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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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28 जिसका चित्त दोषों से अभिभूत होता है, वह जीवन में सब कुछ खो बैठता है। शील में स्थित होकर दोषों का नाश करो और श्रद्धा का पोषण करो (या जो कुछ अच्छा है वह करो)। 29 इसलिए उन्नति चाहनेवाला आदमी पहले अपने को आत्मभाव (अहंभाव) से मुक्त करे; क्योंकि आत्मभाव गुणों को वैसे ही छिपाता है, जैसे धुँआ आग को। 30 गुण, वास्तव में होनेपर भी, अभिमान से अभिभूत होकर नही चमकते, जैसे बादलों से ढँके हुए तारे, सूरज व चाँद नहीं चमकते। 31 औद्धत्य लज्जा (= ह्री) को नष्ट करता है, शोक धैर्य को, बुढ़ापा सौन्दर्य को और आत्मभाव गुणों के मूल को। 32 द्वेष एवं अभिमान के कारण असुरगण देवों से पराजित होकर पाताल में फेंके गये और त्रिपुर नाश को प्राप्त हुआ। 33 वह मनुष्य बुद्धिमान् नही समझा जाता है, जो अनित्य जीवन में अपने को सबसे अच्छा, न कि बुरा, समझता है। 34 यद्यपि यह आकृति ही अस्थिर है तथा मनुष्य अनित्य व विनाशधर्मा है, तो भी “मैं ही” (अहमेव) यह सोचता हुआ वह अभिमान करता है- इसमें विवेक-शून्यता के अतिरिक्त और क्या है? 35 कामराग प्रबल प्रच्छन्न एवं सहजात शत्रु है, जो बुराई करनेवाले दुश्मन के समान मित्रता के वेष में प्रहार करता है। 36 कामराग की अग्नि तथा साधारण अग्नि समानरूप से दहनशील है, किन्तु कामराग की अग्नि प्रज्वलित होनेपर रात अवश्य लम्बी होगी। 37 कहा जाता है कि अग्नि की वैसी शक्ति नही है जैसी कि कामराग की अग्नि की; क्योंकि अग्नि जल से शान्त हो जाती है, किन्तु कामराग की अग्नि सम्पूर्ण सरोवर से भी नही। 38 आग से जङ्गल जलनेपर जङ्गल के वृक्ष समय पर उत्पन्न हो जाते हैं, किन्तु कामराग की अग्नि से दग्ध होनेपर मूर्खों में धर्म की उत्पत्ति नही होती है। 39 कामराग के कारण मनुष्य सुख खोजता है और सुख के लिए बुराई (अकुशल कर्म) करता है; बुराई करने से नरक में गिरता है। कामराग के समान शत्रु नही। 40 काम से इच्छा उत्पन्न होती है और इच्छा से कामासक्ति। कामासक्ति से मनुष्य को दुःख होता है। काम के समान शत्रु नही। 41 मूर्ख कामनामक महाव्याधि की पर्वाह नही करता और ... ... ... ... ... ... । 42 काम को अनित्य अपवित्र दुःखधर्मा एवं अनात्म समझकर यदि कोई मनुष्य अपने को उससे मुक्त भी कर ले, तो भी अपने कुमार्गगामी चित्त के कारण वह फिर काम के वशीभूत हो जाता है।

43 इसलिए वस्तु से अनुराग पैदा होनेपर जो कोई उसे वास्तविक अवस्था में (= यथाभूतं) देख सकता है, वह वास्तविकतादर्शी (= भूतदर्शी) कहा जाता है। 44 जैसे (किसी वस्तु के) गुणों को देखने से आसक्ति उत्पन्न होती है, वैसे ही इसके दोषों पर विचार करने से क्रोध (विमुखता ?) होता है। 45 इसलिए जो कोई क्रोध रोकना चाहे, वह अपने को विमुखता से प्रभावित न होने दे; क्योंकि जैसे आग से धुँआ निकलता है, वैसे ही विमुखता से क्रोध उत्पन्न होता है। 46 जैसे रूपवानों के लिए बुढ़ापा और आँखवालों के लिए अन्धेरा है वैसे ही क्रोध, धर्म अर्थ व काम का विफलीकरण तथा विद्या का शत्रु है। 47 क्रोध चित्त का घना अन्धकार है, मित्रता का प्रधान शत्रु है, सम्मानविनाशक और अपमानजनक है। 48 इसलिए क्रोध न कीजिए, यदि आप करते भी हों तो इसे छोड़ दीजिए। जैसे दंशधर्मा साँप के पीछे आप नही पड़ते हैं, वैसे ही क्रोध के पीछे न पड़े। 49 जो कोई मार्ग से बहके हुए रथ के समान क्रोध को लगाम लगाकर दृढ़तापूर्वक वश में रखता है उसी को मैं सच्चा सारथि समझता हूँ, दूसरे प्रकार का सारथि तो केवल लगाम पकड़नेवाला है। $^{85}$ 50 जो कोई क्रोध करना चाहता है और इसकी उत्पत्ति को रोकना नही चाहता है, क्रोध बीतने पर वह ऐसे जलता है जैसे आग छूने से। 51 जब मनुष्य क्रोध करता है तो पहले उसका ही चित्त जलता है; पीछे ज्यों ज्यों क्रोध बढ़ता जाता है त्यों त्यों, दूसरे भी, इससे जल सकते हैं या नही भी (जल सकते हैं)। 52 शरीर-धारी शत्रुओं के प्रति द्रोह करने से क्या लाभ, जब कि (शरीर-धारी प्राणियों का) संसार ही रोग आदि विपत्तियों से पीड़ित है? 53 इसलिए संसार को दुःख के वशीभूत जानकर आप लोगों को क्रोध रोकने के लिए सब जीवों के प्रति मैत्री एवं करुणा का आचरण करना चाहिए।” 54 उस समय उन्हें दोषों से भरा देखकर, बुद्ध ने उनके ऊपर करुणा की और उपदेश देकर, उन्हें फटकारा।

$^{85}$ - यो वे उप्पतितं कोधं रथं भन्तं' व धारये। तमहं सारथि ब्रूमि रस्मिग्गाहो इतरो जनो ॥ -धम्मपद कोधवग्गो, 17.2 अर्थ-“जो आए क्रोध को उसी तरह रोक ले, जैसे कोई मार्ग-भ्रष्ट रथ को; उस आदमी को मैं (असली) सारथी कहता हूँ; दूसरे लोग तो केवल रस्सी पकड़नेवाले हैं।” यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा। स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते ॥ -महाभारत, आदिपर्व।

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