदशः सर्गः ॥१३ ॥

चतुर्दश सर्ग

बुद्धत्व-प्राप्ति

ततो मारबलं जित्वा धैर्येण च शमेन च । परमार्थं विजिज्ञासुः स दध्यौ ध्यानकोविदः ॥१४.१ तब धैर्य और शान्ति से मार की सेना को जीतकर परमार्थ जानने की इच्छा से उस ध्यान-पटु ने ध्यान किया ॥1 ॥ सर्वेषु ध्यानविधिषु प्राप्य चैश्वर्यमुत्तमम् । सस्मार प्रथमे यामे पूर्वजन्मपरम्पराम् ॥१४.२ और ध्यान-विधियों पर उत्तम स्वामित्व (= अधिकार) प्राप्त कर प्रथम पहर में पूर्व-जन्मों की परम्परा का स्मरण किया ॥2 ॥ अमुत्राहमयं नाम च्युतस्तस्मादिहागतः । इति जन्मसहस्राणि सस्माराऽनुभवन्निव ॥१४.३ “वहाँ मैं वह था, वहा से गिरकर यहाँ आया” इस तरह हजारों जन्मों को मानो अनुभव करते हुए स्मरण किया ॥3 ॥


$^{54}$ - यह श्लोक चीनी अनुवाद में नही है। कुछ लोग इसे प्रक्षिप्त बताते हैं। कीथ ने “संस्कृत साहित्य के इतिहास” में “अश्वघोष की शैली व भाषा” के अन्तर्गत इसे उद्धृत किया है।

74 अश्वघोष


दक्षिण पृष्ठ (Right Column)

स्मृत्वा जन्म च मृत्युं च तासु तासूत्पत्तिषु । ततः सत्त्वेषु कारुण्यं चकार करुणात्मकः ॥१४.४ तब उन जन्मों में उत्पत्ति व मौत का स्मरण कर करुणात्मक ने जीवों पर करुणा की ॥4 ॥ कृत्वेह स्वजनोत्सर्गं पुनरन्यत्र च क्रियाः । अत्राणः खलु लोकोऽयं परिभ्रमति चक्रवत् ॥१४.५ वहाँ स्वजनों को छोड़, अन्यत्र (जन्म लेकर) कर्म करता है; इस तरह अवश्य ही यह संसार रक्षा-रहित है और पहिए के समान घूमता रहता है ॥5 ॥ इत्येवं स्मरतस्तस्य बभूव नियतात्मनः । कदलीगर्भनिःसारः संसार इति निश्चयः ॥१४.६ इस प्रकार स्मरण करते उस निश्चितात्मा को यह निश्चय हुआ–“कदली गर्भ (= केले के पेड़ के भीतरी भाग) के समान संसार असार है” ॥6 ॥ द्वितीये त्वागते यामे सोऽद्वितीयपराक्रमः । दिव्यं लेभे परं चक्षुः सर्वचक्षुष्मतां वरः ॥१४.७ दूसरा पहर आनेपर अद्वितीय पराक्रमवाले ने, जो सब दृष्टिवालों में श्रेष्ठ था, परम दिव्य चक्षु पाया ॥7 ॥ ततस्तेन स दिव्येन परिशुद्धेन चक्षुषा । ददर्श निखिलं लोकमादर्श इव निर्मले ॥१४.८ तब उस अत्यन्त शुद्ध दिव्य चक्षु से उसने समस्त जगत् को इस तरह देखा, जैसे निर्मल दर्पण में देख रहा हो ॥8 ॥ सत्त्वानां पश्यतस्तस्य निकृष्टोत्कृष्टकर्मणाम् । प्रच्युतिं चोपपत्तिं च ववृधे करुणात्मता ॥१४.९ निकृष्ट व उत्कृष्ट कर्मवाले जीवों का पतन व जन्म देखते हुए उसकी करुणा बढ़ी ॥9 ॥ इमे दुष्कृतकर्माणः प्राणिनो यान्ति दुर्गतिम् । इमेऽन्ये शुभकर्माणः प्रतिष्ठन्ते त्रिविष्टपे ॥१४.१० ये पाप-कर्मवाले प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते है, ये दूसरे शुभ-कर्मवाले स्वर्ग में स्थान पाते हैं ॥10 ॥ उपपन्नाः प्रतिभये नरके भृशदारुणे । अमी दुःखैर्बहुविधैः पीड्यन्ते कृपणं बत ॥१४.११ अत्यन्त दारुण व भयावह नरक में उत्पन्न होकर ये (पापी) अनेक प्रकार के दुःखों से पीड़ित होते हैं ॥11 ॥ पाय्यन्ते कथितं केचिदग्निवर्णमयोरसम् । आरोप्यन्ते रुवन्तोऽन्ये निष्टप्तस्तम्भमायसम् ॥१४.१२