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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

▪ भव से जन्म होता है, जन्म से जरा-मरण का उदय उसने जाना। उसने ठीक ठीक समझा कि प्रत्ययों से संसार उत्पन्न होता है ॥79॥ ▪ तब उसे यह दृढ़ निश्चय हुआ कि जन्म-विनाश से जरा-मरण का निरोध होता है, भव-विनाश से स्वयं जन्म नष्ट होता है और उपादान के निरोध से भव बन्द हो जाता है ॥80॥ ▪ फिर तृष्णा-निरोध से उपादान का निरोध होता है; यदि वेदना का अस्तित्व नही, तो तृष्णा का अस्तित्व नही; स्पर्श का नाश होने से वेदना पैदा नही होती; छः आयतनों का अस्तित्व नही होनेपर स्पर्श का नाश होता है ॥81॥ ▪ उसी प्रकार नाम-रूप का सम्यक् निरोध होनेपर छः आयतन भी नष्ट हो जाते है; और विज्ञान का निरोध होने से नाम-रूप का निरोध होता है; और संस्कारों का निरोध होने से विज्ञान का निरोध होता है ॥82॥ ▪ उसी प्रकार महर्षि ने समझा कि अविद्या के सर्वथा अभाव से संस्कारों का निरोध होता है। इसलिए उसने ज्ञेय को उचित रीति से जाना और वह संसार के सामने बुद्ध होकर खड़ा हुआ ॥83॥ ▪ उस नर-श्रेष्ठ ने भव के ऊपर से नीचे तक कहीं आत्मा को नही देखा और परम ज्ञान के अष्टाङ्गिक मार्ग द्वारा, जो शुरू होकर जल्द ही इष्ट स्थान को पहुँचता है, शान्ति को प्राप्त किया, जैसे जलावन के जलनेपर अग्नि (शान्ति को प्राप्त करती है) ॥84॥ ▪ तब पूर्णता प्राप्त करनेपर उसके मन में यह विचार हुआ- "मैंने यह पूर्ण मार्ग प्राप्त किया है, जिसपर भली-बुरी बातों को जाननेवाले पूर्व के महर्षि-वंश परमार्थ के लिए चले थे" ॥85॥ ▪ चौथे पहर के उस क्षण में जब उषा का आगमन हुआ और जब सब चराचर शान्त थे, महर्षि ने अविनाशी पद प्राप्त किया, उत्तम नायक ने सर्वज्ञता प्राप्त की ॥86॥ ▪ जब बुद्ध होकर उसने इस सत्त्व को जाना, तब मदिरा से माती कामिनी के समान पृथ्वी काँपी, सिद्ध-सङ्घों के साथ दिशाएँ दीप्त हुईं और आकाश में बड़ी बड़ी दुन्दुभियाँ बजीं ॥87॥ ▪ सुख देनेवाली हवा धीरे-धीरे बही, देव ने अनभ्र आकाश से जल-वृष्टि की और वृक्षों ने मानो उसका सम्मान करने के लिए, असमय में फल-फूल गिराये ॥88॥ ▪ उस समय, जैसे स्वर्ग में, मान्दारव फूल, सुवर्ण व वैदूर्य के कमल व कुमुद आकाश से गिरे और उससे शाक्य-ऋषि का स्थान भर गया ॥89॥ ▪ उस क्षण किसी को क्रोध नही हुआ, कोई बीमार नही था, किसी ने पाप-मार्ग का आश्रय नही किया, किसी ने मन में मद नही किया; जगत् इस तरह शान्त हुआ, जैसे उसने पूर्णता प्राप्त की हो ॥90॥ ▪ मोक्ष में प्रवृत्त देव-सङ्घ प्रसन्न हुए, नीचे के लोकों में रहनेवाले जीव भी आनन्दित हुए। धर्म-प्रिय सङ्घ की समृद्धि से धर्म का चारों ओर प्रचार हुआ और जगत्, काम व अज्ञानरूप अन्धकार के ऊपर उठा ॥91॥ ▪ इक्ष्वाकु-वंश के ऋषि, जो पहले मनुष्यों के शासक थे, राजर्षि व महर्षि उनकी सिद्धि से आनन्दित व विस्मित होकर अपने दिव्य विमानों में उनका सम्मान करते हुए खड़े हुए ॥92॥ ▪ अदृश्य जीव-समूहों के महर्षिगण ने ऊँचे स्वर से उनकी स्तुति की और जीव-समूह इस तरह आनन्दित हुआ, जैसे उसकी बढ़ती हो रही हो। किन्तु मार वैसे ही निराश हुआ, जैसे किसी महाविपत्ति से पूर्व (निराशा होती है) ॥93॥ ▪ तब सात दिनों तक, शारीरिक क्लेश से मुक्त होकर, निरन्तर निश्चल आँखों से अपने ही चित्त को देखते हुए वह बैठे रहे। "इस स्थान पर मैंने मुक्ति पाई" इस तरह चिन्तन करते हुए उसने अपनी हार्दिक अभिलाषा पूरी की ॥94॥ ▪ तब ऋषि ने, जो कार्य-कारण का सिद्धान्त समझ चुके थे और जो अनात्मवाद की पद्धति में दृढ़तापूर्वक स्थिर थे, अपने को जगाया और महाकरुणा से युक्त होकर, जगत् को उसकी शान्ति के लिए अपनी बुद्ध-दृष्टि से देखा ॥95॥ ▪ जगत् मिथ्या विचारों और व्यर्थ प्रयत्नों में नष्ट हो रहा है, इसकी काम-वासनाएँ अधिक हैं, और मोक्ष-धर्म अत्यन्त सूक्ष्म है, यह देखकर उसने अविचल रहने का निश्चय किया ॥96॥ ▪ तब अपनी पहली प्रतिज्ञा याद कर उसने शान्ति का उपदेश देने का निश्चय किया। इसपर उसने अपने मन में सोचा कि किस प्रकार कुछ लोगों की काम-वासना अधिक है और दूसरों की कम ॥97॥ ▪ तब सुगत के मन ने शान्ति का उपदेश करने के लिए निश्चय किया है, यह जानकर स्वर्ग में रहनेवाले दो प्रधान देवों ने जगत् का हित चाहा और वे चमकते हुए उनके समीप गये ॥98॥ ▪ पाप-परित्याग द्वारा अपना लक्ष्य सिद्ध कर और उत्तम धर्म को अपना उत्तम साथी समझकर वह बैठे हुए थे; उन्होंने सम्मानपूर्वक उनकी स्तुति की और जगत् के हित के लिए ये वचन उनसे कहे:- ॥99॥ ▪ "अहो! क्या संसार इस सौभाग्य के योग्य नही कि आपका चित्त जीवों के प्रति करुणा अनुभव करे? संसार मे विविध योग्यताओं के प्राणी हैं, कुछ की काम-वासना अधिक है, कुछ की काम-वासना कम है ॥100॥ ▪ हे मुनि, आपने स्वयं भव-सागर पार कर लिया है, अब दुःख में डूब रहे जगत् को उबारिये, और जैसे कोई बड़ा सेठ धन दान करता है वैसे ही दूसरों को भी आप अपने गुण दीजिए ॥101॥ 78 अश्वघोष

◼ यहाँ कुछ लोग ऐसे हैं जो इह-लोक व पर-लोक में अपने लाभ की बात सोचकर केवल अपने ही हित के लिए काम करते हैं। किन्तु इस जगत् या स्वर्ग में ऐसा व्यक्ति दुर्लभ है, जो जगत के हित के लिए काम करेगा" ॥102 ॥ ◼ इस प्रकार महर्षि से कहकर, वे जिस रास्ते से आये थे उसी से दिव्य लोक को लौट गये। जब ऋषि ने भी इस भाषण पर विचार किया, तब जगत् की मुक्ति के लिए उनका निश्चय दृढ़ हुआ ॥103 ॥ ◼ भिक्षाटन के समय चार दिशाओं के देवों ने ऋषि को भिक्षा-पात्र दिये; उन्हें ग्रहण कर गौतम ने धर्म के लिए उन्हें एक में परिणत कर दिया ॥104 ॥ ◼ तब उस समय जाते हुए काफ़िले के दो सेठों ने अनुकूल देवता से प्रेरित होकर उदात्त चित्त से ऋषि की आनन्दपूर्वक पूजा की और पहले-पहल उन्हें भिक्षा दी ॥105 ॥ ◼ मुनि ने सोचा कि अराड और उद्रक रामपुत्र दोनों के चित्त धर्मग्रहण करने के योग्य थे; किन्तु जब उसने देखा कि दोनों स्वर्गीय हो गये, तब उन्हें पाँच भिक्षुओं का ख्याल हुआ ॥106 ॥ ◼ तब, जैसे उगता हुआ सूर्य अन्धकार को दूर करता है वैसे ही अज्ञानरूप अन्धकार को दूर करने के लिए शान्ति का उपदेश करने की इच्छा से, गौतम उस धन्य-नगर की ओर गये, जो भीमरथ का प्रिय था और जिसके विविध वन वाराणसी से अलङ्कृत हैं ॥107 ॥⁵⁹ ◼ तब मुनि ने, जिनकी आँखें वृषभ की-सी थीं और जिनकी चाल मत्त हाथी की-सी थी, लोगों को विनीत करने के लिए काशी देश जाना चाहा और हाथी के समान समूचा शरीर घुमाकर उसने बोधि-वृक्ष पर अपनी निश्चल आँखें स्थिर कीं ॥108 ॥ ॥अश्वघोष-कृत-बुद्धचरित महाकाव्य का "बुद्धत्व-प्राप्ति" नामक चतुर्दश सर्ग समाप्त ॥


⁵⁹- भीमरथः—काशी का एक राजा था।


पन्द्रहवाँ सर्ग⁶⁰ धर्मचक्र-प्रवर्तन 1 अपना काम पूरा करने पर उन्हें शान्ति की शक्ति विदित हुई; और यद्यपि वे अकेले ही चल दिए, फिर भी ऐसा लगा जैसे बहुत-से लोग उनके साथ जा रहे हों। मार्ग में उन्हें देखकर एक पवित्र भिक्षु ने हाथ जोड़कर इस प्रकार कहाः- 2 “जो लोग आसक्ति के अधीन हैं और जिनके इन्द्रियरूपी घोड़े दुर्दान्त हैं, उनके बीच आप आसक्ति-रहित और जितेन्द्रिय हैं; इसीलिए चन्द्रमा जैसी आपकी आकृति अभिनव प्रज्ञा के मधुर रस द्वारा आपका हार्दिक सन्तोष प्रकट कर रही है।⁶¹ 3 आपका धैर्य-युक्त चेहरा यहाँ चमक रहा है, आप अपने इन्द्रियों के स्वामी बन गए हैं और आपकी आँखें बलवान वृषभ की तरह हैं; अवश्य ही आप कृतार्थ हैं। हे आर्य, आपके गुरु कौन हैं? किनसे आपने यह सिद्धि (= मुक्ति) पाई है?” 4 इसपर उन्होंने उत्तर दिया- “मेरा गुरु कोई नहीं। मेरे लिए सम्माननीय कोई नहीं, निन्दनीय तो और भी कोई नहीं। मैंने निर्वाण प्राप्त किया है और मैं वैसा नहीं जैसे कि दूसरे हैं। धर्म (= परधर्म) के विषय में मुझे स्वयंभू जानो।⁶² 5 मैंने उसे पूरा-पूरा समझ लिया है जो समझने योग्य है और जिसे दूसरों ने नही समझा है, इसलिए मैं बुद्ध हूँ। और क्योंकि मैंने क्लेशों को शत्रु की तरह जीत लिया है, मुझे शान्तिमय जानो।


⁶⁰- इस सर्ग से अन्तिम सर्ग तक व्यवहृत निम्न-लिखित चिह्नों की व्याख्या यों है :- * यह चिह्न जिन श्लोकों के शुरू में है वे चीनी अनुवाद में नहीं हैं। ( ) कोष्ठक के भीतर के शब्द अर्थ स्पष्ट करने के लिए दिये गये हैं। ये शब्द कहीं-कहीं पूर्ववर्ती शब्दों के अर्थ हैं और कहीं-कहीं बाहर से दिये गये पूरक शब्द हैं। (=) कोष्ठक के भीतर बराबर के चिह्न से युक्त शब्द मूल संस्कृत शब्द समझकर दिये गये हैं। (_) कोष्ठक के भीतर रेखांकित पद अप्राप्त पद के स्थान पर अन्दाज से दिये गये हैं या चीनी अनुवाद से। ... ऐसे चिह्नवाले रिक्त स्थानों के मूल पदों का अनुवाद अप्राप्त, दुर्बोध या संदेहजनक है। ⁶¹- जितेन्द्रिय की जगह अविकल अनुवाद होगा- “इन्द्रियरूपी घोड़ों का दमन कर लिया है”। ⁶²- निर्वाण = “इसी शरीर में राग-द्वेष आदि चित्त-मलों का नष्ट होना क्लेश-निर्वाण है और क्लेश-रहित अर्हत् की मृत्यु होनेपर भविष्य में उसके जन्म की सम्भावना के नष्ट होने का नाम स्कन्ध-निर्वाण है; इस प्रकार निर्वाण के दो भेद किये जाते हैं।” -बुद्धवचन। 'चित्त-मल से रहित ऐसे द्युतिमान् पुरुष ही लोक में निर्वाण-प्राप्त हैं।'-धम्मपद छः 14 । बुद्धचरित 79

