बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
28 जिसका चित्त दोषों से अभिभूत होता है, वह जीवन में सब कुछ खो बैठता है। शील में स्थित होकर दोषों का नाश करो और श्रद्धा का पोषण करो (या जो कुछ अच्छा है वह करो)। 29 इसलिए उन्नति चाहनेवाला आदमी पहले अपने को आत्मभाव (अहंभाव) से मुक्त करे; क्योंकि आत्मभाव गुणों को वैसे ही छिपाता है, जैसे धुँआ आग को। 30 गुण, वास्तव में होनेपर भी, अभिमान से अभिभूत होकर नही चमकते, जैसे बादलों से ढँके हुए तारे, सूरज व चाँद नहीं चमकते। 31 औद्धत्य लज्जा (= ह्री) को नष्ट करता है, शोक धैर्य को, बुढ़ापा सौन्दर्य को और आत्मभाव गुणों के मूल को। 32 द्वेष एवं अभिमान के कारण असुरगण देवों से पराजित होकर पाताल में फेंके गये और त्रिपुर नाश को प्राप्त हुआ। 33 वह मनुष्य बुद्धिमान् नही समझा जाता है, जो अनित्य जीवन में अपने को सबसे अच्छा, न कि बुरा, समझता है। 34 यद्यपि यह आकृति ही अस्थिर है तथा मनुष्य अनित्य व विनाशधर्मा है, तो भी “मैं ही” (अहमेव) यह सोचता हुआ वह अभिमान करता है- इसमें विवेक-शून्यता के अतिरिक्त और क्या है? 35 कामराग प्रबल प्रच्छन्न एवं सहजात शत्रु है, जो बुराई करनेवाले दुश्मन के समान मित्रता के वेष में प्रहार करता है। 36 कामराग की अग्नि तथा साधारण अग्नि समानरूप से दहनशील है, किन्तु कामराग की अग्नि प्रज्वलित होनेपर रात अवश्य लम्बी होगी। 37 कहा जाता है कि अग्नि की वैसी शक्ति नही है जैसी कि कामराग की अग्नि की; क्योंकि अग्नि जल से शान्त हो जाती है, किन्तु कामराग की अग्नि सम्पूर्ण सरोवर से भी नही। 38 आग से जङ्गल जलनेपर जङ्गल के वृक्ष समय पर उत्पन्न हो जाते हैं, किन्तु कामराग की अग्नि से दग्ध होनेपर मूर्खों में धर्म की उत्पत्ति नही होती है। 39 कामराग के कारण मनुष्य सुख खोजता है और सुख के लिए बुराई (अकुशल कर्म) करता है; बुराई करने से नरक में गिरता है। कामराग के समान शत्रु नही। 40 काम से इच्छा उत्पन्न होती है और इच्छा से कामासक्ति। कामासक्ति से मनुष्य को दुःख होता है। काम के समान शत्रु नही। 41 मूर्ख कामनामक महाव्याधि की पर्वाह नही करता और ... ... ... ... ... ... । 42 काम को अनित्य अपवित्र दुःखधर्मा एवं अनात्म समझकर यदि कोई मनुष्य अपने को उससे मुक्त भी कर ले, तो भी अपने कुमार्गगामी चित्त के कारण वह फिर काम के वशीभूत हो जाता है।
43 इसलिए वस्तु से अनुराग पैदा होनेपर जो कोई उसे वास्तविक अवस्था में (= यथाभूतं) देख सकता है, वह वास्तविकतादर्शी (= भूतदर्शी) कहा जाता है। 44 जैसे (किसी वस्तु के) गुणों को देखने से आसक्ति उत्पन्न होती है, वैसे ही इसके दोषों पर विचार करने से क्रोध (विमुखता ?) होता है। 45 इसलिए जो कोई क्रोध रोकना चाहे, वह अपने को विमुखता से प्रभावित न होने दे; क्योंकि जैसे आग से धुँआ निकलता है, वैसे ही विमुखता से क्रोध उत्पन्न होता है। 46 जैसे रूपवानों के लिए बुढ़ापा और आँखवालों के लिए अन्धेरा है वैसे ही क्रोध, धर्म अर्थ व काम का विफलीकरण तथा विद्या का शत्रु है। 47 क्रोध चित्त का घना अन्धकार है, मित्रता का प्रधान शत्रु है, सम्मानविनाशक और अपमानजनक है। 48 इसलिए क्रोध न कीजिए, यदि आप करते भी हों तो इसे छोड़ दीजिए। जैसे दंशधर्मा साँप के पीछे आप नही पड़ते हैं, वैसे ही क्रोध के पीछे न पड़े। 49 जो कोई मार्ग से बहके हुए रथ के समान क्रोध को लगाम लगाकर दृढ़तापूर्वक वश में रखता है उसी को मैं सच्चा सारथि समझता हूँ, दूसरे प्रकार का सारथि तो केवल लगाम पकड़नेवाला है। $^{85}$ 50 जो कोई क्रोध करना चाहता है और इसकी उत्पत्ति को रोकना नही चाहता है, क्रोध बीतने पर वह ऐसे जलता है जैसे आग छूने से। 51 जब मनुष्य क्रोध करता है तो पहले उसका ही चित्त जलता है; पीछे ज्यों ज्यों क्रोध बढ़ता जाता है त्यों त्यों, दूसरे भी, इससे जल सकते हैं या नही भी (जल सकते हैं)। 52 शरीर-धारी शत्रुओं के प्रति द्रोह करने से क्या लाभ, जब कि (शरीर-धारी प्राणियों का) संसार ही रोग आदि विपत्तियों से पीड़ित है? 53 इसलिए संसार को दुःख के वशीभूत जानकर आप लोगों को क्रोध रोकने के लिए सब जीवों के प्रति मैत्री एवं करुणा का आचरण करना चाहिए।” 54 उस समय उन्हें दोषों से भरा देखकर, बुद्ध ने उनके ऊपर करुणा की और उपदेश देकर, उन्हें फटकारा।
$^{85}$ - यो वे उप्पतितं कोधं रथं भन्तं' व धारये। तमहं सारथि ब्रूमि रस्मिग्गाहो इतरो जनो ॥ -धम्मपद कोधवग्गो, 17.2 अर्थ-“जो आए क्रोध को उसी तरह रोक ले, जैसे कोई मार्ग-भ्रष्ट रथ को; उस आदमी को मैं (असली) सारथी कहता हूँ; दूसरे लोग तो केवल रस्सी पकड़नेवाले हैं।” यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा। स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते ॥ -महाभारत, आदिपर्व।
102 अश्वघोष
55 जैसे अस्वस्थ मनुष्यों को रोग-मुक्त करने के लिए, वैद्य उनकी शारीरिक अवस्थाओं के अनुसार ओषधि-सेवन का आदेश देता है, 56 वैसे ही काम बुढ़ापा आदि रोगों से पीड़ित प्राणियों के आशय जानकर मुनि ने उन्हें तत्त्व-ज्ञान की ओषधि दी। 57 मुनि के ऐसे उपदेश से लिच्छवियों को आनन्द हुआ और उन्होंने सिर नवाकर उन्हें प्रणाम किया, जिससे उनकी रत्नमय चूड़ाएँ नीचे लटकने लगीं। 58 तब हाथ जोड़कर और कुछ कुछ देह नवाकर, उन्होंने अपने यहाँ आने के लिए बुद्ध से अनुरोध किया, जैसे देवताओं ने बृहस्पति से अनुरोध किया था। 59 जब मुनि ने उनसे निवेदन किया कि आम्रपाली की पारी पहले आई और बताया कि कुल-पुत्रों के निमित्त नीच कुलवालों को उनके अधिकारों से वञ्चित नहीं करना चाहिए। 60 उस स्त्री ने उन लोगों को पहले ही आकर वञ्चित कर दिया, यह जानकर उन्होंने तथागत का अत्यन्त सम्मान किया, और वे अपनी स्वाभाविक मानसिक अवस्था (क्रोध) पर लौट आये। 61 किन्तु जब तथागत ने उन्हें उपदेश दिया, तब उन्होंने मानसिक शान्ति प्राप्त की, जैसे मुनियों के मन्त्रों का ठीक ठीक उच्चारण करने से साँप का विष शान्त हो जाता है। 62 रात बीतनेपर आम्रपाली ने उनका आतिथ्य किया और (वर्षावास करने के लिए वह) वेणुमती गाँव को (गये)। 63 वर्षाऋतु वहाँ बिताकर महामुनि वैशाली लौट गये और मर्कट-जलाशय के किनारे बैठ गये। 64 वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गये और जब वह वहाँ विराज रहे थे तो मार उस वन में आया और उनके समीप जाकर कहा- 65 "पूर्व में, हे मुनि, नैरञ्जना नदी के तीर पर जब मैंने आपसे कहा था "आपने अपना काम पूरा किया, निर्वाण प्राप्त कीजिए" तब आपने वहाँ उत्तर दिया था:- 66 "मैं तबतक निर्वाण प्राप्त न करूँगा, जबतक पीड़ित प्राणियों की रक्षा न कर लेता हूँ और उनके द्वारा पाप-परित्याग (दोषक्षय) न करा लेता हूँ।" 67 अब बहुतों ने मुक्ति (निर्वाण) पाई, या उसी तरह पाना चाहते हैं या पायेंगे। इसलिए निर्वाण प्राप्त कीजिए।" 68 तब ये वचन सुनकर, अर्हत्-श्रेष्ठ ने उससे कहा, "तीन महीने में मैं निर्वाण प्राप्त करूँगा, अतः अधीर मत होओ।" 69 तब इस प्रतिज्ञा से अपनी इच्छा पूरी हुई जानकर, वह अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ से हट गया। 70 तब महामुनि ऐसे योग-बल से चित्त-समाधि में प्रविष्ट हुए कि उन्होंने अपनी शारीरिक आयु (जीवन) को छोड़ दिया और दिव्य शक्ति के प्रभाव से अभूतपूर्व तरीके से प्राण धारण किया।
