बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 94, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें(भिक्षाटन के) ऐसे कामों से सन्तोष नही होता था उन्हें दृढ़ (समर्थ) करने की, संसार को “तुम्हारा मङ्गल हो” यह कह सकने की, और उसी प्रकार शास्त्रोपदेश करने की अपनी इच्छा उन्होंने याद रक्खी। ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "पितापुत्र-समागम" नामक 19वाँ सर्ग समाप्त ॥ बीसवाँ सर्ग जेतवन-स्वीकार 1 (कपिलवस्तु में) महा-जनसमूह पर दया दिखाने के बाद (बुद्ध) उस नगर की ओर चले, जो प्रसेनजित् के बाहु-बल से रक्षित था। 2 तब वह उस गौरव-पूर्ण जेत-वन में पहुँचे, जो अशोक के बिखरे फूलों से उज्ज्वल था, मत्त कोकिलों के कूजन से गुञ्जित था और कैलाश के बर्फ के समान उजले घरों की पंक्ति से युक्त था। 3 तब सुवर्ण एवं श्वेत माला से अलङ्कृत शुद्ध जल-कलश लेकर सुदत्त ने उचित समय पर तथागत को जेतवन भेंट किया। 4 तब शाक्य-ऋषि को देखने की इच्छा से राजा प्रसेनजित् जेतवन की ओर चला। वहाँ पहुँचकर उसने श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया और बैठकर उनसे निवेदन कियाः- 5 “हे ऋषि, इस नगर में आप ठहरने की इच्छा करते हैं, इससे निश्चय ही कोशल-निवासियों का सौभाग्य-उदय होगा। क्योंकि क्या वह देश, जो ऐसे तत्त्वदर्शी के आश्रय से वञ्चित है, चौपट या अभागा नहीं है? 6 आपके दर्शन से और हमारे ऊपर अनुग्रह करने के लिये हमारा प्रणाम आपके द्वारा स्वीकृत होने से हमें वह सन्तोष हो रहा है जो सज्जनों से मिलने पर भी लोगों को अनुभव नहीं होता है। 7 हवा जिस किसी चीज पर बहती है उसी का गुण (अर्थात् गन्ध) ग्रहण कर लेती है, और पक्षी, मेरु के सम्पर्क में आकर, अपना स्वाभाविक शरीर खो बैठते हैं और सुवर्ण में परिणत हो जाते हैं। 8 एक साधु पुरुष, जो इहलोक और परलोक के ईश्वर हैं, इसमें ठहरे हुए हैं, इसीलिये मेरा उपवन देखने में वैसा ही गौरवमय है जैसा कि त्रिशङ्कु का महल, जिसमें महर्षि गाधि-पुत्र (विश्वामित्र) का स्वागत हुआ था। 9 संसार के विविध लाभ अनित्य व विनाशवान् हैं, किन्तु वे असंख्य चीजें, जो आपके समीप होने से प्राप्त होती हैं, विनाशवान् नहीं हैं। 10 हे साधु, आपके शास्त्र का दर्शन हो, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई लाभ नही जाना जाता है। हे शास्ता, मैंने दुःख भोगा है और मैं राग एवं राजधर्म से पीड़ित हुआ हूँ।” 11 मुनि ने इन्द्र-सदृश राजा के ये और ऐसे ही दूसरे वचन कृपापूर्वक सुने और उसे लोभ एवं काम में आसक्त जानकर उसके मन को प्रेरित करने के लिये यों उत्तर दियाः- 12 “हे राजन्, ये बहुत अचरज की बात नहीं कि आप साधु ... के प्रति इस तरह कहें या ऐसा व्यवहार करें। 13 जो लोग नीचे से ... अपने हितैषी धर्मात्मा (= आर्य) पुरुषों के पास आना चाहते हैं ...। 14 हे भूपति, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ, इसलिए कि आपकी मानसिक अवस्था ऐसी है। अतः आप मेरा उपदेश ग्रहण करें और वैसा करें जिससे यह सफल हो। 15 हे नरपति, जब काल (आप) राजा को बाँधकर खींचेगा, तब न तो स्वजन आपके पीछे जायँगे, न मित्र, न राज्य। सब लोग दुःखी व विवश होकर अलग हो जायँगे। केवल आपके कर्म ही छाया की भाँति आपके साथ जायँगे। 16 इसलिए यदि आप स्वर्ग व सुयश चाहते हैं, तो धर्मानुसार राज्य की रक्षा कीजिए। क्योंकि मोहवश धर्म को आकुल करनेवाले राजा के लिये स्वर्ग में थोड़ा-सा भी राज्य (स्थान) नहीं है। 17 इस संसार में धर्मानुसार राज्य की रक्षा करनेवाले कुशाश्व ने स्वर्ग प्राप्त किया, जब कि इस संसार में मोहवश धर्म से विमुख रहनेवाले नृपति निकुम्भ ने काशी में पृथ्वी में प्रवेश किया। 18 हे सौम्य, मैंने भले-बुरे कर्मों का यह दृष्टान्त आपको दिया। अतः अपनी प्रजाओं का सदा अच्छी तरह पालन कीजिए और खूब समझ-बूझकर उचित के लिए दृढ़तापूर्वक यत्न कीजिए। 19 मनुष्यों को कभी तङ्ग न कीजिए, अपने इन्द्रियों को कभी स्वतन्त्र न छोड़िये, पापियों का सङ्ग या क्रोध न कीजिए, अपने मन को बुरे रास्तों पर न भटकने दीजिए। 20 अभिमानवश धर्मात्माओं को कष्ट न दीजिए, मित्र-तुल्य तपस्वियों को उत्पीड़ित न कीजिए, पाप के प्रभाव में रहते हुए पवित्र व्रत मत ग्रहण कीजिए और बुरे विचारों (= कुदृष्टि) में मत पड़िए। 21 अशुभ का आश्रय न लीजिए, कुकर्मों में आसक्त न होइये, मद से अभिभूत (युक्त) न होइये, अप्रसन्नता या असहिष्णुता से न सुनिये, अपना यश क्षीण न कीजिये या अपना मन असत्य में न लगाइये, शास्त्र-सम्मत अंश से अधिक भूमि-कर न लीजिए। 22 मन को स्थिर रखिए और धर्म का पालप कीजिए, सज्जनों का सङ्ग कीजिए और ...; ऐसा कीजिए जिससे (इस जन्म में) उत्कर्ष प्राप्त कर फिर (जन्मान्तर में) आप उत्तम पद प्राप्त कर सकें। 94 अश्वघोष