6 हे सौम्य, इस समय मैं अमर-धर्म की दुन्दुभि बजाने के लिए वाराणसी जा रहा हूँ, यश (से होनेवाले) सुख के लिए नही, अभिमान से नही, किन्तु दुःख से पीड़ित साथी जनों के हित के लिए। 7 पूर्व में जीव-लोक को दुःखी देखकर मैंने ये प्रतिज्ञा की—स्वयं पार होनेपर मैं जगत् को पार लगाऊँगा, स्वयं मुक्त होनेपर मैं यहाँ रहनेवालों को मुक्त करूँगा। 8 इस जगत् में कुछ लोग धन (= योग्यता) पाकर केवल अपने लिए ही रखते हैं और इससे लज्जा को प्राप्त होते हैं; किन्तु (ज्ञान-) विशेष प्राप्त करने पर खुली दृष्टिवाले महापुरुष के लिए केवल वही धन है जिसे वह बाँटता है। 9 सूखी भूमि पर खड़ा रहनेवाला यदि धारा में बहते इन्सान को बाहर खींचने का प्रयास नहीं करे, तो वह वीर नहीं; और योग्यता पानेवाला यदि उसे पीड़ितों के बीच नहीं बाँटे, तो वह दाता नही। 10 स्वस्थ (= स्वयं में स्थित) व्यक्ति को सुलभ उपचारों से व्याधि ग्रस्त का उपचार करना चाहिए और मार्गपति को कुमार्ग से जानेवाले को उचित मार्ग बताना चाहिए। 11 जैसे कि जब प्रदीप जलता है तब इसके कारण अन्धकार नही हो सकता, वैसे ही जब बुद्ध अपना ज्ञान प्रदीप्त करता है तब मनुष्य काम के वशीभूत नहीं होते। 12 जैसे काष्ठ में अग्नि का रहना, आकाश में हवा का रहना, और पृथ्वी में जल का रहना नियत है, वैसे ही गया में मुनियों का बुद्धत्व-प्राप्ति और काशी में उनका उपदेश करना नियत है।” 13 तब धीरे-धीरे प्रशंसा करके उस भिक्षु ने बुद्ध को छोड़कर इच्छानुसार अपना रास्ता पकड़ा; किन्तु उत्कण्ठित होकर विस्मित आँखों से वह उन्हें बार-बार देखता रहा। 14 तब क्रम से मुनि ने कोश-गृह के भीतरी भाग के सदृश काशी नगरी को देखा, जिसे भागीरथी और वाराणसी एक साथ मिलकर इस तरह आलिङ्गन कर रहीं थीं, जैसे वे सखी हों। 15 शक्ति और गौरव से उज्ज्वल मुनि, सूर्य के समान चमकते हुए, मृगदाव में आए, जहाँ कोयलों की ध्वनि से गूँजते वृक्षों के बीच महर्षिगण रहते थे।⁶³ 16 तब वह कौण्डिन्य गोत्रवाला, महानाम, वाष्प, अश्वजित्, और भद्रजित्—ये पाँचों भिक्षु दूर से ही उन्हें देखकर आपस में ये वचन बोले— 17 “भिक्षु गौतम समीप आ रहा है, जो आराम-प्रियता के कारण तप से विमुख हो गया है। अवश्य ही हमें न तो उससे मिलना है और न उसका अभिवादन करना है; क्योंकि जो व्रत से विमुख हो गया है वह सम्मान के योग्य नहीं। 18 किन्तु यदि वह हम से बातचीत करना चाहे तो, हम अवश्य उससे बातचीत करेंगे; क्योंकि आर्य को अवश्य वैसा करना चाहिए, चाहे आगत अतिथि (= तथागत) कोई भी हो।” 19 बुद्ध बैठे हुए भिक्षुओं की ओर आगे बढ़े, जिन्होंने इस तरह अपने विचार स्थिर किए थे; और जैसे-जैसे वह उनके समीप आते गए वैसे-वैसे वे अपना निश्चय तोड़ते गए। 20 उनमें से एक ने उनका चीवर ग्रहण किया और उसी प्रकार दूसरे ने हाथ जोड़कर उनका भिक्षा-पात्र ग्रहण किया। तीसरे ने उन्हें उचित आसन दिया और उसी तरह दूसरे दो ने पाँव धोने के लिए उन्हें जल दिया। 21 इस प्रकार उनकी अनेक परिचर्याएँ करते हुए उन सब ने उनसे गुरुवत् व्यवहार किया; किन्तु जब उन्होंने उनकी गोत्र-नाम से पुकारना नहीं छोड़ा, तब भगवान् ने करुणापूर्वक उनसे कहा:— 22 “हे भिक्षुओं, पूज्य अर्हत् से पहले की तरह असम्मानपूर्वक मत बोलो; क्योंकि यद्यपि मैं सचमुच ही प्रशंसा व निन्दा से उदासीन हूँ, फिर भी मैं तुम्हें अ-पुण्यों (= अशुभों) से अलग कर सकता हूँ। 23 जगत् के हित के लिए बुद्ध बोधि प्राप्त करता है, अतः वह सदा सब जीवों के हित के लिए कार्य करता है; और जो अपने गुरु को नाम लेकर पुकारता है उसके लिए धर्म उच्छिन्न हो जाता है, जैसे माता-पिता का असम्मान करने से।” 24 इस तरह वक्ता-श्रेष्ठ महर्षि ने अपने हृदय की करुणा से उन्हें उपदेश दिया; किन्तु अ-सार और मोह द्वारा बहकाये जाने के कारण उन्होंने सिकोड़ते मुखों से उत्तर दिया:— 25 “हे गौतम, तुमने परम उत्कृष्ट तपों द्वारा तत्त्व को नहीं समझा और यद्यपि कष्ट से ही लक्ष्य प्राप्त होता है, फिर भी तुम आराम-प्रिय हो। कैसे कह सकते हो— मैंने (-तत्त्व को) देखा है?” 26 जब भिक्षुओं ने तथागत की सच्चाई के बारे में इस प्रकार अविश्वास प्रकट किया, तब मार्ग-दर्शी ने बोधि-मार्ग को उस (-तत्त्वमार्ग) से भिन्न देखते हुए उनसे मार्ग की व्याख्या इस प्रकार की:— 27 “अपने को क्लेश देनेवाले अज्ञानी और वैसे ही इन्द्रियों-विषयों में आसक्त रहनेवाले, इन दोनों को तुम्हें दोष में स्थित समझना चाहिए; क्योंकि उन्होंने जो मार्ग ग्रहण किए हैं वे अमरत्व की ओर नहीं ले जाते। 28 अज्ञानी का चित्त जब तप नामक शारीरिक क्लेशों से आक्रान्त और संक्षुब्ध (= उतावला) होता है तब वह मूढ (= संज्ञाहीन) हो जाता है और साधारण लोक-व्यवहार को भी नहीं जान सकता है, फिर तत्त्व के अतीन्द्रिय मार्ग को कहाँ से जानेगा?


⁶³- मृगदाव = मृगों का वन, सारनाथ का प्राचीन नाम।

80 अश्वघोष

29 जैसे इस जगत् में अन्धकार के विनाश के लिए प्रकाश पाने के हेतु से कोई जल नही गिराता, वैसे ही ज्ञानाग्नि द्वारा (-नष्ट होनेवाले) अज्ञानरूपी अन्धकार के विनाश के लिए शारीरिक क्लेश पूर्व-आवश्यकता नही है। 30 जैसे अग्नि चाहनेवाला व्यक्ति काठ को छेदकर या उसे चीरकर अग्नि नही पाता। किन्तु उचित साधनों के सहारे से ही वह सफल होता है, वैसे ही योग से अमरत्व प्राप्त होता है, क्लेशों से नहीं। 31 वैसे ही जो लोग अनर्थकारी काम-वासनाओं में आसक्त रहते हैं, उनके चित्त, तम व रज से आक्रान्त हो जाते हैं, वे (तर्कज्ञान-) शास्त्र भी नहीं समझ सकते, फिर निरोध का राग-रहित मार्ग कहाँ से समझेंगे? अर्थात् इस परधर्मरूपी रुकावट का राग-रहित मार्ग कहाँ से समझेंगे? 32 जैसे रोग से अभिभूत व्यक्ति अ-स्वास्थ्यकर भोजन करके रोग-मुक्त नही होता, वैसे ही अज्ञानरूपी रोग से अभिभूत इन्सान काम-वासनाओं में आसक्त होकर शान्ति कहाँ से पाएगा? 33 जैसे जलावन (= अग्नि) के लिए सूखी घास रहने पर और हवा से वीजित (= प्रेरित) होनेपर आग नही बुझती है, वैसे ही राग को साथ व काम का आश्रय पाकर चित्त शान्त नही होता है। 34 इन दोनों मार्गों (= तप व भोग) को छोड़कर मैंने इनसे अलग— 'मध्यम-मार्ग' पाया है—जो दुःख का अन्त करके प्रीति-सुख के परे चला जाता है। 35 सम्यक् दृष्टिरूपी सूर्य इसे प्रकाशित करता है, सम्यक् सङ्कल्परूपी रथ इस पर चलता है, ठीक- ठीक बोली गई सम्यक् वाणी (इसके-) विहार (= विश्राम-स्थल) हैं, और यह सम्यक् कर्मान्त (= सदाचार, कर्मों का अन्त) के सौ-सौ उपवनों से प्रसन्न है। 36 यह सम्यक् आजीविकारूपी सुभिक्षा (= सुलभ भिक्षा) का उपभोग करता है और सम्यक् व्यायाम (= प्रयत्न) रूपी सेना व परिचारक-गुण से युक्त है; यह सम्यक् स्मृति (= सावधानी, जागरूकता) रूपी किलेबन्दी से सब ओर सुरक्षित है और (सम्यक्-) समाधि (= मानसिक एकाग्रता) रूपी शय्या व आसन से सुसज्जित है। 37 इस जगत् में यह ऐसा परम उत्तम अष्टाङ्गिक-मार्ग है, जिसके द्वारा जरा-मरण व रोग से मुक्ति मिलती है। 38 यह केवल दुःख है, यह समुदय (= कारण) है, यह निरोध है और यह इसका मार्ग; इस प्रकार निर्वाण के हेतु अभूतपूर्व और अश्रुतपूर्व धर्म-पद्धति के लिए मेरी दृष्टि विकसित हुई है। 39 जन्म जरा रोग और मरण भी, इष्ट-वियोग और अनिष्ट-संयोग, अभिलषित अन्त (= लक्ष्य, वस्तु) की अप्राप्ति—ये विविध दुःख लोगों को सहने पड़ते हैं।

40 जिस किसी अवस्था में मुनष्य हो, चाहे वह काम-वासनाओं के अधीन हो या उसने अपने को जीत लिया हो, चाहे वह शरीर-धारी हो या नहीं, जो कोई भी गुण उसे नहीं है सङ्क्षेप में उसी को दुःख जानो। 41 मेरा यह निश्चित मत है कि जैसे ज्वालाओं के शान्त होनेपर, अति अल्प अग्नि भी उष्ण होने का अपना सहज स्वभाव नहीं छोड़ती है, वैसे ही शान्ति आदि से अति सूक्ष्म होनेपर भी आत्मभाव दुःखधर्मा ही रहता है। 42 जानो कि जैसे भूमि जल बीज व ऋतु, अङ्कुर के कारण-स्वरूप हैं, वैसे ही काम-राग आदि दोष तथा दोषों से होनेवाले कर्म, दुःख के कारण-स्वरूप हैं। 43 स्वर्ग में या नीचे (के लोक में), भव-धारा का कारण काम-राग आदि दोषों का समूह है और इहलोक और परलोक में हीन, मध्य व ऊँच के भेद का मूल कारण कर्म है। 44 दोषों के विनाश से संसाररूपी चक्र का कारण बन्द हो जाता है और कर्म का क्षय होने से दुःख का अन्त होता है; क्योंकि किसी दूसरी चीज' के होने से सब चीजों का प्रादुर्भाव होता है, इसलिए उस दूसरी चीज' का लोप होने से उन सबका अन्त होता है। 45 जानो कि निरोध वह है जिसमें न जन्म है, न जरा, न मरण, न अग्नि, न पृथ्वी, न जल, न शून्य (आकाश), न वायु, और जो अनादि अनन्त आर्य अहार्य (जो हरण नही किया जा सके) सुखमय (= सुखं) और अविनाशी (= अक्षर) है। 46 मार्ग वह है जिसे अष्टाङ्गिक कहा गया है इसे छोड़कर (लक्ष्य-) प्राप्ति (= अधिगम) का (दूसरा) उपाय नही। इस मार्ग को नहीं देखने के कारण लोग विविध मार्गों में भटकते रहते हैं। 47 इस विषय में मैंने इस प्रकार निश्चय किया है कि दुःख की पहचान करनी चाहिए, कारण का त्याग करना चाहिए, निरोध का अनुभव करना चाहिए और मार्ग की भावना करनी चाहिए। 48 मुझमें दृष्टि (= चक्षु, ज्ञान) इस तरह विकसित हुई कि यह दुःख पहचाना गया और कारण छोड़ा गया, उसी तरह निरोध का अनुभव हुआ और उसी तरह इस मार्ग की भावना की गई। 49 जबतक आर्य सत्य की ये चार अवस्थाएं मैंने नहीं देखीं, तबतक इस जगत् में मुक्त होने का दावा मैंने नही किया और अपने में लक्ष्य-प्राप्ति भी नही देखी। 50 किन्तु जब मैंने आर्य सत्यों को अच्छी तरह जाना और उन्हें जानकर कर्तव्य कार्य को किया, तब इस विषय में मैंने मुक्त होने का दावा किया और देखा कि मैंने लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।" 51 जब करुणामय महर्षि ने इन शब्दों में वहाँ इस तरह धर्मोपदेश किया, तब उस कौण्डिन्य गोत्रवाले और सौ देवताओं ने पवित्र और निर्मल (= विरज) दृष्टि पाई।

बुद्धचरित 81

52 जब उसने सब कर्त्तव्य (करणीय) पूरा किया, तब सर्वज्ञ ने वृषभ के-से ऊँचे स्वर में पूछा- “क्या तुमने ज्ञान प्राप्त किया?” उस महात्मा ने उत्तर दिया- “हाँ, मैंने आपका उत्तम विचार जाना।” 53 तब “हाँ, मैंने जाना” यह कहनेवाले कौण्डिन्य ने जगत् में (पहले-पहल) उस पद का ज्ञान ग्रहण किया और आर्य गुरु तथागत के भिक्षुओं में प्रधान धर्म-ज्ञाता हुआ। 54 पृथ्वी पर रहनेवाले यक्षों ने यह शब्द सुनकर गूँजती वाणी में घोषणा की- “यह ध्रुव है कि श्रेष्ठ दृष्टिमान् ने सब जीवों की अमर शान्ति के लिए धर्म-चक्र को अच्छी तरह चलाया। 55 शील इसके आरे (= अणि, कीलक) हैं, शम एवं विनय इसकी पुट्ठियाँ (= नेमि) हैं, यह बुद्धि (?) में विशाल है और स्मृति (जागरूकता) एवं मति (ज्ञान) से स्थिर है, लज्जा (= ह्री) इसकी नाभि है। गम्भीरता असत्य-अभाव तथा उपदेश की उत्तमता के कारण त्रिभुवन में उपदिष्ट होते समय यह धर्म-चक्र अन्य शास्त्रों द्वारा उलटाया नही जा सकता।” 56 पर्वत पर के यक्षों के शब्द सुनकर स्वर्ग के देव-सङ्घों ने ध्वनि ग्रहण की ओर उसी तरह परलोक से परलोक को ब्रह्मलोक तक यह जोरो से चढ़ गई। 57 महर्षि से 'तीनों लोग अनित्य हैं' यह सुनकर कुछ संयतात्मा (= आत्मवान्) देवगण (= दिवौकस) इन्द्रिय-विषयों से विरत हुए और चित्त में संवेग होने के कारण उन्होंने तीन भवों के विषय में शान्ति पाई।⁶⁴ 58 जब तीन लोकों (त्रिभुवन) की परम शान्ति के लिए स्वर्ग में और पृथ्वी पर धर्म-चक्र उस तरह चलाया गया, तब उस मुहूर्त में अनभ्र आकाश से फूलों से भरी जल-वृष्टि हुई और तीन लोकों के निवासियों ने बड़ी बड़ी दुन्दुभियाँ बजाईं ॥ ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “धर्मचक्र-प्रवर्तन” नामक 15वाँ सर्ग समाप्त ॥ सोलहवाँ सर्ग अनेक शिष्य 1 तब सर्वज्ञ ने अध्रिजित् तथा अन्य संयतचित्त भिक्षुओं को निर्वाण-धर्म में स्थापित किया। 2 उन पञ्च-वर्गीय (भिक्षुओं) से घिरे (बुद्ध) आकाश के उस चन्द्रमा के समान शोभित हुए, जो सूर्याधिपति (जिसका अधिपति सूर्य है) नक्षत्र (हस्ता) के पाँच तारों से युक्त हो। 3 उस समय यश नामक कुल-पुत्र (या श्रेष्ठी के पुत्र) ने असावधानी से सोई हुई कुछ स्त्रियों को देखा और इससे उसके चित्त में संवेग हो गया। ⁶⁴- लोक (= भव) तीन हैं; रूप अरूप और काम। 82 अश्वघोष 4 “यह सब इतना कृपण है”, यह वचन कहकर, उज्ज्वल आभूषणों से चमकता हुआ, वह वहाँ गया जहाँ बुद्ध थे। 5 उसे देखकर मनुष्यों के आशय और दोष जाननेवाले तथागत ने कहा- “निर्वाण के लिए कोई निश्चित समय नही, यहाँ आओ और सौगत्य प्राप्त करो।” 6 जिनका यश दूर तक फैला हुआ था उनके ये वचन सुनकर, आतप से पीड़ित होकर नदी में प्रवेश करनेवाले के समान, उसने अत्यन्त मानसिक शान्ति पाई। 7 तब पूर्व कारण के बल से उसने उसी शरीर में (अर्थात् गृहस्थ वेष में ही) शरीर व मन से अर्हत्-पद (= अर्हत्त्व) का अनुभव किया। 8 जैसे खारे जल से स्वच्छ हुआ वस्त्र रङ्ग ग्रहण करता है वैसे ही उस निर्मल-चित्त ने सद्धर्म को सुनते ही पूरा-पूरा समझ लिया। 9 उन वक्ता-श्रेष्ठ (= वदतां वरः) ने, जो अपना कार्य पूरा कर चुके थे और जो अच्छे लक्ष्य को जानते (= जानन् सदर्थे) थे, अपने वस्त्रों के कारण उसे वहाँ लज्जित होते देखकर कहाः- 10 “भिक्षु-वेष धर्म का कारण नहीं है; जो सब जीवों को समान भाव से देखता है और जिसने शम एवं विनय द्वारा अपने इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह आभूषण पहनकर भी धर्म में विचरण करता है। 11 जो शरीर से घर को छोड़ता है चित्त से नही और जो काम के अधीन है, वह वन में रहने पर भी गृहस्थ समझा जाता है। 12 जो चित्त से जाता है किन्तु शरीर से नही और जो अनात्म है, वह घर में रहने पर भी वनवासी समझा जाता है। 13 जिसने यह सिद्धि पाई है वह मुक्त कहा जाता है, चाहे घर में रहता हो या भ्रमणशील भिक्षु हो गया हो। 14 जैसे विजय चाहनेवाला (राजा) विपक्षी सेना को जीतने के लिए कवच पहनता है, वैसे ही दोषों की विपक्षी सेना को जीतने के लिए आदमी (भिक्षु-) वेष ग्रहण करता है।” 15 तब तथागत ने उसे कहा- “यहाँ आओ, भिक्षु”। यह वचन सुनकर वह भिक्षु-वेष पहने हुए आया। 16 तब उसने अनुरक्त होने के कारण उसके मित्रों ने, जो संख्या में 50 और 3 और 1 (= 54) थे, धर्मलाभ किया। 17 जैसे क्षार से लिपे वस्त्र, जल के स्पर्श से तुरत साफ हो जाते हैं, वैसे ही पूर्व युगों में उनके कर्म पवित्र हो चुकने के कारण वे तुरत पूत हो गए। 18 उस समय शिष्यों की पहली टोली में कुल 60 हुए, जो अर्हत् भी थे; और तब अर्हतों द्वारा सम्यक् रूप से सम्मानित होकर उन अर्हत् ने उन्हें यों कहाः-