71 जिस घड़ी उन्होंने शारीरिक आयु का परित्याग किया उस घड़ी पृथ्वी माती हुई स्त्री के समान काँपी और दिशाओं से बड़ी बड़ी उल्काएँ गिरीं, जैसे अग्नि प्रज्वलित मेरु-पर्वत से पत्थरों की वर्षा हो रही हो। 72 उसी प्रकार इन्द्र के अग्निगर्भ एवं विद्युन्मण्डित वज्र चारों ओर निरन्तर प्रदीप्त हुए; और ज्वालाएँ सर्वत्र प्रज्वलित हुईं, जैसे कल्पान्तकालीन जगत् को जलाने की इच्छा कर रहीं हों। 73 पर्वतों ने, जिनकी चोटियाँ नष्ट हो गईं, ढेर के ढेर टूटे हुए वृक्ष चारों ओर बिखरे और आकाश में दुन्दुभियों से, जैसे वायुपूर्ण गुफाओं से, विषम ध्वनि निकली। 74 तब मर्त्यलोक दिव्यलोक एवं आकाश में हुए सार्वभौम संक्षोभ की घड़ी में महामुनि ने गम्भीर समाधि से निकल कर ये वचन कहे:- 75 "मेरा शरीर, जिसकी आयु मुक्त हो गई है, उस रथ के समान है, जिसका धुरा (अक्षाग्र, अक्षधुरा) टूट गया हो और मैं इसे अपनी शक्ति से ढो रहा हूँ। अपनी आयु के साथ मैं भव- बन्धन से मुक्त हूँ, जैसे अण्डे से निकलते समय अण्डे को फोड़नेवाला पक्षी (बन्धन से मुक्त होता है)।" ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "आयु निश्चित करना"⁸⁶ नामक 23वाँ सर्ग समाप्त ॥ चौबीसवाँ सर्ग लिच्छवियों पर अनुकम्पा 1 तब भूकम्प देखकर, आनन्द को रोमाञ्च हो गया; और "क्या होगा" इससे घबराकर ( = आगतवेगः) वह काँपने लगा और आर्त हो गया। 2 उसने कारण जाननेवाले सर्वज्ञ से इसका कारण पूछा। तब मुनि ने मतवाले साँड के स्वर में उसे कहा:- 3 "इस भूकम्प का कारण यह है कि मैंने पृथ्वी पर अपने दिन काट डाले हैं; मेरे जीवन के अब तीन महीने बचे हुए हैं (मेरी आयु अब से तीन महीने पर अधिष्ठित है)।" 4 यह सुनकर आनन्द अत्यन्त विचलित हो गया और उसके आँसू बहने लगे, जैसे किसी बड़े हाथी द्वारा तोड़े गये चन्दन-वृक्ष से रस बह रहा हो। 5 बुद्ध उसके स्वजन और गुरु थे, इस कारण उसे शोक हुआ और अत्यन्त दुःखी होकर उसने दीनतापूर्वक विलाप किया:- 6 "अपने गुरु का निश्चय सुनकर, मेरा शरीर मानो डूब रहा है, मेरी ग्रन्थियाँ ढीली हो रही हैं और धर्मोपदेश, जो कि मैंने सुना है, आकुल हो रहा है।
⁸⁶- शारीरायुःसंस्काराधिष्ठान = शारीरिक आयु के संस्कारों का अधिष्ठान = आयु पर अधिकार प्राप्त करना, या आयु निश्चित करना।
बुद्धचरित 103
7 अहो! पुरुष-शंसित (= नराशंस) तथागत शीघ्रता से निर्वाण की ओर जा रहे हैं, जैसे फटे- पुराने वस्त्रवाले, जाड़े से ठिठुरे हुए लोगों के लिए आग तेजी से बुझ रही हो। 8 पापों (= दोष) के महावन में भटके हुए शरीरधारी प्राणियों को मार्ग बतलाकर, पथ-प्रदर्शक अकस्मात् ही अदृश्य हो रहा है। 9 प्यास से पीड़ित मनुष्य लम्बे मार्ग पर चल रहे हैं और तब उनके मार्ग में स्थित शीतल जल का जलाशय हठात् ही सूख रहा है। 10 नीली पपिनयोंवाला निर्मल लोक-चक्षु, जो भूत वर्तमान एवं भविष्य को देखता है और जो ज्ञान से विकसित है, अब बन्द होने को है।⁸⁷ 11 अवश्य ही सूख रही लगी फसल के ऊपर जल बरसाकर बादल दूर हो रहा है (= √मज्ज)। 12 अज्ञानरूप अन्धकार के कारण मार्ग-भ्रष्ट प्राणियों के लिए चारों ओर चमकनेवाला प्रकाश अत्यन्त अकस्मात् ही शान्त हो रहा है।” 13 तब आनन्द के चित्त को शोकाकुल देखकर तत्त्वज्ञ-श्रेष्ठ ने, जो सान्त्वना देनेवालों में प्रधान थे, उसके लिए तत्त्व की व्याख्या की:– 14 “पहचानो, आनन्द, जगत् के वास्तविक स्वभाव को और शोक न करो। क्योंकि यह जगत् समष्टि है और इसलिए संस्कृत (उत्पन्न) होने के कारण अनित्य है। 15 मैंने पहले ही तुम्हें कहा है कि द्वन्द्वों में आनन्द पानेवाले प्राणियों को तुम्हें अत्यन्त स्नेह-रहित (?) अनुकम्पा के साथ देखना चाहिए। 16 जो कुछ उत्पन्न है वह संस्कृत और अनित्य है, किसी सहारे पर आश्रित होने के कारण इसे अपना आश्रय नहीं है। तब किसी के लिए भी नित्यत्व प्राप्त करना शक्य नहीं है।⁸⁸ 17 यदि पृथ्वी के प्राणी नित्य (स्थायी) होते तो, तो जीवन (= प्रवृत्ति) परिवर्तनशील नहीं होता; और तब मुक्ति (निर्वाण) की भी क्या जरूरत होती? क्योंकि अन्त वैसा ही होता जैसा कि आरम्भ। 18 या मेरे लिए तुम्हारी तथा अन्य लोगों की यह अभिलाषा ही क्या? . . .। 19 मैंने सम्पूर्ण मार्ग तुम्हें दृढ़तापूर्वक बतला दिया है। तुम्हें तथा (दूसरे) शिष्यों को समझना चाहिए कि बुद्ध कुछ छिपाते नहीं। 20 चाहे मैं रहूँ या निर्वाण प्राप्त करूँ, एक ही बात है, वह यह कि तथागत धर्म की मूर्ति (= धर्मकाय) हैं; यह मर्त्य शरीर किस काम का? ⁸⁷- “जो ज्ञान से विकसित है” इसकी जगह चीनी अनुवाद में है “जो प्रज्ञा द्वारा अन्धकार को दूर करता है”। ⁸⁸- “किसी नहीं है” की जगह चीनी अनुवाद में है “यह दीनतापूर्वक किसी सहारे पर आश्रित है।” 21 क्योंकि मेरे जाने के समय संवेग व अप्रमाद द्वारा पूर्ण श्रद्धा पूर्वक मेरा प्रदीप जलाया गया है, इसलिए धर्म का प्रकाश हमेशा रहेगा। 22 इसे अपना प्रदीप समझकर तुम्हें इसमें दृढ़ उत्साह के साथ लगना चाहिए; और निर्द्वन्द्व होकर अपना लक्ष्य (= स्वार्थ) पहचानो तथा अपने मन को दूसरी बातों का शिकार मत होने दो। 23 तुम्हें जानना चाहिए कि धर्म-प्रदीप है प्रज्ञा-प्रदीप, जिसके द्वारा चतुर व विद्वान् पुरुष अज्ञान दूर करता है, जैसे कि प्रदीप अन्धकार (दूर करता है)। 24 परम श्रेय प्राप्त करने के चार क्षेत्र (= गोचर) हैं—शरीर, वेदना, चित्त और अनात्मता। 25 अस्थि, चर्म, रक्त, स्नायु, मांस केश आदि से भरे इसे शरीर में गन्दगी देखनेवाले को शरीर के प्रति आसक्ति नहीं होती। 26 वेदनाएँ दुःख हैं और प्रत्येक वेदना भिन्न भिन्न कारणों से उत्पन्न होती है, ऐसा जो देखता है वह सुख के भाव (= सञ्ज्ञा) को जीत लेता है। 27 जो शान्त चित्त से (मानसिक) धर्मों की उत्पत्ति स्थिति व क्षय को देखता है, वह कुदृष्टि को ग्रहण नहीं कर सकता। 28 स्कन्धों की उत्पत्ति कारणों से होती है, ऐसा जो देखता है उसके लिए “अहं” में विश्वास (श्रद्धा) पैदा करनेवाला आत्मभाव बन्द हो जाता है। 29 दुःख अन्त करने का यही एक मार्ग है; इन चारों के बारे में उसी प्रकार (धर्म-) मार्ग पर सावधान रहो। 30 उसी तरह, मेरे उस पार चले जानेपर, जो लोग इस पर स्थित रहेंगे, वे उत्तम अहार्य एवं नैष्ठिक पद प्राप्त करेंगे।” 31 इस तरह विनायक ने आनन्द को उपदेश दिया; और यह समाचार सुनकर, बुद्ध की भक्ति से लिच्छवि वहाँ दौड़े आये। 32 दया एवं मुनि-भक्ति के कारण उनके चित्त संताप से अभिभूत हुए और यह समाचार सुनकर, उन्होंने तुरत उन कार्यों को, जिनमें वे व्यस्त थे, तथा साधारण आडम्बर (= ऋद्धि) को छोड़ दिया। 33 गुरु से बोलने की इच्छा से वे उन्हें प्रणाम करके एक ओर खड़े हो गये और उनकी बोलने की इच्छा जानकर गुरु ने उन्हें यों कहा– 34 “मेरे प्रति तुम लोगों के चित्त में जो कुछ हो रहा है वह सब मैं जानता हूँ; तुम लोग वही होते हुए भी मानो शोक से बदलकर अब.......। 35 लक्ष्मी के साथ रहते हुए भी तुम लोगों में बाहरी दीप्ति और धर्म का ज्ञान दोनों विद्यमान हैं। 36 यदि मुझसे कुछ सुनकर तुम लोगों ने ज्ञान प्राप्त किया है, तो अपने को शान्त करो और मेरे चले जाने (= व्यय) से दुःखी मत होओ। 104 अश्वघोष
