बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
(भिक्षाटन के) ऐसे कामों से सन्तोष नही होता था उन्हें दृढ़ (समर्थ) करने की, संसार को “तुम्हारा मङ्गल हो” यह कह सकने की, और उसी प्रकार शास्त्रोपदेश करने की अपनी इच्छा उन्होंने याद रक्खी। ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "पितापुत्र-समागम" नामक 19वाँ सर्ग समाप्त ॥ बीसवाँ सर्ग जेतवन-स्वीकार 1 (कपिलवस्तु में) महा-जनसमूह पर दया दिखाने के बाद (बुद्ध) उस नगर की ओर चले, जो प्रसेनजित् के बाहु-बल से रक्षित था। 2 तब वह उस गौरव-पूर्ण जेत-वन में पहुँचे, जो अशोक के बिखरे फूलों से उज्ज्वल था, मत्त कोकिलों के कूजन से गुञ्जित था और कैलाश के बर्फ के समान उजले घरों की पंक्ति से युक्त था। 3 तब सुवर्ण एवं श्वेत माला से अलङ्कृत शुद्ध जल-कलश लेकर सुदत्त ने उचित समय पर तथागत को जेतवन भेंट किया। 4 तब शाक्य-ऋषि को देखने की इच्छा से राजा प्रसेनजित् जेतवन की ओर चला। वहाँ पहुँचकर उसने श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया और बैठकर उनसे निवेदन कियाः- 5 “हे ऋषि, इस नगर में आप ठहरने की इच्छा करते हैं, इससे निश्चय ही कोशल-निवासियों का सौभाग्य-उदय होगा। क्योंकि क्या वह देश, जो ऐसे तत्त्वदर्शी के आश्रय से वञ्चित है, चौपट या अभागा नहीं है? 6 आपके दर्शन से और हमारे ऊपर अनुग्रह करने के लिये हमारा प्रणाम आपके द्वारा स्वीकृत होने से हमें वह सन्तोष हो रहा है जो सज्जनों से मिलने पर भी लोगों को अनुभव नहीं होता है। 7 हवा जिस किसी चीज पर बहती है उसी का गुण (अर्थात् गन्ध) ग्रहण कर लेती है, और पक्षी, मेरु के सम्पर्क में आकर, अपना स्वाभाविक शरीर खो बैठते हैं और सुवर्ण में परिणत हो जाते हैं। 8 एक साधु पुरुष, जो इहलोक और परलोक के ईश्वर हैं, इसमें ठहरे हुए हैं, इसीलिये मेरा उपवन देखने में वैसा ही गौरवमय है जैसा कि त्रिशङ्कु का महल, जिसमें महर्षि गाधि-पुत्र (विश्वामित्र) का स्वागत हुआ था। 9 संसार के विविध लाभ अनित्य व विनाशवान् हैं, किन्तु वे असंख्य चीजें, जो आपके समीप होने से प्राप्त होती हैं, विनाशवान् नहीं हैं। 10 हे साधु, आपके शास्त्र का दर्शन हो, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई लाभ नही जाना जाता है। हे शास्ता, मैंने दुःख भोगा है और मैं राग एवं राजधर्म से पीड़ित हुआ हूँ।” 11 मुनि ने इन्द्र-सदृश राजा के ये और ऐसे ही दूसरे वचन कृपापूर्वक सुने और उसे लोभ एवं काम में आसक्त जानकर उसके मन को प्रेरित करने के लिये यों उत्तर दियाः- 12 “हे राजन्, ये बहुत अचरज की बात नहीं कि आप साधु ... के प्रति इस तरह कहें या ऐसा व्यवहार करें। 13 जो लोग नीचे से ... अपने हितैषी धर्मात्मा (= आर्य) पुरुषों के पास आना चाहते हैं ...। 14 हे भूपति, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ, इसलिए कि आपकी मानसिक अवस्था ऐसी है। अतः आप मेरा उपदेश ग्रहण करें और वैसा करें जिससे यह सफल हो। 15 हे नरपति, जब काल (आप) राजा को बाँधकर खींचेगा, तब न तो स्वजन आपके पीछे जायँगे, न मित्र, न राज्य। सब लोग दुःखी व विवश होकर अलग हो जायँगे। केवल आपके कर्म ही छाया की भाँति आपके साथ जायँगे। 16 इसलिए यदि आप स्वर्ग व सुयश चाहते हैं, तो धर्मानुसार राज्य की रक्षा कीजिए। क्योंकि मोहवश धर्म को आकुल करनेवाले राजा के लिये स्वर्ग में थोड़ा-सा भी राज्य (स्थान) नहीं है। 17 इस संसार में धर्मानुसार राज्य की रक्षा करनेवाले कुशाश्व ने स्वर्ग प्राप्त किया, जब कि इस संसार में मोहवश धर्म से विमुख रहनेवाले नृपति निकुम्भ ने काशी में पृथ्वी में प्रवेश किया। 18 हे सौम्य, मैंने भले-बुरे कर्मों का यह दृष्टान्त आपको दिया। अतः अपनी प्रजाओं का सदा अच्छी तरह पालन कीजिए और खूब समझ-बूझकर उचित के लिए दृढ़तापूर्वक यत्न कीजिए। 19 मनुष्यों को कभी तङ्ग न कीजिए, अपने इन्द्रियों को कभी स्वतन्त्र न छोड़िये, पापियों का सङ्ग या क्रोध न कीजिए, अपने मन को बुरे रास्तों पर न भटकने दीजिए। 20 अभिमानवश धर्मात्माओं को कष्ट न दीजिए, मित्र-तुल्य तपस्वियों को उत्पीड़ित न कीजिए, पाप के प्रभाव में रहते हुए पवित्र व्रत मत ग्रहण कीजिए और बुरे विचारों (= कुदृष्टि) में मत पड़िए। 21 अशुभ का आश्रय न लीजिए, कुकर्मों में आसक्त न होइये, मद से अभिभूत (युक्त) न होइये, अप्रसन्नता या असहिष्णुता से न सुनिये, अपना यश क्षीण न कीजिये या अपना मन असत्य में न लगाइये, शास्त्र-सम्मत अंश से अधिक भूमि-कर न लीजिए। 22 मन को स्थिर रखिए और धर्म का पालप कीजिए, सज्जनों का सङ्ग कीजिए और ...; ऐसा कीजिए जिससे (इस जन्म में) उत्कर्ष प्राप्त कर फिर (जन्मान्तर में) आप उत्तम पद प्राप्त कर सकें। 94 अश्वघोष
23 वीर्य की रक्षा करते हुए, धैर्य रखते हुए, विद्या उपार्जन करते हुए, दोषों को जीतते हुए, मृत्यु को सदा स्मरण करते हुए, आप आर्य-पुरुष का कार्य करें और माहात्म्य-लाभ करके मार्ग प्राप्त करें। (= माहात्म्य-लाभाद् अधिगच्छ मार्गम्) 24 हे मित्र, आपको फिर वह कार्य करना चाहिए, जिससे इस फल की रक्षा (उत्पत्ति ?) होती है; क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य, जिसने (पूर्व में) यह कर्म किया है, उस बीज को बोता है जिसका फल वह देख चुका है। 25 इस जगत् में जो मनुष्य ऊँचे पद पर रहकर पाप में आसक्त होता है वह प्रकाश में है, किन्तु उनका चित्त अन्धकार में स्थित है; और जो मनुष्य धर्मरत (= धर्म-प्रधान) रहता हुआ भी मनुष्यों का प्रधान नहीं है वह अन्धकार में है किन्तु उसका चित्त प्रकाश में है। 26 जो कोई ऊँचे पद (या कुल) का होकर धर्माचरण करता है, उसका चित्त अत्यन्त विशद हो जाता है, और जो कोई नीच पद (या कुल) का होकर पापकर्म करता है, उसका चित्त अत्यन्त तमोमय हो जाता है। 27 इसलिए, हे राजन्, इन चार समूहों का अस्तित्व जानते हुए आपकी जैसी इच्छा हो वैसा यत्न करें, किन्तु यदि आप आनन्द-भोग करना चाहते हैं, तो आप अपने को निचली तीन श्रेणियों में पायेंगे, पहली (उत्तम) में नहीं। 28 किसी भी मनुष्य के लिए दूसरे के खाते कुशल कर्म करना असम्भव है, या यदि वह करे भी तो इसका फल दूसरे को नहीं मिलेगा। अपने ही कर्म का फल नष्ट नहीं होता है, किन्तु अपने ही द्वारा अनुभव किया जाता है, और जो किया नहीं जाता है उसकी फल-प्राप्ति वास्तविक नहीं मानी जाती है। 29 क्योंकि जो किया नहीं जाता है (= अकृत है) उसकी शक्ति नहीं है, इसलिए अकृत से परलोक में श्रेय नहीं मिलता है, और क्योंकि इससे जगत् में जन्म-विनाश (= विभव) नहीं होता है, अतः आप अपने को सत्कर्म-मार्ग में लगाये। 30 उस दुष्ट मनुष्य को, जो अत्यन्त पाप करता है, जीवलोक में आत्मसुख नहीं मिलता है। अपने ही खाते पाप करके परलोक में वह निश्चय ही स्वयं फल भोगेगा। 31 चार महापर्वत, हे महाराज, एक साथ आकर संसार को पीसते हैं, धर्मानुसार यथाशक्ति किये गये विविध कर्मों के आश्रय के बिना किया ही क्या जा सकता है? 32 उसी प्रकार जब जन्म जरा रोग और मृत्यु भी, ये चार, एक साथ आते हैं, तब सारा संसार विवश होकर चक्कर काटता है, जैसे चार पहाड़ों से घिरा हो। 33 जब यह दुःख हम बेबसों पर आता है और इसके विरुद्ध हमें आश्रय प्रतिरोध-शक्ति या त्राण नहीं मिलता है, तब अव्यर्थ व अक्षय धर्म ग्रहण करने के अतिरिक्त हमारे लिए (दूसरी) कोई ओषधि नहीं।
34 क्योंकि संसार अनित्य है और बिजली की चमक के समान क्षणिक इन्द्रिय-सुखों में आसक्त है और क्योंकि यह (संसार) मौत की अँगुली के अग्रभाग पर स्थित है, इसलिए मनुष्य को धर्माचरण नहीं करने का फल नहीं भोगना चाहिए। 35 वे अनेक नृप, जो महेन्द्र के समान थे, देव युद्धों में लड़े, वे शक्तिशाली और अभिमानी (?) थे, तो भी कालक्रम से वे दुःख के भागी हुए। 36 सब जीवों को धारण करनेवाली धरती भी नष्ट होती है, और मेरुपर्वत प्रलय-अग्नि से जल जाता है; महासागर सूख जाता है, फिर फेन के समान क्षणिक मर्त्य-लोक की विनाशशीलता का क्या कहना? 37 हवा जोरों से बहकर भी बन्द हो जाती है, सूरज जगत् को तपाकर भी अस्त हो जाती है, उसी प्रकार आग जलकर भी बूझ जाती है; जो कुछ है वह सब, मैं समझता हूँ, ऐसा ही है और परिवर्तनशील है। 38 यद्यपि इस शरीर का देर तक सावधानीपूर्वक पालन किया जाता है, और विविध उपभोगों से लालन किया जाता है, तो भी यह यहाँ ... कुछ ही दिनों तक रहनेवाला है। 39 विदित हो कि संसार की इस अवस्था में लोग, अभिमान एवं मद का पोषण करते हुए, समय पर ऊँची शय्याओं पर सोने के लिए लेटते हैं; आप उनपर न लेटें, किन्तु परम श्रेय के लिये जगे रहें। 40 भव-चक्र की निरन्तर चलती रहती डोलापर संसार चढ़ता है और असावधान रहता है, यद्यपि इस संसार का पतन ... निश्चित है। 41 उसका सेवन न करें जिसका परिणाम प्रिय नहीं होता है, वह न करें, जिसका फल बुरा होता है; वह मित्र मित्र नहीं है जो शुभ से युक्त नहीं है और वह ज्ञान ज्ञान नहीं है जो दुःख दूर नहीं कर सकता। 42 यदि आपको ज्ञान है, तो आपके लिए पुनर्जन्म नहीं, या यदि जन्म हो भी तो यह अरूप अवस्था में होगा; यदि आप शरीर धारण करते रहे, तो आप विषयों से मुक्त नहीं हो सकते, और काम-लोक (= काम-भव) अनित्य एवं अनर्थकारी है। 43 क्योंकि कर्म-शक्ति के अधीन होकर अरूप देव भी अस्थायी एवं काल के वशीभूत हैं, अतः अप्रवृत्ति में अपना चित्त लगाइये; यदि प्रवृत्ति नहीं, तो दुःख नहीं। 44 क्योंकि शरीर, जो कि चलना, खड़ा होना आदि विविध कार्यों पर आश्रित है, दुःख का मूल है, इसलिए ज्ञान के होने से-ज्ञान जो कि अरूप अवस्था के होने में सहायक है-शरीररूप ऋण से मुक्ति होती है।
बुद्धचरित 95
४. दशम-चतुर्दश सर्ग: मार-विजय, सम्यक्-संबोधि (बुद्धत्व प्राप्ति) एवं धर्मचक्र-प्रवर्तन
45 क्योंकि काम (-वासना) के कारण संसार जन्म लेता है और उसके द्वारा अत्यन्त महादुःख भोगता है, इसलिए जब मनुष्य अपने को काम-भव से अलग (=विविच्य) करेगा, तब वह दुःख में आसक्त न होगा और न पीड़ित होगा। 46 इसलिए चाहे अरूप-देवों के बीच या रूप-देवों के बीच, जो कि काम के अधीन हैं ही पुनर्जन्म की शक्ति (विद्यमान) होने के कारण प्रवृत्ति बन्द नहीं होती है, फिर छः काम- वासनाओं के क्षेत्र में रहनेवालों की प्रवृत्ति कहाँ से बन्द होगी? 47 तीन भवों (काम-भव, रूप-भव, अरूप-भव) के इस तरह अनित्य दुःखमय अनात्म और सदा प्रज्वलित होनेपर लोगों के घुसने के लिए आश्रय-स्थल नहीं, जैसे कि उन चिड़ियों के लिए (आश्रय-स्थल नहीं) जिनका निवास-वृक्ष जल रहा हो। 48 यह परम ज्ञेय है, (इसके अतिरिक्त) और कुछ ज्ञेय नहीं है। यह उत्तम ज्ञान (=मति) है, (इसके अतिरिक्त) और कुछ ज्ञान नहीं है। यह उत्तम कार्य है, (ऐसा)...और कुछ नहीं माना जाता है। 49 निश्चय ही ऐसा नही सोचना चाहिये कि यह धर्म गृहस्थों के लिए नहीं है। वन में रहता हो या घर में, वास्तव में वही (जीता) है जो शान्ति प्राप्त करता है। 50 आतप से दग्ध मनुष्य पानी में प्रवेश करता है, बादल से सब किसी को सुख (आराम) मिलता है। जिसे प्रदीप है वह अन्धकार में देखता है। योग प्रमाण है, न कि उम्र (=वयस) या वंश।⁷⁸ 51 कुछ लोग, यद्यपि वे बुढ़ापे में (=वयसि) वन में रहते हैं, योगाभ्यास नही कर सकते और व्रत-भङ्ग करके दुर्गति को प्राप्त होते हैं; दूसरे लोग घर में रहकर भी अपने कर्मों को विशुद्ध करते हैं और सावधान (=अप्रमत्त) रहते हुए नैष्ठिक पद प्राप्त करते हैं। 52 अज्ञान (=तम) रूप सागर में, कुदृष्टियाँ ही जिसकी तरङ्गैं हैं और जन्म ही जिसका जल है, सङ्घर्ष करनेवाले लोगों के बीच केवल वही उस (सागर) से त्राण पाता है, जिसे स्मृति (=जागरूकता) एवं वीर्यरूपी पतवारों से युक्त प्रज्ञारूपी नाव है।" 53 इस तरह अत्यन्त विषयासक्त राजा ने सर्वज्ञ से यह धर्म-तत्त्व प्राप्त किया और अपने में यह विश्वास उत्पन्न होनेपर कि अकुशल राज्य अनित्य एवं चञ्चल है, वह मद-मुक्त हाथी की तरह गम्भीर होकर श्रावस्ती लौट गया। 54 भूपति ने उन्हें प्रणाम किया, यह जानकर दूसरे पण्डितों ने (=तीर्थिक) उन दसबल (शास्ता) को दिव्य शक्ति प्रदर्शन करने के लिये चुनौती दी; और जब पृथ्वी-पति ने उनसे वैसा करने के लिये अनुरोध किया, तब संयतात्मा (=जितात्मा) मुनि दिव्य शक्ति दिखाने को राजी हुए। 55 तब मुनि अपने प्रभा-वर्षी मण्डल के साथ ऐसे चमकने लगे, जैसे सूर्य ताराओं को निष्प्रभ कर रहा हो, और उन्होंने भाँति-भाँति की दिव्य शक्तियों द्वारा विविध मतों के शिक्षकों को पराजित करके सबको आनन्दित किया। 56 तब श्रावस्ती के लोगों द्वारा इस (ऋषि-प्रदर्शन) के लिये सम्मानित एवं पूजित होकर वह अनुत्तर माहात्म्यपूर्वक (वहाँ से) चल पड़े और अपनी माता के हित के लिये धर्मोपदेश करने के लिए स्वर्ग-लोक (=त्रिविष्टप) के ऊपर चढ़ गये। 57 तब मुनि ने अपने ज्ञान द्वारा स्वर्ग में रहनेवाली अपनी माता को दीक्षित किया; और वर्षा- ऋतु वहीं बिताकर तथा दिव्य देवों के शासक से उचित रीति से भिक्षा ग्रहणकर वह स्वर्ग-लोक से संकाश्य में उतरे। 58 देवगण, जो शान्ति प्राप्त कर चुके थे, अपने विमानों में खड़े रहे और अपनी आँखों से उनका अनुसरण किया; जैसे पृथ्वी पर गिर रहे हों, और उनका सम्मान करते समय पृथ्वी के अनेक राजाओं ने अपने मुख ऊपर उठाकर अपने मस्तकों से उनका स्वागत किया। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का "जेतवन-स्वीकार" नामक 20वाँ सर्ग समाप्त॥ इक्कीसवाँ सर्ग प्रव्रज्या-स्रोत 1 स्वर्ग में अपनी माता को तथा निर्वाण के इच्छुक दूसरे देवों (=दिवौकः) को दीक्षित करने के बाद मुनि पृथ्वी पर दीक्षा पाने योग्य लोगों को दीक्षित करते हुए घूमने लगे। 2 तब पाँच पर्वतों के बीच में स्थित नगर में विनायक ने ज्योतिष्क, जीवक, शूर, श्रोण और अङ्गद को विनीत (प्रव्रजित) किया। 3 उन्होंने राजपुत्र अभय, श्रीगुप्त, उपालि, न्यग्रोध, और दूसरों को, जो (नित्यता और विनाश के) दो अन्तों को मानते थे, उनके पूर्व-मतों से विमुख किया। 4 उन्होंने पुष्कर नामक गान्धार-राज को दीक्षित किया, जिसने धर्म-श्रवण करते ही राज्य-लक्ष्मी का परित्याग किया। 5 तब उन विपुल-पराक्रम ने विपुल पर्वत पर हैमवत और साताग्र यक्षों को दीक्षित किया। 6 जीवक के आम्र-वन में रात के समय पाँच सौ रानियों के साथ राजा (अजातशत्रु) को गुणदर्शी बुद्ध ने धर्म में स्थापित किया। 7 तब पाषाण-पर्वत पर शान्ति-परायण पारायण (नामक) ब्राह्मण आधी गाथा के सूक्ष्म अर्थ द्वारा दीक्षित हुआ।⁷⁹ ⁷⁸ - अन्तिम पाद का मूल यह हो सकता है-"योगः प्रमाणं न वयो न वंशः।" ⁷⁹ - इसका उत्तरार्ध चीनी अनुवाद से लिया गया है। 96 अश्वघोष
8 तब वेणु-कण्टक में उन्होंने नन्द की साध्वी मामा को प्रव्रजित किया, जो उत्तम जागरूकता (= सत्स्मृति)-द्वारा अपनी आँखों के आगे (गुप्त) कोषों को देखती थी। 9 तब स्थाणुमती गाँव में ब्राह्मण-श्रेष्ठ कूटदत्त, जो सब प्रकार के यज्ञ करना चाहता था, निर्वाण- धर्म में प्रवेश कराया गया। 10 तब विदेह पर्वत पर पञ्चशिख (गंधर्व-पुत्र), असुरों और देवों को (धर्म में) दृढ़ विश्वास हुआ। 11 तब अङ्ग नगर में पूर्णभद्र यक्ष तथा श्रेष्ठ, दण्ड, श्वेत, पिङ्गल व चण्ड (नामक) बड़े-बड़े साँप (= महानाग) दीक्षित हुए। 12 आपण नगर में केन्य व शेल (नामक) ब्राह्मण, जो (स्वर्ग में जन्म लेने के लिए) तप कर रहे थे, निर्वाण-पथ पर लाये गये। 13 सुह्मों के बीच भगवान् ने दिव्य शक्ति (ऋद्धि) के प्रभाव से अङ्गुलिमाल ब्राह्मण को विनीत किया, जो सौदास के समान क्रूर था ।⁸⁰ 14 भद्र में एक भद्र पुरुष के पुत्र से, जिसका नाम मेण्डक था, जिसकी आजीविका अच्छी थी, जो उदार दाता था और जो सम्पत्ति में पूर्णभद्र के समान था, सम्यक् दृष्टि ग्रहण कराई गई। 15 तब विदेह नगर में वक्ता-श्रेष्ठ ने उपदेश द्वारा ब्रह्मायु नामक व्यक्ति को जीता, जिसकी आयु ब्रह्मा की-सी लम्बी थी। 16 उन्होंने वैशाली के जलाशय में माँस-भक्षक (मर्कट नामक) राक्षस को तथा सिंह उत्तर व सत्यक-प्रमुख लिच्छवियों को भी दीक्षित किया। 17 तब अलकावती नगर में वह आर्यकर्मा, भद्र नामक एक सदाशय (उत्तम आशयवाले) यक्ष को धर्म-पथ पर लाये। 18 तब एक अत्यन्त अकुशल अटवी (जङ्गल) में बुद्ध ने आटविक यक्ष को और कुमार हस्तक को उपदेश दिया। *19 तब....नगर में निर्वाण-दर्शी ने नागायन यक्ष को निर्वाण कर उपदेश दिया और यक्ष-राज ने उन्हें प्रणाम किया। 20 गया में ऋषि ने टङ्कित ऋषियों को और खर तथा सूचीलोम नामक दो यक्षों को उपदेश दिया।⁸¹ 21 तब वाराणसी नगर में दसबलधारी ने कात्यायन नामक ब्राह्मण को प्रव्रजित किया, जो असित ऋषि का भागिनेय था। 22 तब वह अपनी दिव्य शक्ति से शूर्पारक नगर में गये और स्तवकर्णी श्रेष्ठी को उपदेश दिया, 23 जो उपदेश सुनते ही इतना श्रद्धालु हो गया कि वह मुनि-वर के लिए एक चन्दन-विहार बनाने लगा, जो सदा सुगन्धित एवं गगन-चुम्बी था। 24 तब उन्होंने तपस्वी कपिल को महीवती में विनीत किया, जहाँ एक शिला पर मुनि के पाँवों के चक्र-चिह्न देख पड़ते थे। 25 तब वरण में उन्होंने वारण (नामक) यक्ष को उपदेश दिया; उसी प्रकार मथुरा में भयानक गर्दभ दीक्षित हुआ। 26 तब स्थूलकोष्ठक नगर में विनायक ने राष्ट्रपाल कहे जानेवाले (व्यक्ति) को दीक्षित किया, जिसका धन राजा के धन के बराबर था। 27 तब वैरञ्जा में विरिञ्च-सदृश एक महासत्त्व दीक्षित हुआ और उसी तरह कल्माशदम्य में विद्वान् भारद्वाज। 28 फिर श्रावस्ती में मुनि ने सभिय, निर्ग्रन्थ नप्त्रीपुत्रों और अन्य तीर्थिकों (पंडितों) का अन्धकार दूर किया। 29 यहाँ भी ब्राह्मण याज्ञिक पुष्कलसादी एवं जातिश्रोणी तथा कोशल-राज बुद्ध-धर्म में लाये गये। 30 तब शेतविक की वन-भूमि में उत्तम-शिक्षक ने एक मैने को और एक सुगे को—द्विजों के समान विद्वान् दो द्विजों को—सिखाया। 31 तब....नगर में जङ्गली नागर तथा क्रूरकर्मा कालक व कुम्भीर शम-धर्म में लाये गये।⁸² 32 तब भार्गसों के बीच उन्होंने भेषक यक्ष को दीक्षित किया और नकुल के वृद्ध माता-पिता पर वैसा ही अनुग्रह किया। 33 कौशाम्बी में धनवान् घोषिल, कुब्जोत्तरा तथा दूसरी स्त्रियाँ और बहुत-से लोग दीक्षित हुए। 34 तब गान्धार देश में अपलाल (नामक) सर्प, जिसके इन्द्रिय विनय द्वारा शान्त हो गये, बुराई के परे चला गया। *35 तब मृत्यु (काल) के समान जलाने की इच्छा करनेवाले.... को दीक्षित कर बुद्ध ने क्रम से धर्मोपदेश किया। 36 इन तथा अन्य स्थलचारी अथवा नभचारी जीवों को दीक्षित करने से बुद्ध का यश बढ़ता ही गया, जैसे (पूर्णिमा आदि) पर्व में समुद्र। 37 उनका माहात्म्य देखकर देवदत्त को द्वेष हो गया और ध्यान-संयम खोकर उसने बहुत-से अनुचित काम किये। 38 कलुषित चित्त से उसने मुनि के सङ्घ में भेद खड़ा किया और भेद के कारण उनसे अनुराग करने के बदले उसने उन्हें क्लेश पहुँचाने का प्रयत्न किया।
⁸⁰ - सुह्म = हजारीबाग, संथाल-परगना जिलों का कितना ही अंश—बुद्धचर्या। उस देश के रहनेवाले लोग सुह्म कहलाते हैं। ⁸¹ - "टङ्कित ऋषि" से शायद "टङ्कित गुफाओं में रहनेवाले ऋषि" का अभिप्राय है। ⁸² - रिक्त स्थान में साकेत (अयोध्या) लिखा जा सकता है।
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39 तब गृध्रकूट पर्वत पर उसने वेगपूर्वक एक शिला लुढ़काई; किन्तु मुनि के ऊपर लक्ष्य होनेपर भी यह उनपर नही गिरी, किन्तु दो टुकड़ों में विभक्त हो गई। 40 राज-मार्ग पर उसने तथागत की ओर एक गजेन्द्र छोड़ा, जो प्रलयकालीन काले बादलों के समान गरज रहा था और जो चाँद के छिपने पर आकाश में बहनेवाली आँधी के समान दौड़ रहा था। 41 राजगृह के मार्ग उन लाशों से (पटकर) चलने योग्य नहीं रहे, जिनपर उसने अपने शरीर से चोट की थी, या जिन्हें उसने अपनी सूंड़ से ऊपर उठाया था या जिनकी अँतड़ियाँ उसके दाँतों द्वारा खींची जाकर ढेर की ढेर बिखेरी गई थीं।⁸³ 42 मांस की प्यास से उसने लोगों की जाँघें खोदीं और जब उसकी सूंड़ ने अँतड़ियों का स्पर्श किया, तब छुटकारा पाने के लिए उसने उन (अँतड़ियों) की मालाएँ खींचकर पत्थर की तरह आकाश में फेंकीं, उस समय उसके भयावने मस्तक, कानों व जीभ से लोहू चू रहा था। 43 नगर-निवासी आतंकित हुए और उससे डर गये, इसलिये कि वह रक्त-बिन्दुओं और सड़ते हुए (दुर्गंध-युक्त) रुधिर से लिप्त होकर तथा मस्तक पर व्याप्त मद-जल की गन्ध से युक्त होकर असीम क्रोध से घूम रहा था। 44 जब उन लोगों ने यम-दण्ड के समान भयानक उस मतवाले हाथी को देखा, जिसका चेहरा अविनय से फूला हुआ था, जो गरज रहा था और क्रोध से आँखें घुमा रहा था, तब राजगृह में हाहाकार मच गया। 45 कुछ लोग निराश होकर चारों ओर भागे, कुछ लोग ऐसी जगह छिप गये जहाँ वे देखे नही जा सकते थे और दूसरे ऐसे डरे कि दूसरा सब भय खोकर दूसरों के घरों में घुस गये। 46 हाथी कहीं बुद्ध को क्लेश न पहुँचावे, इस डर से कुछों ने अपनी जान की पर्वाह न की और उसके पीछे से वीरतापूर्वक चिल्लाये, जैसे कूदने को उद्यत सिंह गरज रहा हो। 47 उसी प्रकार दूसरों ने महावत का पुकारा, कुछों ने प्रार्थनापूर्वक अपने हाथ उठाये, कुछों ने तब उसे धमकाया भी और दूसरों ने उसके द्रव्य-प्रेम से प्रार्थना (अपील) की। 48 छज्जों से देखती हुई नवयुवतियाँ बाहुएँ फेंककर रोईं; कुछों ने डरकर सुवर्ण-कङ्कणयुक्त ताम्रवर्ण हाथों से आँखें मूँद लीं। 49 यद्यपि हत्या के अभिप्राय से हाथी आगे आ रहा था और रोते हुए लोग (मना करने के लिए) हाथ उठा रहे थे, तो भी सुगत शान्त एवं अविचल (-चित्त) होकर आगे ही बढ़े, न तो उन्होंने पाँव उठाना ही रोका, और न वे द्वेष के ही वशीभूत हुए।
50 शान्तिपूर्वक मुनि आगे आये; उस महागजेन्द्र को भी उन्हें स्पर्श करने की शक्ति नही थी, इसलिए कि अपनी मैत्री के कारण उनकी करुणा सब जीवों पर थी और इसलिए कि देवगण भक्तिवश उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। 51 दूर से ही गजेन्द्र को देखकर बुद्ध के पीछे पीछे जानेवाले शिष्य भाग गये। केवल आनन्द ने बुद्ध का अनुसरण किया, जैसे सहज स्वभाव विविध पदार्थों का अनुसरण करता है। 52 जब क्रुद्ध हाथी समीप आया तो मुनि के दिव्य प्रभाव से उसे होश हो गया, और अपना शरीर झुकाकर, उस पर्वत के समान जिसके पक्ष वज्र से विदीर्ण हुए हों, उसने अपना मस्तक पृथ्वी पर रक्खा। 53 जैसे सूरज अपनी किरणों से बादल को छूता है, वैसे ही मुनि ने अपने सुन्दर हाथ से, जो कमल के समान कोमल था और जिसकी सुगठित अङ्गुलियाँ (रेखा-) जाल से युक्त थीं, गजराज के माथे पर थपकी लगाई। 54 जब हाथी पानी से भरे बादल के समान उनके पाँवों पर झुका, तब ताल-पत्र-सदृश उसके (बड़े-बड़े) कानों को निश्चल देखकर मुनि ने उसे शम-धर्म का उपदेश दिया, जो बुद्धिधारी प्राणियों के लिए ही उपयुक्त है:— 55 “निरपराध (=नाग) की हत्या करने से दुःख होता है; हे हाथी, निरपराध को पीड़ित न करो। क्योंकि, हे हाथी निरपराध की हत्या करनेवाले का जीवन जन्म जन्म में आठ जन्म तक विकसित नही होता है। 56 काम मोह व घृणा, ये तीन दुर्जेय मद हैं; फिर भी मुनिगण मद-त्रय से मुक्त हैं। अतः इन तापों से अपने को मुक्त करो और दुःख के परे चले जाओ। 57 इसलिए ये अन्धकार-प्रेम (=तमःप्रसक्ति) त्याग करने के लिए मद-मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आओ। हे गजेन्द्र, काम की अधिकता से संसार-सागर के पङ्क में फिर मत गिरो।” 58 तब ये वचन सुनकर हाथी मद से मुक्त हो गया और फिर उचित मानसिक अवस्था पर लौट आया; और अमृत-पान करने पर रोग-मुक्त हुए के समान उसने उत्तम आन्तरिक (=अन्तर्गत) आनन्द प्राप्त किया। 59 गजेन्द्र ने तुरन्त मद का त्याग किया और शिष्य के समान मुनि को प्रणाम किया, यह देख कर कुछों ने वस्त्र से ढँकी बाहुएँ ऊपर फेंकीं और दूसरों ने भुजाएँ चमकाईं (घुमाईं, = √परभ्रि, √उल्लस् ), जिससे कपड़े गिर पड़े। 60 तब कुछों ने मुनि के आगे हाथ जोड़े और दूसरों ने उन्हें घेर लिया। कुछों ने उस बड़े हाथी के आर्यत्व की प्रशंसा की और दूसरों ने विस्मित होकर उसे थपकी लगाई।
⁸³ अमरावती में चित्रित इस दृश्य (Vogel—“भारत लङ्का और जावा में बौद्ध-कला”) का आधार ये ही श्लोक हैं—जौन्स्टन। 98 अश्वघोष