19 “हे भिक्षुओं, तुम सब दुःख के परे चले गए हो और अपना महान कार्य पूरा कर चुके हो। अब उनकी मदद करनी चाहिए, जो इस समय भी दुःखी है। 20 इसलिए तुम सब अकेला-अकेला इस पृथ्वी पर घूमो और लोगों के दुःख के प्रति दया-भाव से उन्हें धर्मोपदेश करो। 21 मैं स्वयं राजर्षियों की निवास-भूमि गया (= गय) की ओर काश्यप ऋषियों को विनीत करने के लिए जा रहा हूँ, जो अपनी सिद्धियों के कारण दिव्य शक्तियों से युक्त (= ऋद्धिमान्) हैं”। 22 तब उन (भिक्षुओं) ने, जिन्हें तत्त्व का दर्शन हो चुका था, उनकी आज्ञा से सब दिशाओं में प्रस्थान किया और द्वन्द्वों से मुक्त महर्षि सुगत गया की ओर गये। 23 तब क्रम से वह वहाँ पहुँचे और धर्म-वन (तपोवन?) के समीप जाकर उन्होंने कश्यप को मूर्त तप के समान वहाँ रहते देखा। 24 यद्यपि पर्वतों पर और उपवनों में रहने के स्थान थे, तो भी दशबल-धारी शास्ता ने उसे विनीत करने की इच्छा से उससे निवास-स्थान माँगा। 25, 26 ... ... ... ... ... ... $^{[65]}$ 27 तब सिद्ध को नष्ट करने के लिए बुरे आशय (= विषमस्थ) से उसने उन्हें अग्नि-शाला दी, जहाँ एक बड़ा साँप रहता था।$^{66}$ 28 रात को विषाक्त दृष्टिवाले साँप ने महामुनि को शान्त और निर्भय होकर वहाँ अपनी ओर देखते देखा और क्रोध से वह उनके ऊपर फुत्कार उठा। 29 उसके क्रोध से अग्नि-गृह में आग लग गई, किन्तु अग्नि ने मानो डर के मारे महामुनि के शरीर का स्पर्श नहीं किया। 30 जैसे महाकल्प के अन्त में अग्नि के शान्त होनेपर ब्रह्मा बैठा हुआ प्रदीप्त होता है, वैसे ही गौतम, अग्निशाला के सर्वथा प्रज्वलित होनेपर भी निर्भय (असंविग्न) रहे। 31 जब बुद्ध वहाँ बिना किसी हानि के निश्चल होकर बैठे रहे, तब साँप को विस्मय हुआ और उसने ऋषि-श्रेष्ठ को प्रणाम किया। 32 मुनि को वहाँ बैठा हुआ समझकर मृगदाव (तपोवन ?) के लोग अत्यन्त आर्त एवं दयाभिभूत हुए कि वैसा भिक्षु जल गया होगा। $^{65}$ - इनके फुटनोट में जॉन्स्टन ने लिखा हैः- There Seems to be a lacuna of uncertain length here, C giving a long account of the conversation. The line which W takes as the last of 26, I take to 24, understanding rub-tu-berten as pratiśraya. $^{66}$ - अग्नि-शाला = पानी गर्म करने का घर—बुद्धचर्या। 33 रात के बीतने पर विनायक ने अपने भिक्षा-पात्र में साँप को शान्तिपूर्वक ले लिया और काश्यप को दिखाया। 34 बुद्ध की शक्ति देखकर वह विस्मित हुआ, तो भी उसका विश्वास बना रहा कि शक्ति में उससे बढ़कर कोई नहीं। 35 तब उसका यह विचार जान, शान्त ऋषि ने समयासुकूल विविध रूप धारण कर उसके हृदय को पवित्र किया। 36 इसपर उसने ऋद्धि में बुद्ध को अपने से बड़ा माना और उसने उनका धर्म लाभ करने का निश्चय किया। 37 ओरुविल्व काश्यप का आकस्मिक हृदय-परिवर्तन देखकर उसके 500 अनुयायियों ने भी धर्म का आश्रय लिया। 38 जब गय (काश्यप) और नदी (काश्यप) का भाई (ओरुविल्व काश्यप) अपने शिष्यों सहित (दुःख के) पार चला गया और वल्कल वस्त्र फेंक चुका, तब वे दोनों (भाई) भी वहाँ पहुँचे और मार्ग पर आरूढ़ हुए। 39 तब गयशीर्ष पर्वत पर अनुयायियों सहित तीनों काश्यप भाईयों को ऋषि ने निर्वाण-धर्म का उपदेश दियाः- 40 “मोहरूपी धुएँ से ढ़की हुई तथा वितर्कों से पैदा होनेवाली राग-द्वेषरूपी अग्नि से सारा जगत् विवश होकर जल रहा है। 41 शान्ति एवं नेतृत्व के बिना इस तरह दोषों की अग्नि से जलता हुआ यह (जगत) जरा-मरण व रोग की अग्नियों से बार-बार निरन्तर उपभुक्त (नष्ट) हो रहा है। 42 इस जगत् का निराश्रय व विविध अग्नियों से दग्ध देखकर, बुद्धिमान् पुरुष को चित्त एवं इन्द्रियों से युक्त अपने शरीर पर संवेग होता है। 43 संवेग से उसे निष्कामता होती है और निष्कामता से मुक्ति, तब मुक्त होकर वह अपने को सब प्रकार से मुक्त हुआ जानता है। 44 भव-धारा का पूरा-पूरा परीक्षण कर, वह सन्यास ग्रहण करता है और अपना कार्य पूरा करता है; उसके लिए फिर जन्म नही”। 45 जब हज़ार भिक्षुओं ने भगवान् का यह उपदेश सुना, तब अनुपादान (उपदान के अभाव) के कारण उनके चित्त तुरन्त आस्रवों (मलों) से मुक्त हो गये। 46 तब अत्यन्त बुद्धिमान् (= महाप्रज्ञ) तीनों कश्यपों के साथ बुद्ध इस तरह शोभित हुए, जैसे धर्म का अवतार, दान, शील और विनय से घिरा हो। 47 तपोवन उन उत्तम ... से वञ्चित होकर निष्प्रभ हो गया, जैसे धन धर्म और आनन्द से रहित रोगी मनुष्य का जीवन फीका पड़ जाता है। बुद्धचरित 83

48 तब मगध-राज के साथ अपनी पूर्व-प्रतिज्ञा याद कर, उन सबसे घिरे हुए ऋषि, राजगृह की ओर गये। 49 तब वेणुवन में तथागत का आगमन सुनकर, राजा अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें देखने के लिए गया। 50 तब विस्मय से विकसित आँखोंवाली जनता, जीवन में अपनी अपनी स्थिति के अनुसार पैदल या सवारी पर पहाड़ी रास्ते से बाहर आई। 51 दूर से ही उत्तम ऋषि को देखकर, मगध-राज उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए शीघ्रतापूर्वक अपने रथ से उतर गया। 52 चँवर, व्यजन और परिजनों को पीछे छोड़, राजा ऋषि के पास गया, जैसे इन्द्र ब्रह्मा के पास जा रहा हो। 53 उसने सिर नवाकर महर्षि को प्रणाम किया, जिससे उसका मुकुट काँप उठा और उनकी अनुमति पाकर वह कोमल तृणों से आवृत पृथ्वी पर बैठ गया। 54 वहाँ लोगों के मन में हुआ— “अहो! शाक्य-ऋषि का प्रभाव! क्या ऋषि काश्यप भी उनके शिष्य हो गये"? 55 तब उनके मन (की बात) जानकर, बुद्ध ने काश्यप से कहा— “काश्यप कौन गुण देखकर तुमने अग्नि की पूजा छोड़ी"? 56 बलवान् बादल की-सी आवाज में जब गुरु ने उसे इस तरह उत्तेजित किया, तब हाथ जोड़कर भरी सभा में उसने जोरों से कहा:- 57 “अग्नि की पूजा करने का और उसमें आहुति देने का फल है संसार-चक्र में प्रवृत्ति एवं विविध मानसिक आधियों की सङ्गति; इसलिए मैंने अग्नि (-पूजा) छोड़ी। 58 विषयों की तृष्णा से, मन्त्रोच्चारण करने से और आहुति आदि देने से विषयों की तृष्णा दृढ़तर ही होती है; इसलिए मैंने अग्नि छोड़ी। 59 मन्त्रोच्चरण एवं अग्नि-आहुति द्वारा जन्म से मुक्ति नही होती और जन्म का दुःख महान् है; इसलिए मैंने अग्नि छोड़ी। 60 पूजा-कर्म और तप से श्रेय प्राप्त होता है, यह मिथ्या विश्वास है; इसलिए मैंने अग्नि छोड़ी। 61 मैं जन्म-मरण से मुक्त, सुखमय व अविनाशी (= अक्षर) पद को जानता हूँ; इसलिए मैंने अग्नि छोड़ी।” 62 विनीत (दीक्षित) हुए काश्यप का वैसा श्रद्धोत्पादक एवं तथ्यपूर्ण वचन सुनकर विनायक ने उसे कहा:- 63 “हे महाभाग, तुम्हारी विजय हो; तुमने विविध धर्मों में सबसे उत्तम धर्म प्राप्त किया, निस्सन्देह यह तुमने बड़ा अच्छा किया है। 64 जैसे महा-ऐश्वर्यशाली व्यक्ति अपने विविध कोषों का प्रदर्शन करता है वैसे ही अपनी विविध ऋद्धियाँ (दिव्य शक्तियाँ) दिखाकर सभा के लोगों के हृदय उत्तेजित करो”। 65 तब काश्यप ने कहा— “बहुत अच्छा” और अपने को अपने में ही सङ्कुचित कर पवन-पथ (आकाश) में पक्षी के समान उड़ गया। 66 वह ऋद्धि-विशारद आकाश में खड़ा रहा, जैसे वृक्ष के तने पर (खड़ा हो), इधर-उधर घूमा जैसे पृथ्वी पर (घूम रहा हो), बैठ गया जैसे शय्या पर (बैठा हो), और तब पड़ रहा। 67 कभी वह अग्नि के समान प्रज्वलित हुआ, कभी मेघ के समान पानी बरसाया, कभी एक ही साथ प्रज्वलित हुआ और पानी बरसाया। 68 जब चमकते हुए और पानी बरसाते हुए उसने लम्बे पग बढ़ाये, तब वह उस बादल के समान शोभित हुआ जो पानी बरसा रहा हो और चमकती बिजली से उज्ज्वल हो। 69 उसमें लगी हुई आँखों से लोगों ने उसे विस्मयपूर्वक देखा और उसे सम्मानपूर्वक प्रणाम करते हुए उन्होंने सिंह-गर्जन किये। 70 तब ऋद्धि-प्रदर्शन बन्द कर उसने शिर झुकाकर ऋषि को प्रणाम किया और कहा “मैं शिष्य हूँ, जिसने यह काम किया और मेरे गुरु (ये) भगवान् (बुद्ध) हैं”। 71 काश्यप, महर्षि को इस प्रकार प्रणाम कर रहा है, यह देखकर मगध-निवासियों ने निश्चय किया कि सुगत ही सर्वज्ञ हैं। 72 तब श्रेय में रमनेवाले उन (सुगत) ने भूमि को तैयार समझा और धर्म को सुनने के लिए इच्छुक श्रेण्य (बिम्बसार) से उसके हित के लिए कहा— 73 “हे पृथ्वीपति, हे जितेन्द्रिय महात्मन्, चित्त और इन्द्रियों के साथ रूप का उदय और अस्त (= व्यय) होता है। 74 धर्म-वृद्धि के लिए उनका उदय और व्यय ठीक ठीक जानना चाहिए और इन दो बातों को ठीक ठीक जानकर शरीर को ठीक ठीक समझो। 75 शरीर को उदय और व्यय के अधीन जान लेने से उपादान बिलकुल नही रहता और “मैं” या “मेरा” का भाव नही होता। 76 मानसिक कल्पनाओं के बाहर शरीर और इन्द्रियों की वास्तविकता नही है; दुःख होकर वे उदय होते हैं, दुःख होकर वे अस्त होते हैं। 77 यह सब “मैं” या “मेरा” नही है, ऐसा समझने पर परम अविनाशी निर्वाण प्राप्त होता है। 78 “मैं” आदि का अस्तित्व मानने के दोषों से मनुष्य मिथ्या आत्म-वाद में बँध जाते हैं और “आत्मा नही है” यह देखने पर वे कामनाओं से मुक्त होते हैं। 79 मिथ्या दृष्टि बाँधती है, सम्यक् दृष्टि मुक्त करती है। “आत्मा है” इस विचार में रहनेवाला यह जगत् सत्य को ग्रहण नही करता। 84 अश्वघोष

80 यदि आत्मा रहती, तो यह नित्य या अनित्य होती; दोनों (मतों) में ही बड़े-बड़े दोष हैं। 81 यदि इसे अनित्य माना जाय, तो कर्म-फल नहीं होगा; और पुनर्जन्म नहीं होने से निर्वाण हमें अनायास ही प्राप्त होगा। 82 यदि यह नित्य और सर्व-व्यापी रहती, तो न जन्म होता न मरण; क्योंकि सर्वव्यापी और नित्य शून्य का न उदय है न व्यय। 83 यदि ये आत्मा स्वभाव से सर्वव्यापी रहती तो कोई स्थान नहीं जहाँ यह नहीं होती; और इसका अस्त होनेपर सबको साथ ही निर्वाण प्राप्त होता। 84 स्वभाव से सर्वव्यापी होने के कारण यह कर्मशील नहीं होती और कर्म नहीं किया जाता; और कर्म नहीं करने से फल के साथ उन (कर्मों) का संयोग कैसे होता? 85 यदि आत्मा कर्म करती तो यह अपने को दुःख नहीं देती; क्योंकि अपना स्वामी आप होकर कौन अपने को दुःख देगा? 86 आत्मा को नित्य मानने से इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह परिवर्तनशील नहीं; किन्तु क्योंकि यह दुःख-सुख अनुभव करती है, अतः हम देखते हैं कि इसमें परिवर्तन होता है। 87 ज्ञान-प्राप्ति और दोष-परित्याग से निर्वाण होता है; और क्योंकि आत्मा अकर्मशील एवं सर्वव्यापी है; इसलिए इसे निर्वाण प्राप्त नहीं होगा। 88 यह नहीं कहना चाहिए कि आत्मा है, क्योंकि वास्तव में इसका अस्तित्व नहीं है। 89 करणीय कार्य क्या है और कौन इसे करता है— यह स्पष्ट नहीं है, अतः आत्मा इस प्रकार (नित्य या अनित्य होकर) रहती है, ऐसा नहीं कह सकते; और इसलिए इसका अस्तित्व नहीं। 90 हे उत्तम श्रोता, इस उपदेश को सुनो कि भव-धारा इस शरीर को—जिसमें न करनेवाला है, न वेदना अनुभव करनेवाला (= वेदक), और न आदेश देनेवाला—धारण करती हुई कैसे बह रही है। 91 छः इन्द्रियों और उनके छः विषयों के आधार पर छः प्रकार की चेतना (सञ्ज्ञा, Consciousness) उत्पन्न होती है; और प्रत्येक तीन के लिए अलग-अलग स्पर्श उत्पन्न होता है; जहाँ से स्मृति इच्छा व कर्म प्रवृत्त होते हैं। 92 जैसे सूर्यकान्त-मणि जलावन और सूर्य का संयोग होने के कारण अग्नि उत्पन्न होती है, वैसे ही व्यक्ति पर अवलम्बित सब कर्म भी बुद्धि (Consciousness), इन्द्रियों और विषयों के आधार पर होते हैं। 93 जैसे बीज से अङ्कुर पैदा होता है और तो भी अङ्कुर का तादात्म्य बीज से नहीं होता और दो में से कोई एक दूसरे के बिना नहीं रह सकता, वैसे ही शरीर इन्द्रियों और चेतना का पारस्परिक सम्बन्ध है।”