37 क्योंकि जीवन (=प्रवृत्ति) अनित्य व संस्कृत है, इसलिए वे नश्वर परिवर्तनशील असार और अविश्वसनीय हैं; उनमें कुछ भी स्थायित्व नही है। 38 वसिष्ठ, अत्रि और दूसरे सभी तपस्वी (ऊर्ध्वरेतस्) काल के वशीभूत हुए। यहाँ का अस्तित्व ही विनाशक है। 39 पृथ्वीपति मान्धाता, वासवतुल्य वसु और भाग्यशाली (=महाभाग) नाभाग (पञ्च-) महाभूतों में मिल गये। 40 मार्ग पर चलनेवाला ययाति भी, भव्य रथवाला भगीरथ, निन्दा व अयश प्राप्त करनेवाले कौरव, राम गिरिरजस, अज, 41 ये महात्मा महर्षि और महेन्द्र के समान अनेक दूसरे लोग नाश को प्राप्त हुए; क्योंकि ऐसा कोई नही जिसका नाश नही होता। 42 सूर्य अपने स्थान से च्युत होता है, सम्पत्तिशाली देवगण पृथ्वी पर आये, शत शत इन्द्र चले गये; क्योंकि कोई सदा नही रहता। 43 दूसरे सब सम्बुद्धों ने जगत् को प्रकाशित कर उन दोषों के समान, जिनका तेल क्षीण हो गया हो, निर्वाण प्राप्त किया। 44 भविष्य में तथागत होनेवाले सब महात्मा भी, उन अग्नियों के समान, जिनका जलावन जल गया हो (=भुक्तेन्धनाः), निर्वाण प्राप्त करेंगे। 45 इसलिए मुझे भी मुक्ति की खोज करनेवाले वनवासी तपस्वी के समान चला जाना चाहिए; क्योंकि मैं जो इस व्यर्थ शारीरिक अस्तित्व (=नाम-रूप) को घसीटूँ, इसका कोई कारण नही। 46 क्योंकि इस रमणीय वैशाली से, जिसमें कुछ लोग दीक्षित होने को हैं ही, मेरा आशय प्रस्थान करने का है, इसलिए तुम्हें दूसरे पथ का अनुसरण न करना चाहिए (या अन्यमनस्क न होना चाहिए)। 47 अतः इस जगत् को निराश्रय दीन व अनित्य जानो; और निष्काम भाव से रहते हुए संवेग प्राप्त करो। 48 इस तरह संक्षेप में, जब क्रम से तथागत फिर न देख पड़ें, तब कुबेर की दिशा (उत्तर) की ओर बढ़ो, जैसे कि जेठ महीने में सूर्य (उत्तर की ओर बढ़ता है)।” 49 तब लिच्छवि अश्रुपूर्ण आँखों से उनके पीछे पीछे जाने लगे; और आभूषणों-भरी मोटी भुजाओं से उन्होंने हाथ (=करतल) जोड़कर विलाप किया:– 50 “अहो! विशुद्ध-सुवर्ण-सदृश गुरु का शरीर, जो 32 लक्षणों से युक्त है, भग्न होगा। करुणामय भगवान् भी अनित्य हैं। 51 बेचारे बछड़े, जिन्हें अबतक होश (बुद्धि) नही हुआ है, दूध के अभाव में प्यासे हैं, और ज्ञान की दुधार गाय, अहो! उन्हें अति शीघ्रता से छोड़ रही है। 52 मुनि वह सूर्य हैं, जिनके ज्ञानरूपी प्रकाश ने प्रदीप-रहित मनुष्यों का मोहान्धकार दूर कर दिया है, और यह सूर्य हठात् ही अस्त होगा। 53 जब कि जगत् में अज्ञान-धारा जहाँ तहाँ बह रही है, धर्म का दूरव्यापी बाँध शीघ्र ही टूट रहा है। 54 करुणामय महाभिषक् को उत्तम ज्ञानरूपी ओषधि है, तो भी मानसिक आधियों से पीड़ित जगत् को छोड़कर वह प्रस्थान करेंगे। 55 मन के हीरों से अलङ्कृत और प्रज्ञारूपी आभूषणों से भूषित इन्द्र-पताका का पतन होगा, जब कि उत्सव के अवसर पर लोग इसके प्यासे ही हैं। 56 दुःख-भागी जगत् के लिए, जो भव-चक्र के बन्धनों से बँधा हुआ है, यह मुक्ति-द्वार है और मौत इसे दृढ़तापूर्वक बन्द कर देगी।” 57 इस प्रकार अश्रु-आविल आँखों से लिच्छवियों ने विलाप किया और जब वे उनके पीछे पीछे जाने लगे, तो मुनि ने उन्हें फिर लौटा दिया। 58 तब मुनि का निश्चय जानकर वे शान्त हो गये और अत्यन्त शोकित होकर उन्होंने लौटने का विचार किया। 59 वे, जो सोने के पहाड़ के समान सुन्दर थे, मुनि के पाँव पड़ते समय कर्णिकार वृक्षों के समान शोभित हुए जिनके फूल हवा में हिल रहे हों। 60 उनके हृदय उनमें अनुरक्त थे, उनके पाँव लड़खड़ा रहे थे, और धारा के विरुद्ध चलती हुई तरङ्गों के समान, वे आगे बढ़े बिना ही लौट गये। *61 .... .... , मुनि में उनका आनन्द और मुनि के प्रति उनकी श्रद्धा अविचल थी। *62 जङ्गल के गवांमति के चले जानेपर महावृषभों के समान वे खड़े हो होकर दशबलधारी की ओर बार बार देख रहे थे। 63 तब तथागत में लगे चित्त से और अत्यन्त कान्तिहीन शरीर से वे शोकित होकर पैदल ही जाने लगे, जैसे अन्त्य कर्म के मृत-स्नान के लिए जा रहे हों।⁸⁹ *64 लिच्छवि (लाचार होकर) अपने महलों में लौट आये और यद्यपि उन्होंने धनुषों से, जिनका निशाना कभी चूका नही, शत्रुओं को पराजित किया था, यद्यपि वे अभिमानी एवं बलवान् थे, यद्यपि वे संसार में साम्राज्य पाने के लिए यत्न करते थे और यद्यपि सुख के साधनों पर उनका अधिकार महान् था, तो भी वे विषण्णवदन थे। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “लिच्छवियों पर अनुकम्पा” नामक 24वाँ सर्ग समाप्त ॥ ⁸⁹ - किसी के मरनेपर स्नान करनेवाले को “अपस्नात” या “मृतस्नात” कहते हैं। बुद्धचरित 105
पच्चीसवाँ सर्ग
निर्वाण-पथपर
**** 1 जब मुनि निर्वाण के लिए चले तब वैशाली निष्प्रभ हो गई, जैसे कि सूर्य ग्रहण होनेपर अन्धकार से ढँका हुआ आकाश (निष्प्रभ हो जाता है)। **** 2 सुन्दर और निरभिमान होनेपर भी, सर्वत्र रमणीय होनेपर भी यह (वैशाली) संताप के कारण शोभित नही हुई, जैसे कि पति के मरनेपर पत्नी, **** 3 जैसे कि विद्या के बिना सुन्दरता, जैसे कि गुण के बिना ज्ञान, जैसे अभिव्यक्ति (की शक्ति) के बिना बुद्धि, जैसे संस्कार के बिना अभिव्यक्ति (की शक्ति), **** 4 जैसे सदाचार के बिना श्री, जैसे श्रद्धा के बिना स्नेह, जैसे उद्योग के बिना लक्ष्मी, जैसे धर्म के बिना कर्म। **** 5 ...उस समय शोक के कारण यह शोभित नही हुई, जैसे शरदऋतु में वर्षा न होनेपर सूखी हुई धान की फसल के साथ पृथ्वी शोभा नही पाती है। **** 6 वहाँ शोक के कारण न किसी ने रसोई बनाई, न भोजन ही किया; यशस्वी मुनि का यश बखानते हुए वे रोते रहे। **** 7 दूसरे लोग न कुछ बोल रहे थे; न कर रहे थे और न सोच रहे थे; नगर में एक ही काम हो रहा था--शोक और क्रन्दन। **** 8 तब सेनापति सिंह अत्यन्त दृढ़ होनेपर भी शोकाकुल हुआ और... ...सोचते हुए यों विलाप किया:-- **** 9 “विधर्मी दर्शनों को पराजित कर, उन्होंने सन्मार्ग का उपदेश दिया और स्वयं उस मार्ग पर चले। अब वह सदा के लिए जा रहे हैं। **** 10 वह नाथ, दुःखी और निष्प्रभ जगत् को छोड़ते हुए, लोगों को अनाथ कर रहे हैं; इस तरह वह शान्ति (= शम) प्राप्त करने जा रहे हैं। **** 11 जैसे काल-क्रम से (बुढ़ापे में) शारीरिक ओज क्षीण होता है, वैसे ही मेरा धैर्य नष्ट हो रहा है, क्योंकि गुरुवर योगाचार्य अन्तिम शान्ति के मार्ग पर हैं। **** 12 अपनी दिव्य शक्ति खोकर स्वर्ग से च्युत हुए नृपति नहुष के समान पृथ्वी उनके बिना दया का पात्र है, और मैं “किंकर्तव्यविमूढ़” हूँ। **** 13 जैसे आतप से पीड़ित व्यक्ति पानी की शरण में जाता है या शीत से पीड़ित आग की शरण में, वैसे ही अपनी शंकाएं मिटाने के लिए लोग अब किसकी शरण जायेंगें? **** 14 मुनि के नष्ट होनेपर-मुनि जो संसार के आचार्य (=लोकाचार्य) हैं और जो आग सुलगानेवाली भाथी की तरह श्रेय की भाथी हैं-धर्म भी नष्ट हो जायगा। **** 15 उनके समान दूसरा कौन हैं जो स्वभावतः रोग व मौत के वशीभूत तथा शील के अभाव या दुःशील से बँधे प्राणियों का महादुःख-चक्र तोड़ सके? **** 16 जैसे वसन्त के अन्त में बादल सूखे हुए सिन्दुवार पौधों को जीवन-दान करता है, वैसे ही कौन दूसरा अपनी वाणी द्वारा काम से अत्यन्त जले हुए मनुष्यों को जिला सकता है? **** 17 जब मेरु के समान ठोस सर्वज्ञ गुरु चले जायेंगे, तब जगत् में किसे वह बुद्धि होगी, जिससे वह विश्वास-पात्र बनेगा? **** 18 मूढ़ जीव-लोक मरने के लिए ही पैदा होता है, जैसे दण्डनीय अपराधी को मद पिलाकर वध-स्थल की ओर ले जाते हैं। **** 19 जैसे तेज आरे से वृक्ष चीरा जाता है, वैसे ही विनाशरूपी आरे से यह संसार चीरा जा रहा है। **** *20 यद्यपि जगत् के श्रेष्ठ आचार्य को ज्ञान-बल प्राप्त है और उन्होंने दोषों को निःशेष जला डाला है, तो भी वह विनाश की ओर जा रहे हैं। **** 21 जो ज्ञानरूपी महानौका द्वारा संसार-सागर से-इच्छाएँ जिसकी तरंगें हैं, अज्ञान जिसका जल है और जिसमें कुदृष्टिरूपी प्राणी तथा काम (=रजस) रूपी मछलियाँ रहती हैं-लोगों को उबारते हैं; **** 22 जो ज्ञानरूपी महाशस्त्र से संसाररूपी वृक्ष को-बुढ़ापा जिसकी शाखाएँ हैं, रोग जिसके फूल हैं, मौत जिसका मूल है और जन्म जिसके अङ्कुर हैं-काटते हैं; **** 23 जो ज्ञानरूपी शीतल जल द्वारा, अज्ञानरूपी अरणियों से उत्पन्न दोषरूपी अग्नि को-काम जिसकी ज्वालाएँ हैं और विषय जिसके ईंधन है-शान्त करते हैं; **** 24 जिन्होंने शान्ति मार्ग ग्रहण किया है, जिन्होंने अज्ञानरूपी महा-अन्धकार का परित्याग किया है, परम नैष्ठिक ज्ञान प्राप्तकर जिन्होंने इसका प्रेमपूर्वक उपदेश दिया है; **** 25 जिन्होंने सब दोषों को अन्त कर लिया है, जो सब जीवों पर दया-दृष्टि रखते हैं और जो सबका उपकार करते हैं, वह सर्वज्ञ सब कुछ छोड़ने जा रहे हैं। **** 26 यदि महामुनि भी, जिनकी भुजाएँ बड़ी बड़ी हैं और जिनकी वाणी मृदु एवं स्पष्ट है, नाश को प्राप्त हो रहे हैं, तो नाश को प्राप्त होने से कौन बच सकेगा? **** 27 अतः बुद्धिमान् मनुष्य को शीघ्र ही धर्म की शरण में जाना चाहिए, जैसे कि जङ्गल में भटका हुआ काफिले का सौदागर, पानी देखकर, तेजी से उसकी शरण में जाता है। **** 28 अनित्यता एक बुराई है जो विनाश-कार्य में भेद-भाव नही रखती है, ऐसा जानकर जो मनुष्य धर्म के विषय में प्रसुप्त नही रहता, वह पड़े रहनेपर भी प्रसुप्त नहीं हैं।” **** 29 तब ज्ञानोपभोक्ता नरसिंह सिंह ने जन्म की बुराइयों की निन्दा की और जन्म-विनाश की प्रशंसा।
**** 106 अश्वघोष
30 जन्म-मूलोच्छेद करने की, सद्रत ग्रहण करने की और चञ्चल चित्त को संयत करने की इच्छा से उसने नैष्ठिक मार्ग पर चलने की इच्छा की। 31 शान्ति-मार्ग पर चलने की, भव-सागर में त्राण पाने की और सदा उदार रहने की इच्छा से उसने जन्म-उच्छेद करना चाहा। 32 उस समय जब कि मुनि निर्वाण प्राप्त करने की इच्छा कर रहे थे, उस सिंह ने दान दिया और अभिमान-परित्याग किया, धर्म का ध्यान किया और शान्ति प्राप्त की, और इस तरह उसने पृथ्वी को शून्य पद समझा। 33 तब गजराज के समान अपना सारा शरीर घुमाकर नगर की ओर देखते हुए, मुनि ने यह वचन कहे :- 34 "हे वैशाली, अपने जीवन के शेष भाग में मैं तुम्हें फिर न देखूँगा; क्योंकि, मैं निर्वाण की ओर जा रहा हूँ।" *35 श्रद्धापूर्वक और धर्म की इच्छा से वे पीछे-पीछे आ रहे हैं, यह देखकर मुनि ने उन्हें विदा किया, जिनका चित्त उस समय तक प्रवृत्ति में ही लगा हुआ था। 36 तब यथाक्रम विनायक भोगनगर की ओर बढ़े और वहाँ ठहरकर सर्वज्ञ ने अपने अनुचरों से कहा:- 37 "आज मेरे चले जानेपर तुम्हें धर्म में अपना श्रेष्ठ ध्यान लगाना चाहिए। यही तुम्हारा चरम लक्ष्य है; इसके अतिरिक्त सब कुछ केवल श्रम है। 38 जो कुछ सूत्रों में समाविष्ट न हो या विनय में दिखाई न पड़े वह सब मेरे सिद्धान्त के प्रतिकूल है और उसे किसी भी प्रकार ग्रहण न करना चाहिए। 39 क्योंकि वह न तो धर्म है, न विनय, और न मेरे वचन; यद्यपि बहुत से लोग उसे कहते हों, तो भी अज्ञान-जन्य वचन की तरह उसे अस्वीकार करना चाहिए। 40 जो पवित्र हैं उनका उपदेश ग्राह्य है, क्योंकि वही है धर्म, विनय और मेरे वचन; और इसके अनुसार नही चलना गड्ढे में गिरना है। 41 इसलिए जो कुछ श्रद्धा के योग्य है वह संक्षेप से मेरे सूत्रों में कहा गया है। जो कोई उनके अनुसार चलता है, वह विश्वसनीय है, और इसे छोड़कर दूसरा कोई प्रमाण नही (= तस्मादृते नास्ति प्रमाणमन्यत्)। 42 मोह-वश अधर्म का प्रतिपादन करनेवाले धार्मिक शास्त्रों की उत्पत्ति होगी, मेरे इन सूक्ष्म विचारों के विषय में अज्ञान और अनिश्चय होने से, 43 या अज्ञान-मिश्रित विचारों के कारण या विभेदों का ज्ञान नही होने से, जैसे कि सोने के समान दिखाई पड़नेवाले पीतल से लोग ठगे जाते हैं। 44 इस प्रकार जो धर्म नही है, किन्तु धर्म का कपट-रूपमात्र, वह वञ्चना है, जिसकी उत्पत्ति होती है प्रज्ञा के अभाव से या तत्त्व को न समझ सकने के कारण। 45 इसलिए विनय एवं सूत्रों की सहायता से तुम्हें इसकी उचित रीति से (= न्यायतः) परीक्षा करनी चाहिए, जैसे कि सुनार सोने को तपाकर, काटकर और तार बनाकर परखता है। 46 वे मनुष्य बुद्धिमान् नहीं, जो शास्त्रों को नहीं जानते; वे अनुचित (अन्याय) मार्ग को उचित (न्याय) मार्ग समझते हैं और उचित मार्ग को अनुचित। 47 इसलिए शब्द और अर्थ के अनुसार ठीक-ठीक सुनकर इसे ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि जो कोई शास्त्र को अनुचित रीति से ग्रहण करता है वह अपने को ही क्षति पहुँचाता है, जैसे कि तलवार को अनुचित रीति से ग्रहण करनेवाला अपने को ही काटता है। 48 जो शब्द को ठीक ठीक नही समझता है उसके लिए अर्थ दुर्लभ हो जाता है, जैसे कि रात्रि काल में किसी आदमी के लिए उस घर को पाना (खोजना) कठिन हो जाता है, जहाँ वह पहले कभी न गया हो और जहाँ का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा हो। 49 जब अर्थ नष्ट हो जाता है तो धर्म (शास्त्र) नष्ट हो जाता है और धर्म के नष्ट होनेपर योग्यता (पात्रता) नष्ट हो जाती है; इसलिए वह बुद्धिमान् है जिसका चित्त अर्थ को ठीक ठीक समझता है।" 50 जब भगवान् ये वचन कह चुके, तब वह यथासमय पापानगर में गये, जहाँ मल्लों ने उनका पूरा सम्मान किया। 51 तब भगवान् ने अपने भक्त चुन्द के घर-उसी के लिए, न कि अपने सहारे के लिए-अन्तिम भोजन किया। 52 तब अपनी शिष्य-मण्डली के साथ भोजन कर चुकनेपर तथागत ने चुन्द को धर्मोपदेश दिया और फिर कुशीनगर चले गये। 53 इस तरह चुन्द के साथ उन्होंने इरावती नदी पार की और स्वयं उस नगर के एक उपवन में शरण ली, जहाँ कमलों का एक शान्त सरोवर था।⁹⁰ 54 उन्होंने, जो सोने के समान चमक रहे थे, हिरण्यवती नदी में स्नान किया और तब शोकाकुल आनन्द को, जो संसार का आनन्द (= लोकानन्द) था, इस प्रकार आदेश दिया:- 55 "आनन्द, इन जोड़े शाल-वृक्षों के बीच मेरे लेटने के लिए स्थान तैयार करो; आज रात्रि के उत्तर भाग में तथागत निर्वाण प्राप्त करेगा।" ⁹⁰- "इरावती" के अन्य वैकल्पिक रूप "अचिरावती" "अजिरावती" और "ऐरावती" हो सकते हैं। चीनी अनुवाद में "कुकु" शब्द है, जो पालि के "ककुत्था" के लिए आया है। बुद्धचरित 107
56 जब आनन्द ने ये वचन सुने, तब आँसुओं से उसकी आँखें भर गई, उसने बुद्ध के लेटने के लिए स्थान तैयार किया और वैसा कर चुकनेपर, विलाप करते हुए उन्हें इसकी सूचना दी। 57 तब वह नर-श्रेष्ठ चिरनिद्रा के निमित्त तथा सब दुःखों का अन्त करने के लिए अपनी अन्तिम शय्या के समीप गये। 58 अपने शिष्यों के सम्मुख हाथीरूप उपधानपर शिर तथा एक पाँवपर दूसरा पाँव रखते हुए वह दाईं करवट लेट गये। 59 तब उस समय पक्षियों ने शब्द नहीं किया और वे (पक्षी) शिथिल-शरीर हो बैठे रहे, जैसे ध्यानावस्थित हों। 60 तब वृक्षों ने, जिनके पत्ते हवा से प्रेरित हुए बिना ही हिल रहे थे, विवर्ण फूल गिराये, मानो रो रहे हों। 61 जैसे दिवाकर के अस्ताचलपर आनेपर, पथिकों को विश्रामभूमि दिखाई पड़ती है, वैसे ही अन्तिम शय्यापर मुनि को देखकर उन्हें (शिष्यों को) शीघ्र ही उत्तम लक्ष्य दृष्टिगोचर हुआ। 62 तब अन्तिम विश्राम-भूमिपर पड़े हुए सर्वज्ञ ने अश्रु-आविल आनन्द से दयापूर्वक कहाः- 63 “मल्लों से, हे आनन्द, मेरे निर्वाण-प्राप्ति के समय के बारे में कहो; क्योंकि यदि वे निर्वाण न देखेंगे, तो पीछे बहुत पछतायेंगे।” 