61 महल की स्त्रियों में से कुछों ने बहुमूल्य नये वस्त्रों से उन्हें सम्मानित किया तथा दूसरों ने उनपर भाँति-भाँति के अलङ्कारों तथा मोहक और नये हारों की झड़ी लगा दी। 62 जब काल-सदृश वह हाथी विनीत होकर खड़ा हुआ, तब जो (धर्म में) विश्वास नही करते थे वे मध्यम अवस्था में प्रविष्ट हुए, जो पहले से ही मध्यम अवस्था में थे उन्होंने विश्वास की एक विशिष्ट अवस्था प्राप्त की, और जो विश्वासी थे वे अत्यन्त दृढ़ हो गये। 63 तब अपने महल में खड़े अजातशत्रु ने गजेन्द्र को मुनि द्वारा विनीत होते देखा और वह विस्मय से अभिभूत हो गया; उसे प्रसन्नता हुई और बुद्ध में परम विश्वास हुआ। 64 जैसे कलियुग बीतने पर तथा कृतयुग शुरु होनेपर धर्म और अर्थ की वृद्धि होती है, वैसे ही मुनि अपने यश, ऋद्धियों (= चमत्कारों) एवं दुष्कर कर्मों से बढ़ने लगे। 65 किन्तु देवदत्त, द्वेषपूर्वक बहुत-से बुरे व पाप कर्म करके अधःलोग में गिरा, जो राजा और प्रजा द्वारा ब्राह्मणों एवं मुनियों द्वारा निन्दित है। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “प्रव्रज्या-श्रोत” नामक 21वाँ सर्ग समाप्त ॥ बाईसवाँ सर्ग आम्रपाली के उपवन में 1 जब वह वक्ता-श्रेष्ठ काल-क्रम से संसार पर अनुग्रह कर चुके और पृथ्वी को अपने धर्म से व्याप्त कर चुके, तब उनका चित्त निर्वाण की ओर गया। 2 तब मुनि यथासमय राजगृह से पाटलिपुत्र गये, जहाँ वह पाटलिपुत्र नामक चैत्य में ठहरे। 3 उस समय मगध-राज के मन्त्री वर्षाकार (वर्षकार) ने लिच्छवियों को शान्त रखने के लिए एक किला बनाया था। 4 तथागत ने देवताओं को वहाँ अपना कोष लाते देखा और भविष्यवाणी की : “यह नगर संसार भर में सर्वश्रेष्ठ होगा।” 5 वह उत्तम कर्मशील (कर्मी), वर्षाकार द्वारा उचित रीति से सम्मानित होकर, समुद्र की प्रधान पत्नी (महिषी) की ओर गये। 6 सूर्य के समान उज्ज्वल भगवान् जिस द्वार से निकले, उसे उस (वर्षाकार) ने गौतम-द्वार (के नाम) सम्मानित किया। 7 वह, जो कि (संसार-सागर) पार करना देख चुके थे, गङ्गातट पर आये और भाँति भाँति की नावों के साथ लोगों को देखकर उन्होंने सोचा:- 8 “प्रयत्नपूर्वक नदी पार करना मेरे लिए अनुचित होगा, इसलिए अपने ऋषि-बल से नाव के बिना ही मुझे स्वयं जाना चाहिए।” 9 इस तरह दर्शकों की दृष्टि से ओझल होकर वह तब अपने शिष्यों के साथ हवा की गति को भी मात करते हुए एक क्षण में उस पार चले गये। 10 क्योंकि मुनि जानते थे कि ज्ञानरूपी नाव से ही दुःखरूपी सागर पार किया जाता है, इसलिए उन्होंने इस (भौतिक) नाव का प्रयोग किये बिना ही गङ्गा पार की। 11 वह घाट, जहाँ से विनायक गङ्गा के उस पार गये, जगत में उनके गोत्र-नाम से (गोतम) तीर्थ होकर विख्यात है। *12 उन्हें देखकर पार होने के इच्छुक, पार हो रहे तथा पार हुए लोगों के मुख विस्मय से विकसित हुए। 13 तब बुद्ध गङ्गा तीर से कुटी नामक गाँव में गये और वहाँ धर्मोपदेश करके नादी गये। 14 उस समय वहाँ बहुत-से लोग मरे थे और मुनि ने बतलाया कि उनमें से कौन किस लोक में जन्मा और क्या होकर। 15 वहाँ एक रात रहकर श्रीघन (बुद्ध) वैशाली नगरी चले गये और आम्रपाली के प्रान्त में एक उज्ज्वल उपवन में ठहरे। 16 “तथागत यहीं हैं” यह जानकर आम्रपाली वेश्या एक साधारण रथ पर सवार हुई और अत्यन्त प्रसन्न होकर चली। 17 देव-पूजन-समय की एक कुलीन स्त्री के समान वह स्वच्छ श्वेत वस्त्र पहने हुए थी और मालाओं या अङ्गराग से रहित थी। *18 सौन्दर्य के अभिमान में वह अपने संयुक्त आकर्षणों से लिच्छवि कुल-पुत्रों की सम्पत्ति एवं चित्त आकृष्ट किया करती थी। 19 रूपवती वन-देवता के समान अपने सौन्दर्य एवं गौरव में आत्म-विश्वास करती हुई वह रथ से उतरी और तेजी से उपवन में घुस गई। 20 “उसकी आँखें चञ्चल हैं और उसके कारण कुलीन स्त्रियों को शोक होता है” यह देखकर सुगत ने दुन्दुभि की-सी वाणी में शिष्यों को आदेश दिया— 21 “यह आम्रपाली समीप आ रही है, जो दुर्बलों का मानसिक ताप है; स्मृतिरूपी रसायन से अपने अपने मन को वश में रखते हुए तुमलोग ज्ञान में स्थित हो जाओ। 22 स्मृति (अप्रमाद, सावधानी) एवं ज्ञान (प्रबोध) रहित पुरुष के लिए स्त्री के सान्निध्य (पड़ोस, समीपता) की अपेक्षा साँप या खुली तलवारवाले शत्रु का सान्निध्य अच्छा है। 23 बैठी हो या सोई, टहलती हो या खड़ी, चित्र-लिखित ही क्यों न हो, स्त्री (हर हालत में) पुरुषों के हृदय हरण करती है। 24 स्त्रियाँ विपत्ति (=व्यसन) से भी पीड़ित हों, या रोती हुई चारों ओर बाहु-लताएँ फेंक रही हों, या आकुल-केशपाश हो दग्ध हो रही हों, तो भी उसकी शक्ति उत्कृष्ट होती है। बुद्धचरित 99
25 बाहरी वस्तुओं का प्रयोग करती हुई वे अनेक आहार्य (बनावटी) गुणों से (लोगों को) ठगती हैं और अपने वास्तविक गुणों को छिपाती हुई वे मूर्खों को मोह में डालती हैं। 26 स्त्री को अनित्य दुःखमय अनात्म और अशुचि समझने से पण्डितों के चित्त उसे देखकर अभिभूत नही होते हैं। 27 जिन मनुष्यों के चित्त इन प्रलोभनों (आलय) से सुपरिचित होते हैं, जैसे कि पशु गोचर-भूमि से, वे दिव्य आनन्दों का आक्रमण होनेपर कैसे मोह में पड़ सकते हैं? 28 अतः प्रज्ञारूपी तीर लेकर, हाथों में वीर्यरूपी धनुष ग्रहण कर और स्मृतिरूपी कवच पहनकर विषयों की बातपर खूब सोचो। 29 बहकी हुई स्मृति से स्त्री की चञ्चल आँखों को देखने की अपेक्षा लोहे की गर्म काँटियों से अपनी आँखों को जला डालना अच्छा है। 30 यदि मरते समय तुम्हारा चित्त काम के अधीन हो, तो इससे तुम विवश होकर बाँधे जाओगे और पशु-योनि में या नरक में तुम्हारा जन्म होगा। 31 इसलिये इस भय को पहचानो और बाहरी लक्षणों (= निमित्त) पर ध्यान मत दो; क्योंकि वही ठीक-ठीक देखता है, जो शरीर में केवल (वास्तविक) रूप को देखता है। 32 जगत् में न तो इन्द्रिय ही विषयों को बाँधते हैं और न विषय ही इन्द्रियों को। उन (विषयों) के लिए जिस किसी को काम (पैदा) होता है, वह उससे बाँधा जाता है। 33 विषय और इन्द्रिय परस्पर आसक्त हैं, जैसे कि दो बैलों का जोड़ा एक जुए में जुता रहता है। *34 आँख आकृति को देखती है और चित्त उसपर विचार करता है, और उस विचार से विषय के बारे में काम उत्पन्न होता है और काम से मुक्ति (निष्कामता) भी। *35 तब विषयों की उचित परीक्षा नही करने से महा-अनर्थ होता है, इन्द्रियों के क्षेत्र में प्रवृत्ति (विषयासक्ति) सब विपत्तियों का घर है। 36 अतः स्मृति का त्याग नही करते हुए, परम सावधानी से चलते हुए, और अपने हित (= स्वार्थ) का ख्याल रखते हुए, तुम लोग मन से उत्साहपूर्वक भावना करो।” 37 जब उन्होंने अपने शिष्यों को, जो रूप के अन्त तक नही पहुँचे थे, इस प्रकार उपदेश दिया, तब आम्रपाली उन्हें देखकर हाथ जोड़े समीप आई। 38 शान्तचित्त मुनि को एक वृक्ष के नीचे बैठे देखकर उस (आम्रपाली) ने उन (मुनि) के द्वारा उपवन का उपभोग (= परिभोग) होने से अपने को अनुगृहीत माना। 39 तब अपनी चञ्चल आँखों को ठीक कर, उसने पूर्ण विकसित चम्पकपुष्प-सदृश मस्तक से मुनि को बड़ी श्रद्धा से प्रणाम किया। 40 जब सर्वज्ञ (मुनि) के आदेशानुसार वह बैठ चुकी, तब मुनि ने उसके समझने योग्य शब्दों में उसे कहाः-
41 “तुम्हारा यह आशय पवित्र है और तुम्हारा चित्त विशुद्धि द्वारा स्थिर है; तो भी रूपवती एवं युवती नारी में धर्म-पिपासा दुर्लभ है। 42 इसमें आश्चर्य का क्या कारण है कि धर्म, बुद्धिमान् पुरुषों को या विपत्ति-पीडि़त (= व्यसनाभिभूत) स्त्रियों को या संयतात्माओं (= आत्मवान) को या व्याधि-ग्रस्तों को आकृष्ट करे? 43 किन्तु यह असाधारण है कि विषयासक्त (= विषयैकरस) जगत् में स्वभावतः दुर्बलबुद्धि एवं चञ्चलचित्त युवती नारी धर्म-भाव का पोषण करे। 44 तुम्हारा चित्त धर्माभिमुख है, यही तुम्हारा सच्चा धन (= सदर्थ) है; क्योंकि जीवलोक अनित्य है, अतः धर्म को छोड़कर दूसरी कोई सम्पत्ति नही। 45 रोग स्वास्थ्य को गिराता है, उम्र जवानी को काटती है और मृत्यु जीवन अपहरण करती है; किन्तु धर्म के लिये ऐसी कोई विपत्ति नही। 46 (सुख की) खोज में मनुष्य को केवल प्रिय से वियोग और अप्रिय से संयोग होता है, इसलिये धर्म ही सर्वोत्तम मार्ग है। 47 दूसरों पर निर्भर होना महादुःख है और अपने पर आश्रित होना परम सुख; तो भी मानव-वंश में उत्पन्न सभी स्त्रियाँ दूसरों पर आश्रित हैं।⁸⁴ 48 इसलिए तुम उचित निष्कर्ष पर पहुॅंचो, क्योंकि पराश्रय एवं प्रसव के कारण स्त्रियों को अत्यन्त कष्ट होता है।” 49 उसने-जो उम्र में छोटी थी, किन्तु जो आशय बुद्धि एवं गम्भीरता में छोटी-जैसी नही थी- महामुनि के वचन प्रसन्नतापूर्वक सुने। 50 तथागत के धर्मोपदेश करने से उसने कामासक्त चित्त की अवस्था का परित्याग किया, स्त्रीत्व (स्त्री होने की दशा) को तुच्छ समझती हुई वह विषयों से विमुख हो गई, और अपनी जीविका के उपायों से उसे घृणा हो गई। *51 तब मञ्जरी से भरी आम्रशाखा के समान अपनी देह से प्रणिपात करते हुए उसने अपनी दृष्टि महामुनि में स्थिर की और फिर धर्म के प्रति विशुद्धदृष्टि होकर वह उठ खड़ी हुई। 52 नम्र स्वभाव होनेपर भी, धर्म-पिपासा से निरन्तर प्रेरित होती नारी ने अपने कर-कमलों को जोड़कर मृदु स्वर में कहा- 53 “हे भगवन्, आपने लक्ष्य प्राप्त कर लिया है और सांसारिक दुःख शान्त कर लिया है। अपने शिष्यों के साथ भिक्षाटन का समय मेरे लिये सफल करें.....जिससे मैं धर्मोपदेश लाभ करूँ।”
⁸⁴ - मूल श्लोक बहुत कुछ ऐसा हो सकता हैः- पराश्रयो महादुःखं स्वाश्रयः परमं सुखम्। मनुवंशे समुत्पन्नाः सर्वाः स्त्रियः पराश्रिताः ॥
100 अश्वघोष
54 तब उसकी भक्ति देख और प्राणियों को आहार पर आश्रित जान, सुगत ने मौन धारण कर अपनी सम्मति दी तथा सङ्केत (= विकार) द्वारा अपना आशय प्रकट किया। 55 परम धर्म के अधिकारी बुद्ध को, जिनकी दृष्टि अवसर को पहचानती थी, उस धर्म-पात्र में अत्यन्त आनन्द हुआ, .... श्रद्धा द्वारा श्रेष्ठ लाभ होता है, यह जानते हुए उन्होंने उस (आम्रपाली) की प्रशंसा की। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का "आम्रपाली के उपवन में मुनि का आगमन" नामक 22वाँ सर्ग समाप्त॥ तेईसवाँ सर्ग आयु निश्चित करना 1 तब मुनि का आशय समझकर, वह उन्हें प्रणाम करके नगर को लौट गई। समाचार सुनकर, लिच्छवि बुद्ध को देखने आये। 2 कुछों के घोड़े, रथ, छत्र, हार, अलङ्कार और वस्त्र श्वेत थे तथा दूसरों के सुनहले रङ्ग के थे। 3 कुछों की सब चीजें वैदूर्य के समान पीली थीं, तो दूसरों की मयूर-पुच्छ के रङ्ग की। इस तरह अपने-अपने मन के अनुकूल उज्जवल परिधान (चमकीला पहनावा) पहनकर वे बाहर आये। 4 वे, जिनके शरीर पर्वत के समान विशाल थे और जिनकी बाहुएँ सुनहले जुए के समान थीं, स्वर्ग के शरीरधारी उज्जवल .... के सदृश जान पड़े। 5 जब वे रथों से उतरने के लिए खड़े हुए, तब संध्याकालीन बादल पर पड़नेवाली बिजली की छटाओं के समान वे चमके। 6 अपने तरङ्गित शिरोवेष्टनों (पगड़ियों) को झुकाते हुए उन्होंने धैर्यपूर्वक मुनि को प्रणाम किया; अभिमानी होनेपर भी वे धर्म की अभिलाषा से मानो गम्भीर होकर वहाँ खड़े हुए। 7 बुद्ध के पास उनका निर्मल मण्डल ऐसे चमका, जैसे अनभ्र (बादलरहित) सूर्य के सामने (प्रकाश में) इन्द्र-धनुष चमक रहा हो। 8 तब सिंह और दूसरे लोग पृथ्वी पर सिंहों की आकृति से युक्त तथा सोने से अलङ्कृत सिंहासनों पर बैठ गये, और तब पुरुष-सिंह ने उनसे कहा- 9 "धर्म के प्रति आपकी यह भक्ति मूल्य में आपके रूप, राज्य व बल आदि विशेषताओं से बहुत बढ़कर है। 10 आपके सौन्दर्य, भव्य वस्त्रों, आभूषणों या हारों की वैसी चमक नहीं है, जैसे कि शील आदि गुणों की। 11 मैं वृज्जियों को अनुगृहीत और भाग्यवान् समझता हूँ कि उनके अधिपति आप हैं, जो धर्म के ज्ञाता तथा विनय के इच्छुक हैं। 12 हे आर्य, धर्म में रहनेवाले (प्रजा-) पालक साधारणतः (आर्यावर्त के) भीतर के देशों में तथा अभागों के लिए दुर्लभ हैं। 13 इस देश पर धर्म का भी अनुग्रह है कि यह धर्म-ज्ञान के रक्षक महाभागों द्वारा पालित है। 