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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 122 में से

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61 महल की स्त्रियों में से कुछों ने बहुमूल्य नये वस्त्रों से उन्हें सम्मानित किया तथा दूसरों ने उनपर भाँति-भाँति के अलङ्कारों तथा मोहक और नये हारों की झड़ी लगा दी। 62 जब काल-सदृश वह हाथी विनीत होकर खड़ा हुआ, तब जो (धर्म में) विश्वास नही करते थे वे मध्यम अवस्था में प्रविष्ट हुए, जो पहले से ही मध्यम अवस्था में थे उन्होंने विश्वास की एक विशिष्ट अवस्था प्राप्त की, और जो विश्वासी थे वे अत्यन्त दृढ़ हो गये। 63 तब अपने महल में खड़े अजातशत्रु ने गजेन्द्र को मुनि द्वारा विनीत होते देखा और वह विस्मय से अभिभूत हो गया; उसे प्रसन्नता हुई और बुद्ध में परम विश्वास हुआ। 64 जैसे कलियुग बीतने पर तथा कृतयुग शुरु होनेपर धर्म और अर्थ की वृद्धि होती है, वैसे ही मुनि अपने यश, ऋद्धियों (= चमत्कारों) एवं दुष्कर कर्मों से बढ़ने लगे। 65 किन्तु देवदत्त, द्वेषपूर्वक बहुत-से बुरे व पाप कर्म करके अधःलोग में गिरा, जो राजा और प्रजा द्वारा ब्राह्मणों एवं मुनियों द्वारा निन्दित है। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “प्रव्रज्या-श्रोत” नामक 21वाँ सर्ग समाप्त ॥ बाईसवाँ सर्ग आम्रपाली के उपवन में 1 जब वह वक्ता-श्रेष्ठ काल-क्रम से संसार पर अनुग्रह कर चुके और पृथ्वी को अपने धर्म से व्याप्त कर चुके, तब उनका चित्त निर्वाण की ओर गया। 2 तब मुनि यथासमय राजगृह से पाटलिपुत्र गये, जहाँ वह पाटलिपुत्र नामक चैत्य में ठहरे। 3 उस समय मगध-राज के मन्त्री वर्षाकार (वर्षकार) ने लिच्छवियों को शान्त रखने के लिए एक किला बनाया था। 4 तथागत ने देवताओं को वहाँ अपना कोष लाते देखा और भविष्यवाणी की : “यह नगर संसार भर में सर्वश्रेष्ठ होगा।” 5 वह उत्तम कर्मशील (कर्मी), वर्षाकार द्वारा उचित रीति से सम्मानित होकर, समुद्र की प्रधान पत्नी (महिषी) की ओर गये। 6 सूर्य के समान उज्ज्वल भगवान् जिस द्वार से निकले, उसे उस (वर्षाकार) ने गौतम-द्वार (के नाम) सम्मानित किया। 7 वह, जो कि (संसार-सागर) पार करना देख चुके थे, गङ्गातट पर आये और भाँति भाँति की नावों के साथ लोगों को देखकर उन्होंने सोचा:- 8 “प्रयत्नपूर्वक नदी पार करना मेरे लिए अनुचित होगा, इसलिए अपने ऋषि-बल से नाव के बिना ही मुझे स्वयं जाना चाहिए।” 9 इस तरह दर्शकों की दृष्टि से ओझल होकर वह तब अपने शिष्यों के साथ हवा की गति को भी मात करते हुए एक क्षण में उस पार चले गये। 10 क्योंकि मुनि जानते थे कि ज्ञानरूपी नाव से ही दुःखरूपी सागर पार किया जाता है, इसलिए उन्होंने इस (भौतिक) नाव का प्रयोग किये बिना ही गङ्गा पार की। 11 वह घाट, जहाँ से विनायक गङ्गा के उस पार गये, जगत में उनके गोत्र-नाम से (गोतम) तीर्थ होकर विख्यात है। *12 उन्हें देखकर पार होने के इच्छुक, पार हो रहे तथा पार हुए लोगों के मुख विस्मय से विकसित हुए। 13 तब बुद्ध गङ्गा तीर से कुटी नामक गाँव में गये और वहाँ धर्मोपदेश करके नादी गये। 14 उस समय वहाँ बहुत-से लोग मरे थे और मुनि ने बतलाया कि उनमें से कौन किस लोक में जन्मा और क्या होकर। 15 वहाँ एक रात रहकर श्रीघन (बुद्ध) वैशाली नगरी चले गये और आम्रपाली के प्रान्त में एक उज्ज्वल उपवन में ठहरे। 16 “तथागत यहीं हैं” यह जानकर आम्रपाली वेश्या एक साधारण रथ पर सवार हुई और अत्यन्त प्रसन्न होकर चली। 17 देव-पूजन-समय की एक कुलीन स्त्री के समान वह स्वच्छ श्वेत वस्त्र पहने हुए थी और मालाओं या अङ्गराग से रहित थी। *18 सौन्दर्य के अभिमान में वह अपने संयुक्त आकर्षणों से लिच्छवि कुल-पुत्रों की सम्पत्ति एवं चित्त आकृष्ट किया करती थी। 19 रूपवती वन-देवता के समान अपने सौन्दर्य एवं गौरव में आत्म-विश्वास करती हुई वह रथ से उतरी और तेजी से उपवन में घुस गई। 20 “उसकी आँखें चञ्चल हैं और उसके कारण कुलीन स्त्रियों को शोक होता है” यह देखकर सुगत ने दुन्दुभि की-सी वाणी में शिष्यों को आदेश दिया— 21 “यह आम्रपाली समीप आ रही है, जो दुर्बलों का मानसिक ताप है; स्मृतिरूपी रसायन से अपने अपने मन को वश में रखते हुए तुमलोग ज्ञान में स्थित हो जाओ। 22 स्मृति (अप्रमाद, सावधानी) एवं ज्ञान (प्रबोध) रहित पुरुष के लिए स्त्री के सान्निध्य (पड़ोस, समीपता) की अपेक्षा साँप या खुली तलवारवाले शत्रु का सान्निध्य अच्छा है। 23 बैठी हो या सोई, टहलती हो या खड़ी, चित्र-लिखित ही क्यों न हो, स्त्री (हर हालत में) पुरुषों के हृदय हरण करती है। 24 स्त्रियाँ विपत्ति (=व्यसन) से भी पीड़ित हों, या रोती हुई चारों ओर बाहु-लताएँ फेंक रही हों, या आकुल-केशपाश हो दग्ध हो रही हों, तो भी उसकी शक्ति उत्कृष्ट होती है। बुद्धचरित 99

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