बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें45 क्योंकि काम (-वासना) के कारण संसार जन्म लेता है और उसके द्वारा अत्यन्त महादुःख भोगता है, इसलिए जब मनुष्य अपने को काम-भव से अलग (=विविच्य) करेगा, तब वह दुःख में आसक्त न होगा और न पीड़ित होगा। 46 इसलिए चाहे अरूप-देवों के बीच या रूप-देवों के बीच, जो कि काम के अधीन हैं ही पुनर्जन्म की शक्ति (विद्यमान) होने के कारण प्रवृत्ति बन्द नहीं होती है, फिर छः काम- वासनाओं के क्षेत्र में रहनेवालों की प्रवृत्ति कहाँ से बन्द होगी? 47 तीन भवों (काम-भव, रूप-भव, अरूप-भव) के इस तरह अनित्य दुःखमय अनात्म और सदा प्रज्वलित होनेपर लोगों के घुसने के लिए आश्रय-स्थल नहीं, जैसे कि उन चिड़ियों के लिए (आश्रय-स्थल नहीं) जिनका निवास-वृक्ष जल रहा हो। 48 यह परम ज्ञेय है, (इसके अतिरिक्त) और कुछ ज्ञेय नहीं है। यह उत्तम ज्ञान (=मति) है, (इसके अतिरिक्त) और कुछ ज्ञान नहीं है। यह उत्तम कार्य है, (ऐसा)...और कुछ नहीं माना जाता है। 49 निश्चय ही ऐसा नही सोचना चाहिये कि यह धर्म गृहस्थों के लिए नहीं है। वन में रहता हो या घर में, वास्तव में वही (जीता) है जो शान्ति प्राप्त करता है। 50 आतप से दग्ध मनुष्य पानी में प्रवेश करता है, बादल से सब किसी को सुख (आराम) मिलता है। जिसे प्रदीप है वह अन्धकार में देखता है। योग प्रमाण है, न कि उम्र (=वयस) या वंश।⁷⁸ 51 कुछ लोग, यद्यपि वे बुढ़ापे में (=वयसि) वन में रहते हैं, योगाभ्यास नही कर सकते और व्रत-भङ्ग करके दुर्गति को प्राप्त होते हैं; दूसरे लोग घर में रहकर भी अपने कर्मों को विशुद्ध करते हैं और सावधान (=अप्रमत्त) रहते हुए नैष्ठिक पद प्राप्त करते हैं। 52 अज्ञान (=तम) रूप सागर में, कुदृष्टियाँ ही जिसकी तरङ्गैं हैं और जन्म ही जिसका जल है, सङ्घर्ष करनेवाले लोगों के बीच केवल वही उस (सागर) से त्राण पाता है, जिसे स्मृति (=जागरूकता) एवं वीर्यरूपी पतवारों से युक्त प्रज्ञारूपी नाव है।" 53 इस तरह अत्यन्त विषयासक्त राजा ने सर्वज्ञ से यह धर्म-तत्त्व प्राप्त किया और अपने में यह विश्वास उत्पन्न होनेपर कि अकुशल राज्य अनित्य एवं चञ्चल है, वह मद-मुक्त हाथी की तरह गम्भीर होकर श्रावस्ती लौट गया। 54 भूपति ने उन्हें प्रणाम किया, यह जानकर दूसरे पण्डितों ने (=तीर्थिक) उन दसबल (शास्ता) को दिव्य शक्ति प्रदर्शन करने के लिये चुनौती दी; और जब पृथ्वी-पति ने उनसे वैसा करने के लिये अनुरोध किया, तब संयतात्मा (=जितात्मा) मुनि दिव्य शक्ति दिखाने को राजी हुए। 55 तब मुनि अपने प्रभा-वर्षी मण्डल के साथ ऐसे चमकने लगे, जैसे सूर्य ताराओं को निष्प्रभ कर रहा हो, और उन्होंने भाँति-भाँति की दिव्य शक्तियों द्वारा विविध मतों के शिक्षकों को पराजित करके सबको आनन्दित किया। 56 तब श्रावस्ती के लोगों द्वारा इस (ऋषि-प्रदर्शन) के लिये सम्मानित एवं पूजित होकर वह अनुत्तर माहात्म्यपूर्वक (वहाँ से) चल पड़े और अपनी माता के हित के लिये धर्मोपदेश करने के लिए स्वर्ग-लोक (=त्रिविष्टप) के ऊपर चढ़ गये। 57 तब मुनि ने अपने ज्ञान द्वारा स्वर्ग में रहनेवाली अपनी माता को दीक्षित किया; और वर्षा- ऋतु वहीं बिताकर तथा दिव्य देवों के शासक से उचित रीति से भिक्षा ग्रहणकर वह स्वर्ग-लोक से संकाश्य में उतरे। 58 देवगण, जो शान्ति प्राप्त कर चुके थे, अपने विमानों में खड़े रहे और अपनी आँखों से उनका अनुसरण किया; जैसे पृथ्वी पर गिर रहे हों, और उनका सम्मान करते समय पृथ्वी के अनेक राजाओं ने अपने मुख ऊपर उठाकर अपने मस्तकों से उनका स्वागत किया। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का "जेतवन-स्वीकार" नामक 20वाँ सर्ग समाप्त॥ इक्कीसवाँ सर्ग प्रव्रज्या-स्रोत 1 स्वर्ग में अपनी माता को तथा निर्वाण के इच्छुक दूसरे देवों (=दिवौकः) को दीक्षित करने के बाद मुनि पृथ्वी पर दीक्षा पाने योग्य लोगों को दीक्षित करते हुए घूमने लगे। 2 तब पाँच पर्वतों के बीच में स्थित नगर में विनायक ने ज्योतिष्क, जीवक, शूर, श्रोण और अङ्गद को विनीत (प्रव्रजित) किया। 3 उन्होंने राजपुत्र अभय, श्रीगुप्त, उपालि, न्यग्रोध, और दूसरों को, जो (नित्यता और विनाश के) दो अन्तों को मानते थे, उनके पूर्व-मतों से विमुख किया। 4 उन्होंने पुष्कर नामक गान्धार-राज को दीक्षित किया, जिसने धर्म-श्रवण करते ही राज्य-लक्ष्मी का परित्याग किया। 5 तब उन विपुल-पराक्रम ने विपुल पर्वत पर हैमवत और साताग्र यक्षों को दीक्षित किया। 6 जीवक के आम्र-वन में रात के समय पाँच सौ रानियों के साथ राजा (अजातशत्रु) को गुणदर्शी बुद्ध ने धर्म में स्थापित किया। 7 तब पाषाण-पर्वत पर शान्ति-परायण पारायण (नामक) ब्राह्मण आधी गाथा के सूक्ष्म अर्थ द्वारा दीक्षित हुआ।⁷⁹ ⁷⁸ - अन्तिम पाद का मूल यह हो सकता है-"योगः प्रमाणं न वयो न वंशः।" ⁷⁹ - इसका उत्तरार्ध चीनी अनुवाद से लिया गया है। 96 अश्वघोष