बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें▪ भव से जन्म होता है, जन्म से जरा-मरण का उदय उसने जाना। उसने ठीक ठीक समझा कि प्रत्ययों से संसार उत्पन्न होता है ॥79॥ ▪ तब उसे यह दृढ़ निश्चय हुआ कि जन्म-विनाश से जरा-मरण का निरोध होता है, भव-विनाश से स्वयं जन्म नष्ट होता है और उपादान के निरोध से भव बन्द हो जाता है ॥80॥ ▪ फिर तृष्णा-निरोध से उपादान का निरोध होता है; यदि वेदना का अस्तित्व नही, तो तृष्णा का अस्तित्व नही; स्पर्श का नाश होने से वेदना पैदा नही होती; छः आयतनों का अस्तित्व नही होनेपर स्पर्श का नाश होता है ॥81॥ ▪ उसी प्रकार नाम-रूप का सम्यक् निरोध होनेपर छः आयतन भी नष्ट हो जाते है; और विज्ञान का निरोध होने से नाम-रूप का निरोध होता है; और संस्कारों का निरोध होने से विज्ञान का निरोध होता है ॥82॥ ▪ उसी प्रकार महर्षि ने समझा कि अविद्या के सर्वथा अभाव से संस्कारों का निरोध होता है। इसलिए उसने ज्ञेय को उचित रीति से जाना और वह संसार के सामने बुद्ध होकर खड़ा हुआ ॥83॥ ▪ उस नर-श्रेष्ठ ने भव के ऊपर से नीचे तक कहीं आत्मा को नही देखा और परम ज्ञान के अष्टाङ्गिक मार्ग द्वारा, जो शुरू होकर जल्द ही इष्ट स्थान को पहुँचता है, शान्ति को प्राप्त किया, जैसे जलावन के जलनेपर अग्नि (शान्ति को प्राप्त करती है) ॥84॥ ▪ तब पूर्णता प्राप्त करनेपर उसके मन में यह विचार हुआ- "मैंने यह पूर्ण मार्ग प्राप्त किया है, जिसपर भली-बुरी बातों को जाननेवाले पूर्व के महर्षि-वंश परमार्थ के लिए चले थे" ॥85॥ ▪ चौथे पहर के उस क्षण में जब उषा का आगमन हुआ और जब सब चराचर शान्त थे, महर्षि ने अविनाशी पद प्राप्त किया, उत्तम नायक ने सर्वज्ञता प्राप्त की ॥86॥ ▪ जब बुद्ध होकर उसने इस सत्त्व को जाना, तब मदिरा से माती कामिनी के समान पृथ्वी काँपी, सिद्ध-सङ्घों के साथ दिशाएँ दीप्त हुईं और आकाश में बड़ी बड़ी दुन्दुभियाँ बजीं ॥87॥ ▪ सुख देनेवाली हवा धीरे-धीरे बही, देव ने अनभ्र आकाश से जल-वृष्टि की और वृक्षों ने मानो उसका सम्मान करने के लिए, असमय में फल-फूल गिराये ॥88॥ ▪ उस समय, जैसे स्वर्ग में, मान्दारव फूल, सुवर्ण व वैदूर्य के कमल व कुमुद आकाश से गिरे और उससे शाक्य-ऋषि का स्थान भर गया ॥89॥ ▪ उस क्षण किसी को क्रोध नही हुआ, कोई बीमार नही था, किसी ने पाप-मार्ग का आश्रय नही किया, किसी ने मन में मद नही किया; जगत् इस तरह शान्त हुआ, जैसे उसने पूर्णता प्राप्त की हो ॥90॥ ▪ मोक्ष में प्रवृत्त देव-सङ्घ प्रसन्न हुए, नीचे के लोकों में रहनेवाले जीव भी आनन्दित हुए। धर्म-प्रिय सङ्घ की समृद्धि से धर्म का चारों ओर प्रचार हुआ और जगत्, काम व अज्ञानरूप अन्धकार के ऊपर उठा ॥91॥ ▪ इक्ष्वाकु-वंश के ऋषि, जो पहले मनुष्यों के शासक थे, राजर्षि व महर्षि उनकी सिद्धि से आनन्दित व विस्मित होकर अपने दिव्य विमानों में उनका सम्मान करते हुए खड़े हुए ॥92॥ ▪ अदृश्य जीव-समूहों के महर्षिगण ने ऊँचे स्वर से उनकी स्तुति की और जीव-समूह इस तरह आनन्दित हुआ, जैसे उसकी बढ़ती हो रही हो। किन्तु मार वैसे ही निराश हुआ, जैसे किसी महाविपत्ति से पूर्व (निराशा होती है) ॥93॥ ▪ तब सात दिनों तक, शारीरिक क्लेश से मुक्त होकर, निरन्तर निश्चल आँखों से अपने ही चित्त को देखते हुए वह बैठे रहे। "इस स्थान पर मैंने मुक्ति पाई" इस तरह चिन्तन करते हुए उसने अपनी हार्दिक अभिलाषा पूरी की ॥94॥ ▪ तब ऋषि ने, जो कार्य-कारण का सिद्धान्त समझ चुके थे और जो अनात्मवाद की पद्धति में दृढ़तापूर्वक स्थिर थे, अपने को जगाया और महाकरुणा से युक्त होकर, जगत् को उसकी शान्ति के लिए अपनी बुद्ध-दृष्टि से देखा ॥95॥ ▪ जगत् मिथ्या विचारों और व्यर्थ प्रयत्नों में नष्ट हो रहा है, इसकी काम-वासनाएँ अधिक हैं, और मोक्ष-धर्म अत्यन्त सूक्ष्म है, यह देखकर उसने अविचल रहने का निश्चय किया ॥96॥ ▪ तब अपनी पहली प्रतिज्ञा याद कर उसने शान्ति का उपदेश देने का निश्चय किया। इसपर उसने अपने मन में सोचा कि किस प्रकार कुछ लोगों की काम-वासना अधिक है और दूसरों की कम ॥97॥ ▪ तब सुगत के मन ने शान्ति का उपदेश करने के लिए निश्चय किया है, यह जानकर स्वर्ग में रहनेवाले दो प्रधान देवों ने जगत् का हित चाहा और वे चमकते हुए उनके समीप गये ॥98॥ ▪ पाप-परित्याग द्वारा अपना लक्ष्य सिद्ध कर और उत्तम धर्म को अपना उत्तम साथी समझकर वह बैठे हुए थे; उन्होंने सम्मानपूर्वक उनकी स्तुति की और जगत् के हित के लिए ये वचन उनसे कहे:- ॥99॥ ▪ "अहो! क्या संसार इस सौभाग्य के योग्य नही कि आपका चित्त जीवों के प्रति करुणा अनुभव करे? संसार मे विविध योग्यताओं के प्राणी हैं, कुछ की काम-वासना अधिक है, कुछ की काम-वासना कम है ॥100॥ ▪ हे मुनि, आपने स्वयं भव-सागर पार कर लिया है, अब दुःख में डूब रहे जगत् को उबारिये, और जैसे कोई बड़ा सेठ धन दान करता है वैसे ही दूसरों को भी आप अपने गुण दीजिए ॥101॥ 78 अश्वघोष