भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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8 तब वेणु-कण्टक में उन्होंने नन्द की साध्वी मामा को प्रव्रजित किया, जो उत्तम जागरूकता (= सत्स्मृति)-द्वारा अपनी आँखों के आगे (गुप्त) कोषों को देखती थी। 9 तब स्थाणुमती गाँव में ब्राह्मण-श्रेष्ठ कूटदत्त, जो सब प्रकार के यज्ञ करना चाहता था, निर्वाण- धर्म में प्रवेश कराया गया। 10 तब विदेह पर्वत पर पञ्चशिख (गंधर्व-पुत्र), असुरों और देवों को (धर्म में) दृढ़ विश्वास हुआ। 11 तब अङ्ग नगर में पूर्णभद्र यक्ष तथा श्रेष्ठ, दण्ड, श्वेत, पिङ्गल व चण्ड (नामक) बड़े-बड़े साँप (= महानाग) दीक्षित हुए। 12 आपण नगर में केन्य व शेल (नामक) ब्राह्मण, जो (स्वर्ग में जन्म लेने के लिए) तप कर रहे थे, निर्वाण-पथ पर लाये गये। 13 सुह्मों के बीच भगवान् ने दिव्य शक्ति (ऋद्धि) के प्रभाव से अङ्गुलिमाल ब्राह्मण को विनीत किया, जो सौदास के समान क्रूर था ।⁸⁰ 14 भद्र में एक भद्र पुरुष के पुत्र से, जिसका नाम मेण्डक था, जिसकी आजीविका अच्छी थी, जो उदार दाता था और जो सम्पत्ति में पूर्णभद्र के समान था, सम्यक् दृष्टि ग्रहण कराई गई। 15 तब विदेह नगर में वक्ता-श्रेष्ठ ने उपदेश द्वारा ब्रह्मायु नामक व्यक्ति को जीता, जिसकी आयु ब्रह्मा की-सी लम्बी थी। 16 उन्होंने वैशाली के जलाशय में माँस-भक्षक (मर्कट नामक) राक्षस को तथा सिंह उत्तर व सत्यक-प्रमुख लिच्छवियों को भी दीक्षित किया। 17 तब अलकावती नगर में वह आर्यकर्मा, भद्र नामक एक सदाशय (उत्तम आशयवाले) यक्ष को धर्म-पथ पर लाये। 18 तब एक अत्यन्त अकुशल अटवी (जङ्गल) में बुद्ध ने आटविक यक्ष को और कुमार हस्तक को उपदेश दिया। *19 तब....नगर में निर्वाण-दर्शी ने नागायन यक्ष को निर्वाण कर उपदेश दिया और यक्ष-राज ने उन्हें प्रणाम किया। 20 गया में ऋषि ने टङ्कित ऋषियों को और खर तथा सूचीलोम नामक दो यक्षों को उपदेश दिया।⁸¹ 21 तब वाराणसी नगर में दसबलधारी ने कात्यायन नामक ब्राह्मण को प्रव्रजित किया, जो असित ऋषि का भागिनेय था। 22 तब वह अपनी दिव्य शक्ति से शूर्पारक नगर में गये और स्तवकर्णी श्रेष्ठी को उपदेश दिया, 23 जो उपदेश सुनते ही इतना श्रद्धालु हो गया कि वह मुनि-वर के लिए एक चन्दन-विहार बनाने लगा, जो सदा सुगन्धित एवं गगन-चुम्बी था। 24 तब उन्होंने तपस्वी कपिल को महीवती में विनीत किया, जहाँ एक शिला पर मुनि के पाँवों के चक्र-चिह्न देख पड़ते थे। 25 तब वरण में उन्होंने वारण (नामक) यक्ष को उपदेश दिया; उसी प्रकार मथुरा में भयानक गर्दभ दीक्षित हुआ। 26 तब स्थूलकोष्ठक नगर में विनायक ने राष्ट्रपाल कहे जानेवाले (व्यक्ति) को दीक्षित किया, जिसका धन राजा के धन के बराबर था। 27 तब वैरञ्जा में विरिञ्च-सदृश एक महासत्त्व दीक्षित हुआ और उसी तरह कल्माशदम्य में विद्वान् भारद्वाज। 28 फिर श्रावस्ती में मुनि ने सभिय, निर्ग्रन्थ नप्त्रीपुत्रों और अन्य तीर्थिकों (पंडितों) का अन्धकार दूर किया। 29 यहाँ भी ब्राह्मण याज्ञिक पुष्कलसादी एवं जातिश्रोणी तथा कोशल-राज बुद्ध-धर्म में लाये गये। 30 तब शेतविक की वन-भूमि में उत्तम-शिक्षक ने एक मैने को और एक सुगे को—द्विजों के समान विद्वान् दो द्विजों को—सिखाया। 31 तब....नगर में जङ्गली नागर तथा क्रूरकर्मा कालक व कुम्भीर शम-धर्म में लाये गये।⁸² 32 तब भार्गसों के बीच उन्होंने भेषक यक्ष को दीक्षित किया और नकुल के वृद्ध माता-पिता पर वैसा ही अनुग्रह किया। 33 कौशाम्बी में धनवान् घोषिल, कुब्जोत्तरा तथा दूसरी स्त्रियाँ और बहुत-से लोग दीक्षित हुए। 34 तब गान्धार देश में अपलाल (नामक) सर्प, जिसके इन्द्रिय विनय द्वारा शान्त हो गये, बुराई के परे चला गया। *35 तब मृत्यु (काल) के समान जलाने की इच्छा करनेवाले.... को दीक्षित कर बुद्ध ने क्रम से धर्मोपदेश किया। 36 इन तथा अन्य स्थलचारी अथवा नभचारी जीवों को दीक्षित करने से बुद्ध का यश बढ़ता ही गया, जैसे (पूर्णिमा आदि) पर्व में समुद्र। 37 उनका माहात्म्य देखकर देवदत्त को द्वेष हो गया और ध्यान-संयम खोकर उसने बहुत-से अनुचित काम किये। 38 कलुषित चित्त से उसने मुनि के सङ्घ में भेद खड़ा किया और भेद के कारण उनसे अनुराग करने के बदले उसने उन्हें क्लेश पहुँचाने का प्रयत्न किया।

⁸⁰ - सुह्म = हजारीबाग, संथाल-परगना जिलों का कितना ही अंश—बुद्धचर्या। उस देश के रहनेवाले लोग सुह्म कहलाते हैं। ⁸¹ - "टङ्कित ऋषि" से शायद "टङ्कित गुफाओं में रहनेवाले ऋषि" का अभिप्राय है। ⁸² - रिक्त स्थान में साकेत (अयोध्या) लिखा जा सकता है।

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