बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसी प्रकार ये, जिनके चित्त परस्पर द्वेष से आक्रान्त रहते हैं आलोक-रहित प्रेत-लोक में उत्पन्न होकर दीनतापूर्वक कर्म-फल भोगते हैं ॥27 ॥ सूचीछिद्रोपममुखाः पर्वतोपमकुक्षयः । क्षुत्तर्षजनितैर्दुःखैः पीड्यन्ते दुःखभागिनः ॥१४.२८ सूई के छेद के समान मुखवाले और पर्वत के समान पेटवाले ये दुःख-भागी भूख-प्यास से उत्पन्न दुःखों से पीड़ित होते हैं ॥28 ॥ आशया समतिक्रान्ता धार्यमाणाः स्वकर्मभिः । लभन्ते न ह्यमी भोक्तुं प्रविद्धान्यशुचीन्यपि ॥१४.२९ आशा द्वारा अतिक्रमण किये जानेपर (अर्थात् निराश होनेपर) भी वे अपने कर्मों द्वारा धारण किये जाते हैं; फेंकी गई अपवित्र वस्तु भी खाने को वे नहीं पाते ॥29 ॥ पुरुषो यदि जानीत मात्सर्यस्येदृशं फलम् । सर्वथा शिबिवद्दद्याच्छरीरावयवानपि ॥१४.३० पुरुष यदि द्वेष का ऐसा फल जानता, तो सब प्रकार से शिवि के सामने अपने शरीर के अवयव भी दान कर देता ॥30 ॥ इमेऽन्ये नरकप्रख्ये गर्भसञ्ज्ञेऽशुचिह्रदे । उपपन्ना मनुष्येषु दुःखमर्च्छन्ति जन्तवः ॥१४.३१ ये दूसरे जन्तु नरकतुल्य गर्भ-नामक अपवित्र सरोवर में उत्पन्न होकर मनुष्यों के बीच दुःख पाते हैं ॥31 ॥
▪ शुरु में जन्म-घड़ी में ही तीक्ष्ण हाथों से पकड़े जाते हुए, मानो तेज तलवारों से काटे जाते हुए, वे खूब रोते हैं ॥32 ॥⁵⁵ ▪ स्वजन उन्हें प्यार करते हैं, उनका पालन-पोषण व रक्षा करते हैं, अत्यन्त सावधानी से संवर्धन करते हैं, और पीछे दुःख से महादुःख में जाते हुए वे अपने ही विविध कर्मों से कलुषित ही होते हैं ॥33 ॥ ▪ और इस अवस्था में तृष्णा से आक्रान्त मूर्ख “यह करना है और वह करना है” इस तरह अधिकाधिक चिन्ता करते हुए, निरन्तर बहती धारा में बहते रहते हैं ॥34 ॥ ▪ ये दूसरे, जिन्होंने पुण्य संचय किये हैं, स्वर्ग में जन्म लेते हैं और काम की ज्वालाओं से इस तरह जलते हैं जैसे आग में जल रहे हों ॥35 ॥ ▪ और विषयों में अतृप्त ही वे वहाँ से गिरते हैं, उनकी आँखें ऊपर लगी रहती हैं, वे निस्तेज रहते हैं और अपनी मालाओं के मुरझाने से दुःखी होते हैं ॥36 ॥ ▪ जब अप्सराओं के प्रेमी असहाय होकर गिरते हैं, तब वे करुणापूर्वक उन्हें देखती हैं और अपने हाथों से उनके वस्त्र पकड़ती हैं ॥37 ॥ ▪ विमानों से दीनतापूर्वक गिरते हुए प्रेमियों को पकड़ने की कोशिश करते समय, कुछ अप्सराएँ ऐसे देख पड़ती हैं जैसे झूलती हुई मोती की लड़ियों के साथ वे पृथ्वी पर गिर रही हों ॥38 ॥ ▪ दूसरी भाँति भाँति की मालाएँ व गहने पहनकर, अपने प्रेमियों के दुःख में पड़ने से शोकित होकर, सहानुभूतिपूर्वक चञ्चल आँखों से उनका अनुसरण करती हैं। ॥39 ॥ ▪ उन गिरनेवालों के प्रति प्रेम होने से अप्सराएँ हाथों से छाती पीटती हैं और मानो महा-पीड़ा से पीड़ित होकर उनमें आसक्त रहती हैं ॥40 ॥ ▪ स्वर्ग में रहनेवाले “हा, चैत्ररथ वन! हा दिव्य सरोवर! हा मन्दाकिनी! हा प्रेयसी!” इस तरह विलाप करते हुए आर्त होकर पृथ्वी पर गिरते हैं ॥41 ॥⁵⁶ ▪ यह देखते हुए कि उतने परिश्रम से प्राप्त होनेवाला स्वर्ग अनिश्चित व क्षणिक है और इससे वियोग होनेपर ऐसा दुःख होता है, ॥42 ॥ ▪ जगत् में यह नियम विशेष रूप से ध्रुव है; जगत् का यह स्वभाव है और तो भी लोग इसे ऐसा नहीं देखते ॥43 ॥ ▪ दूसरे, जिन्होंने काम (-वासना) से अपने को अलग रखा है, अपने मन में निश्चय करते हैं कि उनका निवास शाश्वत है; तो भी वे स्वर्ग से दीनतापूर्वक गिरते हैं ॥44 ॥ ▪ नरकों में अत्यन्त कष्ट है, पशुओं के बीच परस्पर भक्षण होता है, प्रेतों के बीच भूख-प्यास का दुःख है, मनुष्यों के बीच तृष्णाओं का दुःख है ॥45 ॥ ▪ प्रेम-मुक्त स्वर्गों में पुनर्जन्म का दुःख बहुत है। निरन्तर भ्रमणशील जीवलोक के लिए निश्चय ही कहीं भी शान्ति नहीं ॥46 ॥ ▪ संसार-चक्र की यह धारा निराधार है और मरणशील है। इस तरह चारों ओर से घिरे हुए जीव कहीं विश्राम-भूमि नहीं पाते हैं ॥47 ॥ ▪ इस तरह दिव्य दृष्टि से उसने पाँच जीव-लोकों का निरीक्षण किया और जीवन में कुछ भी सारवान् नही पाया, जैसे काटे जानेपर केले के पेड़ में कुछ सार नही मिलता है ॥48 ॥ ▪ रात्रि का तीसरा पहर समीप आने पर, उस उत्तम ध्यान-ज्ञ ने जगत् के सच्चे स्वभाव के बारे मे ध्यान कियाः- ॥49 ॥
⁵⁵- अध्याय 14 श्लोक 31 के बाद के पूरे अध्याय तिब्बती पाठ से जौन्स्टन ने English में अनुवाद किये जिनका हिन्दी अनुवाद सूर्यनारायण चौधरीजी द्वारा किया गया। ⁵⁶_ हा चैत्ररथ हा वापि हा मन्दाकिनि हा प्रिये। इत्यार्था विलपन्तोऽपि गां पतन्ति दिवौकसः ॥-सौ० ग्यारह 50 । 76 अश्वघोष