बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें◼ यहाँ कुछ लोग ऐसे हैं जो इह-लोक व पर-लोक में अपने लाभ की बात सोचकर केवल अपने ही हित के लिए काम करते हैं। किन्तु इस जगत् या स्वर्ग में ऐसा व्यक्ति दुर्लभ है, जो जगत के हित के लिए काम करेगा" ॥102 ॥ ◼ इस प्रकार महर्षि से कहकर, वे जिस रास्ते से आये थे उसी से दिव्य लोक को लौट गये। जब ऋषि ने भी इस भाषण पर विचार किया, तब जगत् की मुक्ति के लिए उनका निश्चय दृढ़ हुआ ॥103 ॥ ◼ भिक्षाटन के समय चार दिशाओं के देवों ने ऋषि को भिक्षा-पात्र दिये; उन्हें ग्रहण कर गौतम ने धर्म के लिए उन्हें एक में परिणत कर दिया ॥104 ॥ ◼ तब उस समय जाते हुए काफ़िले के दो सेठों ने अनुकूल देवता से प्रेरित होकर उदात्त चित्त से ऋषि की आनन्दपूर्वक पूजा की और पहले-पहल उन्हें भिक्षा दी ॥105 ॥ ◼ मुनि ने सोचा कि अराड और उद्रक रामपुत्र दोनों के चित्त धर्मग्रहण करने के योग्य थे; किन्तु जब उसने देखा कि दोनों स्वर्गीय हो गये, तब उन्हें पाँच भिक्षुओं का ख्याल हुआ ॥106 ॥ ◼ तब, जैसे उगता हुआ सूर्य अन्धकार को दूर करता है वैसे ही अज्ञानरूप अन्धकार को दूर करने के लिए शान्ति का उपदेश करने की इच्छा से, गौतम उस धन्य-नगर की ओर गये, जो भीमरथ का प्रिय था और जिसके विविध वन वाराणसी से अलङ्कृत हैं ॥107 ॥⁵⁹ ◼ तब मुनि ने, जिनकी आँखें वृषभ की-सी थीं और जिनकी चाल मत्त हाथी की-सी थी, लोगों को विनीत करने के लिए काशी देश जाना चाहा और हाथी के समान समूचा शरीर घुमाकर उसने बोधि-वृक्ष पर अपनी निश्चल आँखें स्थिर कीं ॥108 ॥ ॥अश्वघोष-कृत-बुद्धचरित महाकाव्य का "बुद्धत्व-प्राप्ति" नामक चतुर्दश सर्ग समाप्त ॥
⁵⁹- भीमरथः—काशी का एक राजा था।
पन्द्रहवाँ सर्ग⁶⁰ धर्मचक्र-प्रवर्तन 1 अपना काम पूरा करने पर उन्हें शान्ति की शक्ति विदित हुई; और यद्यपि वे अकेले ही चल दिए, फिर भी ऐसा लगा जैसे बहुत-से लोग उनके साथ जा रहे हों। मार्ग में उन्हें देखकर एक पवित्र भिक्षु ने हाथ जोड़कर इस प्रकार कहाः- 2 “जो लोग आसक्ति के अधीन हैं और जिनके इन्द्रियरूपी घोड़े दुर्दान्त हैं, उनके बीच आप आसक्ति-रहित और जितेन्द्रिय हैं; इसीलिए चन्द्रमा जैसी आपकी आकृति अभिनव प्रज्ञा के मधुर रस द्वारा आपका हार्दिक सन्तोष प्रकट कर रही है।⁶¹ 3 आपका धैर्य-युक्त चेहरा यहाँ चमक रहा है, आप अपने इन्द्रियों के स्वामी बन गए हैं और आपकी आँखें बलवान वृषभ की तरह हैं; अवश्य ही आप कृतार्थ हैं। हे आर्य, आपके गुरु कौन हैं? किनसे आपने यह सिद्धि (= मुक्ति) पाई है?” 4 इसपर उन्होंने उत्तर दिया- “मेरा गुरु कोई नहीं। मेरे लिए सम्माननीय कोई नहीं, निन्दनीय तो और भी कोई नहीं। मैंने निर्वाण प्राप्त किया है और मैं वैसा नहीं जैसे कि दूसरे हैं। धर्म (= परधर्म) के विषय में मुझे स्वयंभू जानो।⁶² 5 मैंने उसे पूरा-पूरा समझ लिया है जो समझने योग्य है और जिसे दूसरों ने नही समझा है, इसलिए मैं बुद्ध हूँ। और क्योंकि मैंने क्लेशों को शत्रु की तरह जीत लिया है, मुझे शान्तिमय जानो।
⁶⁰- इस सर्ग से अन्तिम सर्ग तक व्यवहृत निम्न-लिखित चिह्नों की व्याख्या यों है :- * यह चिह्न जिन श्लोकों के शुरू में है वे चीनी अनुवाद में नहीं हैं। ( ) कोष्ठक के भीतर के शब्द अर्थ स्पष्ट करने के लिए दिये गये हैं। ये शब्द कहीं-कहीं पूर्ववर्ती शब्दों के अर्थ हैं और कहीं-कहीं बाहर से दिये गये पूरक शब्द हैं। (=) कोष्ठक के भीतर बराबर के चिह्न से युक्त शब्द मूल संस्कृत शब्द समझकर दिये गये हैं। (_) कोष्ठक के भीतर रेखांकित पद अप्राप्त पद के स्थान पर अन्दाज से दिये गये हैं या चीनी अनुवाद से। ... ऐसे चिह्नवाले रिक्त स्थानों के मूल पदों का अनुवाद अप्राप्त, दुर्बोध या संदेहजनक है। ⁶¹- जितेन्द्रिय की जगह अविकल अनुवाद होगा- “इन्द्रियरूपी घोड़ों का दमन कर लिया है”। ⁶²- निर्वाण = “इसी शरीर में राग-द्वेष आदि चित्त-मलों का नष्ट होना क्लेश-निर्वाण है और क्लेश-रहित अर्हत् की मृत्यु होनेपर भविष्य में उसके जन्म की सम्भावना के नष्ट होने का नाम स्कन्ध-निर्वाण है; इस प्रकार निर्वाण के दो भेद किये जाते हैं।” -बुद्धवचन। 'चित्त-मल से रहित ऐसे द्युतिमान् पुरुष ही लोक में निर्वाण-प्राप्त हैं।'-धम्मपद छः 14 । बुद्धचरित 79