94 जब मगध-राज ने मुनि-वर का परमार्थपूर्ण नैष्ठिक उपदेश सुना, तब उसमें निर्मल विरज एवं अद्वितीय धर्म-चक्षु उत्पन्न हुआ। 95 मुनि का उपदेश सुनकर मगध की राजधानी में रहनेवाले बहुत-से लोग तथा स्वर्ग के निवासी देवगण भी उस सभा में विशुद्धचित्त होकर अक्षर व अमर पद को प्राप्त हुए ॥ ॥ अश्वघोष-कृत-बुद्धचरित महाकाव्य का “अनेक शिष्य” नामक 16वाँ सर्ग समाप्त ॥ सत्रहवाँ सर्ग महाशिष्यों की प्रव्रज्या 1 तब (मगध के) राजा ने मुनि के रहने के लिए उज्ज्वल वेणुवन भेंट किया, और उनकी अनुमति से नगर को लौट गया; तत्त्व को समझकर वह बिल्कुल ही बदल गया था। 2 तब ज्ञान से उत्पन्न शुभ प्रदीप को निर्वाण के लिए धारण करते हुए बुद्ध, ब्रह्मा देवों और विविध लोकों के आर्यों के साथ, विहार में रहने लगे। 3 तब अश्वजित्, जिसने इन्द्रियरूपी घोड़ों का दमन कर लिया था, भिक्षा की खोज में राजगृह आया और अपने सौन्दर्य शान्ति एवं आकृति से (लोगों की) एक बड़ी भीड़ की आँखें आकृष्ट कीं। 4 कपिल सम्प्रदाय के बहुत शिष्योंवाले शारद्वतीपुत्र नामक सन्न्यासी ने उस शान्तेन्द्रिय को आते देखा और सड़क पर उसका अनुसरण करते हुए उसे यों कहाः— 5 “आपकी अभिनव आकृति एवं शान्ति देखकर मेरा चित्त अत्यन्त विस्मित है। यदि आप तत्त्व को जानते हों तो कहिए; आपके शिक्षक का क्या नाम है, वह क्या सिखाते हैं और वह कौन हैं?” 6 तब ब्राह्मण ने इस तरह सम्मानपूर्वक पूछा, तब अश्वजित् ने भी उसे कहाः—“मेरे गुरु इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए थे, वे सर्वज्ञ एवं अद्वितीय हैं। 7 मैं अज्ञानी हूँ और हाल में ही धर्म की शरण आया हूँ, अतः आपको (बुद्ध की) शिक्षा बताने में असमर्थ हूँ। तो भी वक्ताश्रेष्ठ महामुनि के वचनों का थोड़ा-सा ही अंश सुनिये। 8 “भगवान् ने कारणों से होनेवाले सब पदार्थों (= धर्मों) की व्याख्या की है। उन्होंने निरोध और निरोध-मार्ग की व्याख्या की है।” 9 अश्वजित् के ये शब्द सुनते ही उपतिष्य (शारद्वतीपुत्र) नामक द्विज की आँखें धर्म में खुल गईं और निर्मल सुखमय व पवित्र हो गईं। 10 पहले उसका मत था कि क्षेत्रज्ञ, अकृत अकर्मशील और ईश्वर है; सब चीजें कारणों के आश्रय से होती हैं—यह सुनकर उसने जाना कि आत्मा नहीं है और उसने तत्त्व को देखा। बुद्धचरित 85

11 उसने समझा था कि सांख्य के अनुसार शरीर अवयवों का बना होता है और इसलिए स्थूल दोषों का ही नाश होता हैः किन्तु बुद्ध की शिक्षा के अनुसार स्थूल एवं सूक्ष्म (दोषों) का समान रूप से नाश होता है। 12 आत्मवाद मानने पर अहंवाद का परित्याग नही होता और इसलिए "अहं" रहता है। जब प्रदीप एवं सूर्य दोनों रहें, तब प्रकाश-विनाश का कारण (भला) क्या हो सकता है? 13-14 जैसे कमल के मूल काटने पर सूक्ष्म तन्तु एक दूसरे से उलझे रहते हैं वैसे ही उसने सांख्य-मार्ग को नैष्ठिक नही समझा, जब कि बुद्ध-मार्ग पत्थर काटने के समान है (पत्थर काटने से टुकड़े अलग अलग हो जाते हैं, एक दूसरे से लगे नही रहते हैं)। 15 तब ब्राह्मण ने अश्वजित् को प्रणाम किया और स्वयं अत्यन्त सन्तुष्ट होकर घर के लिए प्रस्थान किया, और क्रम से अपना भिक्षाटन पूरा करके गम्भीरता एवं बुद्धिमत्तापूर्वक वेणुवन की ओर चला। 16 उपतिष्य को इस तरह परम प्रसन्न होकर लौटते देखकर मौद्गल्यायन ने, जिसके कर्म उसकी विद्या एवं ज्ञान के अनुरूप थे, उससे कहाः- 17 "हे सन्न्यासिन्, (स्वयं) वही होते हुए आप दूसरे-जैसे क्यों हो गए? आप धीर और प्रसन्न होकर लौटै हैं? क्या आज आपने अमर-पद (अमृत) पा लिया है? यह ऐसी शान्ति अकारण नही।" 18 तब उसे तत्त्व बताते हुए उसने कहा "यह ऐसे होता है।" तब उसने कहा "मुझे शास्त्र कहिये।" इसपर उसने वे ही वचन उससे फिर कहे। उन्हें सुनकर उसमें भी सम्यक् दृष्टि उत्पन्न हुई। 19 कर्मों और आशयों (?) से उनके चित्त पवित्र हो जाने के कारण उन्होंने तत्त्व को हाथ में रखे दीप के समान देखा, और इसे जानने के कारण गुरु के प्रति उनके भाव अविचल थे, अतः उसी क्षण वे उन्हें देखने के लिए चले। 20 शिष्यों के साथ आते उन दोनों को दूर से ही देखकर महामुनि भगवान् ने भिक्षुओं से कहाः- "यहाँ आ रहे ये दोनों मेरे प्रधान शिष्य हैं, उनमें से एक ज्ञानी है और दूसरा दिव्य शक्तिवाला।" 21 तब शान्त ऋषि ने गम्भीर स्वर में उन दोनों से कहाः-"शान्ति के लिए यहाँ आये हुए भिक्षुओं, इस धर्म को ठीक-ठीक उचित रीति से ग्रहण करो।" 22 ज्यों ही तथागत ने ये वचन उनसे कहे कि त्रिदण्डी और जटाधारी ब्राह्मण बुद्ध के प्रभाव से काषायधारी भिक्षु बन गये। 23 इस तरह (काषाय) वस्त्र-युक्त होकर उन दोनों ने अपने शिष्यों के साथ शिर नवाकर सर्वज्ञ को प्रणाम किया। तब बुद्ध ने उन्हें धर्मोपदेश किया और वे दोनों काल-क्रम से नैष्ठिक-पद पर पहुँचे। 24 तब काश्यप-कुल के प्रदीप-स्वरूप एक ब्राह्मण ने, जो वर्ण रूप व धन से युक्त था, अपनी सम्पत्ति एवं सुन्दरी पत्नि का परित्याग किया, और वह काषाय वस्त्र पहनकर निर्वाण की खोज में चला। 25 उस सर्वस्व-त्यागी ने ब्रह्मपुत्रक चैत्य के समीप उत्तम सोने के बने पवित्र पताका-दण्ड के समान चमकते सर्वज्ञ को देखा; और विस्मित हो, हाथ जोड़े, उनके समीप गया। 26 उसने दूर से ही शिर नवाकर मुनि को प्रणाम किया, और हाथ जोड़कर उचित रीति से ऊँची आवाज में कहा-"मैं शिष्य हूँ, भगवान मेरे गुरु हैं, हे धीर, अन्धकार में मेरा प्रकाश बनिये।" 27 "(ज्ञान की) चाह उत्पन्न होने के कारण यह द्विज आया है, यह विशुद्धाशय एवं निर्वाण का इच्छुक है," ऐसा जानकर वाणी रूपी जल से चित्त को शान्त करनेवाले तथागत ने उसे कहा- "स्वागत।" 28 इन अक्षरों से उसकी थकावट मानो चली गई; नैष्ठिक पद की खोज करने के लिए वह यहाँ रहने लगा। उसका स्वभाव शुद्ध था, इसलिए मुनि ने उसके ऊपर कृपा की और सङ्क्षेप में उसके लिए धर्म की व्याख्या की। 29 मुनि ने सङ्क्षेप में ही धर्म की व्याख्या की और उसने अभिप्राय बिलकुल समझ लिया, अतः अपनी बुद्धि एवं विख्याति के कारण वह 'अर्हत् महाकाश्यप' कहलाया। 30 उसने पहले समझा था कि आत्मा 'मैं' और 'मेरा' दोनों ही है, और शरीर से भिन्न होते हुए भी शरीर में है। अब उसने आत्म-दृष्टि का परित्याग किया और इसे शाश्वत (नित्य) दुःख समझा। 31 उसने पहले शील-व्रत द्वारा पवित्रता पाना चाहा था और जो कारण नही, उसे कारण समझा था; अब उसने दुःख का स्वभाव समझा और वह मार्ग पर आया, और शील-व्रत को श्रेष्ठ मार्ग नही माना। ⁶⁷ 32 वह कुमार्ग पर भटका था और श्रेष्ठ मार्ग नही पा सका था; अब उसने चार सत्यों का क्रम देखा और संशय-शङ्काओं को सर्वथा काट डाला। 33 उन काम-वासनाओं की-जिनके बारे में संसार ने मूढ़ता (मोह) की है, करता है और करेगा- अपवित्रता एवं असारता देखकर, उसने कामनामक इन्द्रिय-विषयों को छोड़ा। 34 मानसिक मैत्री प्राप्तकर उसने मित्र और शत्रु में भेद नही किया और सब जीवों पर दया करता हुआ वह मन के भीतरी द्वेष (=व्यापाद) से भी मुक्त हो गया। 35 रूप और इसके प्रतिघातों पर आश्रित विविध सञ्ज्ञाओं को उसने छोड़ा और रूप में रहनेवाली बुराईयों को समझा; इसलिए उसने रूप-धातु की आसक्ति को जीता।

⁶⁷- शीलव्रत = क्रिया-कर्म, बाहरी आचार। 86 अश्वघोष

36 उसने पहचाना कि अरूप देवों की, जो मोहवश ध्यान को ही निर्वाण समझते हैं, अवस्था अनित्य है; शान्त होकर उसने निमित्त शून्य चित्त प्राप्त किया और अरूप-भव की आसक्ति छोड़ी। 37 उसने अनुभव किया कि महानदी (= सिन्धु) की बलवती धारा के समान बहते हुए चित्त की चञ्चलता विघ्न का मूल है; वीर्य के सहारे आलस्य छोड़कर उसने शान्ति प्राप्त की और वह पूर्ण (निर्मल ?) सरोवर के समान निश्चल हो गया। 38 उसने जीवन को असार अनात्म और नाशवान् (= व्ययधर्मा) देखा; किसी को छोटा-बड़ा या बराबर नहीं देखते हुए उसने मिथ्याभिमान छोड़ा;..। 39 ज्ञानरूपी अग्नि से अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर कर, उसने नित्य और अनित्य को (एक दूसरे से) भिन्न देखा और योग द्वारा अपनी विद्या को पूर्णकर, उसने अविद्या को अच्छी तरह काट डाला। 40 दृष्टि एवं भावना से युक्त होकर, वह दश (संयोजनों, बन्धनों) से मुक्त हुआ और अपना कार्य पूरा कर, वह शान्तिमय, हाथ जोड़े, बुद्ध को देखता खड़ा रहा। 41 अपने 3 शिष्यों के साथ-जो 3 विद्याओं के ज्ञाता (= त्रैविद्य) थे, जिन्होंने 3 (आस्रवों) को क्षीणकर दिया था, और जिन्होंने 3 (शील समाधि प्रज्ञा) को भलीभाँति प्राप्तकर लिया था- सुगत (तीसरे पर्व के) पूर्ण चन्द्रमा के समान शोभित हुए, जो 15वें मुहूर्त में 3 ताराओंवाले उस (ज्येष्ठा) नक्षत्र से युक्त हो, जिसका अधिपति (= अधिदेव) अनुजदेव (इन्द्र) है।⁶⁸ ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “महाशिष्यों की प्रव्रज्या” नामक 17वाँ सर्ग समाप्त ॥ अठारहवाँ सर्ग अनाथपिण्डद की दीक्षा 1 तब एक बार उत्तर की ओर से कोशल देश से एक धनी गृहपति आया। उसे गरीबों को धन देने की आदत थी। उसका प्रसिद्ध नाम सुदत्त था। 2 उसने सुना “ऋषि यहीं रहते हैं” और यह सुनकर उसने उन्हें देखना चाहा और रात में उनके समीप गया। उसने सुगत को प्रणाम किया। वह विशुद्धस्वभाव होकर आया है, यह जानकर उन्होंने उसे उपदेश दिया:- 3 “हे मनीषी, धर्म की प्यास से नींद छोड़कर रात में तुम मेरा दर्शन करने आये हो, इसलिए इस प्रकार आये हुए मनुष्य (= तथागत) के लिए नैष्ठिक-पद का प्रदीप ऊपर उठाया जाय। 4 (तुममें-) ये जो सद्गुण दिखाई पड़ते हैं इसका कारण है तुम्हारा (शुद्ध) आशय, तुम्हारा धैर्य, मेरे विषय में सुनकर (उत्पन्न) हुई तुम्हारी श्रद्धा और पूर्व-निमित्त द्वारा (शुद्ध) हुई तुम्हारी चित्त- वृत्ति। 5 जो उत्तम (वस्तु) है उसे दान करने से इस लोक में यश होता है और परलोक में फल, यह जानकर तुम्हें धर्म से प्राप्त होनेवाला कोष उचित समय पर भक्तिपूर्ण चित्त से सम्मानपूर्वक दान करना चाहिए। 6 शील ग्रहण कर अपना आचरण ठीक करो; क्योंकि शील का पालन एवं सम्मान करने से अधम अधःलोकों का भय जाता रहता और मनुष्य को ऊपर के स्वर्गों की प्राप्ति अवश्य होती है। 7 कामासक्तियों में होनेवाले अन्वेषण आदि के दुष्परिणामों को देखते हुए और त्याग-मार्ग के सुपरिणामों का अनुभव करते हुए, विवेक से उत्पन्न होनेवाली सच्ची शान्ति में लगो। 8 मौत व बुढ़ापे की पीड़ा के रहते संसार भटक रहा है, यह ठीक-ठीक देखकर जन्म-मुक्त शान्ति के लिए यत्न करो और जन्म के अधीन नही होने से वह (शान्ति) बुढ़ापे व मौत से (भी) रहित है।⁶⁹ 9 जैसे यह जानते हो कि अनित्यता के कारण लोगों को हरदम दुःख होता है, वैसे ही जानो के देवताओं को (भी) वही दुःख है। प्रवृत्ति में कुछ भी नित्यता नही है। 10 जहाँ अनित्यता है वहाँ दुःख है; ..... । तब जो (धातु अर्थात् धातुओं से बना शरीर) अनित्य दुःखमय एवं अनात्म है, उसमें 'मैं' या 'मेरा' कैसे हो सकता है? ⁷⁰ 11 इसलिए इस दुःख को दुःख, इसकी उत्पत्ति (= समुदय) को उत्पत्ति, दुःख निरोध को निरोध (= व्युपशम) और शुभ मार्ग को मार्ग समझो। 12 इस जगत् को दुःखमय एवं अनित्य जानो और मानव जाति को, कालरूपी आग से, जैसे असली आग से, बिलकुल दग्ध देखकर, तुम अस्तित्व एवं विनाश को समान रूप से अवांछनीय समझो। 13 इस जगत् को शून्य, 'मैं' या 'मेरा' से रहित, माया सदृश्य जानो और इस शरीर को संस्कारों (उत्पादकों, वस्तुओं) का परिणाम-मात्र विचारते हुए, इसे केवल तत्त्वों (= धातुओं) का बना हुआ समझो।

⁶⁸- काम-आस्रव, भव-आस्रव और अविद्या-आस्रव। ⁶⁹- जन्म-मुक्त शान्ति = वह शान्ति जिसकी प्राप्ति होनेपर फिर जन्म नही होता है। “न जायते शान्तिमवाप्य भूयः”—सौन्दरनन्द, सोलह 5। ⁷⁰- धातु के लिए देखिये—सौन्दरनन्द, सोलह 47-48। बुद्धचरित 87