64 तब आँसुओं से मूर्छित होते आनन्द ने आज्ञा-पालन किया और मल्लों से कहा- “मुनि अन्तिम शय्यापर पड़े हुए हैं।” 65 तब उस समय आनन्द के वचन सुनकर, दुःख से अभिभूत हो, शोक करते हुए और आँखों से आँसू बहाते हुए वे नगर से ऐसे निकले, जैसे सिंह से डर से साँड़ पर्वत से निकल रहे हों। 66 आनन्द-रहित होने के कारण उनके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और पगों के संक्षोभ से उनके शिरोवस्त्र काँप रहे थे। तब वे उस उपवन में उन देवों के समान दुःखी होकर आये, जिनके पुण्य क्षीण हो गये हों। 67 इस तरह वहाँ आकर उन्होंने मुनि को देखा और देखने के बाद उन्हें प्रणाम करते समय उनके मुख आँसुओं से भर गये। सम्मान प्रकट करनेपर संतप्त हृदय से वे वहाँ खड़े रहे और मुनि ने उन्हें कहाः- 68 “आनन्द के समय शोक करना उचित नहीं। नैराश्य 'अस्थाने' है, शान्ति प्राप्त करो। वह अतिदुर्लभ लक्ष्य, जिसकी मैंने कल्पों से अभिलाषा की है, अब मेरे समीप आ गया है। 69 वह लक्ष्य अति उत्तम है, भूमि जल अनल-अनिल व शून्य-इन तत्त्वों से रहित है, सुखमय व अविकारी है, अतीन्द्रिय शान्त और अहार्य है, उदय एवं व्यय से रहित है। यह सुनकर शोक के लिए स्थान नहीं।
70 पूर्व में बोधि के समय गया में मैंने अकुशल जन्म के कारणों को सर्पों के समान काट डाला; किन्तु अतीत में एकत्र हुए कर्मों का यह निवास-गृह-यह शरीर-आज तक बचा हुआ है। 71 क्या मेरे लिए शोक करना उचित है जो तुम सब रो रहे हो, जब कि यह समष्टि-दुःख का महा-कोषगृह-व्यय को प्राप्त हो रहा है, जब कि जन्म का महाभय उन्मूलित हो रहा है और जब कि मैं महादुःख से विदा हो रहा हूँ?” 72 जब उन्होंने शाक्यमुनि को बादल की-सी आवाज में यह कहते सुना कि उनके लिए शान्ति (निर्वाण) प्राप्त करने का समय आ गया है, तब बोलने की इच्छा से उनके मुख विकसित हुए और उनमें से वृद्धतम ने ये वचन कहे:- 73 “क्या शोक करना उचित है जो तुम सब रो रहे हो? मुनि उस मनुष्य के समान हैं जो आग- लगे घर से बच निकला हो, और जब कि देवों के अधिपति भी इसे ऐसा ही समझें तब मनुजों का क्या कहना? 74 किन्तु इससे हमें दुःख हो रहा है कि शास्ता तथागत निर्वाण प्राप्तकर लेनेपर फिर दिखाई न पड़ेंगे; मरुभूमि में उत्तम पथ-प्रदर्शक के मरनेपर किसे अत्यन्त दुःख न होगा? 75 सोने की खान से दरिद्र होकर आनेवालों के समान वे लोग अवश्य ही उपहास के पात्र हैं जो महर्षि सर्वज्ञ गुरु का साक्षात् दर्शनकर सन्मार्ग (= विशेष) न प्राप्त करें।” 76 इस तरह मल्लों ने पुत्रवत् हाथ जोड़कर बहुत कुछ युक्ति-युक्त कहा और श्रेष्ठ महात्मा ने उत्तम- अर्थ-भरे शब्दों में परम श्रेय एवं शान्ति के उद्देश से यों उत्तर दियाः- 77 “सच तो यह है कि कठोर योगाचार के बिना केवल मेरे दर्शन से ही मुक्ति (निर्वाण) नहीं मिलती; जो कोई मेरे इस धर्म को ठीक-ठीक समझता है वह मेरे दर्शन के बिना भी दुःख के जाल से मुक्त हो जाता है। 78 जैसे कोई मनुष्य ओषधि-सेवन किये बिना केवल वैद्य को देखकर ही रोगमुक्त नहीं हो जाता, वैसे ही जो कोई मेरे इस धर्म की भावना नहीं करता वह मेरे दर्शन से ही दुःख-मुक्त नहीं हो जाता है। 79 इस जगत् में मेरे धर्म को देखनेवाला संयतात्मा मनुष्य दूरवर्ती होनेपर भी मुझे देखता है; और जो श्रेय-परायण नहीं है वह मेरे बगल में रहकर भी बहुत दूर में रहता है। 80 इसलिए सदा आलस्य-रहित (वीर्यवान्) रहो और मन को वश में रक्खो; परिश्रमपूर्वक श्रेयस्कर कार्य करो, क्योंकि हवा में जलती दीप-शिखा के समान जीवन चञ्चल और महादुःख के वशीभूत है।” 81 इस तरह मुनि द्वारा, श्रेष्ठ प्राणी द्वारा, उपदिष्ट होकर वे, जिनके चित्त संतप्त थे और जिनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, अनिच्छा एवं दीनतापूर्वक कुशीनगर की ओर लौट गये, जैसे प्रतिकूल धारा में नदी का मध्य भाग पार कर रहे हों। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “निर्वाण-पथपर” नामक 25वाँ सर्ग समाप्त ॥
108 अश्वघोष
छब्बीसवाँ सर्ग
महापरिनिर्वाण
1 तब त्रिदण्डी सुभद्र ने, जो सद्गुणों से सम्यक् युक्त था और जो किसी जीव को क्लेश नही देता था, भिक्षु होकर निर्वाण प्राप्त करने के उद्देश से मुनि को देखना चाहा। अतः उसने सबको आनन्दित करनेवाले आनन्द से कहा:— 2 “मैंने सुना है कि मुनि की निर्वाण-प्राप्ति की घड़ी (वेला) आ गई है और इसलिए मैं उन्हें देखना चाहता हूँ; क्योंकि इस जगत् में प्रतिपदा के चाँद के समान परम धर्म में प्रवेश पाये हुए का दर्शन दुर्लभ है। 3 मैं आपके विनायक को देखना चाहता हूँ, जो सब दुःखों के अन्त की ओर जानेवाले हैं; बादलों में छिपकर डूबते हुए सूरज के समान वह मेरे देखे बिना ही व्यय (अस्त) को प्राप्त न हों।” 4 धर्म-पिपासा के बहाने यह परिव्राजक विवाद करने आया है, इस विचार से आनन्द का चित्त भावाविष्ट हो गया; और अश्रु-पूर्ण मुख से उसने कहा, “यह (उपयुक्त) समय नही।” 5 तब, परिव्राजक की दृष्टि (फूल की) पंखुड़ी के समान विकसित हो रही है, यह देखकर मनुष्यों के आशय जाननेवाले चन्द्रोज्ज्वल मुनि ने कहा, “हे आनन्द द्विज को न रोको, क्योंकि मेरा जन्म जगत् के हित के लिए हुआ था।” 6 तब आश्वस्त एवं परम प्रसन्न होकर सुभद्र श्रेय-विधायक श्रीघन के समीप गया; और अवसर के अनुकूल शान्त भाव से उन्हें अभिवादन कर उसने ये वचन कहे:— 7 “कहा जाता है कि आपने निर्वाण-मार्ग प्राप्त किया है जो मेरे जैसे दार्शनिकों (=परीक्षक) के (मोक्ष-) मार्ग से भिन्न है; अतः मुझसे इसकी व्याख्या कीजिए, क्योंकि मैं इसे ग्रहण करना चाहता हूँ। आपको देखने की मेरी इच्छा का कारण स्नेह है, न कि विवाद करने की चाह।” 8 तब समीप आये द्विज से बुद्ध ने अष्टाङ्गिक मार्ग की व्याख्या की और उसने इसे ध्यानपूर्वक सुना, जैसे कि मार्ग से भटका हुआ मनुष्य सही आदेश को ध्यानपूर्वक सुनता है, और उसने इसपर .... ..... अच्छी तरह विचार किया। 9 तब उसने देखा कि जिन रास्तों पर पहले वह चला था उनपर चलने से श्रेय प्राप्त नही होता है, और अदृष्टपूर्व मार्ग प्राप्तकर उसने दूसरे रास्तों का परित्याग किया जो कि हृदय के अन्धकार से युक्त हैं। 10 क्योंकि उन मार्गों पर, कहते हैं, रजस्-युक्त तमस् प्राप्त करने से अकुशल कर्म एकत्र होते हैं, और सत्त्व-युक्त रजस् द्वारा कुशल कर्म बढ़ते हैं।