14 इसलिए, जैसे नदी पार करने की इच्छा करनेवाली गौएँ (पशु) गवांपति (झुण्ड के सरदार) का अनुसरण करती हैं, वैसे ही राजाओं से रक्षित देश में (बसने के लिए) लोग इकट्ठे होते हैं। 15 यह शील हमेशा आप में रहना चाहिए जिससे आपका धन (= स्वार्थ ?) इहलोक या परलोक में काम द्वारा नही छीना जा सके। 16 शील का फल महान् है, - सन्तुष्ट चित्त, सम्मान, लाभ, यश, विश्वास, आनन्द एवं पारलौकिक सुख। 17 जैसे पृथिवी सब चराचर जीवों का आश्रय है, वैसे ही शील सब गुणों का उत्तम आश्रय है। 18 शील छोड़कर भी परम पद चाहनेवाले मनुष्य को, उड़ने की इच्छा करनेवाले पंख-विहीन प्राणी के समान या नदी पार करने की इच्छा करनेवाले नाव-रहित व्यक्ति के समान जानिये। 19 जो मनुष्य यशस्वी, रूपवान् धनवान् होकर भी शील से विमुख है, वह उस वृक्ष के समान है जो फूला-फला होनेपर भी काँटों से भरा हो। 20 कोई मनुष्य महल में रहता हो और उज्ज्वल वस्त्र-आभूषण पहनता हो, किन्तु, यदि वह शीलवान् है तो उसकी गति महर्षि की-सी है। 21 वे सब छद्मचारी (कपटी) समझे जायेंगे, जिन्होंने, काषाय या वल्कल वस्त्र पहनते हुए भी तथा ऋषियों की भाँति तरह-तरह से केशों को सजाते हुए भी, अपना शील नष्ट कर लिया है। 22 यद्यपि कोई मनुष्य प्रतिदिन तीन बार तीर्थ में नहाता हो, अग्नि में दो बार आहुतियाँ डालता हो, अग्नि के ताप से दग्ध होता हो, तो भी शीलवान् नही होनेपर वह कुछ नही है। 23 यद्यपि वह हिंसक पशुओं के आगे अपना शरीर समर्पित करता हो, पर्वत पर से अपने को गिराता हो, आग या पानी में कूदता हो, तो भी शीलवान् नही होनेपर वह कुछ नही है। 24 यद्यपि वह थोड़ा-सा फल-मूल खाकर रहता हो, मृग के समान तृण चरता हो, हवा पीकर जीना चाहता हो, तो भी शीलवान् नही होनेपर वह शुद्ध नही हो सकता। 25 दुःशील मनुष्य पशु-पक्षियों के समान है; वह धर्म का पात्र नही है, किन्तु पानी के चूते हुए पात्र के समान है। 26 इहलोक में उसे भय, अयश, अविश्वास एवं असन्तोष मिलते हैं और परलोक में वह विपत्ति भोगेगा। 27 इसलिए मरुभूमि के पथ-प्रदर्शक की तरह शील की हत्या नही होनी चाहिए; अपने पर भी आश्रित रहनेवाला दुर्लभ शील एक नाव है, जो मनुष्य को स्वर्ग ले जाती है। बुद्धचरित 101
28 जिसका चित्त दोषों से अभिभूत होता है, वह जीवन में सब कुछ खो बैठता है। शील में स्थित होकर दोषों का नाश करो और श्रद्धा का पोषण करो (या जो कुछ अच्छा है वह करो)। 29 इसलिए उन्नति चाहनेवाला आदमी पहले अपने को आत्मभाव (अहंभाव) से मुक्त करे; क्योंकि आत्मभाव गुणों को वैसे ही छिपाता है, जैसे धुँआ आग को। 30 गुण, वास्तव में होनेपर भी, अभिमान से अभिभूत होकर नही चमकते, जैसे बादलों से ढँके हुए तारे, सूरज व चाँद नहीं चमकते। 31 औद्धत्य लज्जा (= ह्री) को नष्ट करता है, शोक धैर्य को, बुढ़ापा सौन्दर्य को और आत्मभाव गुणों के मूल को। 32 द्वेष एवं अभिमान के कारण असुरगण देवों से पराजित होकर पाताल में फेंके गये और त्रिपुर नाश को प्राप्त हुआ। 33 वह मनुष्य बुद्धिमान् नही समझा जाता है, जो अनित्य जीवन में अपने को सबसे अच्छा, न कि बुरा, समझता है। 34 यद्यपि यह आकृति ही अस्थिर है तथा मनुष्य अनित्य व विनाशधर्मा है, तो भी “मैं ही” (अहमेव) यह सोचता हुआ वह अभिमान करता है- इसमें विवेक-शून्यता के अतिरिक्त और क्या है? 35 कामराग प्रबल प्रच्छन्न एवं सहजात शत्रु है, जो बुराई करनेवाले दुश्मन के समान मित्रता के वेष में प्रहार करता है। 36 कामराग की अग्नि तथा साधारण अग्नि समानरूप से दहनशील है, किन्तु कामराग की अग्नि प्रज्वलित होनेपर रात अवश्य लम्बी होगी। 37 कहा जाता है कि अग्नि की वैसी शक्ति नही है जैसी कि कामराग की अग्नि की; क्योंकि अग्नि जल से शान्त हो जाती है, किन्तु कामराग की अग्नि सम्पूर्ण सरोवर से भी नही। 38 आग से जङ्गल जलनेपर जङ्गल के वृक्ष समय पर उत्पन्न हो जाते हैं, किन्तु कामराग की अग्नि से दग्ध होनेपर मूर्खों में धर्म की उत्पत्ति नही होती है। 39 कामराग के कारण मनुष्य सुख खोजता है और सुख के लिए बुराई (अकुशल कर्म) करता है; बुराई करने से नरक में गिरता है। कामराग के समान शत्रु नही। 40 काम से इच्छा उत्पन्न होती है और इच्छा से कामासक्ति। कामासक्ति से मनुष्य को दुःख होता है। काम के समान शत्रु नही। 41 मूर्ख कामनामक महाव्याधि की पर्वाह नही करता और ... ... ... ... ... ... । 42 काम को अनित्य अपवित्र दुःखधर्मा एवं अनात्म समझकर यदि कोई मनुष्य अपने को उससे मुक्त भी कर ले, तो भी अपने कुमार्गगामी चित्त के कारण वह फिर काम के वशीभूत हो जाता है।
43 इसलिए वस्तु से अनुराग पैदा होनेपर जो कोई उसे वास्तविक अवस्था में (= यथाभूतं) देख सकता है, वह वास्तविकतादर्शी (= भूतदर्शी) कहा जाता है। 44 जैसे (किसी वस्तु के) गुणों को देखने से आसक्ति उत्पन्न होती है, वैसे ही इसके दोषों पर विचार करने से क्रोध (विमुखता ?) होता है। 45 इसलिए जो कोई क्रोध रोकना चाहे, वह अपने को विमुखता से प्रभावित न होने दे; क्योंकि जैसे आग से धुँआ निकलता है, वैसे ही विमुखता से क्रोध उत्पन्न होता है। 46 जैसे रूपवानों के लिए बुढ़ापा और आँखवालों के लिए अन्धेरा है वैसे ही क्रोध, धर्म अर्थ व काम का विफलीकरण तथा विद्या का शत्रु है। 47 क्रोध चित्त का घना अन्धकार है, मित्रता का प्रधान शत्रु है, सम्मानविनाशक और अपमानजनक है। 48 इसलिए क्रोध न कीजिए, यदि आप करते भी हों तो इसे छोड़ दीजिए। जैसे दंशधर्मा साँप के पीछे आप नही पड़ते हैं, वैसे ही क्रोध के पीछे न पड़े। 49 जो कोई मार्ग से बहके हुए रथ के समान क्रोध को लगाम लगाकर दृढ़तापूर्वक वश में रखता है उसी को मैं सच्चा सारथि समझता हूँ, दूसरे प्रकार का सारथि तो केवल लगाम पकड़नेवाला है। $^{85}$ 50 जो कोई क्रोध करना चाहता है और इसकी उत्पत्ति को रोकना नही चाहता है, क्रोध बीतने पर वह ऐसे जलता है जैसे आग छूने से। 51 जब मनुष्य क्रोध करता है तो पहले उसका ही चित्त जलता है; पीछे ज्यों ज्यों क्रोध बढ़ता जाता है त्यों त्यों, दूसरे भी, इससे जल सकते हैं या नही भी (जल सकते हैं)। 52 शरीर-धारी शत्रुओं के प्रति द्रोह करने से क्या लाभ, जब कि (शरीर-धारी प्राणियों का) संसार ही रोग आदि विपत्तियों से पीड़ित है? 53 इसलिए संसार को दुःख के वशीभूत जानकर आप लोगों को क्रोध रोकने के लिए सब जीवों के प्रति मैत्री एवं करुणा का आचरण करना चाहिए।” 54 उस समय उन्हें दोषों से भरा देखकर, बुद्ध ने उनके ऊपर करुणा की और उपदेश देकर, उन्हें फटकारा।
$^{85}$ - यो वे उप्पतितं कोधं रथं भन्तं' व धारये। तमहं सारथि ब्रूमि रस्मिग्गाहो इतरो जनो ॥ -धम्मपद कोधवग्गो, 17.2 अर्थ-“जो आए क्रोध को उसी तरह रोक ले, जैसे कोई मार्ग-भ्रष्ट रथ को; उस आदमी को मैं (असली) सारथी कहता हूँ; दूसरे लोग तो केवल रस्सी पकड़नेवाले हैं।” यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा। स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते ॥ -महाभारत, आदिपर्व।
102 अश्वघोष
55 जैसे अस्वस्थ मनुष्यों को रोग-मुक्त करने के लिए, वैद्य उनकी शारीरिक अवस्थाओं के अनुसार ओषधि-सेवन का आदेश देता है, 56 वैसे ही काम बुढ़ापा आदि रोगों से पीड़ित प्राणियों के आशय जानकर मुनि ने उन्हें तत्त्व-ज्ञान की ओषधि दी। 57 मुनि के ऐसे उपदेश से लिच्छवियों को आनन्द हुआ और उन्होंने सिर नवाकर उन्हें प्रणाम किया, जिससे उनकी रत्नमय चूड़ाएँ नीचे लटकने लगीं। 58 तब हाथ जोड़कर और कुछ कुछ देह नवाकर, उन्होंने अपने यहाँ आने के लिए बुद्ध से अनुरोध किया, जैसे देवताओं ने बृहस्पति से अनुरोध किया था। 59 जब मुनि ने उनसे निवेदन किया कि आम्रपाली की पारी पहले आई और बताया कि कुल-पुत्रों के निमित्त नीच कुलवालों को उनके अधिकारों से वञ्चित नहीं करना चाहिए। 60 उस स्त्री ने उन लोगों को पहले ही आकर वञ्चित कर दिया, यह जानकर उन्होंने तथागत का अत्यन्त सम्मान किया, और वे अपनी स्वाभाविक मानसिक अवस्था (क्रोध) पर लौट आये। 61 किन्तु जब तथागत ने उन्हें उपदेश दिया, तब उन्होंने मानसिक शान्ति प्राप्त की, जैसे मुनियों के मन्त्रों का ठीक ठीक उच्चारण करने से साँप का विष शान्त हो जाता है। 62 रात बीतनेपर आम्रपाली ने उनका आतिथ्य किया और (वर्षावास करने के लिए वह) वेणुमती गाँव को (गये)। 63 वर्षाऋतु वहाँ बिताकर महामुनि वैशाली लौट गये और मर्कट-जलाशय के किनारे बैठ गये। 64 वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गये और जब वह वहाँ विराज रहे थे तो मार उस वन में आया और उनके समीप जाकर कहा- 65 "पूर्व में, हे मुनि, नैरञ्जना नदी के तीर पर जब मैंने आपसे कहा था "आपने अपना काम पूरा किया, निर्वाण प्राप्त कीजिए" तब आपने वहाँ उत्तर दिया था:- 66 "मैं तबतक निर्वाण प्राप्त न करूँगा, जबतक पीड़ित प्राणियों की रक्षा न कर लेता हूँ और उनके द्वारा पाप-परित्याग (दोषक्षय) न करा लेता हूँ।" 67 अब बहुतों ने मुक्ति (निर्वाण) पाई, या उसी तरह पाना चाहते हैं या पायेंगे। इसलिए निर्वाण प्राप्त कीजिए।" 68 तब ये वचन सुनकर, अर्हत्-श्रेष्ठ ने उससे कहा, "तीन महीने में मैं निर्वाण प्राप्त करूँगा, अतः अधीर मत होओ।" 69 तब इस प्रतिज्ञा से अपनी इच्छा पूरी हुई जानकर, वह अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ से हट गया। 70 तब महामुनि ऐसे योग-बल से चित्त-समाधि में प्रविष्ट हुए कि उन्होंने अपनी शारीरिक आयु (जीवन) को छोड़ दिया और दिव्य शक्ति के प्रभाव से अभूतपूर्व तरीके से प्राण धारण किया।
71 जिस घड़ी उन्होंने शारीरिक आयु का परित्याग किया उस घड़ी पृथ्वी माती हुई स्त्री के समान काँपी और दिशाओं से बड़ी बड़ी उल्काएँ गिरीं, जैसे अग्नि प्रज्वलित मेरु-पर्वत से पत्थरों की वर्षा हो रही हो। 72 उसी प्रकार इन्द्र के अग्निगर्भ एवं विद्युन्मण्डित वज्र चारों ओर निरन्तर प्रदीप्त हुए; और ज्वालाएँ सर्वत्र प्रज्वलित हुईं, जैसे कल्पान्तकालीन जगत् को जलाने की इच्छा कर रहीं हों। 73 पर्वतों ने, जिनकी चोटियाँ नष्ट हो गईं, ढेर के ढेर टूटे हुए वृक्ष चारों ओर बिखरे और आकाश में दुन्दुभियों से, जैसे वायुपूर्ण गुफाओं से, विषम ध्वनि निकली। 74 तब मर्त्यलोक दिव्यलोक एवं आकाश में हुए सार्वभौम संक्षोभ की घड़ी में महामुनि ने गम्भीर समाधि से निकल कर ये वचन कहे:- 75 "मेरा शरीर, जिसकी आयु मुक्त हो गई है, उस रथ के समान है, जिसका धुरा (अक्षाग्र, अक्षधुरा) टूट गया हो और मैं इसे अपनी शक्ति से ढो रहा हूँ। अपनी आयु के साथ मैं भव- बन्धन से मुक्त हूँ, जैसे अण्डे से निकलते समय अण्डे को फोड़नेवाला पक्षी (बन्धन से मुक्त होता है)।" ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "आयु निश्चित करना"⁸⁶ नामक 23वाँ सर्ग समाप्त ॥ चौबीसवाँ सर्ग लिच्छवियों पर अनुकम्पा 1 तब भूकम्प देखकर, आनन्द को रोमाञ्च हो गया; और "क्या होगा" इससे घबराकर ( = आगतवेगः) वह काँपने लगा और आर्त हो गया। 2 उसने कारण जाननेवाले सर्वज्ञ से इसका कारण पूछा। तब मुनि ने मतवाले साँड के स्वर में उसे कहा:- 3 "इस भूकम्प का कारण यह है कि मैंने पृथ्वी पर अपने दिन काट डाले हैं; मेरे जीवन के अब तीन महीने बचे हुए हैं (मेरी आयु अब से तीन महीने पर अधिष्ठित है)।" 4 यह सुनकर आनन्द अत्यन्त विचलित हो गया और उसके आँसू बहने लगे, जैसे किसी बड़े हाथी द्वारा तोड़े गये चन्दन-वृक्ष से रस बह रहा हो। 5 बुद्ध उसके स्वजन और गुरु थे, इस कारण उसे शोक हुआ और अत्यन्त दुःखी होकर उसने दीनतापूर्वक विलाप किया:- 6 "अपने गुरु का निश्चय सुनकर, मेरा शरीर मानो डूब रहा है, मेरी ग्रन्थियाँ ढीली हो रही हैं और धर्मोपदेश, जो कि मैंने सुना है, आकुल हो रहा है।
⁸⁶- शारीरायुःसंस्काराधिष्ठान = शारीरिक आयु के संस्कारों का अधिष्ठान = आयु पर अधिकार प्राप्त करना, या आयु निश्चित करना।
बुद्धचरित 103
