भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 122 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

54 तब उसकी भक्ति देख और प्राणियों को आहार पर आश्रित जान, सुगत ने मौन धारण कर अपनी सम्मति दी तथा सङ्केत (= विकार) द्वारा अपना आशय प्रकट किया। 55 परम धर्म के अधिकारी बुद्ध को, जिनकी दृष्टि अवसर को पहचानती थी, उस धर्म-पात्र में अत्यन्त आनन्द हुआ, .... श्रद्धा द्वारा श्रेष्ठ लाभ होता है, यह जानते हुए उन्होंने उस (आम्रपाली) की प्रशंसा की। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का "आम्रपाली के उपवन में मुनि का आगमन" नामक 22वाँ सर्ग समाप्त॥ तेईसवाँ सर्ग आयु निश्चित करना 1 तब मुनि का आशय समझकर, वह उन्हें प्रणाम करके नगर को लौट गई। समाचार सुनकर, लिच्छवि बुद्ध को देखने आये। 2 कुछों के घोड़े, रथ, छत्र, हार, अलङ्कार और वस्त्र श्वेत थे तथा दूसरों के सुनहले रङ्ग के थे। 3 कुछों की सब चीजें वैदूर्य के समान पीली थीं, तो दूसरों की मयूर-पुच्छ के रङ्ग की। इस तरह अपने-अपने मन के अनुकूल उज्जवल परिधान (चमकीला पहनावा) पहनकर वे बाहर आये। 4 वे, जिनके शरीर पर्वत के समान विशाल थे और जिनकी बाहुएँ सुनहले जुए के समान थीं, स्वर्ग के शरीरधारी उज्जवल .... के सदृश जान पड़े। 5 जब वे रथों से उतरने के लिए खड़े हुए, तब संध्याकालीन बादल पर पड़नेवाली बिजली की छटाओं के समान वे चमके। 6 अपने तरङ्गित शिरोवेष्टनों (पगड़ियों) को झुकाते हुए उन्होंने धैर्यपूर्वक मुनि को प्रणाम किया; अभिमानी होनेपर भी वे धर्म की अभिलाषा से मानो गम्भीर होकर वहाँ खड़े हुए। 7 बुद्ध के पास उनका निर्मल मण्डल ऐसे चमका, जैसे अनभ्र (बादलरहित) सूर्य के सामने (प्रकाश में) इन्द्र-धनुष चमक रहा हो। 8 तब सिंह और दूसरे लोग पृथ्वी पर सिंहों की आकृति से युक्त तथा सोने से अलङ्कृत सिंहासनों पर बैठ गये, और तब पुरुष-सिंह ने उनसे कहा- 9 "धर्म के प्रति आपकी यह भक्ति मूल्य में आपके रूप, राज्य व बल आदि विशेषताओं से बहुत बढ़कर है। 10 आपके सौन्दर्य, भव्य वस्त्रों, आभूषणों या हारों की वैसी चमक नहीं है, जैसे कि शील आदि गुणों की। 11 मैं वृज्जियों को अनुगृहीत और भाग्यवान् समझता हूँ कि उनके अधिपति आप हैं, जो धर्म के ज्ञाता तथा विनय के इच्छुक हैं। 12 हे आर्य, धर्म में रहनेवाले (प्रजा-) पालक साधारणतः (आर्यावर्त के) भीतर के देशों में तथा अभागों के लिए दुर्लभ हैं। 13 इस देश पर धर्म का भी अनुग्रह है कि यह धर्म-ज्ञान के रक्षक महाभागों द्वारा पालित है। 14 इसलिए, जैसे नदी पार करने की इच्छा करनेवाली गौएँ (पशु) गवांपति (झुण्ड के सरदार) का अनुसरण करती हैं, वैसे ही राजाओं से रक्षित देश में (बसने के लिए) लोग इकट्ठे होते हैं। 15 यह शील हमेशा आप में रहना चाहिए जिससे आपका धन (= स्वार्थ ?) इहलोक या परलोक में काम द्वारा नही छीना जा सके। 16 शील का फल महान् है, - सन्तुष्ट चित्त, सम्मान, लाभ, यश, विश्वास, आनन्द एवं पारलौकिक सुख। 17 जैसे पृथिवी सब चराचर जीवों का आश्रय है, वैसे ही शील सब गुणों का उत्तम आश्रय है। 18 शील छोड़कर भी परम पद चाहनेवाले मनुष्य को, उड़ने की इच्छा करनेवाले पंख-विहीन प्राणी के समान या नदी पार करने की इच्छा करनेवाले नाव-रहित व्यक्ति के समान जानिये। 19 जो मनुष्य यशस्वी, रूपवान् धनवान् होकर भी शील से विमुख है, वह उस वृक्ष के समान है जो फूला-फला होनेपर भी काँटों से भरा हो। 20 कोई मनुष्य महल में रहता हो और उज्ज्वल वस्त्र-आभूषण पहनता हो, किन्तु, यदि वह शीलवान् है तो उसकी गति महर्षि की-सी है। 21 वे सब छद्मचारी (कपटी) समझे जायेंगे, जिन्होंने, काषाय या वल्कल वस्त्र पहनते हुए भी तथा ऋषियों की भाँति तरह-तरह से केशों को सजाते हुए भी, अपना शील नष्ट कर लिया है। 22 यद्यपि कोई मनुष्य प्रतिदिन तीन बार तीर्थ में नहाता हो, अग्नि में दो बार आहुतियाँ डालता हो, अग्नि के ताप से दग्ध होता हो, तो भी शीलवान् नही होनेपर वह कुछ नही है। 23 यद्यपि वह हिंसक पशुओं के आगे अपना शरीर समर्पित करता हो, पर्वत पर से अपने को गिराता हो, आग या पानी में कूदता हो, तो भी शीलवान् नही होनेपर वह कुछ नही है। 24 यद्यपि वह थोड़ा-सा फल-मूल खाकर रहता हो, मृग के समान तृण चरता हो, हवा पीकर जीना चाहता हो, तो भी शीलवान् नही होनेपर वह शुद्ध नही हो सकता। 25 दुःशील मनुष्य पशु-पक्षियों के समान है; वह धर्म का पात्र नही है, किन्तु पानी के चूते हुए पात्र के समान है। 26 इहलोक में उसे भय, अयश, अविश्वास एवं असन्तोष मिलते हैं और परलोक में वह विपत्ति भोगेगा। 27 इसलिए मरुभूमि के पथ-प्रदर्शक की तरह शील की हत्या नही होनी चाहिए; अपने पर भी आश्रित रहनेवाला दुर्लभ शील एक नाव है, जो मनुष्य को स्वर्ग ले जाती है। बुद्धचरित 101