11 विद्या, बुद्धि व प्रयत्न द्वारा सत्त्व की वृद्धि होने से तथा रजस् व तमस् का तिरोभाव होने से कर्म-फल का नाश होने के कारण कर्म-फल क्षीण हो जाता है (ऐसा वे कहते हैं), और उस कर्म-शक्ति को, जिसे वे मानते हैं, स्वभाव का परिणाम कहते हैं। 12 संसार में चित्त को मोह में डालनेवाले रजस् और तमस् का कारण वे स्वभाव बताते हैं। क्योंकि स्वभाव नित्य माना जाता है इसलिए वे दोनों (रजस् और तमम्) भी नित्य हैं, और उनका अभाव नही हो सकता। 13 यदि किसी व्यक्ति के सत्त्वयुक्त होनेपर उन दोनों का अभाव हो भी जाय, तो काल-वश उनका फिर प्रादुर्भाव होगा, जैसे कि पानी, जो रात को धीरे-धीरे बर्फ बन जाता है, काल-क्रम से फिर अपनी स्वाभाविक अवस्था को लौट जाता है। 14 क्योंकि सत्त्व स्वभावतः नित्य है, इसलिए विद्या, बुद्धि व प्रयत्न इसे बढ़ा नही सकते; और क्योंकि इसकी वृद्धि नही होती, इसलिए उन दोनों का नाश नही होता और क्योंकि उनका नाश नही होता, इसलिए (उन मार्गों पर चलने से) नैष्ठिक शान्ति नही होती। 15 पहले उसका मत था कि जन्म स्वभाव से होता है, अब उसने देखा कि उस मत में (वस्तुतः) मोक्ष नही है; क्योंकि यदि जीवन स्वाभाविक है, तो मोक्ष वैसे ही असम्भव है जैसे कि प्रज्वलित अग्नि से निकलते हुए प्रकाश को रोकना। 16 बुद्ध के मार्ग को सत्य देखकर उसने संसार को इच्छा पर आश्रित समझा, इच्छा का नाश होनेपर शान्ति (= शम) मिलती है, क्योंकि कारण का विनाश होने से कार्य का भी विनाश होता है। 17 पहले उसका मत था कि आत्मा शरीर से भिन्न है और विकारवान् (परिवर्तनशील) नही है, अब मुनि के वचन सुनने से उसने जाना कि जगत् अनात्म है और (जगत्) आत्मा का परिणाम नही है। 18 यह जानकर कि जन्म अनेक धर्मों के पारस्परिक सम्बन्ध पर आश्रित है, और कुछ भी अपने पर आश्रित नही है, उसने देखा कि प्रवृत्ति दुःख है और निवृत्ति है दुःख से मुक्ति। 19 संसार को एक परिणाम समझकर उसने प्रलय का सिद्धान्त छोड़ा, और संसार का व्यय होता है, यह जानकर उसने नित्यता का मत धैर्यपूर्वक शीघ्र ही छोड़ा। 20 महामुनि का उपदेश सुनकर और ग्रहण कर, उसने अपने पूर्व मतों का तुरत परित्याग किया; क्योंकि उसने पहले ही अपने को तैयार कर लिया था, जिससे सद्धर्म में वह शीघ्र ही लग गया। 21 उसका चित्त श्रद्धा-युक्त हो गया और परम (धर्म) को पाकर उसने शान्त और अविकारी पद प्राप्त किया; और इसलिए, वहाँ लेटे हुए मुनि की ओर कृतज्ञतापूर्वक देखते हुए, उसने यह निश्चय किया:—
बुद्धचरित 109
22 “मेरे लिए यह उचित नही कि यहाँ रहकर मैं पूज्य एवं श्रेष्ठ शास्ता की निर्वाण-प्राप्ति देखूँ; करुणामय शास्ता की निर्वाण-प्राप्ति से पूर्व ही मैं स्वयं सीधे नैष्ठिक अन्त को प्राप्त होऊँगा।” 23 तब मुनि को प्रणाम कर, वह साँप की तरह निश्चल हो गया और हवा से विलीन हुए बादल के समान एक ही क्षण में निर्वाण की शान्ति में प्रविष्ट हुआ। 24 तब संस्कार के जाननेवाले मुनि ने उसके दाह-संस्कार के लिए यह कहते हुए आदेश दिया, “उत्तम शिष्यवाले महामुनि का यह अन्तिम शिष्य अन्त को प्राप्त हुआ।” 25 जब रात का पूर्व भाग बीत गया, चन्द्रमा ने ताराओं का प्रकाश ग्रस लिया, और उपवन ऐसे नीरव हो गये जैसे सोये हुए हों, तब महाकारुणिक ने अपने शिष्यों को उपदेश दिया:- 26 “मेरे उस पार चले जानेपर तुम्हें प्रातिमोक्ष को अपना आचार्य, अपना प्रदीप और अपना कोष समझना चाहिए। वही तुम्हारा उपदेशक है, जिसके अधीन तुम्हें रहना चाहिए और तुम्हें इसकी आवृत्ति करनी चाहिए, जैसे कि मेरे जीवन-काल में करते थे।⁹¹ 27 शारीरिक और वाणी के कर्मों की शुद्धि के लिए सब सांसारिक कार्यों (= व्यवहार) को छोड़ो तथा भूमि, जीव, अन्न और कोष आदि लेने से (= √ग्रह) वैसे ही बचो जैसे कि आग पकड़ने से (= √ग्रह)। 28 पृथ्वी पर जो कुछ पैदा होता है उसे काट गिराने से, धरती को खोदने व जोतने से तथा ओषधि एवं ज्योतिष (के व्यवसाय) से विरत रहना जीविका का उचित उपाय है। 29 घटक (मध्यस्थ) का ज्ञान प्राप्त करने में, तन्त्र-मन्त्र के प्रयोग में, कुटिल एवं कपटी होने में या शास्त्र-सम्मत सिद्धियों में, न संयम है न संतोष और न जीवन ही। 30 इस प्रकार प्रातिमोक्ष शील का सार है, मुक्ति का मूल है; इससे समाधि, समस्त ज्ञान एवं अन्तिम लक्ष्य प्राप्त होते हैं। 31 इसलिए वही धर्मवान् है जिसका शील विशुद्ध व अखण्ड है, अविच्छिन्न व अविनष्ट है, क्योंकि शील ही सद्गुणों का आश्रय है। 32 शील के अक्षुण्ण व विशुद्ध रहनेपर इन्द्रिय चञ्चल नहीं रहते; क्योंकि जैसे लाठी लेकर पशुओं को फसल से दूर रखते हैं वैसे ही दृढ़तापूर्वक छः इन्द्रियों की (विषयों से) रक्षा (= संवरण) करनी चाहिए। 33 विषयों के बीच इन्द्रियरूपी घोड़ों को (स्वतन्त्र) छोड़नेवाला मनुष्य (सन्मार्ग से) बहकता है और उन (विषयों) से तृप्ति नही पाता है। कुमार्ग-गामी घोड़ों के कारण मार्ग-भ्रष्ट हुए के समान वह उनके कारण विपत्ति भोगता है। 34 इस जगत् में कुछ लोग महाशत्रुओं के हाथ में पड़कर दारुण दुःख भोगते हैं, किन्तु मोहवश विषयों के वशीभूत होनेवाले लोग विवश होकर इस जन्म में और जन्मान्तरों में दुःख के अधीन होते हैं। 35 अतः इन्द्रियों से वैसे ही दूर रहना चाहिए, जैसे कि बुरे (=विषम) विपक्षी राजाओं से; क्योंकि इस जगत् में इन्द्रिय-सुख भोगने के बाद मनुष्य जगत् में इन्द्रियों के जल्लाद को देखता है। 36 संसार में बाघ, साँप, जलती आग या शत्रु से उतना नही डरना चाहिए जितना कि अपने ही चञ्चल चित्त से, जो मधु को देखता है किन्तु खतरे को नही।⁹² 37 लोहे के अङ्कुश से अनियन्त्रित मतवाले हाथी के समान या वृक्षों पर कूदनेवाले शाखामृग के समान चित्त स्वेच्छानुसार सब दिशाओं में घूमता रहता है; इसे चञ्चलता का अवसर ही न देना चाहिए। 38 चित्त के स्वतन्त्र रहनेपर शान्ति नही मिलती, किन्तु इसके स्थिर होनेपर कार्य पूरा होता है। इसलिए यथाशक्ति यत्न करो जिससे तुम्हारे ये चित्त चञ्चलता से विरत हो जायँ। 39 ओषधि की मात्रा के समान भोजन की उचित मात्रा का पालन करो, और इससे अनुराग या घृणा न करो, उतना ही खाओ जितना कि क्षुधा-शान्ति और शरीर-रक्षा के लिए आवश्यक है।⁹³ 40 जैसे उद्यान में रस-पान करते हुए भौंरे फूलों को नष्ट नही करते, वैसे ही अन्य मतावलम्बियों का विनाश नही करते हुए (अन्य मतावलम्बी गृहस्थों के लिए भार-स्वरूप नही होते हुए) उचित समयपर भिक्षाटन करो।⁹⁴ 41 अत्यन्त भारी बोझ नही रखना चाहिए, यह नियम बैल और दाता दोनों के लिए ही लागू है, इस संसार में अत्यन्त भारी बोझ से दबकर बैल गिर पड़ता है और जो हाल बैल का है वही दाता का भी।⁹⁵ 91- प्रातिमोक्ष = भिक्षु-जीवन के पापनिशेधक नियम। 92- “यथा पश्यति मध्वेव न प्रपातमवेक्षते।”—सौन्दरनन्द ग्यारह 29। 93- “भोजने भव मात्राज्ञ ”—सौन्दरनन्द 14.1 भोजन और नींद के लिए देखिये—सौन्दरनन्द सर्ग 14 94- “यथापि भ्रमरो पुष्पं वण्णगन्धं अहेठयं। पलेति रसमादाय एवं गामे मुनी चरे॥”—धम्मपद 4.6 “जिस प्रकार फूल के वर्ण या गन्ध को बिना हानि पहुँचाये भ्रमर रस को लेकर चल देता है, उसी प्रकार मुनि गाँव में विचरण करे।” 95 - पूर्वार्ध का अनुवाद स्वतन्त्र है और उत्तरार्ध का चीनी अनुवाद के आधार पर। 110 अश्वघोष
42 सारा दिन और रात का प्रथम व अन्तिम भाग (= याम) योगाचार में बिताओ और मध्य भाग में स्मृतिपूर्वक सोओ, जिससे कोई अनर्थ न हो। 43 कालरूपी अग्नि से संसार के जलते रहनेपर क्या सारी रात सोना उचित है? जब कि हृदय में रहनेवाले दोष शत्रुओं के समान प्रहार करते हैं, तब कौन नींद के वशीभूत हो? 44 इसलिए, जैसे कि मन्त्र आदि से कृष्ण सर्प को घर से बाहर किया जाता है, वैसे ही ज्ञान और मन्त्रोच्चारण द्वारा हृदय में रहनेवाले दोषरूपी साँपों को भगाकर तुम्हें सोना चाहिए, .... .... । 45 लज्जा (= ह्री) एक आभूषण है और उत्तम वस्त्र है, मार्गभ्रष्टों के लिए अङ्कुश है। ऐसा होनेपर तुम्हें लज्जा होनी चाहिए; क्योंकि निर्लज्ज होना गुण-हीन होना है। 46 मनुष्य जितना ही लज्जावान् होता है, उतना ही उसका (आदर होता) है, और जो निर्लज्ज तथा हित-अहित के विवेक से शून्य है वह नर पशु-तुल्य है। 47 यदि कोई आदमी तलवार से तुम्हारी भुजाएँ और अङ्ग काट डाले तो भी तुम्हें उसके प्रति पाप-भाव का पोषण न करना चाहिए और न उसे अशान्त शब्द ही कहना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से तुम्हें ही विघ्न होगा। 