7 अहो! पुरुष-शंसित (= नराशंस) तथागत शीघ्रता से निर्वाण की ओर जा रहे हैं, जैसे फटे- पुराने वस्त्रवाले, जाड़े से ठिठुरे हुए लोगों के लिए आग तेजी से बुझ रही हो। 8 पापों (= दोष) के महावन में भटके हुए शरीरधारी प्राणियों को मार्ग बतलाकर, पथ-प्रदर्शक अकस्मात् ही अदृश्य हो रहा है। 9 प्यास से पीड़ित मनुष्य लम्बे मार्ग पर चल रहे हैं और तब उनके मार्ग में स्थित शीतल जल का जलाशय हठात् ही सूख रहा है। 10 नीली पपिनयोंवाला निर्मल लोक-चक्षु, जो भूत वर्तमान एवं भविष्य को देखता है और जो ज्ञान से विकसित है, अब बन्द होने को है।⁸⁷ 11 अवश्य ही सूख रही लगी फसल के ऊपर जल बरसाकर बादल दूर हो रहा है (= √मज्ज)। 12 अज्ञानरूप अन्धकार के कारण मार्ग-भ्रष्ट प्राणियों के लिए चारों ओर चमकनेवाला प्रकाश अत्यन्त अकस्मात् ही शान्त हो रहा है।” 13 तब आनन्द के चित्त को शोकाकुल देखकर तत्त्वज्ञ-श्रेष्ठ ने, जो सान्त्वना देनेवालों में प्रधान थे, उसके लिए तत्त्व की व्याख्या की:– 14 “पहचानो, आनन्द, जगत् के वास्तविक स्वभाव को और शोक न करो। क्योंकि यह जगत् समष्टि है और इसलिए संस्कृत (उत्पन्न) होने के कारण अनित्य है। 15 मैंने पहले ही तुम्हें कहा है कि द्वन्द्वों में आनन्द पानेवाले प्राणियों को तुम्हें अत्यन्त स्नेह-रहित (?) अनुकम्पा के साथ देखना चाहिए। 16 जो कुछ उत्पन्न है वह संस्कृत और अनित्य है, किसी सहारे पर आश्रित होने के कारण इसे अपना आश्रय नहीं है। तब किसी के लिए भी नित्यत्व प्राप्त करना शक्य नहीं है।⁸⁸ 17 यदि पृथ्वी के प्राणी नित्य (स्थायी) होते तो, तो जीवन (= प्रवृत्ति) परिवर्तनशील नहीं होता; और तब मुक्ति (निर्वाण) की भी क्या जरूरत होती? क्योंकि अन्त वैसा ही होता जैसा कि आरम्भ। 18 या मेरे लिए तुम्हारी तथा अन्य लोगों की यह अभिलाषा ही क्या? . . .। 19 मैंने सम्पूर्ण मार्ग तुम्हें दृढ़तापूर्वक बतला दिया है। तुम्हें तथा (दूसरे) शिष्यों को समझना चाहिए कि बुद्ध कुछ छिपाते नहीं। 20 चाहे मैं रहूँ या निर्वाण प्राप्त करूँ, एक ही बात है, वह यह कि तथागत धर्म की मूर्ति (= धर्मकाय) हैं; यह मर्त्य शरीर किस काम का? ⁸⁷- “जो ज्ञान से विकसित है” इसकी जगह चीनी अनुवाद में है “जो प्रज्ञा द्वारा अन्धकार को दूर करता है”। ⁸⁸- “किसी नहीं है” की जगह चीनी अनुवाद में है “यह दीनतापूर्वक किसी सहारे पर आश्रित है।” 21 क्योंकि मेरे जाने के समय संवेग व अप्रमाद द्वारा पूर्ण श्रद्धा पूर्वक मेरा प्रदीप जलाया गया है, इसलिए धर्म का प्रकाश हमेशा रहेगा। 22 इसे अपना प्रदीप समझकर तुम्हें इसमें दृढ़ उत्साह के साथ लगना चाहिए; और निर्द्वन्द्व होकर अपना लक्ष्य (= स्वार्थ) पहचानो तथा अपने मन को दूसरी बातों का शिकार मत होने दो। 23 तुम्हें जानना चाहिए कि धर्म-प्रदीप है प्रज्ञा-प्रदीप, जिसके द्वारा चतुर व विद्वान् पुरुष अज्ञान दूर करता है, जैसे कि प्रदीप अन्धकार (दूर करता है)। 24 परम श्रेय प्राप्त करने के चार क्षेत्र (= गोचर) हैं—शरीर, वेदना, चित्त और अनात्मता। 25 अस्थि, चर्म, रक्त, स्नायु, मांस केश आदि से भरे इसे शरीर में गन्दगी देखनेवाले को शरीर के प्रति आसक्ति नहीं होती। 26 वेदनाएँ दुःख हैं और प्रत्येक वेदना भिन्न भिन्न कारणों से उत्पन्न होती है, ऐसा जो देखता है वह सुख के भाव (= सञ्ज्ञा) को जीत लेता है। 27 जो शान्त चित्त से (मानसिक) धर्मों की उत्पत्ति स्थिति व क्षय को देखता है, वह कुदृष्टि को ग्रहण नहीं कर सकता। 28 स्कन्धों की उत्पत्ति कारणों से होती है, ऐसा जो देखता है उसके लिए “अहं” में विश्वास (श्रद्धा) पैदा करनेवाला आत्मभाव बन्द हो जाता है। 29 दुःख अन्त करने का यही एक मार्ग है; इन चारों के बारे में उसी प्रकार (धर्म-) मार्ग पर सावधान रहो। 30 उसी तरह, मेरे उस पार चले जानेपर, जो लोग इस पर स्थित रहेंगे, वे उत्तम अहार्य एवं नैष्ठिक पद प्राप्त करेंगे।” 31 इस तरह विनायक ने आनन्द को उपदेश दिया; और यह समाचार सुनकर, बुद्ध की भक्ति से लिच्छवि वहाँ दौड़े आये। 32 दया एवं मुनि-भक्ति के कारण उनके चित्त संताप से अभिभूत हुए और यह समाचार सुनकर, उन्होंने तुरत उन कार्यों को, जिनमें वे व्यस्त थे, तथा साधारण आडम्बर (= ऋद्धि) को छोड़ दिया। 33 गुरु से बोलने की इच्छा से वे उन्हें प्रणाम करके एक ओर खड़े हो गये और उनकी बोलने की इच्छा जानकर गुरु ने उन्हें यों कहा– 34 “मेरे प्रति तुम लोगों के चित्त में जो कुछ हो रहा है वह सब मैं जानता हूँ; तुम लोग वही होते हुए भी मानो शोक से बदलकर अब.......। 35 लक्ष्मी के साथ रहते हुए भी तुम लोगों में बाहरी दीप्ति और धर्म का ज्ञान दोनों विद्यमान हैं। 36 यदि मुझसे कुछ सुनकर तुम लोगों ने ज्ञान प्राप्त किया है, तो अपने को शान्त करो और मेरे चले जाने (= व्यय) से दुःखी मत होओ। 104 अश्वघोष
37 क्योंकि जीवन (=प्रवृत्ति) अनित्य व संस्कृत है, इसलिए वे नश्वर परिवर्तनशील असार और अविश्वसनीय हैं; उनमें कुछ भी स्थायित्व नही है। 38 वसिष्ठ, अत्रि और दूसरे सभी तपस्वी (ऊर्ध्वरेतस्) काल के वशीभूत हुए। यहाँ का अस्तित्व ही विनाशक है। 39 पृथ्वीपति मान्धाता, वासवतुल्य वसु और भाग्यशाली (=महाभाग) नाभाग (पञ्च-) महाभूतों में मिल गये। 40 मार्ग पर चलनेवाला ययाति भी, भव्य रथवाला भगीरथ, निन्दा व अयश प्राप्त करनेवाले कौरव, राम गिरिरजस, अज, 41 ये महात्मा महर्षि और महेन्द्र के समान अनेक दूसरे लोग नाश को प्राप्त हुए; क्योंकि ऐसा कोई नही जिसका नाश नही होता। 42 सूर्य अपने स्थान से च्युत होता है, सम्पत्तिशाली देवगण पृथ्वी पर आये, शत शत इन्द्र चले गये; क्योंकि कोई सदा नही रहता। 43 दूसरे सब सम्बुद्धों ने जगत् को प्रकाशित कर उन दोषों के समान, जिनका तेल क्षीण हो गया हो, निर्वाण प्राप्त किया। 44 भविष्य में तथागत होनेवाले सब महात्मा भी, उन अग्नियों के समान, जिनका जलावन जल गया हो (=भुक्तेन्धनाः), निर्वाण प्राप्त करेंगे। 45 इसलिए मुझे भी मुक्ति की खोज करनेवाले वनवासी तपस्वी के समान चला जाना चाहिए; क्योंकि मैं जो इस व्यर्थ शारीरिक अस्तित्व (=नाम-रूप) को घसीटूँ, इसका कोई कारण नही। 46 क्योंकि इस रमणीय वैशाली से, जिसमें कुछ लोग दीक्षित होने को हैं ही, मेरा आशय प्रस्थान करने का है, इसलिए तुम्हें दूसरे पथ का अनुसरण न करना चाहिए (या अन्यमनस्क न होना चाहिए)। 47 अतः इस जगत् को निराश्रय दीन व अनित्य जानो; और निष्काम भाव से रहते हुए संवेग प्राप्त करो। 48 इस तरह संक्षेप में, जब क्रम से तथागत फिर न देख पड़ें, तब कुबेर की दिशा (उत्तर) की ओर बढ़ो, जैसे कि जेठ महीने में सूर्य (उत्तर की ओर बढ़ता है)।” 49 तब लिच्छवि अश्रुपूर्ण आँखों से उनके पीछे पीछे जाने लगे; और आभूषणों-भरी मोटी भुजाओं से उन्होंने हाथ (=करतल) जोड़कर विलाप किया:– 50 “अहो! विशुद्ध-सुवर्ण-सदृश गुरु का शरीर, जो 32 लक्षणों से युक्त है, भग्न होगा। करुणामय भगवान् भी अनित्य हैं। 51 बेचारे बछड़े, जिन्हें अबतक होश (बुद्धि) नही हुआ है, दूध के अभाव में प्यासे हैं, और ज्ञान की दुधार गाय, अहो! उन्हें अति शीघ्रता से छोड़ रही है। 52 मुनि वह सूर्य हैं, जिनके ज्ञानरूपी प्रकाश ने प्रदीप-रहित मनुष्यों का मोहान्धकार दूर कर दिया है, और यह सूर्य हठात् ही अस्त होगा। 53 जब कि जगत् में अज्ञान-धारा जहाँ तहाँ बह रही है, धर्म का दूरव्यापी बाँध शीघ्र ही टूट रहा है। 54 करुणामय महाभिषक् को उत्तम ज्ञानरूपी ओषधि है, तो भी मानसिक आधियों से पीड़ित जगत् को छोड़कर वह प्रस्थान करेंगे। 55 मन के हीरों से अलङ्कृत और प्रज्ञारूपी आभूषणों से भूषित इन्द्र-पताका का पतन होगा, जब कि उत्सव के अवसर पर लोग इसके प्यासे ही हैं। 56 दुःख-भागी जगत् के लिए, जो भव-चक्र के बन्धनों से बँधा हुआ है, यह मुक्ति-द्वार है और मौत इसे दृढ़तापूर्वक बन्द कर देगी।” 57 इस प्रकार अश्रु-आविल आँखों से लिच्छवियों ने विलाप किया और जब वे उनके पीछे पीछे जाने लगे, तो मुनि ने उन्हें फिर लौटा दिया। 58 तब मुनि का निश्चय जानकर वे शान्त हो गये और अत्यन्त शोकित होकर उन्होंने लौटने का विचार किया। 59 वे, जो सोने के पहाड़ के समान सुन्दर थे, मुनि के पाँव पड़ते समय कर्णिकार वृक्षों के समान शोभित हुए जिनके फूल हवा में हिल रहे हों। 60 उनके हृदय उनमें अनुरक्त थे, उनके पाँव लड़खड़ा रहे थे, और धारा के विरुद्ध चलती हुई तरङ्गों के समान, वे आगे बढ़े बिना ही लौट गये। *61 .... .... , मुनि में उनका आनन्द और मुनि के प्रति उनकी श्रद्धा अविचल थी। *62 जङ्गल के गवांमति के चले जानेपर महावृषभों के समान वे खड़े हो होकर दशबलधारी की ओर बार बार देख रहे थे। 63 तब तथागत में लगे चित्त से और अत्यन्त कान्तिहीन शरीर से वे शोकित होकर पैदल ही जाने लगे, जैसे अन्त्य कर्म के मृत-स्नान के लिए जा रहे हों।⁸⁹ *64 लिच्छवि (लाचार होकर) अपने महलों में लौट आये और यद्यपि उन्होंने धनुषों से, जिनका निशाना कभी चूका नही, शत्रुओं को पराजित किया था, यद्यपि वे अभिमानी एवं बलवान् थे, यद्यपि वे संसार में साम्राज्य पाने के लिए यत्न करते थे और यद्यपि सुख के साधनों पर उनका अधिकार महान् था, तो भी वे विषण्णवदन थे। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “लिच्छवियों पर अनुकम्पा” नामक 24वाँ सर्ग समाप्त ॥ ⁸⁹ - किसी के मरनेपर स्नान करनेवाले को “अपस्नात” या “मृतस्नात” कहते हैं। बुद्धचरित 105
पच्चीसवाँ सर्ग
निर्वाण-पथपर
**** 1 जब मुनि निर्वाण के लिए चले तब वैशाली निष्प्रभ हो गई, जैसे कि सूर्य ग्रहण होनेपर अन्धकार से ढँका हुआ आकाश (निष्प्रभ हो जाता है)। **** 2 सुन्दर और निरभिमान होनेपर भी, सर्वत्र रमणीय होनेपर भी यह (वैशाली) संताप के कारण शोभित नही हुई, जैसे कि पति के मरनेपर पत्नी, **** 3 जैसे कि विद्या के बिना सुन्दरता, जैसे कि गुण के बिना ज्ञान, जैसे अभिव्यक्ति (की शक्ति) के बिना बुद्धि, जैसे संस्कार के बिना अभिव्यक्ति (की शक्ति), **** 4 जैसे सदाचार के बिना श्री, जैसे श्रद्धा के बिना स्नेह, जैसे उद्योग के बिना लक्ष्मी, जैसे धर्म के बिना कर्म। **** 5 ...उस समय शोक के कारण यह शोभित नही हुई, जैसे शरदऋतु में वर्षा न होनेपर सूखी हुई धान की फसल के साथ पृथ्वी शोभा नही पाती है। **** 6 वहाँ शोक के कारण न किसी ने रसोई बनाई, न भोजन ही किया; यशस्वी मुनि का यश बखानते हुए वे रोते रहे। **** 7 दूसरे लोग न कुछ बोल रहे थे; न कर रहे थे और न सोच रहे थे; नगर में एक ही काम हो रहा था--शोक और क्रन्दन। **** 8 तब सेनापति सिंह अत्यन्त दृढ़ होनेपर भी शोकाकुल हुआ और... ...