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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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25 बाहरी वस्तुओं का प्रयोग करती हुई वे अनेक आहार्य (बनावटी) गुणों से (लोगों को) ठगती हैं और अपने वास्तविक गुणों को छिपाती हुई वे मूर्खों को मोह में डालती हैं। 26 स्त्री को अनित्य दुःखमय अनात्म और अशुचि समझने से पण्डितों के चित्त उसे देखकर अभिभूत नही होते हैं। 27 जिन मनुष्यों के चित्त इन प्रलोभनों (आलय) से सुपरिचित होते हैं, जैसे कि पशु गोचर-भूमि से, वे दिव्य आनन्दों का आक्रमण होनेपर कैसे मोह में पड़ सकते हैं? 28 अतः प्रज्ञारूपी तीर लेकर, हाथों में वीर्यरूपी धनुष ग्रहण कर और स्मृतिरूपी कवच पहनकर विषयों की बातपर खूब सोचो। 29 बहकी हुई स्मृति से स्त्री की चञ्चल आँखों को देखने की अपेक्षा लोहे की गर्म काँटियों से अपनी आँखों को जला डालना अच्छा है। 30 यदि मरते समय तुम्हारा चित्त काम के अधीन हो, तो इससे तुम विवश होकर बाँधे जाओगे और पशु-योनि में या नरक में तुम्हारा जन्म होगा। 31 इसलिये इस भय को पहचानो और बाहरी लक्षणों (= निमित्त) पर ध्यान मत दो; क्योंकि वही ठीक-ठीक देखता है, जो शरीर में केवल (वास्तविक) रूप को देखता है। 32 जगत् में न तो इन्द्रिय ही विषयों को बाँधते हैं और न विषय ही इन्द्रियों को। उन (विषयों) के लिए जिस किसी को काम (पैदा) होता है, वह उससे बाँधा जाता है। 33 विषय और इन्द्रिय परस्पर आसक्त हैं, जैसे कि दो बैलों का जोड़ा एक जुए में जुता रहता है। *34 आँख आकृति को देखती है और चित्त उसपर विचार करता है, और उस विचार से विषय के बारे में काम उत्पन्न होता है और काम से मुक्ति (निष्कामता) भी। *35 तब विषयों की उचित परीक्षा नही करने से महा-अनर्थ होता है, इन्द्रियों के क्षेत्र में प्रवृत्ति (विषयासक्ति) सब विपत्तियों का घर है। 36 अतः स्मृति का त्याग नही करते हुए, परम सावधानी से चलते हुए, और अपने हित (= स्वार्थ) का ख्याल रखते हुए, तुम लोग मन से उत्साहपूर्वक भावना करो।” 37 जब उन्होंने अपने शिष्यों को, जो रूप के अन्त तक नही पहुँचे थे, इस प्रकार उपदेश दिया, तब आम्रपाली उन्हें देखकर हाथ जोड़े समीप आई। 38 शान्तचित्त मुनि को एक वृक्ष के नीचे बैठे देखकर उस (आम्रपाली) ने उन (मुनि) के द्वारा उपवन का उपभोग (= परिभोग) होने से अपने को अनुगृहीत माना। 39 तब अपनी चञ्चल आँखों को ठीक कर, उसने पूर्ण विकसित चम्पकपुष्प-सदृश मस्तक से मुनि को बड़ी श्रद्धा से प्रणाम किया। 40 जब सर्वज्ञ (मुनि) के आदेशानुसार वह बैठ चुकी, तब मुनि ने उसके समझने योग्य शब्दों में उसे कहाः-


41 “तुम्हारा यह आशय पवित्र है और तुम्हारा चित्त विशुद्धि द्वारा स्थिर है; तो भी रूपवती एवं युवती नारी में धर्म-पिपासा दुर्लभ है। 42 इसमें आश्चर्य का क्या कारण है कि धर्म, बुद्धिमान् पुरुषों को या विपत्ति-पीडि़त (= व्यसनाभिभूत) स्त्रियों को या संयतात्माओं (= आत्मवान) को या व्याधि-ग्रस्तों को आकृष्ट करे? 43 किन्तु यह असाधारण है कि विषयासक्त (= विषयैकरस) जगत् में स्वभावतः दुर्बलबुद्धि एवं चञ्चलचित्त युवती नारी धर्म-भाव का पोषण करे। 44 तुम्हारा चित्त धर्माभिमुख है, यही तुम्हारा सच्चा धन (= सदर्थ) है; क्योंकि जीवलोक अनित्य है, अतः धर्म को छोड़कर दूसरी कोई सम्पत्ति नही। 45 रोग स्वास्थ्य को गिराता है, उम्र जवानी को काटती है और मृत्यु जीवन अपहरण करती है; किन्तु धर्म के लिये ऐसी कोई विपत्ति नही। 46 (सुख की) खोज में मनुष्य को केवल प्रिय से वियोग और अप्रिय से संयोग होता है, इसलिये धर्म ही सर्वोत्तम मार्ग है। 47 दूसरों पर निर्भर होना महादुःख है और अपने पर आश्रित होना परम सुख; तो भी मानव-वंश में उत्पन्न सभी स्त्रियाँ दूसरों पर आश्रित हैं।⁸⁴ 48 इसलिए तुम उचित निष्कर्ष पर पहुॅंचो, क्योंकि पराश्रय एवं प्रसव के कारण स्त्रियों को अत्यन्त कष्ट होता है।” 49 उसने-जो उम्र में छोटी थी, किन्तु जो आशय बुद्धि एवं गम्भीरता में छोटी-जैसी नही थी- महामुनि के वचन प्रसन्नतापूर्वक सुने। 50 तथागत के धर्मोपदेश करने से उसने कामासक्त चित्त की अवस्था का परित्याग किया, स्त्रीत्व (स्त्री होने की दशा) को तुच्छ समझती हुई वह विषयों से विमुख हो गई, और अपनी जीविका के उपायों से उसे घृणा हो गई। *51 तब मञ्जरी से भरी आम्रशाखा के समान अपनी देह से प्रणिपात करते हुए उसने अपनी दृष्टि महामुनि में स्थिर की और फिर धर्म के प्रति विशुद्धदृष्टि होकर वह उठ खड़ी हुई। 52 नम्र स्वभाव होनेपर भी, धर्म-पिपासा से निरन्तर प्रेरित होती नारी ने अपने कर-कमलों को जोड़कर मृदु स्वर में कहा- 53 “हे भगवन्, आपने लक्ष्य प्राप्त कर लिया है और सांसारिक दुःख शान्त कर लिया है। अपने शिष्यों के साथ भिक्षाटन का समय मेरे लिये सफल करें.....जिससे मैं धर्मोपदेश लाभ करूँ।”


⁸⁴ - मूल श्लोक बहुत कुछ ऐसा हो सकता हैः- पराश्रयो महादुःखं स्वाश्रयः परमं सुखम्। मनुवंशे समुत्पन्नाः सर्वाः स्त्रियः पराश्रिताः ॥


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