14 अनित्य जीवन से अपने मन को मुक्त करो और संसार में विविध योनियों को देखते हुए, भावना-द्वारा अपने चित्त को वितर्क-रहित शान्ति-परायण और राग-मुक्त (= विराग, विरज) करो। तब ‘अनिमित्त' का अभ्यास करो।” ⁷¹ 15 तब महर्षि का धर्म सुनकर उसने धर्माचरण का प्रथम फल पाया; और इसकी प्राप्ति होने से दुःखरूपी महासागर में से केवल एक बूँद उसके लिए रह गई। 16 गृहस्थ होते हुए भी उसने ज्ञान द्वारा श्रेय और तत्त्व (वास्तविक सत्य) का अनुभव किया जो अज्ञानी के लिए (सुलभ) नहीं है, चाहे वह तपोवन में हो या स्वर्ग में, चाहे वह तृष्णा-रहित मनुष्यों के झुण्ड (= वितृष्ण वन) में रहता हो या अरूप लोक के शिखर पर। 17 विविध मिथ्या दृष्टियों के जाल से तथा संसार के दुःखों से मुक्त नहीं होने के कारण वे अतत्त्वदर्शी नष्ट होते हैं और केवल रागरहित होनेवाले ही विशेष पद पर पहुँचते हैं। 18 अपने में सम्यक् दृष्टि उत्पन्न होनेपर उसने कुदृष्टियों का वैसे ही त्याग किया जैसे शरद् ऋतु का मेघ पत्थरों की झड़ी लगावे और ईश्वर आदि मिथ्या कारणों से संसार उत्पन्न होता है या यह (संसार) कारण-रहित है, ऐसा उसने नहीं माना। ⁷² *19 क्योंकि यदि (परिणाम से) कारण भिन्न प्रकार का है, तब उत्पत्ति (= उपपत्ति) नहीं हो सकती; और कारण नहीं है, (ऐसा मानना) भारी भूल है। इन बातों को विद्या (= श्रुत) एवं ज्ञान द्वारा क्रमशः जानकर वह तत्त्व का दर्शन करने में अवश्य ही संशय-रहित था। 20 यदि ईश्वर संसार को पैदा करता तो, इसमें व्यवस्थित कार्य पद्धति नहीं होती और लोग भव- चक्र में नहीं भटकते; जिस किसी योनि में जो जन्म लेता वह वहीं रहता। 21 देहधारी प्राणियों को अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं होता और न उसके लिए इच्छित वस्तु की ही उत्पत्ति होती है। जो कुछ भला-बुरा (= शुभाशुभ ?) देह-धारियों को होता वह ईश्वर होने के कारण ईश्वर में (भी) होता। 22 लोगों को ईश्वर के प्रति कुछ सन्देह नहीं होता और वे उसके प्रति पिता की तरह स्नेह अनुभव करते। अपने ऊपर विपत्ति आनेपर वे उसे बुरी बातें नहीं कहते, और संसार भाँति-भाँति के देवताओं की पूजा नहीं करता। 23 यदि उसकी सृष्टि में कोई सङ्कल्प (अभिप्राय) है, तो वह आज यहाँ ईश्वर नहीं; क्योंकि (तब) यह (सृष्टि) सङ्कल्प का परिणाम होता (ईश्वर का नहीं)। यदि सङ्कल्प की निरन्तर कार्यशीलता मानी जाय, तो वही (सङ्कल्प) ईश्वर होने का कारण होगा। 24 या यदि यह सृष्टि किसी सङ्कल्प से प्रवृत्त नहीं होती है, तो उस (ईश्वर) के काम बच्चे के-से कारण-रहित हैं और यदि ईश्वर को अपने पर अधिकार नहीं, तो उसे संसार पैदा करने की ही क्या शक्ति? 25 यदि वह स्वेच्छानुसार लोगों से दुःख-सुख अनुभव कराता है, तब किसी वस्तु में आसक्ति या उससे विमुखता उस (ईश्वर) को होती है और इसलिए अधिकार उसमें नहीं (बल्कि वस्तु में) रहता है। 26 लोग विवश होकर उसके अधीन होते और कार्यों का उत्तरदायित्व उसी पर होता। देहधारी के द्वारा कुछ भी नहीं किया जाता और कर्म-फल होता ही नहीं। कार्य के साथ सम्पर्क (= कर्मयोग) उस (ईश्वर) पर निर्भर करता। 27 यदि अपने कार्यों के कारण वह ईश्वर है, तब (क्योंकि उसके कार्यों में लोगों का भी भाग है, इसलिए) वह ईश्वर नहीं हो सकता। या यदि वह सर्वव्यापी (= विभु) एवं कारण-रहित है, तब समस्त जगत का ईश्वरत्व स्थापित होता। 28 या यदि ईश्वर के कार्य के अतिरिक्त कोई दूसरा कार्य है, तब इसी कारण उसके अतिरिक्त कोई दूसरा शक्तिशाली ईश्वर होगा। और यह निश्चित (= व्यवस्थित) नहीं कि उसके अतिरिक्त कोई दूसरा (ईश्वर) है; इसलिए जगत का कोई ईश्वर नहीं। 29 ईश्वर का स्रष्टा मानने से उठनेवाली परस्पर-विरोधी बातों को उसने देखा और स्वभाव के सिद्धान्त में भी वे ही दोष वर्तमान हैं। 30 स्वभाव-वाद, इंद्रप्रत्ययता (कार्य-कारण)-वादी के सिद्धान्तों (= आश्रय) को कुछ हद तक अस्वीकार करता है और कार्य के सम्बन्ध में कारण की कुछ शक्ति नहीं मानता है; किन्तु देखा जाता है कि बीज आदि विविध द्रव्यों से परिणाम (फल) पैदा होते हैं, इसलिए स्वभाव कारण नहीं है। 31 एक कर्ता विविध वस्तुओं का कारण नहीं हो सकता; इसलिए एकात्मक कहा जानेवाला स्वभाव सांसारिक प्रवृत्ति का कारण नहीं। 32 स्वभाव सर्वव्यापी है, ऐसा प्रतिपादित किया जाता है, इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि यह कोई परिणाम पैदा नहीं कर सकता; और ..... इसलिए स्वभाव उत्पत्ति का कारण नहीं। 33 क्योंकि यह सर्वव्यापी है, इसलिए कारण होने के कारण इसे सब चीजों का निरन्तर सार्वभौम कारण होना चाहिए; किन्तु फल के सम्बन्ध में (कारण के) व्यापार में हम एक सीमा देखते हैं; इसलिए स्वभाव उत्पत्ति का कारण नहीं। 34 यह स्थापित होता है कि यह निर्गुण है, इसलिए इसका फल निर्गुण होना चाहिए; किन्तु संसार में सब चीजों को हम सगुण देखते हैं, इसलिए स्वभाव सांसारिक प्रवृत्ति का कारण नहीं। ⁷¹- अनिमित्त = निर्वाण - अभिधर्मकोष 8.44 ⁷²- प्रवृत्तिदुःखस्य च तस्य लोके तृष्णादयो दोषगणा निमित्तं। नैवेश्वरो न प्रकृतिर्न कालो नापि स्वभावो न विधिर्यदृच्छा ॥- सौन्दरनन्द, सोलह 17। 88 अश्वघोष

35 शाश्वत कारण होने से इसमें कुछ विशेषता (= विशेष) नही हो सकती, इसलिए इसके फल (=विकार) में भी कोई विशिष्ट गुण नहीं हो सकता; और क्योंकि फल में विशिष्ट गुण पाये जाते हैं, इसलिए स्वभाव से उत्पत्ति नही। 36 स्वभाव उत्पादात्मक है, इसलिए फल के सम्बन्ध में नाश होने का कोई कारण स्थापित नही होता है; और क्योंकि फल का विनाश हम देखते हैं, इसलिए हमें मानना होगा कि कारण कुछ और ही है। 37 (पुनर्जन्म करने की) शक्ति के साथ सम्पर्क रहने के कारण नैष्ठिक मोक्ष चाहनेवाले यतियों को कुछ प्राप्त नही होता है; क्योंकि मनुष्य के स्वभाव का गुण है प्रवृत्ति, इसलिए परलोक में जाने के अतिरिक्त ये यति मुक्त कैसे हो सकते हैं? 38 यदि स्वभाव की विशेषता है उत्पत्ति, तब इसके फलों की भी समान रूप से वही विशेषता होगी, किन्तु इस संसार में फलों के बारे में हमेशा यह बात नही होती है; इसलिए स्वभाव उत्पादक नहीं है। 39 कहते हैं कि स्वभाव का कार्य चित्त (?) के लिए व्यक्त नही है, तो भी इसके फल व्यक्त बताये जाते हैं। इसलिए स्वभाव प्रवृत्ति का कारण नही है; क्योंकि यह निश्चित है कि संसार में कोई (व्यक्त) फल उसी कारण से निकल सकता है, जो समान रूप से व्यक्त है। 40 अचेतन स्वभाव के परिणाम घोड़े, बैल, खच्चर आदि चेतन प्राणी नहीं हो सकते; क्योंकि अचेतन कारणों से कोई चेतन उत्पन्न नहीं हो सकता। 41 जैसे सुवर्ण-हार (सुवर्ण का) विशिष्ट रूप है, वैसे ही स्वभाव के फल (= विकार) विशिष्ट रूप हैं; और क्योंकि फल तो विशिष्ट रूप है जब कि कारण विशिष्ट रूप नही है, इसलिए स्वभाव को उत्पादनशक्ति नही है। 42 यदि काल (समय) को संसार का ईश्वर माना जाय, तो (मुक्ति की) खोज करनेवालों के लिए मुक्ति नहीं। क्योंकि संसार का कारण शाश्वत रूप से उत्पादक होगा, जिससे मनुष्यों का अन्त होगा ही नहीं। 43 ... ... ... *44-46 ... ... .... 73 [74] 47 यदि कार्य के विषय में मनुष्य (= पुरुष) कारण होता, तो अवश्य ही सब किसी को इच्छित वस्तु मिल जाती; तो भी इस जगत् में कुछ इच्छाएँ अपूर्ण ही रह जाती हैं और लोग विवश होकर वही पाते हैं जो वे नहीं चाहते। 48 यदि अपने वश की बात होती, तो मनुष्य स्वयं बैल, घोड़ा, खच्चर या ऊँट होकर उत्पन्न नही होता; क्योंकि, मनुष्य इच्छित काम करते हैं और दुःख से घृणा करते हैं, इसलिए कौन अपने ऊपर स्वयं दुःख लेता? 49 यदि संसार में मनुष्य कर्ता होता, तो निश्चय ही वह अपने लिए प्रिय करता, अप्रिय नहीं; तो भी इच्छाओं की पूर्ति करने में चाहा और अनचाहा (इष्ट और अनिष्ट) दोनों ही किये जाते हैं, और यदि वह ईश्वर होता, तो कौन (स्वयं) अनचाहा करता? *50 मनुष्य अधर्म से डरता है और धर्म (शुभ) प्राप्त करने के लिए यत्न करता है, तो भी विविध दोषों द्वारा वह विवश (बेचारा) पथभ्रष्ट किया जाता है; इसलिए इस विषय में मनुष्य परतन्त्र है। *51 मनुष्य स्वतन्त्र नही, किन्तु परतन्त्र है; क्योंकि हम देखते हैं कि सर्दी, गर्मी, वर्षा, वज्र व बिजली के परिणाम उसके उद्योगों को विफल करते रहते हैं। अतः मनुष्य कार्यों का ईश्वर नहीं है। 52 क्योंकि, मिट्टी व पानी के सहारे तथा उचित ऋतु के सम्पर्क (योग) से अन्न पैदा होता है, और अग्नि काठ से उत्पन्न होती है और घी पाकर प्रदीप्त होती है, इसलिए अस्तित्व को कारण-रहित कहना ऐसा कारण का अभाव नही है। 53 यदि सांसारिक प्रवृत्ति अकारण होती तो मनुष्यों द्वारा कुछ काम नहीं होता। सब किसी को सब कुछ मिल जाता और ध्रुव है कि इस संसार में सार्वभौम सिद्धि होती। 73- 44-46 तीनों श्लोक प्रक्षिप्त जान पड़ते हैं। इनमें तत्कालीन सांख्य मत का खण्डन किया गया है। 74- जॉन्स्टन ने इनका अंग्रेजी अनुवाद इस प्रकार दिया हैः- 43. Some see the determining principle as the selfness in the matters which is one and is made manifold by the attributes; though they take their stand on a single cause, yet it has separate characteristics. 44. The attribute-theorist sees in the variety of attributes the operation of matter, which is born from a certain maturation. Since the cause is held to be not different (from the effect), one must conclude that the matters are ineffective. 45. Certainly the unmanifested, from which matter arises, cannot be the subject of a valid inference; for by perception we do not see in fact the development of a result which is manifest from that which is unmanifest. 46. As for the result which first arises from the unmanifest and comes into activity from the pair of manifest, from it (sc. the unmanifest?) which is postulated arises in this world the great one which is not postulated, and there ensue the defects of the Nature-hypothesis. बुद्धचरित 89

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*54 यदि दुःख-सुख अकारण होता, तो प्रत्येक को दुःख-सुख का भाग नहीं मिलता, और कारण के बिना दुःख-सुख बोध-गम्य होता ही नहीं, इसलिए यह जो "कारण-रहित" कहा जाता है कारण नहीं है। *55 उसने जाना कि ये और ऐसे ही अदृश्य कारण सांसारिक प्रवृत्ति के कारण नहीं हैं। उसने देखा कि संसार कारण-रहित नहीं है और उसने कारण-रहित होने के ये दोष समझे। 56 विविध चराचर जीव भी विविध कारणों के आश्रय से उत्पन्न होते हैं, संसार में कुछ भी कारण- रहित नहीं है, तो भी संसार सार्वभौम कारण को नहीं जानता है। 57 यह सुन्दर दान पाकर, सुदत्त ने आर्यधर्मा महर्षि के सद्धर्म को समझा और श्रद्धा में अविचल चित्त हो उनसे ये वचन कहेः— 58 “मेरा निवास श्रावस्ती नगर में है, जो धर्म के लिए विख्यात है और जहाँ हर्यश्व-वंश का अङ्कुर शासन करता है। वहाँ मैं आपके लिए एक विहार बनाना चाहता हूँ; आप कृपा-पूर्वक उस अनवद्य एवं उत्तम निवास को स्वीकार करें। 59 हे ऋषि, आप राज-महल में रहें या निर्जन वन में—इस ओर से आप उदासीन हैं, यद्यपि मैं यह जानता हूँ, तो भी, हे अर्हत्, मेरे ऊपर करुणा करके आप इसे निवास के लिए स्वीकार करें।” 60 तब उन्होंने जाना कि वह देना चाहता है और उसका मन मुक्त है, अतः आशय जाननेवाले निर्मल-चित्त मुनि ने परम शान्तिपूर्वक अपना आशय कहाः— 61 “(यद्यपि) तुम बिजली की भाँति चञ्चल सम्पत्ति-राशि के बीच (रहते) हो (तो भी) तुम्हारा निश्चय दृढ़ है और तुम देने पर तुले हुए हो। तब इसमें आश्चर्य नहीं कि तुम सत्य को देखो, क्योंकि, धर्म में तुम्हें स्वभावतः आनन्द आता है और दान देने में प्रसन्नता होती है। 62 जलते हुए घर से जो चीजें निकाली जाती हैं वे जलती नहीं (बच जाती हैं), उसी प्रकार कालरूपी अग्नि से जलते हुए संसार में मनुष्य जो कुछ दान करता है वह उसे लाभ होता है। 63 इसलिए उदार हृदय पुरुष दान को असली (= सम्यक्) विषयोपभोग समझते हैं। किन्तु कृपण मनुष्य धन-क्षय का डर देखकर दान नहीं करते, इस डर से कि कहीं उपभोग के लिए उन्हें कुछ न बचे। 64 उचित समय पर सत्पात्र को धन देना वीरता व अभिमानपूर्वक युद्ध करने के समान है। जिस मनुष्य का निश्चय श्रेष्ठ है वह यह जानता है, किन्तु दूसरे नहीं, और केवल वही दान देता है और निश्चयपूर्वक युद्ध करता है। 65 क्योंकि जो दान देने में आनन्दित होता हुआ संसार-यात्रा करता है वह दाता है और दान-द्वारा यश एवं सुनाम प्राप्त करता है, अतः उसकी उदारता के लिए सज्जन उसका सम्मान करते हैं और उसकी सङ्गति करते हैं।


