भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 122 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

6 हे सौम्य, इस समय मैं अमर-धर्म की दुन्दुभि बजाने के लिए वाराणसी जा रहा हूँ, यश (से होनेवाले) सुख के लिए नही, अभिमान से नही, किन्तु दुःख से पीड़ित साथी जनों के हित के लिए। 7 पूर्व में जीव-लोक को दुःखी देखकर मैंने ये प्रतिज्ञा की—स्वयं पार होनेपर मैं जगत् को पार लगाऊँगा, स्वयं मुक्त होनेपर मैं यहाँ रहनेवालों को मुक्त करूँगा। 8 इस जगत् में कुछ लोग धन (= योग्यता) पाकर केवल अपने लिए ही रखते हैं और इससे लज्जा को प्राप्त होते हैं; किन्तु (ज्ञान-) विशेष प्राप्त करने पर खुली दृष्टिवाले महापुरुष के लिए केवल वही धन है जिसे वह बाँटता है। 9 सूखी भूमि पर खड़ा रहनेवाला यदि धारा में बहते इन्सान को बाहर खींचने का प्रयास नहीं करे, तो वह वीर नहीं; और योग्यता पानेवाला यदि उसे पीड़ितों के बीच नहीं बाँटे, तो वह दाता नही। 10 स्वस्थ (= स्वयं में स्थित) व्यक्ति को सुलभ उपचारों से व्याधि ग्रस्त का उपचार करना चाहिए और मार्गपति को कुमार्ग से जानेवाले को उचित मार्ग बताना चाहिए। 11 जैसे कि जब प्रदीप जलता है तब इसके कारण अन्धकार नही हो सकता, वैसे ही जब बुद्ध अपना ज्ञान प्रदीप्त करता है तब मनुष्य काम के वशीभूत नहीं होते। 12 जैसे काष्ठ में अग्नि का रहना, आकाश में हवा का रहना, और पृथ्वी में जल का रहना नियत है, वैसे ही गया में मुनियों का बुद्धत्व-प्राप्ति और काशी में उनका उपदेश करना नियत है।” 13 तब धीरे-धीरे प्रशंसा करके उस भिक्षु ने बुद्ध को छोड़कर इच्छानुसार अपना रास्ता पकड़ा; किन्तु उत्कण्ठित होकर विस्मित आँखों से वह उन्हें बार-बार देखता रहा। 14 तब क्रम से मुनि ने कोश-गृह के भीतरी भाग के सदृश काशी नगरी को देखा, जिसे भागीरथी और वाराणसी एक साथ मिलकर इस तरह आलिङ्गन कर रहीं थीं, जैसे वे सखी हों। 15 शक्ति और गौरव से उज्ज्वल मुनि, सूर्य के समान चमकते हुए, मृगदाव में आए, जहाँ कोयलों की ध्वनि से गूँजते वृक्षों के बीच महर्षिगण रहते थे।⁶³ 16 तब वह कौण्डिन्य गोत्रवाला, महानाम, वाष्प, अश्वजित्, और भद्रजित्—ये पाँचों भिक्षु दूर से ही उन्हें देखकर आपस में ये वचन बोले— 17 “भिक्षु गौतम समीप आ रहा है, जो आराम-प्रियता के कारण तप से विमुख हो गया है। अवश्य ही हमें न तो उससे मिलना है और न उसका अभिवादन करना है; क्योंकि जो व्रत से विमुख हो गया है वह सम्मान के योग्य नहीं। 18 किन्तु यदि वह हम से बातचीत करना चाहे तो, हम अवश्य उससे बातचीत करेंगे; क्योंकि आर्य को अवश्य वैसा करना चाहिए, चाहे आगत अतिथि (= तथागत) कोई भी हो।” 19 बुद्ध बैठे हुए भिक्षुओं की ओर आगे बढ़े, जिन्होंने इस तरह अपने विचार स्थिर किए थे; और जैसे-जैसे वह उनके समीप आते गए वैसे-वैसे वे अपना निश्चय तोड़ते गए। 20 उनमें से एक ने उनका चीवर ग्रहण किया और उसी प्रकार दूसरे ने हाथ जोड़कर उनका भिक्षा-पात्र ग्रहण किया। तीसरे ने उन्हें उचित आसन दिया और उसी तरह दूसरे दो ने पाँव धोने के लिए उन्हें जल दिया। 21 इस प्रकार उनकी अनेक परिचर्याएँ करते हुए उन सब ने उनसे गुरुवत् व्यवहार किया; किन्तु जब उन्होंने उनकी गोत्र-नाम से पुकारना नहीं छोड़ा, तब भगवान् ने करुणापूर्वक उनसे कहा:— 22 “हे भिक्षुओं, पूज्य अर्हत् से पहले की तरह असम्मानपूर्वक मत बोलो; क्योंकि यद्यपि मैं सचमुच ही प्रशंसा व निन्दा से उदासीन हूँ, फिर भी मैं तुम्हें अ-पुण्यों (= अशुभों) से अलग कर सकता हूँ। 23 जगत् के हित के लिए बुद्ध बोधि प्राप्त करता है, अतः वह सदा सब जीवों के हित के लिए कार्य करता है; और जो अपने गुरु को नाम लेकर पुकारता है उसके लिए धर्म उच्छिन्न हो जाता है, जैसे माता-पिता का असम्मान करने से।” 24 इस तरह वक्ता-श्रेष्ठ महर्षि ने अपने हृदय की करुणा से उन्हें उपदेश दिया; किन्तु अ-सार और मोह द्वारा बहकाये जाने के कारण उन्होंने सिकोड़ते मुखों से उत्तर दिया:— 25 “हे गौतम, तुमने परम उत्कृष्ट तपों द्वारा तत्त्व को नहीं समझा और यद्यपि कष्ट से ही लक्ष्य प्राप्त होता है, फिर भी तुम आराम-प्रिय हो। कैसे कह सकते हो— मैंने (-तत्त्व को) देखा है?” 26 जब भिक्षुओं ने तथागत की सच्चाई के बारे में इस प्रकार अविश्वास प्रकट किया, तब मार्ग-दर्शी ने बोधि-मार्ग को उस (-तत्त्वमार्ग) से भिन्न देखते हुए उनसे मार्ग की व्याख्या इस प्रकार की:— 27 “अपने को क्लेश देनेवाले अज्ञानी और वैसे ही इन्द्रियों-विषयों में आसक्त रहनेवाले, इन दोनों को तुम्हें दोष में स्थित समझना चाहिए; क्योंकि उन्होंने जो मार्ग ग्रहण किए हैं वे अमरत्व की ओर नहीं ले जाते। 28 अज्ञानी का चित्त जब तप नामक शारीरिक क्लेशों से आक्रान्त और संक्षुब्ध (= उतावला) होता है तब वह मूढ (= संज्ञाहीन) हो जाता है और साधारण लोक-व्यवहार को भी नहीं जान सकता है, फिर तत्त्व के अतीन्द्रिय मार्ग को कहाँ से जानेगा?


⁶³- मृगदाव = मृगों का वन, सारनाथ का प्राचीन नाम।

80 अश्वघोष