सोचते हुए यों विलाप किया:-- **** 9 “विधर्मी दर्शनों को पराजित कर, उन्होंने सन्मार्ग का उपदेश दिया और स्वयं उस मार्ग पर चले। अब वह सदा के लिए जा रहे हैं। **** 10 वह नाथ, दुःखी और निष्प्रभ जगत् को छोड़ते हुए, लोगों को अनाथ कर रहे हैं; इस तरह वह शान्ति (= शम) प्राप्त करने जा रहे हैं। **** 11 जैसे काल-क्रम से (बुढ़ापे में) शारीरिक ओज क्षीण होता है, वैसे ही मेरा धैर्य नष्ट हो रहा है, क्योंकि गुरुवर योगाचार्य अन्तिम शान्ति के मार्ग पर हैं। **** 12 अपनी दिव्य शक्ति खोकर स्वर्ग से च्युत हुए नृपति नहुष के समान पृथ्वी उनके बिना दया का पात्र है, और मैं “किंकर्तव्यविमूढ़” हूँ। **** 13 जैसे आतप से पीड़ित व्यक्ति पानी की शरण में जाता है या शीत से पीड़ित आग की शरण में, वैसे ही अपनी शंकाएं मिटाने के लिए लोग अब किसकी शरण जायेंगें? **** 14 मुनि के नष्ट होनेपर-मुनि जो संसार के आचार्य (=लोकाचार्य) हैं और जो आग सुलगानेवाली भाथी की तरह श्रेय की भाथी हैं-धर्म भी नष्ट हो जायगा। **** 15 उनके समान दूसरा कौन हैं जो स्वभावतः रोग व मौत के वशीभूत तथा शील के अभाव या दुःशील से बँधे प्राणियों का महादुःख-चक्र तोड़ सके? **** 16 जैसे वसन्त के अन्त में बादल सूखे हुए सिन्दुवार पौधों को जीवन-दान करता है, वैसे ही कौन दूसरा अपनी वाणी द्वारा काम से अत्यन्त जले हुए मनुष्यों को जिला सकता है? **** 17 जब मेरु के समान ठोस सर्वज्ञ गुरु चले जायेंगे, तब जगत् में किसे वह बुद्धि होगी, जिससे वह विश्वास-पात्र बनेगा? **** 18 मूढ़ जीव-लोक मरने के लिए ही पैदा होता है, जैसे दण्डनीय अपराधी को मद पिलाकर वध-स्थल की ओर ले जाते हैं। **** 19 जैसे तेज आरे से वृक्ष चीरा जाता है, वैसे ही विनाशरूपी आरे से यह संसार चीरा जा रहा है। **** *20 यद्यपि जगत् के श्रेष्ठ आचार्य को ज्ञान-बल प्राप्त है और उन्होंने दोषों को निःशेष जला डाला है, तो भी वह विनाश की ओर जा रहे हैं। **** 21 जो ज्ञानरूपी महानौका द्वारा संसार-सागर से-इच्छाएँ जिसकी तरंगें हैं, अज्ञान जिसका जल है और जिसमें कुदृष्टिरूपी प्राणी तथा काम (=रजस) रूपी मछलियाँ रहती हैं-लोगों को उबारते हैं; **** 22 जो ज्ञानरूपी महाशस्त्र से संसाररूपी वृक्ष को-बुढ़ापा जिसकी शाखाएँ हैं, रोग जिसके फूल हैं, मौत जिसका मूल है और जन्म जिसके अङ्कुर हैं-काटते हैं; **** 23 जो ज्ञानरूपी शीतल जल द्वारा, अज्ञानरूपी अरणियों से उत्पन्न दोषरूपी अग्नि को-काम जिसकी ज्वालाएँ हैं और विषय जिसके ईंधन है-शान्त करते हैं; **** 24 जिन्होंने शान्ति मार्ग ग्रहण किया है, जिन्होंने अज्ञानरूपी महा-अन्धकार का परित्याग किया है, परम नैष्ठिक ज्ञान प्राप्तकर जिन्होंने इसका प्रेमपूर्वक उपदेश दिया है; **** 25 जिन्होंने सब दोषों को अन्त कर लिया है, जो सब जीवों पर दया-दृष्टि रखते हैं और जो सबका उपकार करते हैं, वह सर्वज्ञ सब कुछ छोड़ने जा रहे हैं। **** 26 यदि महामुनि भी, जिनकी भुजाएँ बड़ी बड़ी हैं और जिनकी वाणी मृदु एवं स्पष्ट है, नाश को प्राप्त हो रहे हैं, तो नाश को प्राप्त होने से कौन बच सकेगा? **** 27 अतः बुद्धिमान् मनुष्य को शीघ्र ही धर्म की शरण में जाना चाहिए, जैसे कि जङ्गल में भटका हुआ काफिले का सौदागर, पानी देखकर, तेजी से उसकी शरण में जाता है। **** 28 अनित्यता एक बुराई है जो विनाश-कार्य में भेद-भाव नही रखती है, ऐसा जानकर जो मनुष्य धर्म के विषय में प्रसुप्त नही रहता, वह पड़े रहनेपर भी प्रसुप्त नहीं हैं।” **** 29 तब ज्ञानोपभोक्ता नरसिंह सिंह ने जन्म की बुराइयों की निन्दा की और जन्म-विनाश की प्रशंसा।
**** 106 अश्वघोष
30 जन्म-मूलोच्छेद करने की, सद्रत ग्रहण करने की और चञ्चल चित्त को संयत करने की इच्छा से उसने नैष्ठिक मार्ग पर चलने की इच्छा की। 31 शान्ति-मार्ग पर चलने की, भव-सागर में त्राण पाने की और सदा उदार रहने की इच्छा से उसने जन्म-उच्छेद करना चाहा। 32 उस समय जब कि मुनि निर्वाण प्राप्त करने की इच्छा कर रहे थे, उस सिंह ने दान दिया और अभिमान-परित्याग किया, धर्म का ध्यान किया और शान्ति प्राप्त की, और इस तरह उसने पृथ्वी को शून्य पद समझा। 33 तब गजराज के समान अपना सारा शरीर घुमाकर नगर की ओर देखते हुए, मुनि ने यह वचन कहे :- 34 "हे वैशाली, अपने जीवन के शेष भाग में मैं तुम्हें फिर न देखूँगा; क्योंकि, मैं निर्वाण की ओर जा रहा हूँ।" *35 श्रद्धापूर्वक और धर्म की इच्छा से वे पीछे-पीछे आ रहे हैं, यह देखकर मुनि ने उन्हें विदा किया, जिनका चित्त उस समय तक प्रवृत्ति में ही लगा हुआ था। 36 तब यथाक्रम विनायक भोगनगर की ओर बढ़े और वहाँ ठहरकर सर्वज्ञ ने अपने अनुचरों से कहा:- 37 "आज मेरे चले जानेपर तुम्हें धर्म में अपना श्रेष्ठ ध्यान लगाना चाहिए। यही तुम्हारा चरम लक्ष्य है; इसके अतिरिक्त सब कुछ केवल श्रम है। 38 जो कुछ सूत्रों में समाविष्ट न हो या विनय में दिखाई न पड़े वह सब मेरे सिद्धान्त के प्रतिकूल है और उसे किसी भी प्रकार ग्रहण न करना चाहिए। 39 क्योंकि वह न तो धर्म है, न विनय, और न मेरे वचन; यद्यपि बहुत से लोग उसे कहते हों, तो भी अज्ञान-जन्य वचन की तरह उसे अस्वीकार करना चाहिए। 40 जो पवित्र हैं उनका उपदेश ग्राह्य है, क्योंकि वही है धर्म, विनय और मेरे वचन; और इसके अनुसार नही चलना गड्ढे में गिरना है। 41 इसलिए जो कुछ श्रद्धा के योग्य है वह संक्षेप से मेरे सूत्रों में कहा गया है। जो कोई उनके अनुसार चलता है, वह विश्वसनीय है, और इसे छोड़कर दूसरा कोई प्रमाण नही (= तस्मादृते नास्ति प्रमाणमन्यत्)। 42 मोह-वश अधर्म का प्रतिपादन करनेवाले धार्मिक शास्त्रों की उत्पत्ति होगी, मेरे इन सूक्ष्म विचारों के विषय में अज्ञान और अनिश्चय होने से, 43 या अज्ञान-मिश्रित विचारों के कारण या विभेदों का ज्ञान नही होने से, जैसे कि सोने के समान दिखाई पड़नेवाले पीतल से लोग ठगे जाते हैं। 44 इस प्रकार जो धर्म नही है, किन्तु धर्म का कपट-रूपमात्र, वह वञ्चना है, जिसकी उत्पत्ति होती है प्रज्ञा के अभाव से या तत्त्व को न समझ सकने के कारण। 45 इसलिए विनय एवं सूत्रों की सहायता से तुम्हें इसकी उचित रीति से (= न्यायतः) परीक्षा करनी चाहिए, जैसे कि सुनार सोने को तपाकर, काटकर और तार बनाकर परखता है। 46 वे मनुष्य बुद्धिमान् नहीं, जो शास्त्रों को नहीं जानते; वे अनुचित (अन्याय) मार्ग को उचित (न्याय) मार्ग समझते हैं और उचित मार्ग को अनुचित। 47 इसलिए शब्द और अर्थ के अनुसार ठीक-ठीक सुनकर इसे ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि जो कोई शास्त्र को अनुचित रीति से ग्रहण करता है वह अपने को ही क्षति पहुँचाता है, जैसे कि तलवार को अनुचित रीति से ग्रहण करनेवाला अपने को ही काटता है। 48 जो शब्द को ठीक ठीक नही समझता है उसके लिए अर्थ दुर्लभ हो जाता है, जैसे कि रात्रि काल में किसी आदमी के लिए उस घर को पाना (खोजना) कठिन हो जाता है, जहाँ वह पहले कभी न गया हो और जहाँ का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा हो। 49 जब अर्थ नष्ट हो जाता है तो धर्म (शास्त्र) नष्ट हो जाता है और धर्म के नष्ट होनेपर योग्यता (पात्रता) नष्ट हो जाती है; इसलिए वह बुद्धिमान् है जिसका चित्त अर्थ को ठीक ठीक समझता है।" 50 जब भगवान् ये वचन कह चुके, तब वह यथासमय पापानगर में गये, जहाँ मल्लों ने उनका पूरा सम्मान किया। 51 तब भगवान् ने अपने भक्त चुन्द के घर-उसी के लिए, न कि अपने सहारे के लिए-अन्तिम भोजन किया। 52 तब अपनी शिष्य-मण्डली के साथ भोजन कर चुकनेपर तथागत ने चुन्द को धर्मोपदेश दिया और फिर कुशीनगर चले गये। 53 इस तरह चुन्द के साथ उन्होंने इरावती नदी पार की और स्वयं उस नगर के एक उपवन में शरण ली, जहाँ कमलों का एक शान्त सरोवर था।⁹⁰ 54 उन्होंने, जो सोने के समान चमक रहे थे, हिरण्यवती नदी में स्नान किया और तब शोकाकुल आनन्द को, जो संसार का आनन्द (= लोकानन्द) था, इस प्रकार आदेश दिया:- 55 "आनन्द, इन जोड़े शाल-वृक्षों के बीच मेरे लेटने के लिए स्थान तैयार करो; आज रात्रि के उत्तर भाग में तथागत निर्वाण प्राप्त करेगा।" ⁹⁰- "इरावती" के अन्य वैकल्पिक रूप "अचिरावती" "अजिरावती" और "ऐरावती" हो सकते हैं। चीनी अनुवाद में "कुकु" शब्द है, जो पालि के "ककुत्था" के लिए आया है। बुद्धचरित 107
56 जब आनन्द ने ये वचन सुने, तब आँसुओं से उसकी आँखें भर गई, उसने बुद्ध के लेटने के लिए स्थान तैयार किया और वैसा कर चुकनेपर, विलाप करते हुए उन्हें इसकी सूचना दी। 57 तब वह नर-श्रेष्ठ चिरनिद्रा के निमित्त तथा सब दुःखों का अन्त करने के लिए अपनी अन्तिम शय्या के समीप गये। 58 अपने शिष्यों के सम्मुख हाथीरूप उपधानपर शिर तथा एक पाँवपर दूसरा पाँव रखते हुए वह दाईं करवट लेट गये। 59 तब उस समय पक्षियों ने शब्द नहीं किया और वे (पक्षी) शिथिल-शरीर हो बैठे रहे, जैसे ध्यानावस्थित हों। 60 तब वृक्षों ने, जिनके पत्ते हवा से प्रेरित हुए बिना ही हिल रहे थे, विवर्ण फूल गिराये, मानो रो रहे हों। 61 जैसे दिवाकर के अस्ताचलपर आनेपर, पथिकों को विश्रामभूमि दिखाई पड़ती है, वैसे ही अन्तिम शय्यापर मुनि को देखकर उन्हें (शिष्यों को) शीघ्र ही उत्तम लक्ष्य दृष्टिगोचर हुआ। 62 तब अन्तिम विश्राम-भूमिपर पड़े हुए सर्वज्ञ ने अश्रु-आविल आनन्द से दयापूर्वक कहाः- 63 “मल्लों से, हे आनन्द, मेरे निर्वाण-प्राप्ति के समय के बारे में कहो; क्योंकि यदि वे निर्वाण न देखेंगे, तो पीछे बहुत पछतायेंगे।” 64 तब आँसुओं से मूर्छित होते आनन्द ने आज्ञा-पालन किया और मल्लों से कहा- “मुनि अन्तिम शय्यापर पड़े हुए हैं।” 65 तब उस समय आनन्द के वचन सुनकर, दुःख से अभिभूत हो, शोक करते हुए और आँखों से आँसू बहाते हुए वे नगर से ऐसे निकले, जैसे सिंह से डर से साँड़ पर्वत से निकल रहे हों। 66 आनन्द-रहित होने के कारण उनके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और पगों के संक्षोभ से उनके शिरोवस्त्र काँप रहे थे। तब वे उस उपवन में उन देवों के समान दुःखी होकर आये, जिनके पुण्य क्षीण हो गये हों। 67 इस तरह वहाँ आकर उन्होंने मुनि को देखा और देखने के बाद उन्हें प्रणाम करते समय उनके मुख आँसुओं से भर गये। सम्मान प्रकट करनेपर संतप्त हृदय से वे वहाँ खड़े रहे और मुनि ने उन्हें कहाः- 68 “आनन्द के समय शोक करना उचित नहीं। नैराश्य 'अस्थाने' है, शान्ति प्राप्त करो। वह अतिदुर्लभ लक्ष्य, जिसकी मैंने कल्पों से अभिलाषा की है, अब मेरे समीप आ गया है। 69 वह लक्ष्य अति उत्तम है, भूमि जल अनल-अनिल व शून्य-इन तत्त्वों से रहित है, सुखमय व अविकारी है, अतीन्द्रिय शान्त और अहार्य है, उदय एवं व्यय से रहित है। यह सुनकर शोक के लिए स्थान नहीं।
70 पूर्व में बोधि के समय गया में मैंने अकुशल जन्म के कारणों को सर्पों के समान काट डाला; किन्तु अतीत में एकत्र हुए कर्मों का यह निवास-गृह-यह शरीर-आज तक बचा हुआ है। 71 क्या मेरे लिए शोक करना उचित है जो तुम सब रो रहे हो, जब कि यह समष्टि-दुःख का महा-कोषगृह-व्यय को प्राप्त हो रहा है, जब कि जन्म का महाभय उन्मूलित हो रहा है और जब कि मैं महादुःख से विदा हो रहा हूँ?” 72 जब उन्होंने शाक्यमुनि को बादल की-सी आवाज में यह कहते सुना कि उनके लिए शान्ति (निर्वाण) प्राप्त करने का समय आ गया है, तब बोलने की इच्छा से उनके मुख विकसित हुए और उनमें से वृद्धतम ने ये वचन कहे:- 73 “क्या शोक करना उचित है जो तुम सब रो रहे हो? मुनि उस मनुष्य के समान हैं जो आग- लगे घर से बच निकला हो, और जब कि देवों के अधिपति भी इसे ऐसा ही समझें तब मनुजों का क्या कहना? 74 किन्तु इससे हमें दुःख हो रहा है कि शास्ता तथागत निर्वाण प्राप्तकर लेनेपर फिर दिखाई न पड़ेंगे; मरुभूमि में उत्तम पथ-प्रदर्शक के मरनेपर किसे अत्यन्त दुःख न होगा? 75 सोने की खान से दरिद्र होकर आनेवालों के समान वे लोग अवश्य ही उपहास के पात्र हैं जो महर्षि सर्वज्ञ गुरु का साक्षात् दर्शनकर सन्मार्ग (= विशेष) न प्राप्त करें।” 76 इस तरह मल्लों ने पुत्रवत् हाथ जोड़कर बहुत कुछ युक्ति-युक्त कहा और श्रेष्ठ महात्मा ने उत्तम- अर्थ-भरे शब्दों में परम श्रेय एवं शान्ति के उद्देश से यों उत्तर दियाः- 77 “सच तो यह है कि कठोर योगाचार के बिना केवल मेरे दर्शन से ही मुक्ति (निर्वाण) नहीं मिलती; जो कोई मेरे इस धर्म को ठीक-ठीक समझता है वह मेरे दर्शन के बिना भी दुःख के जाल से मुक्त हो जाता है। 78 जैसे कोई मनुष्य ओषधि-सेवन किये बिना केवल वैद्य को देखकर ही रोगमुक्त नहीं हो जाता, वैसे ही जो कोई मेरे इस धर्म की भावना नहीं करता वह मेरे दर्शन से ही दुःख-मुक्त नहीं हो जाता है। 79 इस जगत् में मेरे धर्म को देखनेवाला संयतात्मा मनुष्य दूरवर्ती होनेपर भी मुझे देखता है; और जो श्रेय-परायण नहीं है वह मेरे बगल में रहकर भी बहुत दूर में रहता है। 80 इसलिए सदा आलस्य-रहित (वीर्यवान्) रहो और मन को वश में रक्खो; परिश्रमपूर्वक श्रेयस्कर कार्य करो, क्योंकि हवा में जलती दीप-शिखा के समान जीवन चञ्चल और महादुःख के वशीभूत है।” 81 इस तरह मुनि द्वारा, श्रेष्ठ प्राणी द्वारा, उपदिष्ट होकर वे, जिनके चित्त संतप्त थे और जिनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, अनिच्छा एवं दीनतापूर्वक कुशीनगर की ओर लौट गये, जैसे प्रतिकूल धारा में नदी का मध्य भाग पार कर रहे हों। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “निर्वाण-पथपर” नामक 25वाँ सर्ग समाप्त ॥
108 अश्वघोष
छब्बीसवाँ सर्ग
महापरिनिर्वाण
