बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें39 तब गृध्रकूट पर्वत पर उसने वेगपूर्वक एक शिला लुढ़काई; किन्तु मुनि के ऊपर लक्ष्य होनेपर भी यह उनपर नही गिरी, किन्तु दो टुकड़ों में विभक्त हो गई। 40 राज-मार्ग पर उसने तथागत की ओर एक गजेन्द्र छोड़ा, जो प्रलयकालीन काले बादलों के समान गरज रहा था और जो चाँद के छिपने पर आकाश में बहनेवाली आँधी के समान दौड़ रहा था। 41 राजगृह के मार्ग उन लाशों से (पटकर) चलने योग्य नहीं रहे, जिनपर उसने अपने शरीर से चोट की थी, या जिन्हें उसने अपनी सूंड़ से ऊपर उठाया था या जिनकी अँतड़ियाँ उसके दाँतों द्वारा खींची जाकर ढेर की ढेर बिखेरी गई थीं।⁸³ 42 मांस की प्यास से उसने लोगों की जाँघें खोदीं और जब उसकी सूंड़ ने अँतड़ियों का स्पर्श किया, तब छुटकारा पाने के लिए उसने उन (अँतड़ियों) की मालाएँ खींचकर पत्थर की तरह आकाश में फेंकीं, उस समय उसके भयावने मस्तक, कानों व जीभ से लोहू चू रहा था। 43 नगर-निवासी आतंकित हुए और उससे डर गये, इसलिये कि वह रक्त-बिन्दुओं और सड़ते हुए (दुर्गंध-युक्त) रुधिर से लिप्त होकर तथा मस्तक पर व्याप्त मद-जल की गन्ध से युक्त होकर असीम क्रोध से घूम रहा था। 44 जब उन लोगों ने यम-दण्ड के समान भयानक उस मतवाले हाथी को देखा, जिसका चेहरा अविनय से फूला हुआ था, जो गरज रहा था और क्रोध से आँखें घुमा रहा था, तब राजगृह में हाहाकार मच गया। 45 कुछ लोग निराश होकर चारों ओर भागे, कुछ लोग ऐसी जगह छिप गये जहाँ वे देखे नही जा सकते थे और दूसरे ऐसे डरे कि दूसरा सब भय खोकर दूसरों के घरों में घुस गये। 46 हाथी कहीं बुद्ध को क्लेश न पहुँचावे, इस डर से कुछों ने अपनी जान की पर्वाह न की और उसके पीछे से वीरतापूर्वक चिल्लाये, जैसे कूदने को उद्यत सिंह गरज रहा हो। 47 उसी प्रकार दूसरों ने महावत का पुकारा, कुछों ने प्रार्थनापूर्वक अपने हाथ उठाये, कुछों ने तब उसे धमकाया भी और दूसरों ने उसके द्रव्य-प्रेम से प्रार्थना (अपील) की। 48 छज्जों से देखती हुई नवयुवतियाँ बाहुएँ फेंककर रोईं; कुछों ने डरकर सुवर्ण-कङ्कणयुक्त ताम्रवर्ण हाथों से आँखें मूँद लीं। 49 यद्यपि हत्या के अभिप्राय से हाथी आगे आ रहा था और रोते हुए लोग (मना करने के लिए) हाथ उठा रहे थे, तो भी सुगत शान्त एवं अविचल (-चित्त) होकर आगे ही बढ़े, न तो उन्होंने पाँव उठाना ही रोका, और न वे द्वेष के ही वशीभूत हुए।
50 शान्तिपूर्वक मुनि आगे आये; उस महागजेन्द्र को भी उन्हें स्पर्श करने की शक्ति नही थी, इसलिए कि अपनी मैत्री के कारण उनकी करुणा सब जीवों पर थी और इसलिए कि देवगण भक्तिवश उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। 51 दूर से ही गजेन्द्र को देखकर बुद्ध के पीछे पीछे जानेवाले शिष्य भाग गये। केवल आनन्द ने बुद्ध का अनुसरण किया, जैसे सहज स्वभाव विविध पदार्थों का अनुसरण करता है। 52 जब क्रुद्ध हाथी समीप आया तो मुनि के दिव्य प्रभाव से उसे होश हो गया, और अपना शरीर झुकाकर, उस पर्वत के समान जिसके पक्ष वज्र से विदीर्ण हुए हों, उसने अपना मस्तक पृथ्वी पर रक्खा। 53 जैसे सूरज अपनी किरणों से बादल को छूता है, वैसे ही मुनि ने अपने सुन्दर हाथ से, जो कमल के समान कोमल था और जिसकी सुगठित अङ्गुलियाँ (रेखा-) जाल से युक्त थीं, गजराज के माथे पर थपकी लगाई। 54 जब हाथी पानी से भरे बादल के समान उनके पाँवों पर झुका, तब ताल-पत्र-सदृश उसके (बड़े-बड़े) कानों को निश्चल देखकर मुनि ने उसे शम-धर्म का उपदेश दिया, जो बुद्धिधारी प्राणियों के लिए ही उपयुक्त है:— 55 “निरपराध (=नाग) की हत्या करने से दुःख होता है; हे हाथी, निरपराध को पीड़ित न करो। क्योंकि, हे हाथी निरपराध की हत्या करनेवाले का जीवन जन्म जन्म में आठ जन्म तक विकसित नही होता है। 56 काम मोह व घृणा, ये तीन दुर्जेय मद हैं; फिर भी मुनिगण मद-त्रय से मुक्त हैं। अतः इन तापों से अपने को मुक्त करो और दुःख के परे चले जाओ। 57 इसलिए ये अन्धकार-प्रेम (=तमःप्रसक्ति) त्याग करने के लिए मद-मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आओ। हे गजेन्द्र, काम की अधिकता से संसार-सागर के पङ्क में फिर मत गिरो।” 58 तब ये वचन सुनकर हाथी मद से मुक्त हो गया और फिर उचित मानसिक अवस्था पर लौट आया; और अमृत-पान करने पर रोग-मुक्त हुए के समान उसने उत्तम आन्तरिक (=अन्तर्गत) आनन्द प्राप्त किया। 59 गजेन्द्र ने तुरन्त मद का त्याग किया और शिष्य के समान मुनि को प्रणाम किया, यह देख कर कुछों ने वस्त्र से ढँकी बाहुएँ ऊपर फेंकीं और दूसरों ने भुजाएँ चमकाईं (घुमाईं, = √परभ्रि, √उल्लस् ), जिससे कपड़े गिर पड़े। 60 तब कुछों ने मुनि के आगे हाथ जोड़े और दूसरों ने उन्हें घेर लिया। कुछों ने उस बड़े हाथी के आर्यत्व की प्रशंसा की और दूसरों ने विस्मित होकर उसे थपकी लगाई।
⁸³ अमरावती में चित्रित इस दृश्य (Vogel—“भारत लङ्का और जावा में बौद्ध-कला”) का आधार ये ही श्लोक हैं—जौन्स्टन। 98 अश्वघोष