48 क्षमा के समान कोई तप नही, जो क्षमावान् है उसे शक्ति है, धैर्य है और जो दूसरों का कठोर व्यवहार नही सह सकते वे न तो धर्म-संस्थापकों के मार्गपर ही चलते हैं और न उनका त्राण ही होता है। 49 क्रोध को थोड़ा-सा भी अवकाश (प्रश्रय) न दो, यह धर्म और यश को नष्ट करता है, रूप का शत्रु है, हृदय की अग्नि है; गुणों के लिए इसके समान कोई शत्रु नही। 50 क्रोध प्रव्रज्या के लिए प्रतिकूल है, वैसे ही जैसे कि बिजली की अग्नि शीतल जल के लिए, किन्तु क्रोध गृहस्थ-जीवन के लिए प्रतिकूल नही है; क्योंकि गृहस्थ इच्छाओं से भरे होते हैं और इसके सम्बन्ध में कोई व्रत लिए नही होते हैं। 51 यदि तुम्हारें हृदय में अभिमान का उदय हो, तो सुन्दर बालों से विहीन मस्तक को छूकर अपने काषाय वस्त्र एवं भिक्षा-पात्र को देखकर, और दूसरों के कर्म (= कमांत) और आचरण का चिन्तन कर, इसे दूर करो। 52 यदि अभिमान-युक्त सांसारिक मनुष्य अभिमान को जीतने के लिए (यत्न करे), तो फिर उनका क्या कहना, जिनके मस्तक मुड़े हुए हैं, जिन्होंने अपने को निर्वाण (-धर्म) में लगाया है, जो भिक्षा का अन्न खाते हैं और जिन्होंने अपने को प्रमाणित किया है? 53 कपट और धर्माचरण असङ्गत है, इसलिए कुटिल उपायों का सहारा न लो। छल (कपट) और छद्म (= माया) ठगने के लिए हैं किन्तु जो धर्म में लगे हुए हैं, उनके लिए ठगना-जैसी कोई चीज नही।
54 बड़ी-बड़ी इच्छाएँ रखनेवाले को जो दुःख होता है वह अल्प इच्छावाले को नही होता है। इसलिए अल्पेच्छता का अभ्यास करना चाहिए और विशेषतः उन्हें, जो गुणों की परिपूर्णता चाहते हैं। 55 जो धनवानों से बिलकुल नही डरता वह कृपणों को देखने से नही डरता; जिसकी इच्छाएँ अल्प हैं और जो "कुछ नही है" यह सुनकर उदास नही होता, उसी को निर्वाण प्राप्त होता है।$^{96}$ 56 यदि तुम निर्वाण चाहते हो तो सन्तोष का अभ्यास करो, सन्तोष होनेपर ही यहाँ (सच्चा) सुख मिलता है और सन्तोष ही धर्म है। सन्तुष्ट मनुष्य भूमिपर भी शान्तिपूर्वक सोते हैं और असन्तुष्ट मनुष्य स्वर्ग में भी जलते रहते हैं। 57 असन्तुष्ट मनुष्य अत्यन्त धनवान् होनेपर भी सदा दरिद्र ही रहता है और सन्तुष्ट मनुष्य अत्यन्त दरिद्र होनेपर भी सदा धनी ही रहता है। प्रिय विषयों की खोज करनेवाला असन्तुष्ट मनुष्य, तृप्ति पाने के लिए श्रम करता हुआ, अपने ही लिए दुःख पैदा करता है। 58 जो परम शान्ति-सुख पाना चाहते हैं, उन्हें सुख में इतना आसक्त न होना चाहिए। क्योंकि इन्द्र और दूसरे देवगण भी संसार के उस मनुष्य से ईर्ष्या (= स्पृह) करते हैं जो केवल शान्ति (की प्राप्ति) में लगा हुआ है। 59 आसक्ति दुःख का निवास-वृक्ष है; इसलिए स्वजनों में या दूसरों में आसक्ति छोड़ो। इस संसार में अत्यन्त आसक्त मनुष्य दुःख में वैसे ही फँसता है, जैसे कि जरा-जीर्ण हाथी कीचड़ में। 60 नदी द्वारा-जिसका जल निरन्तर बह रहा हो, अत्यन्त धीरे धीरे ही क्यों नही-काल-क्रम से चट्टान की सतह घिस जाती है। वीर्य (उद्योग) के लिए कुछ भी दुर्लभ नही। अतः उद्यमी बनो और अपने भार को न फेको 61 जो मनुष्य अरणियों को रगड़ने में बार-बार रुकता है उनके लिए काठ से आग निकालना कठिन हो जाता है, किन्तु उद्योग करने से यह आसानी से निकल आती है। अतः जहाँ परिश्रम है वहाँ सिद्धि है। 62 स्मृति (जागरूकता) रहनेपर दोष काम नही करते (अर्थात् निष्क्रिय हो जाते हैं); स्मृति के समान न कोई मित्र है, न कोई रक्षक, और स्मृति के नष्ट होनेपर अवश्य ही सब कुछ नष्ट हो जाता है। अतः शरीर में लगी (= कायगता) स्मृति को शिथिल न करो। 63 जिनका चित्त दृढ़ है वे शरीर के लिए स्मृतिरूपी कवच पहनकर विषयों की रण-भूमि में उन वीरों की तरह आचरण करते हैं, जो कवच पहनकर शत्रु-व्यूह में निर्भयतापूर्वक घुस जाते हैं।
$^{96}$ - पूर्वार्ध का अनुवाद अनिश्चित कहा गया है।
बुद्धचरित 111
64 इसलिए अपने भावों को सम तथा चित्त को नियन्त्रित रखते हुए संसार के उदय और व्यय को जानो और समाधि का अभ्यास करो। क्योंकि जिसने मानसिक समाधि प्राप्त कर ली है उसे कोई आधियाँ स्पर्श नहीं करतीं। 65 जैसे बढ़ते हुए पानी को रोकने के लिए मनुष्य परिश्रमपूर्वक बाँध बनाते हैं, वैसे ही समाधि को उस बाँध के समान बताते हैं जिसके द्वारा विचाररूपी जल स्थिर किया जाता है। 66 उस बुद्धिमान् मनुष्य (= प्राज्ञ) का, जो सदा अपनी सम्पत्ति (ऐश्वर्य) दान करता है और हृदय से अत्यन्त धर्माभिमुख रहता है, त्राण होता है; फिर उस भिक्षु के त्राण का क्या कहना, जिसे घर भी नहीं है। 67 प्रज्ञा, जरा-मरणरूपी महासागर में एक नौका है, मोहान्धकार में मानो एक प्रदीप है, सब व्याधियों को दूर करनेवाली ओषधि है, दोषरूपी वृक्षों को काटनेवाली तेज कुल्हाड़ी है। 68 इसलिए प्रज्ञा की वृद्धि के लिए विद्या, ज्ञान और भावना का अभ्यास करो; क्योंकि जिसे प्रज्ञा-चक्षु है, उसे ही वास्तविक दृष्टि है, यद्यपि उस चक्षु में (स्थूल पदार्थों को) देखने की शक्ति नहीं होती।⁹⁷ 69 घर छोड़नेपर भी यदि कोई मनुष्य चित्त के विविध व्यापारों में लगा रहे तो उसका त्राण नहीं होता; जो लोग परम शम प्राप्त करना चाहें वे इसे जानें और सब व्यापारों से मुक्त हो जायें। 70 इसलिए अप्रमाद में वैसे ही लगो जैसे कि गुरु में और प्रमाद का वैसे ही परित्याग करो जैसे कि शत्रु का। अप्रमाद द्वारा इन्द्र ने राज्य प्राप्त किया और प्रमाद द्वारा उद्धत असुरों ने विनाश।⁹⁸ 71 करुणामय, सहानुभूतिपूर्ण एवं हितैषी गुरु को जो कुछ करना चाहिए वह सब मैंने किया; अब अपने को लगाओ और चित्त को शान्त करो। 72 तब, जहाँ कहीं रहो, पर्वतपर या शून्य भवन में या जङ्गल में, धर्माचरण में सदा प्रयत्नशील (अप्रमत्त) रहो और पश्चाताप न करो। 73 रोगियों की शारीरिक अवस्थाओं का पूरा-पूरा विचारकर, उन्हें उचित ओषधि बताना वैद्य का काम है; किन्तु उचित समय पर ओषधि-सेवन का उत्तरदायित्व रोगी पर ही है, न कि वैद्य पर। 74 पथ-प्रदर्शक (= देशिक) द्वारा उत्तम सीधा समतल एवं निरापद मार्ग बताये जानेपर, यदि सुननेवाले उसपर नहीं चलें और विनाश को प्राप्त हों, तो पथ-प्रदर्शक के ऊपर आदेशरूपी ऋण शेष नही रहता।
75 तुम लोगों में जिस किसी को दुःख आदि चार सत्यों के मेरे उपदेश के बारे में (कुछ भी जानने की) इच्छा हो, वह तुरन्त मुझसे विश्वासपूर्वक कहे और अपना संशय दूर करे।” 76 महामुनि द्वारा इस तरह जोरों से कहे जानेपर वे सब संशय-रहित थे और वे कुछ नहीं बोले। तब अपने चित्त से उनके चित्तों में प्रवेशकर, साधु (= कृती) अनिरुद्ध ने ये वचन कहे:— 77 “हवा का बहना बन्द हो जाय, सूरज सीतल हो जाय और चाँद गर्म, तो भी जगत् में चार सत्त्वों को मिथ्या प्रमाणित करना शक्य नही। 78 जिसे दुःख कहा गया है वह सुख नही; दुःख के कारण को छोड़कर दुःख पैदा करनेवाला दूसरा कुछ नही; कारण का निरोध होने से मुक्ति अवश्य होती है और (-निरोध) मार्ग ही उपाय है। 79 इसलिए, हे महात्मन्, चार सत्यों के बारे में शिष्यों को कुछ संशय नही है; किन्तु जिन्होंने अपना लक्ष्य सिद्ध नही किया है वे यह सोचकर दुःखी हो रहे हैं कि विनायक जा रहे हैं। 80 इस सभा में, जिसने नये व्रत (नई दीक्षा) के कारण अपने लक्ष्य को नही देखा था, वह भी आज आपके इस उपदेश से अपने सम्पूर्ण लक्ष्य को वैसे ही देख रहा है जैसे कि बिजली की चमक में (देख रहा हो)। 81 किन्तु वे भी, जिन्हें कुछ भी करना शेष नही है और जो भवसागर के उस पार चले गये हैं, यह सुनकर हृदय से चिन्तित हो रहे हैं कि पूर्ण शास्ता विदा हो रहे हैं।” 