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66 इस तरह वह संसार में सुखी है और दीर्घ दुःख के अभाव से पाप में नहीं पड़ता। क्योंकि वह सत्कर्म करने का सच्चा दावा करता है, इसलिए वह सदा प्रसन्न रहता है और मरते समय भयभीत नहीं होता। 67 इस लोक में दान का फल कुछ फूल हो सकता है, किन्तु परलोक में वह (दानी) दान का पारितोषिक पाता है। संसार-चक्र में घूमनेवाले मनुष्य के लिए दान के समान दूसरा मित्र नहीं। 68 जो (दानी) मर्त्यलोक या स्वर्ग में जन्म लेते हैं, वे अपने दान के कारण बराबरीवालों से ऊँचा पद पाते हैं; जो लोग घोड़े या हाथी होकर उत्पन्न होते हैं, वे भी (घोड़े या हाथियों के) प्रधान होकर दान का फल पाते हैं। 69 दान द्वारा उसे स्वर्ग प्राप्त होता है, उपभोग उसे घेरे रहते हैं और शील उसकी रक्षा करता है। जो मनुष्य शान्त है और स्वयं समझ-बूझकर (= ज्ञानपूर्वक) चलता है, वह स्वतन्त्र (= निराश्रय) है और बहु-संख्यक मनुष्यों के मार्ग से नहीं जाता। 70 अमृत पाने के लिए भी वह उदारता का आचरण करता है और दान की बात सोचने में (= स्मृ) उसे आनन्द आता है; उस आनन्द के कारण अवश्य ही उसका चित्त एकाग्र हो जाता है। 71 मानसिक एकाग्रता की इस सफलता (= समुदय) से वह धीरे-धीरे जन्म व निरोध का ज्ञान प्राप्त करता है; क्योंकि दूसरों को दान देने से दाता के हृदय में रहनेवाले दोष क्षीण हो जाते हैं। 72 कहा जाता है कि दाता दान दी जानेवाली वस्तुओं से आसक्ति पहले ही अलग करता है; और क्योंकि वह सस्नेह चित्त से दान करता है, इसलिए वह क्रोध व अभिमान का परित्याग करता है। 73 जो दाता (दान) पानेवाले का आनन्द देखकर प्रसन्न होता है और इसलिए कृपण नहीं है और जो दान-फल का चिन्तन करता है, उसकी अश्रद्धा (= नास्तित्व) व अज्ञानरूपी अन्धकार (= तमस्) नष्ट हो जाते हैं। 74 इसलिए दान देना निर्वाण (-साधना) का एक अङ्ग है, क्योंकि इसके द्वारा वह लोभ जीता जाता है, अनार्य जिसका आश्रय लेते हैं और वह तृष्णा जीती जाती है, जिसके द्वारा दान देने की आदत नष्ट होती है; क्योंकि इस (दान देने की आदत) के होनेपर दोषों के विनाश से निर्वाण होता है। 75 जैसे कुछ लोग छाया के लिए पेड़ पसन्द करते हैं, कुछ लोग फल के लिए और कुछ लोग फूल के लिए, वैसे ही कुछ लोग शान्ति के लिए अपने को दान देने में लगाते हैं, तो दूसरे लोग सम्पत्ति के लिए।


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90 अश्वघोष

76 इसलिए खासकर गृहस्थ लोग द्रव्य-संचय नहीं करते, किन्तु अपने साधन के अनुसार दान देते हैं; और क्योंकि दान देना ही असार सम्पत्ति का सार है (सारादानं दानमाहुर्धनानां ⁷⁵) अतः सज्जनों के चलने का यही मार्ग है। 77 भोजन देनेवाला बल देता है, वस्त्र देनेवाला भी सौन्दर्य देता है, किन्तु जो धर्मात्माओं को निवास देता है वह संसार में सब कुछ देता है। *78 सवारी देनेवाला भी आराम देता है और दीप देनेवाला प्रकाश देता है। अतः जो नैष्ठिक धर्म का उपदेश देता है वह अमर पद देता है, जो छीना नहीं जा सकता, (=अहार्यममृतं पदं)। 79 कुछ लोग काम (उपभोगों) के लिए दान देते हैं, दूसरे सम्पत्ति के लिए, तीसरे यश के लिए, कुछ लोग स्वर्ग के लिए और दूसरे कृपण नहीं होने के लिए; किन्तु तुम्हारे इस दान का कोई गूढ़ उद्देश्य नहीं है। 80 इसलिए साधुवाद तुम्हें, जिसकी इच्छा ऐसी (उत्तम) है। अपनी इच्छा पूरी करके सन्तुष्ट हो जाओ। तुम यहाँ काम (=रजस्) व अज्ञानरूपी अन्धकार (=तमस्) के साथ आये थे और यहाँ से ज्ञान द्वारा विशुद्ध-चित्त होकर जाओगे।" 81 वह, जो कि (उचित) रास्ते से (चलकर) तत्त्व को ठीक-ठीक पा चुका था, परम प्रसन्न होकर विहार (बनाने) की बात से हार्दिक अनुराग करने लगा और उचित समयपर उपतिष्य के साथ चल पड़ा। 82 तब वह कौशल-राज की राजधानी में आया और विहार के स्थान की खोज में इधर-उधर घूमने लगा। तब उसने मनोहर वृक्षों से भरा भव्य एवं उपयुक्त जेत-वन देखा। 83 तब इसे खरीदने के लिए जेत के पास गया, जो इसमें इतना आसक्त था कि इसे बेच नहीं सकता था। उसने कहा- "यदि आप द्रव्य से इसे पूरा-पूरा ढक भी दें तो भी मैं आपको यह भूमि नहीं लेने दूँगा।" 84 तब सुदत्त ने उसे वहाँ कहा- "मुझे उपवन की जरूरत है" और इसके लिए आग्रह करने लगा। तब उसने इसे कोष से ढक दिया और इसे धर्म का व्यवहार समझते हुए खरीदा। 85 जब जेत ने उसे द्रव्य देते हुए देखा, तब वह बुद्ध के प्रति अत्यन्त अनुरक्त हो गया और तथागत के लिए सारा शेष उपवन दे दिया। 86 तब महर्षि उपतिष्य के साथ, जो निर्माण-कार्य का अध्यक्ष (नवर्मिक) नियुक्त हुआ, अनाथपिण्डद ने इसे जल्द तैयार करना चाहा और एक विशाल रूपोज्ज्वल विहार बनाना शुरू किया,


⁷⁵. देखिये जातकमाला, जातक 3, श्लोक 23।


87 जो उसकी सम्पत्ति शक्ति व ज्ञान का मूर्त आकार था, पृथ्वी पर आये हुए कुबेर-प्रासाद के भी समान था, उत्तर कौशल की राजधानी के समान सौभाग्य के समान था और तथागतत्व (प्राप्त होने) की भूमि के समान था। ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "अनाथपिण्डद की दीक्षा" नामक 18वाँ सर्ग समाप्त ॥ उन्नीसवाँ सर्ग पितापुत्र-समागम⁷⁶ 1 तब अपने ज्ञान से विविध दर्शनों के शिक्षकों को जीतकर मुनि क्रम से पाँच पर्वतों के नगर से (निकलकर) उस नगर की ओर चले जहाँ उनका राजा पिता रहता था। 2 तब हजार भिक्षु भी चले, जिन्हें उन्होंने उसी क्षण प्रव्रजित किया था। वह अपने पिता के राज्य में पहुँचे और उसे अनुगृहीत करने के लिये पितृ-नगर के समीप ठहर गये। 3 लक्ष्य सिद्धकर आर्य लौट आये हैं, यह आनन्द-प्रद समाचार अपने विश्वस्त गुप्तचरों से सुनकर पुरोहित व बुद्धिमान् मन्त्री ने राजा से सविनय निवेदन किया। 4 उनके आने की बात जानकर राजा आनन्दित हुआ और उन्हें देखने की इच्छा से वह सब नागरिकों के साथ चल पड़ा, शीघ्रता में वह साधारण शिष्टाचार (=धैर्य) भी भूल गया? 5 उसने कुछ दूर पर उन्हें शिष्यों से घिरा देखा, जैसे ऋषियों के बीच ब्रह्मा बैठा हो; और महर्षि के धर्म के प्रति आदर-भाव होने के कारण वह रथ से उतर गया और पैदल ही उनके समीप गया। 6 मुनि को देखकर वह उनके समक्ष घबड़ा गया और कुछ बोल न सका; क्योंकि वह उन्हें न तो 'भिक्षु' कहकर ही पुकार सकता था और न 'पुत्र' कहकर ही। *7 जब उसने उनका भिक्षु-वेष देखा और अपने शरीर पर के विविध आभूषणों का ख्याल किया, तब उसकी साँसें तेजी से चलने लगीं, और आँसू बहाते हुए उसने अस्पुट वाणी में विलाप किया:- 8 "उन्हें अपने समीप शान्तिपूर्वक निर्विकार होकर बैठे देखकर मैं पीड़ा से वैसे ही अभिभूत हो रहा हूँ, जैसे प्यास से आकुल पथिक, जो दूरवर्ती जलाशय के समीप जाकर उसे सूखा पावे। 9 जब कि मैं उनके उसी रूप को देख रहा हूँ, जैसे कोई अपने उस प्रिय जन की चित्रित आकृति को देखे, जो अब भी मन में याद है, किन्तु जो आवागमन के अन्त में है, तो मुझे कुछ आनन्द नही हो रहा है जैसे (मुझे देखकर) इन्हें कुछ आनन्द नही हो रहा है।


⁷⁶. चीनी त्रिपिटक तथा तिब्बती कञ्जुर के अन्तर्गत "रत्नकूट" (अर्थात् रत्नराशि) में 49 सूत्र हैं, जिनमें एक है 'पिता-पुत्र समागम' अर्थात् पिता शुद्धोदन के साथ शाक्य-मुनि का मिलन। इस सूत्र के कुछ अंश "शिक्षा- समुच्चय" में पाये जाते हैं।

[बुद्धचरित 91]

10 सब पर्वतों से परिवेष्टित पृथ्वी इनकी होनी चाहिये, जैसे कृतयुग में यह मान्धाता की थी; तो भी वह, जिन्हें राजा से भी याचना नहीं करनी चाहिये, अब दूसरों से भीख माँगकर जीते हैं। 11 वह यहाँ धैर्य में मेरु पर्वत से, दीप्ति में सूर्य से, कान्ति में चन्द्रमा से, गति में गजराज से और वाणी में वृषभ से बढ़कर है; तो भी पृथ्वी जीतने की जगह वह भिक्षा का अन्न खाते हैं।" 12 तब बुद्ध ने जाना कि अब भी उनका पिता उन्हें अपने मन में अपना पुत्र समझ रहा है और राजा (= लोकाधिदेव) के ऊपर करुणा करके वह उसके लिये आकाश में उड़ गये। 13 उन्होंने अपने हाथ से सूर्य का रथ स्पर्श किया और वह पवन-पथ (आकाश) में पैदल चले; उन्होंने अपने एक शरीर को अनेक में परिणत किया और फिर अनेक शरीरों को एक बनाया। 14 बिना किसी बाधा के उन्होंने पृथ्वी में ऐसे अवगाहन किया जैसे पानी में, और पानी की सतह पर ऐसे चले जैसे सूखी भूमि पर; और उन्होंने शान्त होकर पर्वत में प्रवेश किया और उसमें ऐसे निर्बाध होकर चले जैसे आकाश में चल रहे हों। 15 आधे शरीर से उन्होंने जल बरसाया और आधे से वह ऐसे प्रज्वलित हुए जैसे अग्नि से। गौरवपूर्वक चमकते हुए वह आकाश में ऐसे दिखाई पड़े जैसे पर्वत पर की उज्ज्वल ओषिधियाँ चमक रही हों। 16 इस तरह उन्होंने राजा के मन में आनन्द उत्पन्न किया, जो उनसे इतना अनुराग करता था, और आकाश में दूसरे सूर्य के समान बैठे हुए उन्होंने नरपति के लिये धर्म की व्याख्या की:- 17 "हे राजन्, मैं जानता हूँ कि अपनी दयालु प्रकृति के कारण आप मुझे देखकर दुःखी हो रहे हैं। पुत्रवान् होने का आनन्द छोड़िये और शान्त होकर आप मुझसे पुत्र की जगह धर्म ग्रहण कीजिये। 18 पूर्व में किसी पुत्र ने पिता को जो कभी नहीं दिया पूर्व में किसी पिता ने पुत्र से जो कभी नहीं पाया, जो राज्य अथवा स्वर्ग से भी अच्छा है, हे राजन्, आप उस परम उत्तम अमृत को जानें। 19 हे भूपति, कर्म का स्वभाव, कर्म की उत्पत्ति-भूमि (= योनि), कर्म का आश्रय और कर्म के विपाक से होनेवाला भाग पहचानिये और जगत् को कर्म के वशीभूत जानिये; इसलिये वह कर्म कीजिये जो हितकारी है। 20 जगत् के वास्तविक सत्य (= तत्त्व) पर विचार कीजिये। सत्कर्म मनुष्य का मित्र है और कुकर्म विपरीत (अर्थात् शत्रु)। (मरते समय) आपको सब कुछ छोड़ना पड़ेगा और निराश्रय हो अकेला ही जाना पड़ेगा, केवल कर्म आपके साथ जायेंगे। 21 स्वर्ग में या नरक में या पशुओं में या मर्त्य-भूमि में जीवलोक कर्म के आश्रय से चलता है। भव का कारण त्रिविध है, उत्पत्तिभूमि (= योनि) त्रिविध है और मनुष्यों द्वारा किये जानेवाले कर्म विविध हैं। 22 इसलिये अपने को सम्यक् रूप से अन्य पक्ष (द्विवर्ग) में लगाइये और शरीर व वाणी के व्यापार (कृत्य) शुद्ध कीजिये। मानसिक शान्ति के लिये यत्न कीजिये। यही आपका लक्ष्य है, दूसरा नही। 23 जगत् को समुद्र-तरङ्ग के समान चञ्चल जानते हुए और इसकी भावना करते हुए आपको (रूप-, अरूप-, व काम-) भव में आनन्द नही पाना चाहिये और कर्म-शक्ति क्षीण करने के लिए धार्मिक व श्रेयस्कर कर्म करना चाहिए। 24 विदित हो कि संसार सदा नक्षत्र-मण्डल के समान घूमता रहता है। अपनी पराकाष्ठा पार करके देवता भी स्वर्ग से गिरते हैं; तब मानवी सत्ता पर कौन कितना भरोसा करे? 25 निर्वाण-सुख को परम् सुख और आन्तरिक (= अध्यात्म) आनन्द का परमानन्द जानिये। वैभव-सुख साँपवाले घर के समान विपत्तिपूर्ण हैं, यह देखकर कौन आत्मवान् (संयतात्मा) व्यक्ति उसमें आनन्द पायेगा? 26 इसलिये इस जगत् को जलते हुए घर के समान विपत्ति-ग्रस्त देखिये और उस पद की खोज कीजिये जो शान्त एवं ध्रुव है, जहाँ न जन्म है न मौत, न श्रम है न दुःख। 27 दोषों की विपक्षी सेना को पराजित कीजिए, जिसके लिए सम्पत्ति राज्य अश्व घोड़े या हाथी की जरूरत नही है। एक बार उन्हें जीत लेनेपर जीतने के लिये कुछ और नही रह जाता है। 28 दुःख, दुःख-समुदय, (दुःख-) उपशम और उपशम-मार्ग को समझिये। इन चारों को पूर्णतः समझ लेने से महाभय व दुर्गत्तियों का निरोध होता है।" 29 सुगत के चमत्कार-प्रदर्शन से राजा का चित्त उपदेश (ग्रहण करने) के लिये उपयुक्त क्षेत्र पहले ही हो गया था, इसलिये अब सुन करके धर्म प्राप्त करनेपर रोमाञ्चित हो गया और हाथ जोड़कर उसने ये वचन कहे- 30 "आपके कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण और सफल हैं; क्योंकि आपने मुझे महादुःख से मुक्त किया है। मैं, जो पहले विपत्तिपूर्ण पृथ्वी की प्राप्ति में दुःख-वृद्धि के लिए आनन्द पाता था, अब पुत्रवान् होने के फल में आनन्द पा रहा हूँ। 31 राज्य-लक्ष्मी का परित्याग कर आप ठीक ही (= स्थाने) चले गये। ठीक ही आपने कठोर श्रम किया और ठीक ही आप प्रिय ने प्रिय स्वजनों को छोड़ा और हमारे ऊपर करुणा की। 32 आर्त जगत् के हित के लिए आपने यह नैष्ठिक ज्ञान पाया है, जो पूर्व में देवर्षियों या राजर्षियों को प्राप्त नही हुआ। 33 यदि आप चक्रवर्ती सम्राट् होते तो आप मुझे यह आनन्द नही देते जो इस समय मैं, इन चमत्कारों एवं आपके धर्म को देखकर दृढ़तापूर्वक अनुभव कर रहा हूँ।

