बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें▪ "अहो! जीवित प्राणी केवल थकावट पाते हैं, बार-बार जन्म लेते हैं, बूढ़े होते हैं, मरकर चले जाते हैं और फिर जन्म लेते हैं ॥50 ॥ ▪ और मनुष्य की दृष्टि काम व मोहान्धकार से ढकी रहती है और अपनी अन्धता की अधिकता से वह इस महादुःख से निकलने का मार्ग नही जानता है" ॥51 ॥ ▪ इस तरह विचार कर उसने अपने मन में सोचा, "सचमुच में यह क्या है, जिसका अस्तित्व जरा-मरण का कारण है?" ॥52 ॥ ▪ सत्य की गहराई तक प्रवेश कर उसने समझा कि जन्म होने से जरा-मरण की उत्पत्ति होती है ॥53 ॥ ▪ उसने देखा कि शिर होनेपर ही शिर-दर्द सम्भव है, क्योंकि वृक्ष का जन्म होनेपर ही यह काटकर गिराया जा सकता है ॥54 ॥ ▪ तब उसने फिर सोचा, "यह जन्म किससे होता है?" तब उसने ठीक-ठीक देखा कि कर्मभव से जन्म होता है ॥55 ॥ ▪ अपनी दिव्य दृष्टि से उसने देखा कि प्रवृत्ति (= जीवन) कर्म से होती है, न कि स्रष्टा से या प्रकृति से या आत्मा से या अकारण ही ॥56 ॥ ▪ जैसे बाँस की पहली गिरह बुद्धिमानी से काटनेपर सब तेजी से ठीक हो जाता है (अर्थात् शेष बाँस अच्छी तरह चीरा जाता है), वैसे ही उसका ज्ञान उचित क्रम से बढ़ा ॥57 ॥ ▪ तब ऋषि ने भव का कारण निश्चित करने में अपना मन लगाया। तब उसने देखा कि भव का कारण उपादान में पाया जाता है ॥58 ॥⁵⁷ ▪ जीवन के विविध शील-व्रतों, काम, आत्मवाद और असम्यक् दृष्टि ग्रहण करने से यह कर्म (उपादान) होता है, जैसे जलावन ग्रहण करने से अग्नि उत्पन्न होती है ॥59 ॥ ▪ तब उसने सोचा- “उपादान किस कारण से होता है?" तब उसने पहचाना कि उपादान का प्रत्यय (= कारण) तृष्णा में है ॥60 ॥ ▪ जैसे हवा का साथ पाकर थोड़ी सी आग से जङ्गल प्रज्वलित हो जाता है, वैसे ही तृष्णा से काम आदि महापाप होते हैं ॥61 ॥ ▪ तब उसने सोचा- "तृष्णा किससे होती है?" तब उसने निश्चय किया कि तृष्णा का कारण वेदना है ॥62 ॥⁵⁸ ▪ वेदनाओं से अभिभूत होकर मनुष्य उसकी तृप्ति के उपाय चाहते हैं; क्योंकि प्यास के अभाव में किसी को जल में आनन्द नही आता (और प्यास लगनेपर ही पानी की चाह होती है) ॥63 ॥ ⁵⁷. उपादान = भोग-प्राप्ति के लिए प्रयत्न करनेवाले की तात्कालिक अवस्था-अ० को०। ⁵⁸. वेदना = इन्द्रियों और विषयों के स्पर्श से होनेवाली अनुभूति; चक्षु-स्पर्श, श्रोत-स्पर्श, घ्राण-स्पर्श, जिह्वा- स्पर्श, काय-स्पर्श और मन-स्पर्श से उत्पन्न होनेवाली वेदना। ▪ तब उसने फिर ध्यान किया- "वेदना का स्रोत क्या है?" उसने, जिनसे वेदना का अन्त कर दिया था, देखा कि वेदना का कारण स्पर्श में है ॥64 ॥ ▪ स्पर्श की व्याख्या है, "वस्तु, इन्द्रिय और मन का संयोग" जिससे वेदना वैसे ही उत्पन्न होती है, जैसे दो अरणियों और जलावन के संयोग से आग पैदा होती है ॥65 ॥ ▪ तब उसने सोचा कि स्पर्श का भी कारण है। इसपर उसने जाना कि कारण छः आयतनों (= काय, मन, चक्षु, श्रोत्र, घ्राण और रसना) में है ॥66 ॥ ▪ अन्धा वस्तुओं को नही देखता है, क्योंकि उसकी आँखें मन के साथ उन (वस्तुओं) का संयोग नही करती; दृष्टि होनेपर संयोग होता है। इसलिए छः आयतनों के होनेपर स्पर्श होता है ॥67 ॥ ▪ फिर उसने छः आयतनों का कारण जानने का निश्चय किया। तब उस कारण-ज्ञ ने नामरूप को कारण जाना ॥68 ॥ ▪ जैसे अङ्कुर का अस्तित्व होनेपर ही पत्ते व तने का अस्तित्व होता है, वैसे ही नाम-रूप का अस्तित्व होनेपर ही छः आयतन होते हैं ॥69 ॥ ▪ तब उसने सोचा- "नाम-रूप का क्या कारण है?" इसपर उसने, जो ज्ञान के उस पार तक पहुँच चुका था, इसका कारण विज्ञान (= सञ्ज्ञा, चेतना) में देखा ॥70 ॥ ▪ विज्ञान का उदय होनेपर नाम-रूप उत्पन्न होता है। बीज का विकास पूरा होनेपर अङ्कुर शारीरिक रूप धारण करता है ॥71 ॥ ▪ फिर उसने सोचा- "विज्ञान किससे पैदा होता है?" तब उसने जाना कि नाम-रूप का आश्रय लेकर यह पैदा होता है ॥72 ॥ ▪ तब निमित्त-नैमित्तिक का क्रम समझने के बाद उसने इसपर विचार किया; उसका मन उसके द्वारा स्थिर किये गये विचारों में विचरा और दूसरी बातों की ओर नही गया ॥73 ॥ ▪ विज्ञान प्रत्यय है जिससे नाम-रूप पैदा होता है। और नाम-रूप आधार है जिसपर विज्ञान आश्रित है ॥74 ॥ ▪ जैसे (जल में) नाव आदमी को ढोती है (और स्थल पर आदमी नाव को ढोता है), वैसे ही विज्ञान व नाम-रूप एक दूसरे के कारण हैं ॥75 ॥ ▪ जैसे तपा हुआ लोहा तृण को प्रज्वलित करता है और प्रज्वलित तृण लोहे को तपाता है, वैसे ही उनका पारस्परिक कार्य-कारण सम्बन्ध है ॥76 ॥ ▪ इस तरह उसने समझा कि विज्ञान से नाम-रूप का उदय होता है, नाम-रूप से आयतन पैदा होते हैं और आयतनों से स्पर्श का उदय होता है ॥77 ॥ ▪ उसने जाना कि स्पर्श से वेदना, वेदना से तृष्णा, तृष्णा से उपादान, और वैसे ही उपादान से भव उत्पन्न होता है ॥78 ॥ बुद्धचरित 77