बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें23 वीर्य की रक्षा करते हुए, धैर्य रखते हुए, विद्या उपार्जन करते हुए, दोषों को जीतते हुए, मृत्यु को सदा स्मरण करते हुए, आप आर्य-पुरुष का कार्य करें और माहात्म्य-लाभ करके मार्ग प्राप्त करें। (= माहात्म्य-लाभाद् अधिगच्छ मार्गम्) 24 हे मित्र, आपको फिर वह कार्य करना चाहिए, जिससे इस फल की रक्षा (उत्पत्ति ?) होती है; क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य, जिसने (पूर्व में) यह कर्म किया है, उस बीज को बोता है जिसका फल वह देख चुका है। 25 इस जगत् में जो मनुष्य ऊँचे पद पर रहकर पाप में आसक्त होता है वह प्रकाश में है, किन्तु उनका चित्त अन्धकार में स्थित है; और जो मनुष्य धर्मरत (= धर्म-प्रधान) रहता हुआ भी मनुष्यों का प्रधान नहीं है वह अन्धकार में है किन्तु उसका चित्त प्रकाश में है। 26 जो कोई ऊँचे पद (या कुल) का होकर धर्माचरण करता है, उसका चित्त अत्यन्त विशद हो जाता है, और जो कोई नीच पद (या कुल) का होकर पापकर्म करता है, उसका चित्त अत्यन्त तमोमय हो जाता है। 27 इसलिए, हे राजन्, इन चार समूहों का अस्तित्व जानते हुए आपकी जैसी इच्छा हो वैसा यत्न करें, किन्तु यदि आप आनन्द-भोग करना चाहते हैं, तो आप अपने को निचली तीन श्रेणियों में पायेंगे, पहली (उत्तम) में नहीं। 28 किसी भी मनुष्य के लिए दूसरे के खाते कुशल कर्म करना असम्भव है, या यदि वह करे भी तो इसका फल दूसरे को नहीं मिलेगा। अपने ही कर्म का फल नष्ट नहीं होता है, किन्तु अपने ही द्वारा अनुभव किया जाता है, और जो किया नहीं जाता है उसकी फल-प्राप्ति वास्तविक नहीं मानी जाती है। 29 क्योंकि जो किया नहीं जाता है (= अकृत है) उसकी शक्ति नहीं है, इसलिए अकृत से परलोक में श्रेय नहीं मिलता है, और क्योंकि इससे जगत् में जन्म-विनाश (= विभव) नहीं होता है, अतः आप अपने को सत्कर्म-मार्ग में लगाये। 30 उस दुष्ट मनुष्य को, जो अत्यन्त पाप करता है, जीवलोक में आत्मसुख नहीं मिलता है। अपने ही खाते पाप करके परलोक में वह निश्चय ही स्वयं फल भोगेगा। 31 चार महापर्वत, हे महाराज, एक साथ आकर संसार को पीसते हैं, धर्मानुसार यथाशक्ति किये गये विविध कर्मों के आश्रय के बिना किया ही क्या जा सकता है? 32 उसी प्रकार जब जन्म जरा रोग और मृत्यु भी, ये चार, एक साथ आते हैं, तब सारा संसार विवश होकर चक्कर काटता है, जैसे चार पहाड़ों से घिरा हो। 33 जब यह दुःख हम बेबसों पर आता है और इसके विरुद्ध हमें आश्रय प्रतिरोध-शक्ति या त्राण नहीं मिलता है, तब अव्यर्थ व अक्षय धर्म ग्रहण करने के अतिरिक्त हमारे लिए (दूसरी) कोई ओषधि नहीं।
34 क्योंकि संसार अनित्य है और बिजली की चमक के समान क्षणिक इन्द्रिय-सुखों में आसक्त है और क्योंकि यह (संसार) मौत की अँगुली के अग्रभाग पर स्थित है, इसलिए मनुष्य को धर्माचरण नहीं करने का फल नहीं भोगना चाहिए। 35 वे अनेक नृप, जो महेन्द्र के समान थे, देव युद्धों में लड़े, वे शक्तिशाली और अभिमानी (?) थे, तो भी कालक्रम से वे दुःख के भागी हुए। 36 सब जीवों को धारण करनेवाली धरती भी नष्ट होती है, और मेरुपर्वत प्रलय-अग्नि से जल जाता है; महासागर सूख जाता है, फिर फेन के समान क्षणिक मर्त्य-लोक की विनाशशीलता का क्या कहना? 37 हवा जोरों से बहकर भी बन्द हो जाती है, सूरज जगत् को तपाकर भी अस्त हो जाती है, उसी प्रकार आग जलकर भी बूझ जाती है; जो कुछ है वह सब, मैं समझता हूँ, ऐसा ही है और परिवर्तनशील है। 38 यद्यपि इस शरीर का देर तक सावधानीपूर्वक पालन किया जाता है, और विविध उपभोगों से लालन किया जाता है, तो भी यह यहाँ ... कुछ ही दिनों तक रहनेवाला है। 39 विदित हो कि संसार की इस अवस्था में लोग, अभिमान एवं मद का पोषण करते हुए, समय पर ऊँची शय्याओं पर सोने के लिए लेटते हैं; आप उनपर न लेटें, किन्तु परम श्रेय के लिये जगे रहें। 40 भव-चक्र की निरन्तर चलती रहती डोलापर संसार चढ़ता है और असावधान रहता है, यद्यपि इस संसार का पतन ... निश्चित है। 41 उसका सेवन न करें जिसका परिणाम प्रिय नहीं होता है, वह न करें, जिसका फल बुरा होता है; वह मित्र मित्र नहीं है जो शुभ से युक्त नहीं है और वह ज्ञान ज्ञान नहीं है जो दुःख दूर नहीं कर सकता। 42 यदि आपको ज्ञान है, तो आपके लिए पुनर्जन्म नहीं, या यदि जन्म हो भी तो यह अरूप अवस्था में होगा; यदि आप शरीर धारण करते रहे, तो आप विषयों से मुक्त नहीं हो सकते, और काम-लोक (= काम-भव) अनित्य एवं अनर्थकारी है। 43 क्योंकि कर्म-शक्ति के अधीन होकर अरूप देव भी अस्थायी एवं काल के वशीभूत हैं, अतः अप्रवृत्ति में अपना चित्त लगाइये; यदि प्रवृत्ति नहीं, तो दुःख नहीं। 44 क्योंकि शरीर, जो कि चलना, खड़ा होना आदि विविध कार्यों पर आश्रित है, दुःख का मूल है, इसलिए ज्ञान के होने से-ज्ञान जो कि अरूप अवस्था के होने में सहायक है-शरीररूप ऋण से मुक्ति होती है।
बुद्धचरित 95