92 अश्वघोष

34 यदि आप इस जन्म में भी इस जीवन से बँधे रहते, तो चक्रवर्ती होकर आप मानव जाति का पालन करते, किन्तु अब मुनि होकर भव-चक्रके महादुःख को तोड़कर आप जगत् के लिए धर्मोपदेश कर रहे हैं। 35 इन ऋद्धियों एवं गम्भीर ज्ञान का प्रदर्शन कर और भव-चक्र की विपत्तियों पर पूर्ण विजय प्राप्तकर राज्य के बिना भी आप संसार के ईश्वर हो गये हैं, किन्तु राज्य-समृद्धि के रहते हुए भी आप वैसा नहीं होते, यदि आप असहाय होकर भव-चक्र में पड़े रहते।" 36 शाक्य-राज्य ने, जो उन करुणामय के धर्मोपदेश (ग्रहण करने) के योग्य हो गया था, ऐसी बहुत-सी बातें कहीं और यद्यपि वह राजा और पिता के पद पर था, तो भी उसने अपने पुत्र को प्रणाम किया, क्योंकि वह सत्य में प्रवेश कर चुका था। 37 बहुत से लोगों को, जिन्होंने मुनि का ऋद्धि-बल पर अधिकार देखा, जिन्होंने तत्त्व में प्रवेश करानेवाले शास्त्र को समझा और जिन्होंने राजा को-उनके पिता को-उनका सम्मान करते देखा, घर छोड़ने की इच्छा हुई। 38 तब कर्म-फल में स्थित बहुत से राजकुमारों ने उस धर्म-विधि को ग्रहण किया और वैदिक- मन्त्रों एवं मोह के बड़े-बड़े साधनों की उपेक्षा करके, रोते हुये प्रिय परिवारों का परित्याग किया। 39 आनन्द, नन्द, कृमिल, अनिरुद्ध, नन्द, उपनन्द, कुण्ठधान और शिष्यों का मिथ्या शिक्षक देवदत्त भी मुनि का उपदेश पाकर घर से निकल गये। 40 तब पुरोहित-पुत्र महात्मा उदायी ने उसी मार्ग का अनुसरण किया; और उन लोगों का निश्चय देखकर अत्रि-पुत्र (आत्रेय) उपाली ने भी उसी मार्ग पर चलने का इरादा किया। 41 अपने पुत्र की शक्ति देखकर राजा ने भी परम अमरत्व की धारा में प्रवेश किया और आसक्ति से विमुख होकर उसने राज्य अपने भाई को सौंपा और (स्वयं) महल में राजर्षि की तरह आचरण करते हुए रहने लगा। 42 इन तथा अन्य बन्धुओं, मित्रों एवं अनुयायियों को विनीत (दीक्षित) कर, बुद्ध ने उचित समय पर, पूरे आत्म-संयम के साथ, नगर में प्रवेश किया, जहाँ रोते हुए पुरवासियों ने उनका सत्कार किया। 43 राजा ने पुत्र सर्वार्थसिद्ध अपना कार्य पूरा करके नगर में प्रवेश कर रहे हैं, यह समाचार सुनकर महल की स्त्रियाँ द्वारों एवं वातायनों की ओर दौड़ीं। 44 काषाय वस्त्रधारी होनेपर भी उन्हें संध्याकालीन बादल से आधा ढके सूरज के समान चमकते देखकर, स्त्रियों ने आँसू बहाये और अपने कर-कमल जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। 45 उन्हें नीची-निगाह चेहरे से चलते तथा धर्म एवं शरीर-सौन्दर्य से प्रकाशित होते देखकर स्त्रियों ने दया एवं भक्ति प्रकट की और अश्रु-म्लान-आँखों से उन्होंने इस तरह विलाप कियाः-


46 "शिर मुड़ाने से व फेंके हुए चिथड़े पहनने से यद्यपि उनका सुन्दर शरीर बदल गया है, तो भी अपने शरीर के सुनहले रङ्ग से वह व्याप्त हैं। वह जमीन की ओर देखते हुए चल रहे हैं। 47 जो श्वेत आतपत्र के नीचे आश्रय पाने योग्य थे, ...., ...., और जो विजेता होने योग्य थे, वह अब भिक्षा-पात्र लिए घूम रहे हैं। 48 जो घोड़े की पीठ पर उस छाते की छाया के नीचे, जो तमाल-पत्र-युक्त कपोलवाले सुन्दरी- मुख के समान उज्ज्वल हो, सवार होने योग्य थे, वह भिक्षा-पात्र धारण किये हुए पैदल जा रहे हैं। 49 जो विपक्षी राजकुमारों को विनीत (नम्र) करने योग्य थे और जो उज्ज्वल मुकुट पहनकर स्त्री- समूहों एवं अपने परिचारक-वृन्द द्वारा देखे जाने योग्य थे, वह आगे की ओर केवल जुए की दूरी तक जमीन देखते हुए ( = अवेक्षमाणो युगमात्रमुर्व्याः⁷⁷) चल रहे हैं। 50 यह उनका कैसा दर्शन है, ये कैसे भिक्षु-वेष हैं, कौनसा लक्ष्य वह खोज रहे हैं, सुख उनका शत्रु क्यों हो गया है कि वह व्रतों में आनन्द पायें, स्त्रियों और बच्चों में नहीं? 51 राजा की पुत्र-वधू यशोधरा निश्चय ही शोक से ग्रस्त हुई, तो भी उसने कैसा दुष्कर कर्म किया है कि अपने पति के इस आचरण का समाचार सुनकर वह जीती रही और विनाश को प्राप्त नहीं हुई। 52 रूप के अनुरूप ही चमकती हुई पुत्र की आकृति को, जो अब आभूषण-रहित (=विवर्ण) है, देखकर क्या नरपति भी अपने पुत्र से अनुराग करते हैं या उन्हें हानिकारक शत्रु समझते हैं? 53 अश्रु-जल से नहाये हुए अपने पुत्र राहुल का देखकर यदि वह उसमें आसक्त (अनुरक्त) नहीं होते हैं, तो भला कोई क्या सोचे इन दृढ़ व्रतों के बारे में, जिनके कारण मनुष्य अपने स्नेही स्वजन से विमुख होता है। 54 व्रतों के आचरण से न तो उनकी दीप्ति ही नष्ट हुई है, न उनके शरीर का रूप ही और न उनकी गति ही; और इन गुणों से चमकते हुए उन्होंने शान्ति प्राप्त की है तथा अपने को विषयों से अलग किया है।" 55 विविध मतावलम्बियों के समान भिन्न-भिन्न मत ग्रहण करती हुई स्त्रियों ने इस तरह बहुत विलाप किया। बुद्ध ने भी अनासक्त (कठोर, दृढ़) चित्त से अपने जन्म नगर में प्रवेश किया और भिक्षा प्राप्त कर वह न्यग्रोध-वन में लौट गये। 56 तृष्णा-रहित चित्त से तथागत ने अपने पितृ-नगर में भिक्षा के लिए प्रवेश किया था; और पूर्व में श्रेय नही करने से जिनके साधन अल्प थे और जो बहुत कम भीख दे सकते थे उन लोगों को मुक्त करने की, जिन श्रमणों को अपने चित्त पर संयम प्राप्त नहीं हुआ था और जिन्हें


⁷⁷- देखिये जातकमाला, जातक 4 श्लोक 4। बुद्धचरित 93

(भिक्षाटन के) ऐसे कामों से सन्तोष नही होता था उन्हें दृढ़ (समर्थ) करने की, संसार को “तुम्हारा मङ्गल हो” यह कह सकने की, और उसी प्रकार शास्त्रोपदेश करने की अपनी इच्छा उन्होंने याद रक्खी। ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "पितापुत्र-समागम" नामक 19वाँ सर्ग समाप्त ॥ बीसवाँ सर्ग जेतवन-स्वीकार 1 (कपिलवस्तु में) महा-जनसमूह पर दया दिखाने के बाद (बुद्ध) उस नगर की ओर चले, जो प्रसेनजित् के बाहु-बल से रक्षित था। 2 तब वह उस गौरव-पूर्ण जेत-वन में पहुँचे, जो अशोक के बिखरे फूलों से उज्ज्वल था, मत्त कोकिलों के कूजन से गुञ्जित था और कैलाश के बर्फ के समान उजले घरों की पंक्ति से युक्त था। 3 तब सुवर्ण एवं श्वेत माला से अलङ्कृत शुद्ध जल-कलश लेकर सुदत्त ने उचित समय पर तथागत को जेतवन भेंट किया। 4 तब शाक्य-ऋषि को देखने की इच्छा से राजा प्रसेनजित् जेतवन की ओर चला। वहाँ पहुँचकर उसने श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया और बैठकर उनसे निवेदन कियाः- 5 “हे ऋषि, इस नगर में आप ठहरने की इच्छा करते हैं, इससे निश्चय ही कोशल-निवासियों का सौभाग्य-उदय होगा। क्योंकि क्या वह देश, जो ऐसे तत्त्वदर्शी के आश्रय से वञ्चित है, चौपट या अभागा नहीं है? 6 आपके दर्शन से और हमारे ऊपर अनुग्रह करने के लिये हमारा प्रणाम आपके द्वारा स्वीकृत होने से हमें वह सन्तोष हो रहा है जो सज्जनों से मिलने पर भी लोगों को अनुभव नहीं होता है। 7 हवा जिस किसी चीज पर बहती है उसी का गुण (अर्थात् गन्ध) ग्रहण कर लेती है, और पक्षी, मेरु के सम्पर्क में आकर, अपना स्वाभाविक शरीर खो बैठते हैं और सुवर्ण में परिणत हो जाते हैं। 8 एक साधु पुरुष, जो इहलोक और परलोक के ईश्वर हैं, इसमें ठहरे हुए हैं, इसीलिये मेरा उपवन देखने में वैसा ही गौरवमय है जैसा कि त्रिशङ्कु का महल, जिसमें महर्षि गाधि-पुत्र (विश्वामित्र) का स्वागत हुआ था। 9 संसार के विविध लाभ अनित्य व विनाशवान् हैं, किन्तु वे असंख्य चीजें, जो आपके समीप होने से प्राप्त होती हैं, विनाशवान् नहीं हैं। 10 हे साधु, आपके शास्त्र का दर्शन हो, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई लाभ नही जाना जाता है। हे शास्ता, मैंने दुःख भोगा है और मैं राग एवं राजधर्म से पीड़ित हुआ हूँ।” 11 मुनि ने इन्द्र-सदृश राजा के ये और ऐसे ही दूसरे वचन कृपापूर्वक सुने और उसे लोभ एवं काम में आसक्त जानकर उसके मन को प्रेरित करने के लिये यों उत्तर दियाः- 12 “हे राजन्, ये बहुत अचरज की बात नहीं कि आप साधु ... के प्रति इस तरह कहें या ऐसा व्यवहार करें। 13 जो लोग नीचे से ... अपने हितैषी धर्मात्मा (= आर्य) पुरुषों के पास आना चाहते हैं ...। 14 हे भूपति, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ, इसलिए कि आपकी मानसिक अवस्था ऐसी है। अतः आप मेरा उपदेश ग्रहण करें और वैसा करें जिससे यह सफल हो। 15 हे नरपति, जब काल (आप) राजा को बाँधकर खींचेगा, तब न तो स्वजन आपके पीछे जायँगे, न मित्र, न राज्य। सब लोग दुःखी व विवश होकर अलग हो जायँगे। केवल आपके कर्म ही छाया की भाँति आपके साथ जायँगे। 16 इसलिए यदि आप स्वर्ग व सुयश चाहते हैं, तो धर्मानुसार राज्य की रक्षा कीजिए। क्योंकि मोहवश धर्म को आकुल करनेवाले राजा के लिये स्वर्ग में थोड़ा-सा भी राज्य (स्थान) नहीं है। 17 इस संसार में धर्मानुसार राज्य की रक्षा करनेवाले कुशाश्व ने स्वर्ग प्राप्त किया, जब कि इस संसार में मोहवश धर्म से विमुख रहनेवाले नृपति निकुम्भ ने काशी में पृथ्वी में प्रवेश किया। 18 हे सौम्य, मैंने भले-बुरे कर्मों का यह दृष्टान्त आपको दिया। अतः अपनी प्रजाओं का सदा अच्छी तरह पालन कीजिए और खूब समझ-बूझकर उचित के लिए दृढ़तापूर्वक यत्न कीजिए। 19 मनुष्यों को कभी तङ्ग न कीजिए, अपने इन्द्रियों को कभी स्वतन्त्र न छोड़िये, पापियों का सङ्ग या क्रोध न कीजिए, अपने मन को बुरे रास्तों पर न भटकने दीजिए। 20 अभिमानवश धर्मात्माओं को कष्ट न दीजिए, मित्र-तुल्य तपस्वियों को उत्पीड़ित न कीजिए, पाप के प्रभाव में रहते हुए पवित्र व्रत मत ग्रहण कीजिए और बुरे विचारों (= कुदृष्टि) में मत पड़िए। 21 अशुभ का आश्रय न लीजिए, कुकर्मों में आसक्त न होइये, मद से अभिभूत (युक्त) न होइये, अप्रसन्नता या असहिष्णुता से न सुनिये, अपना यश क्षीण न कीजिये या अपना मन असत्य में न लगाइये, शास्त्र-सम्मत अंश से अधिक भूमि-कर न लीजिए। 22 मन को स्थिर रखिए और धर्म का पालप कीजिए, सज्जनों का सङ्ग कीजिए और ...; ऐसा कीजिए जिससे (इस जन्म में) उत्कर्ष प्राप्त कर फिर (जन्मान्तर में) आप उत्तम पद प्राप्त कर सकें। 94 अश्वघोष

23 वीर्य की रक्षा करते हुए, धैर्य रखते हुए, विद्या उपार्जन करते हुए, दोषों को जीतते हुए, मृत्यु को सदा स्मरण करते हुए, आप आर्य-पुरुष का कार्य करें और माहात्म्य-लाभ करके मार्ग प्राप्त करें। (= माहात्म्य-लाभाद् अधिगच्छ मार्गम्) 24 हे मित्र, आपको फिर वह कार्य करना चाहिए, जिससे इस फल की रक्षा (उत्पत्ति ?) होती है; क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य, जिसने (पूर्व में) यह कर्म किया है, उस बीज को बोता है जिसका फल वह देख चुका है। 25 इस जगत् में जो मनुष्य ऊँचे पद पर रहकर पाप में आसक्त होता है वह प्रकाश में है, किन्तु उनका चित्त अन्धकार में स्थित है; और जो मनुष्य धर्मरत (= धर्म-प्रधान) रहता हुआ भी मनुष्यों का प्रधान नहीं है वह अन्धकार में है किन्तु उसका चित्त प्रकाश में है। 26 जो कोई ऊँचे पद (या कुल) का होकर धर्माचरण करता है, उसका चित्त अत्यन्त विशद हो जाता है, और जो कोई नीच पद (या कुल) का होकर पापकर्म करता है, उसका चित्त अत्यन्त तमोमय हो जाता है। 27 इसलिए, हे राजन्, इन चार समूहों का अस्तित्व जानते हुए आपकी जैसी इच्छा हो वैसा यत्न करें, किन्तु यदि आप आनन्द-भोग करना चाहते हैं, तो आप अपने को निचली तीन श्रेणियों में पायेंगे, पहली (उत्तम) में नहीं। 28 किसी भी मनुष्य के लिए दूसरे के खाते कुशल कर्म करना असम्भव है, या यदि वह करे भी तो इसका फल दूसरे को नहीं मिलेगा। अपने ही कर्म का फल नष्ट नहीं होता है, किन्तु अपने ही द्वारा अनुभव किया जाता है, और जो किया नहीं जाता है उसकी फल-प्राप्ति वास्तविक नहीं मानी जाती है। 29 क्योंकि जो किया नहीं जाता है (= अकृत है) उसकी शक्ति नहीं है, इसलिए अकृत से परलोक में श्रेय नहीं मिलता है, और क्योंकि इससे जगत् में जन्म-विनाश (= विभव) नहीं होता है, अतः आप अपने को सत्कर्म-मार्ग में लगाये। 30 उस दुष्ट मनुष्य को, जो अत्यन्त पाप करता है, जीवलोक में आत्मसुख नहीं मिलता है। अपने ही खाते पाप करके परलोक में वह निश्चय ही स्वयं फल भोगेगा। 31 चार महापर्वत, हे महाराज, एक साथ आकर संसार को पीसते हैं, धर्मानुसार यथाशक्ति किये गये विविध कर्मों के आश्रय के बिना किया ही क्या जा सकता है? 32 उसी प्रकार जब जन्म जरा रोग और मृत्यु भी, ये चार, एक साथ आते हैं, तब सारा संसार विवश होकर चक्कर काटता है, जैसे चार पहाड़ों से घिरा हो। 33 जब यह दुःख हम बेबसों पर आता है और इसके विरुद्ध हमें आश्रय प्रतिरोध-शक्ति या त्राण नहीं मिलता है, तब अव्यर्थ व अक्षय धर्म ग्रहण करने के अतिरिक्त हमारे लिए (दूसरी) कोई ओषधि नहीं।