1 तब त्रिदण्डी सुभद्र ने, जो सद्गुणों से सम्यक् युक्त था और जो किसी जीव को क्लेश नही देता था, भिक्षु होकर निर्वाण प्राप्त करने के उद्देश से मुनि को देखना चाहा। अतः उसने सबको आनन्दित करनेवाले आनन्द से कहा:— 2 “मैंने सुना है कि मुनि की निर्वाण-प्राप्ति की घड़ी (वेला) आ गई है और इसलिए मैं उन्हें देखना चाहता हूँ; क्योंकि इस जगत् में प्रतिपदा के चाँद के समान परम धर्म में प्रवेश पाये हुए का दर्शन दुर्लभ है। 3 मैं आपके विनायक को देखना चाहता हूँ, जो सब दुःखों के अन्त की ओर जानेवाले हैं; बादलों में छिपकर डूबते हुए सूरज के समान वह मेरे देखे बिना ही व्यय (अस्त) को प्राप्त न हों।” 4 धर्म-पिपासा के बहाने यह परिव्राजक विवाद करने आया है, इस विचार से आनन्द का चित्त भावाविष्ट हो गया; और अश्रु-पूर्ण मुख से उसने कहा, “यह (उपयुक्त) समय नही।” 5 तब, परिव्राजक की दृष्टि (फूल की) पंखुड़ी के समान विकसित हो रही है, यह देखकर मनुष्यों के आशय जाननेवाले चन्द्रोज्ज्वल मुनि ने कहा, “हे आनन्द द्विज को न रोको, क्योंकि मेरा जन्म जगत् के हित के लिए हुआ था।” 6 तब आश्वस्त एवं परम प्रसन्न होकर सुभद्र श्रेय-विधायक श्रीघन के समीप गया; और अवसर के अनुकूल शान्त भाव से उन्हें अभिवादन कर उसने ये वचन कहे:— 7 “कहा जाता है कि आपने निर्वाण-मार्ग प्राप्त किया है जो मेरे जैसे दार्शनिकों (=परीक्षक) के (मोक्ष-) मार्ग से भिन्न है; अतः मुझसे इसकी व्याख्या कीजिए, क्योंकि मैं इसे ग्रहण करना चाहता हूँ। आपको देखने की मेरी इच्छा का कारण स्नेह है, न कि विवाद करने की चाह।” 8 तब समीप आये द्विज से बुद्ध ने अष्टाङ्गिक मार्ग की व्याख्या की और उसने इसे ध्यानपूर्वक सुना, जैसे कि मार्ग से भटका हुआ मनुष्य सही आदेश को ध्यानपूर्वक सुनता है, और उसने इसपर .... ..... अच्छी तरह विचार किया। 9 तब उसने देखा कि जिन रास्तों पर पहले वह चला था उनपर चलने से श्रेय प्राप्त नही होता है, और अदृष्टपूर्व मार्ग प्राप्तकर उसने दूसरे रास्तों का परित्याग किया जो कि हृदय के अन्धकार से युक्त हैं। 10 क्योंकि उन मार्गों पर, कहते हैं, रजस्-युक्त तमस् प्राप्त करने से अकुशल कर्म एकत्र होते हैं, और सत्त्व-युक्त रजस् द्वारा कुशल कर्म बढ़ते हैं।
11 विद्या, बुद्धि व प्रयत्न द्वारा सत्त्व की वृद्धि होने से तथा रजस् व तमस् का तिरोभाव होने से कर्म-फल का नाश होने के कारण कर्म-फल क्षीण हो जाता है (ऐसा वे कहते हैं), और उस कर्म-शक्ति को, जिसे वे मानते हैं, स्वभाव का परिणाम कहते हैं। 12 संसार में चित्त को मोह में डालनेवाले रजस् और तमस् का कारण वे स्वभाव बताते हैं। क्योंकि स्वभाव नित्य माना जाता है इसलिए वे दोनों (रजस् और तमम्) भी नित्य हैं, और उनका अभाव नही हो सकता। 13 यदि किसी व्यक्ति के सत्त्वयुक्त होनेपर उन दोनों का अभाव हो भी जाय, तो काल-वश उनका फिर प्रादुर्भाव होगा, जैसे कि पानी, जो रात को धीरे-धीरे बर्फ बन जाता है, काल-क्रम से फिर अपनी स्वाभाविक अवस्था को लौट जाता है। 14 क्योंकि सत्त्व स्वभावतः नित्य है, इसलिए विद्या, बुद्धि व प्रयत्न इसे बढ़ा नही सकते; और क्योंकि इसकी वृद्धि नही होती, इसलिए उन दोनों का नाश नही होता और क्योंकि उनका नाश नही होता, इसलिए (उन मार्गों पर चलने से) नैष्ठिक शान्ति नही होती। 15 पहले उसका मत था कि जन्म स्वभाव से होता है, अब उसने देखा कि उस मत में (वस्तुतः) मोक्ष नही है; क्योंकि यदि जीवन स्वाभाविक है, तो मोक्ष वैसे ही असम्भव है जैसे कि प्रज्वलित अग्नि से निकलते हुए प्रकाश को रोकना। 16 बुद्ध के मार्ग को सत्य देखकर उसने संसार को इच्छा पर आश्रित समझा, इच्छा का नाश होनेपर शान्ति (= शम) मिलती है, क्योंकि कारण का विनाश होने से कार्य का भी विनाश होता है। 17 पहले उसका मत था कि आत्मा शरीर से भिन्न है और विकारवान् (परिवर्तनशील) नही है, अब मुनि के वचन सुनने से उसने जाना कि जगत् अनात्म है और (जगत्) आत्मा का परिणाम नही है। 18 यह जानकर कि जन्म अनेक धर्मों के पारस्परिक सम्बन्ध पर आश्रित है, और कुछ भी अपने पर आश्रित नही है, उसने देखा कि प्रवृत्ति दुःख है और निवृत्ति है दुःख से मुक्ति। 19 संसार को एक परिणाम समझकर उसने प्रलय का सिद्धान्त छोड़ा, और संसार का व्यय होता है, यह जानकर उसने नित्यता का मत धैर्यपूर्वक शीघ्र ही छोड़ा। 20 महामुनि का उपदेश सुनकर और ग्रहण कर, उसने अपने पूर्व मतों का तुरत परित्याग किया; क्योंकि उसने पहले ही अपने को तैयार कर लिया था, जिससे सद्धर्म में वह शीघ्र ही लग गया। 21 उसका चित्त श्रद्धा-युक्त हो गया और परम (धर्म) को पाकर उसने शान्त और अविकारी पद प्राप्त किया; और इसलिए, वहाँ लेटे हुए मुनि की ओर कृतज्ञतापूर्वक देखते हुए, उसने यह निश्चय किया:—
बुद्धचरित 109
22 “मेरे लिए यह उचित नही कि यहाँ रहकर मैं पूज्य एवं श्रेष्ठ शास्ता की निर्वाण-प्राप्ति देखूँ; करुणामय शास्ता की निर्वाण-प्राप्ति से पूर्व ही मैं स्वयं सीधे नैष्ठिक अन्त को प्राप्त होऊँगा।” 23 तब मुनि को प्रणाम कर, वह साँप की तरह निश्चल हो गया और हवा से विलीन हुए बादल के समान एक ही क्षण में निर्वाण की शान्ति में प्रविष्ट हुआ। 24 तब संस्कार के जाननेवाले मुनि ने उसके दाह-संस्कार के लिए यह कहते हुए आदेश दिया, “उत्तम शिष्यवाले महामुनि का यह अन्तिम शिष्य अन्त को प्राप्त हुआ।” 25 जब रात का पूर्व भाग बीत गया, चन्द्रमा ने ताराओं का प्रकाश ग्रस लिया, और उपवन ऐसे नीरव हो गये जैसे सोये हुए हों, तब महाकारुणिक ने अपने शिष्यों को उपदेश दिया:- 26 “मेरे उस पार चले जानेपर तुम्हें प्रातिमोक्ष को अपना आचार्य, अपना प्रदीप और अपना कोष समझना चाहिए। वही तुम्हारा उपदेशक है, जिसके अधीन तुम्हें रहना चाहिए और तुम्हें इसकी आवृत्ति करनी चाहिए, जैसे कि मेरे जीवन-काल में करते थे।⁹¹ 27 शारीरिक और वाणी के कर्मों की शुद्धि के लिए सब सांसारिक कार्यों (= व्यवहार) को छोड़ो तथा भूमि, जीव, अन्न और कोष आदि लेने से (= √ग्रह) वैसे ही बचो जैसे कि आग पकड़ने से (= √ग्रह)। 28 पृथ्वी पर जो कुछ पैदा होता है उसे काट गिराने से, धरती को खोदने व जोतने से तथा ओषधि एवं ज्योतिष (के व्यवसाय) से विरत रहना जीविका का उचित उपाय है। 29 घटक (मध्यस्थ) का ज्ञान प्राप्त करने में, तन्त्र-मन्त्र के प्रयोग में, कुटिल एवं कपटी होने में या शास्त्र-सम्मत सिद्धियों में, न संयम है न संतोष और न जीवन ही। 30 इस प्रकार प्रातिमोक्ष शील का सार है, मुक्ति का मूल है; इससे समाधि, समस्त ज्ञान एवं अन्तिम लक्ष्य प्राप्त होते हैं। 31 इसलिए वही धर्मवान् है जिसका शील विशुद्ध व अखण्ड है, अविच्छिन्न व अविनष्ट है, क्योंकि शील ही सद्गुणों का आश्रय है। 32 शील के अक्षुण्ण व विशुद्ध रहनेपर इन्द्रिय चञ्चल नहीं रहते; क्योंकि जैसे लाठी लेकर पशुओं को फसल से दूर रखते हैं वैसे ही दृढ़तापूर्वक छः इन्द्रियों की (विषयों से) रक्षा (= संवरण) करनी चाहिए। 33 विषयों के बीच इन्द्रियरूपी घोड़ों को (स्वतन्त्र) छोड़नेवाला मनुष्य (सन्मार्ग से) बहकता है और उन (विषयों) से तृप्ति नही पाता है। कुमार्ग-गामी घोड़ों के कारण मार्ग-भ्रष्ट हुए के समान वह उनके कारण विपत्ति भोगता है। 34 इस जगत् में कुछ लोग महाशत्रुओं के हाथ में पड़कर दारुण दुःख भोगते हैं, किन्तु मोहवश विषयों के वशीभूत होनेवाले लोग विवश होकर इस जन्म में और जन्मान्तरों में दुःख के अधीन होते हैं। 35 अतः इन्द्रियों से वैसे ही दूर रहना चाहिए, जैसे कि बुरे (=विषम) विपक्षी राजाओं से; क्योंकि इस जगत् में इन्द्रिय-सुख भोगने के बाद मनुष्य जगत् में इन्द्रियों के जल्लाद को देखता है। 36 संसार में बाघ, साँप, जलती आग या शत्रु से उतना नही डरना चाहिए जितना कि अपने ही चञ्चल चित्त से, जो मधु को देखता है किन्तु खतरे को नही।⁹² 37 लोहे के अङ्कुश से अनियन्त्रित मतवाले हाथी के समान या वृक्षों पर कूदनेवाले शाखामृग के समान चित्त स्वेच्छानुसार सब दिशाओं में घूमता रहता है; इसे चञ्चलता का अवसर ही न देना चाहिए। 38 चित्त के स्वतन्त्र रहनेपर शान्ति नही मिलती, किन्तु इसके स्थिर होनेपर कार्य पूरा होता है। इसलिए यथाशक्ति यत्न करो जिससे तुम्हारे ये चित्त चञ्चलता से विरत हो जायँ। 39 ओषधि की मात्रा के समान भोजन की उचित मात्रा का पालन करो, और इससे अनुराग या घृणा न करो, उतना ही खाओ जितना कि क्षुधा-शान्ति और शरीर-रक्षा के लिए आवश्यक है।⁹³ 40 जैसे उद्यान में रस-पान करते हुए भौंरे फूलों को नष्ट नही करते, वैसे ही अन्य मतावलम्बियों का विनाश नही करते हुए (अन्य मतावलम्बी गृहस्थों के लिए भार-स्वरूप नही होते हुए) उचित समयपर भिक्षाटन करो।⁹⁴ 41 अत्यन्त भारी बोझ नही रखना चाहिए, यह नियम बैल और दाता दोनों के लिए ही लागू है, इस संसार में अत्यन्त भारी बोझ से दबकर बैल गिर पड़ता है और जो हाल बैल का है वही दाता का भी।⁹⁵ 91- प्रातिमोक्ष = भिक्षु-जीवन के पापनिशेधक नियम। 92- “यथा पश्यति मध्वेव न प्रपातमवेक्षते।”—सौन्दरनन्द ग्यारह 29। 93- “भोजने भव मात्राज्ञ ”—सौन्दरनन्द 14.1 भोजन और नींद के लिए देखिये—सौन्दरनन्द सर्ग 14 94- “यथापि भ्रमरो पुष्पं वण्णगन्धं अहेठयं। पलेति रसमादाय एवं गामे मुनी चरे॥”—धम्मपद 4.6 “जिस प्रकार फूल के वर्ण या गन्ध को बिना हानि पहुँचाये भ्रमर रस को लेकर चल देता है, उसी प्रकार मुनि गाँव में विचरण करे।” 95 - पूर्वार्ध का अनुवाद स्वतन्त्र है और उत्तरार्ध का चीनी अनुवाद के आधार पर। 110 अश्वघोष
42 सारा दिन और रात का प्रथम व अन्तिम भाग (= याम) योगाचार में बिताओ और मध्य भाग में स्मृतिपूर्वक सोओ, जिससे कोई अनर्थ न हो। 43 कालरूपी अग्नि से संसार के जलते रहनेपर क्या सारी रात सोना उचित है? जब कि हृदय में रहनेवाले दोष शत्रुओं के समान प्रहार करते हैं, तब कौन नींद के वशीभूत हो? 44 इसलिए, जैसे कि मन्त्र आदि से कृष्ण सर्प को घर से बाहर किया जाता है, वैसे ही ज्ञान और मन्त्रोच्चारण द्वारा हृदय में रहनेवाले दोषरूपी साँपों को भगाकर तुम्हें सोना चाहिए, .... .... । 45 लज्जा (= ह्री) एक आभूषण है और उत्तम वस्त्र है, मार्गभ्रष्टों के लिए अङ्कुश है। ऐसा होनेपर तुम्हें लज्जा होनी चाहिए; क्योंकि निर्लज्ज होना गुण-हीन होना है। 46 मनुष्य जितना ही लज्जावान् होता है, उतना ही उसका (आदर होता) है, और जो निर्लज्ज तथा हित-अहित के विवेक से शून्य है वह नर पशु-तुल्य है। 47 यदि कोई आदमी तलवार से तुम्हारी भुजाएँ और अङ्ग काट डाले तो भी तुम्हें उसके प्रति पाप-भाव का पोषण न करना चाहिए और न उसे अशान्त शब्द ही कहना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से तुम्हें ही विघ्न होगा। 48 क्षमा के समान कोई तप नही, जो क्षमावान् है उसे शक्ति है, धैर्य है और जो दूसरों का कठोर व्यवहार नही सह सकते वे न तो धर्म-संस्थापकों के मार्गपर ही चलते हैं और न उनका त्राण ही होता है। 49 क्रोध को थोड़ा-सा भी अवकाश (प्रश्रय) न दो, यह धर्म और यश को नष्ट करता है, रूप का शत्रु है, हृदय की अग्नि है; गुणों के लिए इसके समान कोई शत्रु नही। 50 क्रोध प्रव्रज्या के लिए प्रतिकूल है, वैसे ही जैसे कि बिजली की अग्नि शीतल जल के लिए, किन्तु क्रोध गृहस्थ-जीवन के लिए प्रतिकूल नही है; क्योंकि गृहस्थ इच्छाओं से भरे होते हैं और इसके सम्बन्ध में कोई व्रत लिए नही होते हैं। 51 यदि तुम्हारें हृदय में अभिमान का उदय हो, तो सुन्दर बालों से विहीन मस्तक को छूकर अपने काषाय वस्त्र एवं भिक्षा-पात्र को देखकर, और दूसरों के कर्म (= कमांत) और आचरण का चिन्तन कर, इसे दूर करो। 52 यदि अभिमान-युक्त सांसारिक मनुष्य अभिमान को जीतने के लिए (यत्न करे), तो फिर उनका क्या कहना, जिनके मस्तक मुड़े हुए हैं, जिन्होंने अपने को निर्वाण (-धर्म) में लगाया है, जो भिक्षा का अन्न खाते हैं और जिन्होंने अपने को प्रमाणित किया है? 53 कपट और धर्माचरण असङ्गत है, इसलिए कुटिल उपायों का सहारा न लो। छल (कपट) और छद्म (= माया) ठगने के लिए हैं किन्तु जो धर्म में लगे हुए हैं, उनके लिए ठगना-जैसी कोई चीज नही।
