भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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कुछ लोगों को पिघले हुए लोहे का पानी, जो आग के रङ्ग का होता है, पिलाया जाता है; चिल्लाते हुए दूसरों को लोहे के तपे खम्भे पर चढ़ाया जाता है ॥12॥ पच्यन्ते पिष्टवत्केचिदयस्कुम्भीष्ववाङ्मुखाः । दह्यन्ते करुणं केचिद्दीप्तेष्वङ्गारराशिषु ॥१४.१३ कोई-कोई लोहे के कड़ाहों में औंधे-मुख, पुए के समान, पकाये जाते हैं; कोई-कोई जलते अङ्गारों के ढेर पर कष्टपूर्वक जलाये जाते हैं ॥13॥ केचित्तीक्ष्णैरयोदंष्ट्रैर्भक्ष्यन्ते दारुणैः श्वभिः । केचिद्गृध्रैरयस्तुण्डैर्वायसैरायसैरि्व ॥१४.१४ कोई-कोई लोहे के दाँतवाले तीक्ष्ण व दारुण कुत्तों द्वारा भक्षित होते हैं; कोई-कोई लोहे की ढीठ चोंचों (=चञ्चुओं) द्वारा, मानो लोहे के चने कौओं द्वारा खाये जाते हैं ॥14॥ केचिद्दाहपरिश्रान्ताः शीतच्छायाभिकाङ्क्षिणः । असिपत्त्रवनं नीलं बद्धा इव विशन्त्यमी ॥१४.१५ कोई-कोई दाह से थककर शीतल छाया की आकाङ्क्षा करते हैं; वे नीले असि पत्र-वन में (=तलवारों के वन में) बन्दी के समान प्रवेश करते हैं ॥15॥ पाट्यन्ते दारुवत्केचित्कुठारैर्बद्धबाहवः । दुःखेदपि न विपद्यन्ते कर्मभिर्धारितासवः ॥१४.१६ कुछ, जिनकी भुजाएँ बँधी रहती हैं, कुठारों द्वारा लकड़ी के समान काटे जाते हैं। दुःख में भी उनका अन्त नहीं होता है; कर्मों से उनके प्राण धारण किये जाते हैं ॥16॥ सुखं स्यादिति यत्कर्म कृतं दुःखनिवृत्तये । फलं तस्येदमवशैर्दुःखमेवोपभुज्यते ॥१४.१७ “सुख होगा” इस आशा से दुःख-निवृत्ति के लिए उन्होंने जो कर्म किया था उसका यह दुःखमय फल ही वे बेचारे भोगते हैं ॥17॥ सुखार्थमशुभं कृत्वा य एते भृशदुःखिताः । आस्वादः स किमेतेषां करोति सुखमन्वपि ॥१४.१८ सुख पाने के लिए अशुभ (कर्म) करके जो ये अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं, क्या (अशुभ का) यह आस्वाद थोड़ा-सा भी सुख इन्हें देता है? ॥18॥ हसद्भिर्यत्कृतं कर्म कलुषं कलुषात्मभिः । एतत्परिणते काले क्रोशद्भिरनुभूयते ॥१४.१९ पापात्मा हँसते हुए जो पाप-कर्म करते हैं, समय पकने पर (उसका) यह (फल) वे रोते हुए अनुभव करते हैं ॥19॥ यद्येव पापकर्माणः पश्येयुः कर्मणां फलम् । वमेयुरुष्णं रुधिरं मर्मस्वभिहता इव ॥१४.२० यदि पाप-कर्म करनेवाले पाप-कर्मों का ऐसा फल देखें, तो मर्मस्थल में घायल हुए के समान उष्ण रुधिर वमन करें ॥20॥ इमेऽन्ये कर्मभिश्चित्रैश्चित्तविस्पन्दसम्भवैः । तिर्यग्योनौ विचित्रायामुपपन्नास्तपस्विनः ॥१४.२१ ये दूसरे बेचारे चित्त की चञ्चलता से होनेवाले विविध कर्मों के कारण पशु-पक्षियों की विविध योनि में उत्पन्न होते हैं, ॥21॥ मांसत्वग्बालदन्तार्थं वैरादपि मदादपि । हन्यन्ते कृपणं यत्र बन्धूनां पश्यतामपि ॥१४.२२ जहाँ मांस त्वचा बाल व दाँत के लिए, या वैर व मद से भी, और बन्धुओं के देखते रहने पर भी, वे दीनतापूर्वक मार जाते हैं ॥22॥ अशक्नुवन्तोऽप्यवशाः क्षुतर्षश्रमपीडिताः । गोऽश्वभूताश्च वाह्यन्ते प्रतोदक्षतमूर्तयः ॥१४.२३ और बैल-घोड़े होनेपर, भूख प्यास व थकावट की पीड़ा से विवश व अशक्त होनेपर भी, वे अङ्कुशों से क्षत- शरीर (घायल) होते हुए हाँके जाते हैं ॥23॥ वाह्यन्ते गजभूताश्च बलीयांसोऽपि दुर्बलैः । अङ्कुशक्लिष्टमूर्धानस्ताडिताः पादपार्ष्णिभिः ॥१४.२४ और हाथी होकर, बलवान् होनेपर भी, दुर्बलों द्वारा अङ्कुशों से मस्तकों पर क्लेश पाते हुए तथा पाँवों व एड़ियों से ताड़ित होते हुए हाँके जाते हैं ॥24॥ सत्स्वप्यन्येषु दुःखेषु दुःखं यत्र विशेषतः । परस्परविरोधाच्च पराधीनतयैव च ॥१४.२५ अन्य दुःखों के रहने पर भी वहाँ (पशु पक्षियों की योनि में) परस्पर-विरोध और पराधीनता के कारण विशेष दुःख है ॥25॥ खस्थाः खस्थैर्हि बाध्यन्ते जलस्था जलचारिभिः । स्थलस्थाः स्थलसंस्थैश्च प्राप्य चैवेतरेतरैः ॥१४.२६ आकाश-वासी आकाश-वासियों द्वारा, जल-चारी जल-चारियों द्वारा, स्थल-वासी स्थल-वासियों द्वारा परस्पर पीड़ित होते हैं ॥26॥ उपपन्नास्तथा चेमे मात्सर्याक्रान्तचेतसः । पितृलोके निरालोके कृपणं भुञ्जते फलम् ॥१४.२७

बुद्धचरित 75

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