34 क्योंकि संसार अनित्य है और बिजली की चमक के समान क्षणिक इन्द्रिय-सुखों में आसक्त है और क्योंकि यह (संसार) मौत की अँगुली के अग्रभाग पर स्थित है, इसलिए मनुष्य को धर्माचरण नहीं करने का फल नहीं भोगना चाहिए। 35 वे अनेक नृप, जो महेन्द्र के समान थे, देव युद्धों में लड़े, वे शक्तिशाली और अभिमानी (?) थे, तो भी कालक्रम से वे दुःख के भागी हुए। 36 सब जीवों को धारण करनेवाली धरती भी नष्ट होती है, और मेरुपर्वत प्रलय-अग्नि से जल जाता है; महासागर सूख जाता है, फिर फेन के समान क्षणिक मर्त्य-लोक की विनाशशीलता का क्या कहना? 37 हवा जोरों से बहकर भी बन्द हो जाती है, सूरज जगत् को तपाकर भी अस्त हो जाती है, उसी प्रकार आग जलकर भी बूझ जाती है; जो कुछ है वह सब, मैं समझता हूँ, ऐसा ही है और परिवर्तनशील है। 38 यद्यपि इस शरीर का देर तक सावधानीपूर्वक पालन किया जाता है, और विविध उपभोगों से लालन किया जाता है, तो भी यह यहाँ ... कुछ ही दिनों तक रहनेवाला है। 39 विदित हो कि संसार की इस अवस्था में लोग, अभिमान एवं मद का पोषण करते हुए, समय पर ऊँची शय्याओं पर सोने के लिए लेटते हैं; आप उनपर न लेटें, किन्तु परम श्रेय के लिये जगे रहें। 40 भव-चक्र की निरन्तर चलती रहती डोलापर संसार चढ़ता है और असावधान रहता है, यद्यपि इस संसार का पतन ... निश्चित है। 41 उसका सेवन न करें जिसका परिणाम प्रिय नहीं होता है, वह न करें, जिसका फल बुरा होता है; वह मित्र मित्र नहीं है जो शुभ से युक्त नहीं है और वह ज्ञान ज्ञान नहीं है जो दुःख दूर नहीं कर सकता। 42 यदि आपको ज्ञान है, तो आपके लिए पुनर्जन्म नहीं, या यदि जन्म हो भी तो यह अरूप अवस्था में होगा; यदि आप शरीर धारण करते रहे, तो आप विषयों से मुक्त नहीं हो सकते, और काम-लोक (= काम-भव) अनित्य एवं अनर्थकारी है। 43 क्योंकि कर्म-शक्ति के अधीन होकर अरूप देव भी अस्थायी एवं काल के वशीभूत हैं, अतः अप्रवृत्ति में अपना चित्त लगाइये; यदि प्रवृत्ति नहीं, तो दुःख नहीं। 44 क्योंकि शरीर, जो कि चलना, खड़ा होना आदि विविध कार्यों पर आश्रित है, दुःख का मूल है, इसलिए ज्ञान के होने से-ज्ञान जो कि अरूप अवस्था के होने में सहायक है-शरीररूप ऋण से मुक्ति होती है।


बुद्धचरित 95

४. दशम-चतुर्दश सर्ग: मार-विजय, सम्यक्-संबोधि (बुद्धत्व प्राप्ति) एवं धर्मचक्र-प्रवर्तन

45 क्योंकि काम (-वासना) के कारण संसार जन्म लेता है और उसके द्वारा अत्यन्त महादुःख भोगता है, इसलिए जब मनुष्य अपने को काम-भव से अलग (=विविच्य) करेगा, तब वह दुःख में आसक्त न होगा और न पीड़ित होगा। 46 इसलिए चाहे अरूप-देवों के बीच या रूप-देवों के बीच, जो कि काम के अधीन हैं ही पुनर्जन्म की शक्ति (विद्यमान) होने के कारण प्रवृत्ति बन्द नहीं होती है, फिर छः काम- वासनाओं के क्षेत्र में रहनेवालों की प्रवृत्ति कहाँ से बन्द होगी? 47 तीन भवों (काम-भव, रूप-भव, अरूप-भव) के इस तरह अनित्य दुःखमय अनात्म और सदा प्रज्वलित होनेपर लोगों के घुसने के लिए आश्रय-स्थल नहीं, जैसे कि उन चिड़ियों के लिए (आश्रय-स्थल नहीं) जिनका निवास-वृक्ष जल रहा हो। 48 यह परम ज्ञेय है, (इसके अतिरिक्त) और कुछ ज्ञेय नहीं है। यह उत्तम ज्ञान (=मति) है, (इसके अतिरिक्त) और कुछ ज्ञान नहीं है। यह उत्तम कार्य है, (ऐसा)...और कुछ नहीं माना जाता है। 49 निश्चय ही ऐसा नही सोचना चाहिये कि यह धर्म गृहस्थों के लिए नहीं है। वन में रहता हो या घर में, वास्तव में वही (जीता) है जो शान्ति प्राप्त करता है। 50 आतप से दग्ध मनुष्य पानी में प्रवेश करता है, बादल से सब किसी को सुख (आराम) मिलता है। जिसे प्रदीप है वह अन्धकार में देखता है। योग प्रमाण है, न कि उम्र (=वयस) या वंश।⁷⁸ 51 कुछ लोग, यद्यपि वे बुढ़ापे में (=वयसि) वन में रहते हैं, योगाभ्यास नही कर सकते और व्रत-भङ्ग करके दुर्गति को प्राप्त होते हैं; दूसरे लोग घर में रहकर भी अपने कर्मों को विशुद्ध करते हैं और सावधान (=अप्रमत्त) रहते हुए नैष्ठिक पद प्राप्त करते हैं। 52 अज्ञान (=तम) रूप सागर में, कुदृष्टियाँ ही जिसकी तरङ्गैं हैं और जन्म ही जिसका जल है, सङ्घर्ष करनेवाले लोगों के बीच केवल वही उस (सागर) से त्राण पाता है, जिसे स्मृति (=जागरूकता) एवं वीर्यरूपी पतवारों से युक्त प्रज्ञारूपी नाव है।" 53 इस तरह अत्यन्त विषयासक्त राजा ने सर्वज्ञ से यह धर्म-तत्त्व प्राप्त किया और अपने में यह विश्वास उत्पन्न होनेपर कि अकुशल राज्य अनित्य एवं चञ्चल है, वह मद-मुक्त हाथी की तरह गम्भीर होकर श्रावस्ती लौट गया। 54 भूपति ने उन्हें प्रणाम किया, यह जानकर दूसरे पण्डितों ने (=तीर्थिक) उन दसबल (शास्ता) को दिव्य शक्ति प्रदर्शन करने के लिये चुनौती दी; और जब पृथ्वी-पति ने उनसे वैसा करने के लिये अनुरोध किया, तब संयतात्मा (=जितात्मा) मुनि दिव्य शक्ति दिखाने को राजी हुए। 55 तब मुनि अपने प्रभा-वर्षी मण्डल के साथ ऐसे चमकने लगे, जैसे सूर्य ताराओं को निष्प्रभ कर रहा हो, और उन्होंने भाँति-भाँति की दिव्य शक्तियों द्वारा विविध मतों के शिक्षकों को पराजित करके सबको आनन्दित किया। 56 तब श्रावस्ती के लोगों द्वारा इस (ऋषि-प्रदर्शन) के लिये सम्मानित एवं पूजित होकर वह अनुत्तर माहात्म्यपूर्वक (वहाँ से) चल पड़े और अपनी माता के हित के लिये धर्मोपदेश करने के लिए स्वर्ग-लोक (=त्रिविष्टप) के ऊपर चढ़ गये। 57 तब मुनि ने अपने ज्ञान द्वारा स्वर्ग में रहनेवाली अपनी माता को दीक्षित किया; और वर्षा- ऋतु वहीं बिताकर तथा दिव्य देवों के शासक से उचित रीति से भिक्षा ग्रहणकर वह स्वर्ग-लोक से संकाश्य में उतरे। 58 देवगण, जो शान्ति प्राप्त कर चुके थे, अपने विमानों में खड़े रहे और अपनी आँखों से उनका अनुसरण किया; जैसे पृथ्वी पर गिर रहे हों, और उनका सम्मान करते समय पृथ्वी के अनेक राजाओं ने अपने मुख ऊपर उठाकर अपने मस्तकों से उनका स्वागत किया। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का "जेतवन-स्वीकार" नामक 20वाँ सर्ग समाप्त॥ इक्कीसवाँ सर्ग प्रव्रज्या-स्रोत 1 स्वर्ग में अपनी माता को तथा निर्वाण के इच्छुक दूसरे देवों (=दिवौकः) को दीक्षित करने के बाद मुनि पृथ्वी पर दीक्षा पाने योग्य लोगों को दीक्षित करते हुए घूमने लगे। 2 तब पाँच पर्वतों के बीच में स्थित नगर में विनायक ने ज्योतिष्क, जीवक, शूर, श्रोण और अङ्गद को विनीत (प्रव्रजित) किया। 3 उन्होंने राजपुत्र अभय, श्रीगुप्त, उपालि, न्यग्रोध, और दूसरों को, जो (नित्यता और विनाश के) दो अन्तों को मानते थे, उनके पूर्व-मतों से विमुख किया। 4 उन्होंने पुष्कर नामक गान्धार-राज को दीक्षित किया, जिसने धर्म-श्रवण करते ही राज्य-लक्ष्मी का परित्याग किया। 5 तब उन विपुल-पराक्रम ने विपुल पर्वत पर हैमवत और साताग्र यक्षों को दीक्षित किया। 6 जीवक के आम्र-वन में रात के समय पाँच सौ रानियों के साथ राजा (अजातशत्रु) को गुणदर्शी बुद्ध ने धर्म में स्थापित किया। 7 तब पाषाण-पर्वत पर शान्ति-परायण पारायण (नामक) ब्राह्मण आधी गाथा के सूक्ष्म अर्थ द्वारा दीक्षित हुआ।⁷⁹ ⁷⁸ - अन्तिम पाद का मूल यह हो सकता है-"योगः प्रमाणं न वयो न वंशः।" ⁷⁹ - इसका उत्तरार्ध चीनी अनुवाद से लिया गया है। 96 अश्वघोष

8 तब वेणु-कण्टक में उन्होंने नन्द की साध्वी मामा को प्रव्रजित किया, जो उत्तम जागरूकता (= सत्स्मृति)-द्वारा अपनी आँखों के आगे (गुप्त) कोषों को देखती थी। 9 तब स्थाणुमती गाँव में ब्राह्मण-श्रेष्ठ कूटदत्त, जो सब प्रकार के यज्ञ करना चाहता था, निर्वाण- धर्म में प्रवेश कराया गया। 10 तब विदेह पर्वत पर पञ्चशिख (गंधर्व-पुत्र), असुरों और देवों को (धर्म में) दृढ़ विश्वास हुआ। 11 तब अङ्ग नगर में पूर्णभद्र यक्ष तथा श्रेष्ठ, दण्ड, श्वेत, पिङ्गल व चण्ड (नामक) बड़े-बड़े साँप (= महानाग) दीक्षित हुए। 12 आपण नगर में केन्य व शेल (नामक) ब्राह्मण, जो (स्वर्ग में जन्म लेने के लिए) तप कर रहे थे, निर्वाण-पथ पर लाये गये। 13 सुह्मों के बीच भगवान् ने दिव्य शक्ति (ऋद्धि) के प्रभाव से अङ्गुलिमाल ब्राह्मण को विनीत किया, जो सौदास के समान क्रूर था ।⁸⁰ 14 भद्र में एक भद्र पुरुष के पुत्र से, जिसका नाम मेण्डक था, जिसकी आजीविका अच्छी थी, जो उदार दाता था और जो सम्पत्ति में पूर्णभद्र के समान था, सम्यक् दृष्टि ग्रहण कराई गई। 15 तब विदेह नगर में वक्ता-श्रेष्ठ ने उपदेश द्वारा ब्रह्मायु नामक व्यक्ति को जीता, जिसकी आयु ब्रह्मा की-सी लम्बी थी। 16 उन्होंने वैशाली के जलाशय में माँस-भक्षक (मर्कट नामक) राक्षस को तथा सिंह उत्तर व सत्यक-प्रमुख लिच्छवियों को भी दीक्षित किया। 17 तब अलकावती नगर में वह आर्यकर्मा, भद्र नामक एक सदाशय (उत्तम आशयवाले) यक्ष को धर्म-पथ पर लाये। 18 तब एक अत्यन्त अकुशल अटवी (जङ्गल) में बुद्ध ने आटविक यक्ष को और कुमार हस्तक को उपदेश दिया। *19 तब....नगर में निर्वाण-दर्शी ने नागायन यक्ष को निर्वाण कर उपदेश दिया और यक्ष-राज ने उन्हें प्रणाम किया। 20 गया में ऋषि ने टङ्कित ऋषियों को और खर तथा सूचीलोम नामक दो यक्षों को उपदेश दिया।⁸¹ 21 तब वाराणसी नगर में दसबलधारी ने कात्यायन नामक ब्राह्मण को प्रव्रजित किया, जो असित ऋषि का भागिनेय था। 22 तब वह अपनी दिव्य शक्ति से शूर्पारक नगर में गये और स्तवकर्णी श्रेष्ठी को उपदेश दिया, 23 जो उपदेश सुनते ही इतना श्रद्धालु हो गया कि वह मुनि-वर के लिए एक चन्दन-विहार बनाने लगा, जो सदा सुगन्धित एवं गगन-चुम्बी था। 24 तब उन्होंने तपस्वी कपिल को महीवती में विनीत किया, जहाँ एक शिला पर मुनि के पाँवों के चक्र-चिह्न देख पड़ते थे। 25 तब वरण में उन्होंने वारण (नामक) यक्ष को उपदेश दिया; उसी प्रकार मथुरा में भयानक गर्दभ दीक्षित हुआ। 26 तब स्थूलकोष्ठक नगर में विनायक ने राष्ट्रपाल कहे जानेवाले (व्यक्ति) को दीक्षित किया, जिसका धन राजा के धन के बराबर था। 27 तब वैरञ्जा में विरिञ्च-सदृश एक महासत्त्व दीक्षित हुआ और उसी तरह कल्माशदम्य में विद्वान् भारद्वाज। 28 फिर श्रावस्ती में मुनि ने सभिय, निर्ग्रन्थ नप्त्रीपुत्रों और अन्य तीर्थिकों (पंडितों) का अन्धकार दूर किया। 29 यहाँ भी ब्राह्मण याज्ञिक पुष्कलसादी एवं जातिश्रोणी तथा कोशल-राज बुद्ध-धर्म में लाये गये। 30 तब शेतविक की वन-भूमि में उत्तम-शिक्षक ने एक मैने को और एक सुगे को—द्विजों के समान विद्वान् दो द्विजों को—सिखाया। 31 तब....नगर में जङ्गली नागर तथा क्रूरकर्मा कालक व कुम्भीर शम-धर्म में लाये गये।⁸² 32 तब भार्गसों के बीच उन्होंने भेषक यक्ष को दीक्षित किया और नकुल के वृद्ध माता-पिता पर वैसा ही अनुग्रह किया। 33 कौशाम्बी में धनवान् घोषिल, कुब्जोत्तरा तथा दूसरी स्त्रियाँ और बहुत-से लोग दीक्षित हुए। 34 तब गान्धार देश में अपलाल (नामक) सर्प, जिसके इन्द्रिय विनय द्वारा शान्त हो गये, बुराई के परे चला गया। *35 तब मृत्यु (काल) के समान जलाने की इच्छा करनेवाले.... को दीक्षित कर बुद्ध ने क्रम से धर्मोपदेश किया। 36 इन तथा अन्य स्थलचारी अथवा नभचारी जीवों को दीक्षित करने से बुद्ध का यश बढ़ता ही गया, जैसे (पूर्णिमा आदि) पर्व में समुद्र। 37 उनका माहात्म्य देखकर देवदत्त को द्वेष हो गया और ध्यान-संयम खोकर उसने बहुत-से अनुचित काम किये। 38 कलुषित चित्त से उसने मुनि के सङ्घ में भेद खड़ा किया और भेद के कारण उनसे अनुराग करने के बदले उसने उन्हें क्लेश पहुँचाने का प्रयत्न किया।

⁸⁰ - सुह्म = हजारीबाग, संथाल-परगना जिलों का कितना ही अंश—बुद्धचर्या। उस देश के रहनेवाले लोग सुह्म कहलाते हैं। ⁸¹ - "टङ्कित ऋषि" से शायद "टङ्कित गुफाओं में रहनेवाले ऋषि" का अभिप्राय है। ⁸² - रिक्त स्थान में साकेत (अयोध्या) लिखा जा सकता है।

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