54 बड़ी-बड़ी इच्छाएँ रखनेवाले को जो दुःख होता है वह अल्प इच्छावाले को नही होता है। इसलिए अल्पेच्छता का अभ्यास करना चाहिए और विशेषतः उन्हें, जो गुणों की परिपूर्णता चाहते हैं। 55 जो धनवानों से बिलकुल नही डरता वह कृपणों को देखने से नही डरता; जिसकी इच्छाएँ अल्प हैं और जो "कुछ नही है" यह सुनकर उदास नही होता, उसी को निर्वाण प्राप्त होता है।$^{96}$ 56 यदि तुम निर्वाण चाहते हो तो सन्तोष का अभ्यास करो, सन्तोष होनेपर ही यहाँ (सच्चा) सुख मिलता है और सन्तोष ही धर्म है। सन्तुष्ट मनुष्य भूमिपर भी शान्तिपूर्वक सोते हैं और असन्तुष्ट मनुष्य स्वर्ग में भी जलते रहते हैं। 57 असन्तुष्ट मनुष्य अत्यन्त धनवान् होनेपर भी सदा दरिद्र ही रहता है और सन्तुष्ट मनुष्य अत्यन्त दरिद्र होनेपर भी सदा धनी ही रहता है। प्रिय विषयों की खोज करनेवाला असन्तुष्ट मनुष्य, तृप्ति पाने के लिए श्रम करता हुआ, अपने ही लिए दुःख पैदा करता है। 58 जो परम शान्ति-सुख पाना चाहते हैं, उन्हें सुख में इतना आसक्त न होना चाहिए। क्योंकि इन्द्र और दूसरे देवगण भी संसार के उस मनुष्य से ईर्ष्या (= स्पृह) करते हैं जो केवल शान्ति (की प्राप्ति) में लगा हुआ है। 59 आसक्ति दुःख का निवास-वृक्ष है; इसलिए स्वजनों में या दूसरों में आसक्ति छोड़ो। इस संसार में अत्यन्त आसक्त मनुष्य दुःख में वैसे ही फँसता है, जैसे कि जरा-जीर्ण हाथी कीचड़ में। 60 नदी द्वारा-जिसका जल निरन्तर बह रहा हो, अत्यन्त धीरे धीरे ही क्यों नही-काल-क्रम से चट्टान की सतह घिस जाती है। वीर्य (उद्योग) के लिए कुछ भी दुर्लभ नही। अतः उद्यमी बनो और अपने भार को न फेको 61 जो मनुष्य अरणियों को रगड़ने में बार-बार रुकता है उनके लिए काठ से आग निकालना कठिन हो जाता है, किन्तु उद्योग करने से यह आसानी से निकल आती है। अतः जहाँ परिश्रम है वहाँ सिद्धि है। 62 स्मृति (जागरूकता) रहनेपर दोष काम नही करते (अर्थात् निष्क्रिय हो जाते हैं); स्मृति के समान न कोई मित्र है, न कोई रक्षक, और स्मृति के नष्ट होनेपर अवश्य ही सब कुछ नष्ट हो जाता है। अतः शरीर में लगी (= कायगता) स्मृति को शिथिल न करो। 63 जिनका चित्त दृढ़ है वे शरीर के लिए स्मृतिरूपी कवच पहनकर विषयों की रण-भूमि में उन वीरों की तरह आचरण करते हैं, जो कवच पहनकर शत्रु-व्यूह में निर्भयतापूर्वक घुस जाते हैं।
$^{96}$ - पूर्वार्ध का अनुवाद अनिश्चित कहा गया है।
बुद्धचरित 111
64 इसलिए अपने भावों को सम तथा चित्त को नियन्त्रित रखते हुए संसार के उदय और व्यय को जानो और समाधि का अभ्यास करो। क्योंकि जिसने मानसिक समाधि प्राप्त कर ली है उसे कोई आधियाँ स्पर्श नहीं करतीं। 65 जैसे बढ़ते हुए पानी को रोकने के लिए मनुष्य परिश्रमपूर्वक बाँध बनाते हैं, वैसे ही समाधि को उस बाँध के समान बताते हैं जिसके द्वारा विचाररूपी जल स्थिर किया जाता है। 66 उस बुद्धिमान् मनुष्य (= प्राज्ञ) का, जो सदा अपनी सम्पत्ति (ऐश्वर्य) दान करता है और हृदय से अत्यन्त धर्माभिमुख रहता है, त्राण होता है; फिर उस भिक्षु के त्राण का क्या कहना, जिसे घर भी नहीं है। 67 प्रज्ञा, जरा-मरणरूपी महासागर में एक नौका है, मोहान्धकार में मानो एक प्रदीप है, सब व्याधियों को दूर करनेवाली ओषधि है, दोषरूपी वृक्षों को काटनेवाली तेज कुल्हाड़ी है। 68 इसलिए प्रज्ञा की वृद्धि के लिए विद्या, ज्ञान और भावना का अभ्यास करो; क्योंकि जिसे प्रज्ञा-चक्षु है, उसे ही वास्तविक दृष्टि है, यद्यपि उस चक्षु में (स्थूल पदार्थों को) देखने की शक्ति नहीं होती।⁹⁷ 69 घर छोड़नेपर भी यदि कोई मनुष्य चित्त के विविध व्यापारों में लगा रहे तो उसका त्राण नहीं होता; जो लोग परम शम प्राप्त करना चाहें वे इसे जानें और सब व्यापारों से मुक्त हो जायें। 70 इसलिए अप्रमाद में वैसे ही लगो जैसे कि गुरु में और प्रमाद का वैसे ही परित्याग करो जैसे कि शत्रु का। अप्रमाद द्वारा इन्द्र ने राज्य प्राप्त किया और प्रमाद द्वारा उद्धत असुरों ने विनाश।⁹⁸ 71 करुणामय, सहानुभूतिपूर्ण एवं हितैषी गुरु को जो कुछ करना चाहिए वह सब मैंने किया; अब अपने को लगाओ और चित्त को शान्त करो। 72 तब, जहाँ कहीं रहो, पर्वतपर या शून्य भवन में या जङ्गल में, धर्माचरण में सदा प्रयत्नशील (अप्रमत्त) रहो और पश्चाताप न करो। 73 रोगियों की शारीरिक अवस्थाओं का पूरा-पूरा विचारकर, उन्हें उचित ओषधि बताना वैद्य का काम है; किन्तु उचित समय पर ओषधि-सेवन का उत्तरदायित्व रोगी पर ही है, न कि वैद्य पर। 74 पथ-प्रदर्शक (= देशिक) द्वारा उत्तम सीधा समतल एवं निरापद मार्ग बताये जानेपर, यदि सुननेवाले उसपर नहीं चलें और विनाश को प्राप्त हों, तो पथ-प्रदर्शक के ऊपर आदेशरूपी ऋण शेष नही रहता।
75 तुम लोगों में जिस किसी को दुःख आदि चार सत्यों के मेरे उपदेश के बारे में (कुछ भी जानने की) इच्छा हो, वह तुरन्त मुझसे विश्वासपूर्वक कहे और अपना संशय दूर करे।” 76 महामुनि द्वारा इस तरह जोरों से कहे जानेपर वे सब संशय-रहित थे और वे कुछ नहीं बोले। तब अपने चित्त से उनके चित्तों में प्रवेशकर, साधु (= कृती) अनिरुद्ध ने ये वचन कहे:— 77 “हवा का बहना बन्द हो जाय, सूरज सीतल हो जाय और चाँद गर्म, तो भी जगत् में चार सत्त्वों को मिथ्या प्रमाणित करना शक्य नही। 78 जिसे दुःख कहा गया है वह सुख नही; दुःख के कारण को छोड़कर दुःख पैदा करनेवाला दूसरा कुछ नही; कारण का निरोध होने से मुक्ति अवश्य होती है और (-निरोध) मार्ग ही उपाय है। 79 इसलिए, हे महात्मन्, चार सत्यों के बारे में शिष्यों को कुछ संशय नही है; किन्तु जिन्होंने अपना लक्ष्य सिद्ध नही किया है वे यह सोचकर दुःखी हो रहे हैं कि विनायक जा रहे हैं। 80 इस सभा में, जिसने नये व्रत (नई दीक्षा) के कारण अपने लक्ष्य को नही देखा था, वह भी आज आपके इस उपदेश से अपने सम्पूर्ण लक्ष्य को वैसे ही देख रहा है जैसे कि बिजली की चमक में (देख रहा हो)। 81 किन्तु वे भी, जिन्हें कुछ भी करना शेष नही है और जो भवसागर के उस पार चले गये हैं, यह सुनकर हृदय से चिन्तित हो रहे हैं कि पूर्ण शास्ता विदा हो रहे हैं।” 82 आर्य अनिरुद्ध के ये वचन सुनकर बुद्ध ने, असलियत को जानते हुए भी, इसे फिर से सुना और अपने शिष्यों के चित्त दृढ़ करने के लिए उनसे स्नेहपूर्वक कहा:— 83 “युगपर्यन्त रहनेपर भी प्राणी का विनाश होता ही है, इसलिए पारस्परिक संयोग या मिलन जैसी कोई (स्थायी) वस्तु नही है। मैंने अपना और दूसरों का काम पूरा कर लिया है, अब और जीवित रहने में कोई लाभ नही है। 84 स्वर्ग में और पृथ्वी पर जिन्हें दीक्षित करना था वे सब बचाये गये और मार्गपर लाये गये (स्रोत-आपन्न किये गये)। इसके बाद मेरा यह धर्म भिक्षुओं की वंश-परम्परा से मनुष्यों के बीच रहेगा। 85 जगत् के वास्तविक स्वभाव का पहचानो और चिन्तित मत होओ; क्योंकि वियोग अवश्यम्भावी है। संसार को ऐसा जानकर वैसा यत्न करो जिससे यह फिर कभी न हो। 86 जब ज्ञानरूपी प्रदीप से अन्धकार में प्रकाश हो जाता है और भवों को असार देख लिया जाता है, तब आयु का निरोध होनेपर वैसे ही संतोष होता है, जैसे कि रोगों के दूर होनेपर। 87 जब द्वन्द्वों सहित छूटनेवाले शरीर नामक भव-सागर की धारा कट रही हो, तब जीवन का अन्त होनेपर, जैसे कि विपत्ति-प्रद शत्रुओं का नाश होनेपर, किसे आनन्द न होगा।
⁹⁷ - “प्रज्ञामयं यस्य हि नास्ति चक्षुश्चक्षुर्न तस्यास्ति सचक्षुषोऽपि”—सौन्दरनन्द 18.35 ⁹⁸ - “अप्रमाद से ही इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ बना”—धम्मपद, 2.10
112 अश्वघोष
88 सब चराचर का विनाश होता है, अतः जागरूक रहो; मेरी निर्वाण-प्राप्ति का समय आ गया है। विलाप मत करो; ये मेरे अन्तिम वचन हैं।” 89 तब वह श्रेष्ठ ध्यानज्ञ उस समय प्रथम ध्यान में प्रविष्ट हुए और उससे निकलकर दूसरे में, और इसी तरह उचित क्रम से वह किसी को छोड़े बिना सब (ध्यानों) में प्रवृष्टि हुए। 90 तब सब ध्यानों से, नौ समापत्तियों से ऊर्ध्व (अनुलोम) क्रम से निकलकर, महामुनि फिर निम्न (प्रतिलोम) क्रम से प्रथम ध्यान में लौट आये। 91 उससे भी निकलकर वह उचित क्रम से चतुर्थ ध्यान में आये और चतुर्थ ध्यान से निकलकर वह अनन्त शान्ति अनुभव करने को चले गये। 92 तब मुनि का परिनिर्वाण होनेपर, तूफान से प्रतिहत नौका के समान पृथ्वी काँप उठी, और आकाश से उल्काएँ गिरीं, जैसे दिग्गजों द्वारा फेंकी गई हों। 93 जलावन और धुएँ से रहित आग, हवा से प्रेरित हुए बिना ही दिशाओं को जलाने लगी, जैसे दिव्य चित्ररथ वन को जलाने के लिए आकाश में दावानल उठा हो। 94 भयङ्कर वज्र, शत शत अङ्गारों से आग उगलते हुए, गिरने लगे, जैसे युद्ध में असुरों को जीतने के लिए इन्द्रदेव क्रोधपूर्वक उन्हें (वज्रों को) फेंक रहा हो। 95 धूल-भरी हवा लताओं को टुकड़े-टुकड़े करती हुई जोरों से बही, और क्रुद्ध झंझावात से आहत हुए पर्वतों की चोटियाँ गिर पड़ीं।⁹⁹ 96 चाँद का प्रकाश क्षीण हुआ और यह अपनी निष्प्रभ किरणों से वैसे ही शोभित हुआ, जैसे पङ्किल जल से लिप्त राजहंस, जिसका शरीर छोटे छोटे बेतों (या नरकटों) से घिरा हो। 97 यद्यपि आकाश अनभ्र था और चाँद उगा हुआ था, तो भी अपवित्र अन्धकार चारों ओर फैल गया था। और उस समय नदियों का जल मानो शोक से खौल रहा था। 98 तब समीपवर्ती शाल-वृक्षों ने झुककर असमय के सुन्दर फूल बुद्ध के शरीर पर... ... ...बरसाये। 99 आकाश में पाँच शिरवाले नाग निश्चल खड़े रहे, वे मुनि को भक्तिपूर्वक देख रहे थे, उनकी आँखें शोक से लाल थीं, उनके फन बन्द थे, और उनके शरीर नियन्त्रित थे। *100 मानसिक पीड़ा के कारण उन्होंने गर्म निश्वास छोड़े, किन्तु यह सोचकर कि जगत् स्वभावतः अनित्य है, उन्हें शोक से विरति एवं जगत से घृणा हो गई। 101 दिव्य लोक में नैष्ठिक धर्म के आचरण में रत राजा वैश्रवण की धर्मसभा ने धर्म में आसक्ति होने के कारण न शोक किया न आँसू बहाये। 102 पवित्र (=कृती) शुद्धाधिवास देवगण, यद्यपि वे महामुनि का अत्यन्त सम्मान करते थे, शान्त रहे और मन में क्षुब्ध नही हुए; क्योंकि उन्हें जगत के स्वभाव से घृणा थी। 103 सद्धर्म में आनन्द पानेवाले देवगण, गन्धर्व-राज, नाग-राज और यक्ष अत्यन्त शोक-मग्न और व्याकुल होकर आकाश में खड़े रहे। 104 किन्तु, मार की हार्दिक अभिलाषा पूरी हुई, उसके दल ने आनन्द में आकर अट्टहास किया, उच्छल-कूद की, साँपों के समान फूत्कार किया, नृत्य किया और बड़े बड़े मृदङ्ग एवं पटह बजाये। 105 तब ऋषि-ऋषभ (बुद्ध) के उस पार चले जानेपर संसार उस पर्वत के समान दिखाई पड़ा, जिसकी चोटी वज्र से कट गई हो, या उस उदास हाथी के समान जिसका मद बन्द हो गया हो, या उस वृषभ के समान जिसका ककुद नष्ट हो गया हो। 106 उन जन्म-विनाशक को खोकर, संसार वैसा ही दिखाई पड़ा जैसे कि बिना चाँद का आकाश, या हिम से सूखे कमलों का सरोवर या धन के अभाव से निष्फल हुई विद्या (दिखाई पड़े)। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “महापरिनिर्वाण” नामक 26वाँ सर्ग समाप्त॥ सत्ताईसवाँ सर्ग निर्वाण की प्रशंसा 1 तब किसी बड़े देवता ने विमान से अपना शिर कुछ बाहर झुकाकर सर्वज्ञ की ओर एक क्षण तक देखा और कहाः- 2 “आहो! सब जीव अनित्य हैं और जन्म एवं विनाश के नियम के अधीन हैं, जो जो जन्म लेते हैं उनके भाग्य में दुःख है। इस प्रकार शान्ति उसी शान्ति से मिलती है, जो अपने पीछे कुछ छोड़ नही जाती। 3 जैसे कि जल अग्नि को शान्त करता है वैसे ही कालरूपी जल को तथागतरूपी अग्नि शान्त करनी पड़ी, जिसकी ज्वाला ज्ञान है, जिसका धुआँ यश है, और जिसने जन्मरूपी इन्धन को निःशेष जला डाला है।” 4 तब श्रेष्ठ ऋषि के समान दिखाई पड़नेवाले दूसरे ऋषि ने, जो स्वर्ग में रहते हुए भी उसके उपभोगों से आकृष्ट नही हुआ, अर्हत् ऋषि की ओर देखा, जिन्होंने शान्ति प्राप्त कर ली थी; और गिरिराज के समान धैर्य धारण करते हुए, उसने ये वचन कहेः- 5 “इस संसार में ऐसा कुछ नही जो नाश को नही प्राप्त होता है, जो नाश को नही प्राप्त हुआ और जो नाश को नही प्राप्त होगा, यह देखकर कि अनुपम गुरु, जिन्होंने परम ज्ञान प्राप्त किया था और जो उत्तम लक्ष्य (=परमार्थ) को जानते थे, शान्ति को प्राप्त हुए।
⁹⁹- इसका उत्तरार्द्ध चीनी अनुवाद से लिया गया है। बुद्धचरित 113