82 आर्य अनिरुद्ध के ये वचन सुनकर बुद्ध ने, असलियत को जानते हुए भी, इसे फिर से सुना और अपने शिष्यों के चित्त दृढ़ करने के लिए उनसे स्नेहपूर्वक कहा:— 83 “युगपर्यन्त रहनेपर भी प्राणी का विनाश होता ही है, इसलिए पारस्परिक संयोग या मिलन जैसी कोई (स्थायी) वस्तु नही है। मैंने अपना और दूसरों का काम पूरा कर लिया है, अब और जीवित रहने में कोई लाभ नही है। 84 स्वर्ग में और पृथ्वी पर जिन्हें दीक्षित करना था वे सब बचाये गये और मार्गपर लाये गये (स्रोत-आपन्न किये गये)। इसके बाद मेरा यह धर्म भिक्षुओं की वंश-परम्परा से मनुष्यों के बीच रहेगा। 85 जगत् के वास्तविक स्वभाव का पहचानो और चिन्तित मत होओ; क्योंकि वियोग अवश्यम्भावी है। संसार को ऐसा जानकर वैसा यत्न करो जिससे यह फिर कभी न हो। 86 जब ज्ञानरूपी प्रदीप से अन्धकार में प्रकाश हो जाता है और भवों को असार देख लिया जाता है, तब आयु का निरोध होनेपर वैसे ही संतोष होता है, जैसे कि रोगों के दूर होनेपर। 87 जब द्वन्द्वों सहित छूटनेवाले शरीर नामक भव-सागर की धारा कट रही हो, तब जीवन का अन्त होनेपर, जैसे कि विपत्ति-प्रद शत्रुओं का नाश होनेपर, किसे आनन्द न होगा।
⁹⁷ - “प्रज्ञामयं यस्य हि नास्ति चक्षुश्चक्षुर्न तस्यास्ति सचक्षुषोऽपि”—सौन्दरनन्द 18.35 ⁹⁸ - “अप्रमाद से ही इन्द्र देवताओं में श्रेष्ठ बना”—धम्मपद, 2.10
112 अश्वघोष
88 सब चराचर का विनाश होता है, अतः जागरूक रहो; मेरी निर्वाण-प्राप्ति का समय आ गया है। विलाप मत करो; ये मेरे अन्तिम वचन हैं।” 89 तब वह श्रेष्ठ ध्यानज्ञ उस समय प्रथम ध्यान में प्रविष्ट हुए और उससे निकलकर दूसरे में, और इसी तरह उचित क्रम से वह किसी को छोड़े बिना सब (ध्यानों) में प्रवृष्टि हुए। 90 तब सब ध्यानों से, नौ समापत्तियों से ऊर्ध्व (अनुलोम) क्रम से निकलकर, महामुनि फिर निम्न (प्रतिलोम) क्रम से प्रथम ध्यान में लौट आये। 91 उससे भी निकलकर वह उचित क्रम से चतुर्थ ध्यान में आये और चतुर्थ ध्यान से निकलकर वह अनन्त शान्ति अनुभव करने को चले गये। 92 तब मुनि का परिनिर्वाण होनेपर, तूफान से प्रतिहत नौका के समान पृथ्वी काँप उठी, और आकाश से उल्काएँ गिरीं, जैसे दिग्गजों द्वारा फेंकी गई हों। 93 जलावन और धुएँ से रहित आग, हवा से प्रेरित हुए बिना ही दिशाओं को जलाने लगी, जैसे दिव्य चित्ररथ वन को जलाने के लिए आकाश में दावानल उठा हो। 94 भयङ्कर वज्र, शत शत अङ्गारों से आग उगलते हुए, गिरने लगे, जैसे युद्ध में असुरों को जीतने के लिए इन्द्रदेव क्रोधपूर्वक उन्हें (वज्रों को) फेंक रहा हो। 95 धूल-भरी हवा लताओं को टुकड़े-टुकड़े करती हुई जोरों से बही, और क्रुद्ध झंझावात से आहत हुए पर्वतों की चोटियाँ गिर पड़ीं।⁹⁹ 96 चाँद का प्रकाश क्षीण हुआ और यह अपनी निष्प्रभ किरणों से वैसे ही शोभित हुआ, जैसे पङ्किल जल से लिप्त राजहंस, जिसका शरीर छोटे छोटे बेतों (या नरकटों) से घिरा हो। 97 यद्यपि आकाश अनभ्र था और चाँद उगा हुआ था, तो भी अपवित्र अन्धकार चारों ओर फैल गया था। और उस समय नदियों का जल मानो शोक से खौल रहा था। 98 तब समीपवर्ती शाल-वृक्षों ने झुककर असमय के सुन्दर फूल बुद्ध के शरीर पर... ... ...बरसाये। 99 आकाश में पाँच शिरवाले नाग निश्चल खड़े रहे, वे मुनि को भक्तिपूर्वक देख रहे थे, उनकी आँखें शोक से लाल थीं, उनके फन बन्द थे, और उनके शरीर नियन्त्रित थे। *100 मानसिक पीड़ा के कारण उन्होंने गर्म निश्वास छोड़े, किन्तु यह सोचकर कि जगत् स्वभावतः अनित्य है, उन्हें शोक से विरति एवं जगत से घृणा हो गई। 101 दिव्य लोक में नैष्ठिक धर्म के आचरण में रत राजा वैश्रवण की धर्मसभा ने धर्म में आसक्ति होने के कारण न शोक किया न आँसू बहाये। 102 पवित्र (=कृती) शुद्धाधिवास देवगण, यद्यपि वे महामुनि का अत्यन्त सम्मान करते थे, शान्त रहे और मन में क्षुब्ध नही हुए; क्योंकि उन्हें जगत के स्वभाव से घृणा थी। 103 सद्धर्म में आनन्द पानेवाले देवगण, गन्धर्व-राज, नाग-राज और यक्ष अत्यन्त शोक-मग्न और व्याकुल होकर आकाश में खड़े रहे। 104 किन्तु, मार की हार्दिक अभिलाषा पूरी हुई, उसके दल ने आनन्द में आकर अट्टहास किया, उच्छल-कूद की, साँपों के समान फूत्कार किया, नृत्य किया और बड़े बड़े मृदङ्ग एवं पटह बजाये। 105 तब ऋषि-ऋषभ (बुद्ध) के उस पार चले जानेपर संसार उस पर्वत के समान दिखाई पड़ा, जिसकी चोटी वज्र से कट गई हो, या उस उदास हाथी के समान जिसका मद बन्द हो गया हो, या उस वृषभ के समान जिसका ककुद नष्ट हो गया हो। 106 उन जन्म-विनाशक को खोकर, संसार वैसा ही दिखाई पड़ा जैसे कि बिना चाँद का आकाश, या हिम से सूखे कमलों का सरोवर या धन के अभाव से निष्फल हुई विद्या (दिखाई पड़े)। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “महापरिनिर्वाण” नामक 26वाँ सर्ग समाप्त॥ सत्ताईसवाँ सर्ग निर्वाण की प्रशंसा 1 तब किसी बड़े देवता ने विमान से अपना शिर कुछ बाहर झुकाकर सर्वज्ञ की ओर एक क्षण तक देखा और कहाः- 2 “आहो! सब जीव अनित्य हैं और जन्म एवं विनाश के नियम के अधीन हैं, जो जो जन्म लेते हैं उनके भाग्य में दुःख है। इस प्रकार शान्ति उसी शान्ति से मिलती है, जो अपने पीछे कुछ छोड़ नही जाती। 3 जैसे कि जल अग्नि को शान्त करता है वैसे ही कालरूपी जल को तथागतरूपी अग्नि शान्त करनी पड़ी, जिसकी ज्वाला ज्ञान है, जिसका धुआँ यश है, और जिसने जन्मरूपी इन्धन को निःशेष जला डाला है।” 4 तब श्रेष्ठ ऋषि के समान दिखाई पड़नेवाले दूसरे ऋषि ने, जो स्वर्ग में रहते हुए भी उसके उपभोगों से आकृष्ट नही हुआ, अर्हत् ऋषि की ओर देखा, जिन्होंने शान्ति प्राप्त कर ली थी; और गिरिराज के समान धैर्य धारण करते हुए, उसने ये वचन कहेः- 5 “इस संसार में ऐसा कुछ नही जो नाश को नही प्राप्त होता है, जो नाश को नही प्राप्त हुआ और जो नाश को नही प्राप्त होगा, यह देखकर कि अनुपम गुरु, जिन्होंने परम ज्ञान प्राप्त किया था और जो उत्तम लक्ष्य (=परमार्थ) को जानते थे, शान्ति को प्राप्त हुए।
⁹⁹- इसका उत्तरार्द्ध चीनी अनुवाद से लिया गया है। बुद्धचरित 113
6 जीवलोक, जिसकी आँखें मोह से अवश्य ही अन्धी हो गई हैं, इन नेता से वञ्चित हुआ, जिनकी प्रज्ञा विशुद्ध थी और जिन्हें उत्तम दृष्टि प्राप्त थी; और होश खोकर यह लोक कुमार्ग में स्थित है।” 7 तब मुनि का निर्वाण होनेपर अनिरुद्ध ने, जिसने संसार को जीत लिया था, जिसकी आसक्ति नष्ट हो गई थी और जिसने जन्म-निरोध कर लिया था, जगत् को प्रकाश से वञ्चित हुआ देखकर, शान्तिपूर्वक यों कहा:- 8 “संस्कारों के अधीन रहनेवाले बुद्धिमान् मनुष्य को इस समय विश्वास नही करना चाहिए, जब कि ऋषिरूपी महापर्वत पर अनित्यता रूपी वज्र के गिरने से चोट पड़ी है। 9 अहो! इस असार अनात्म एवं विनाशधर्मा जगत् को जीवलोक कहते हैं, जिसमें मुनि-दुर्धर्ष सिंह-दोषरूपी हाथियों को नष्ट करके स्वयं नाश को प्राप्त हुए। 10 जगत् सदा कर्मशील और कामासक्त है; अब किसका हाथ सुरक्षा प्रदान करेगा, जब कि तथागत भी साधारण भाग्य के अधीन होकर सुवर्ण-स्तम्भ के समान गिर पड़े? 11 मुनिरूपी हाथी ने दोषरूपी वृक्ष को-जिसके बीज छः हैं, अङ्कुर एक, बलि एक, मूल छः, फल पाँच, शाखाएँ दो, . ., और तना एक-उखाड़ डाला; तो भी वह यहाँ पड़े हुए हैं। 12 सम्राट के समान सभी शत्रुओं को जीतकर, ग्रीष्म ऋतु में मोर के समान आसक्ति-रहित होकर, घोड़े के समान अपनी यात्रा पूरी कर, (इन्धन-रहित) अग्नि के समान जन्म-मुक्त होकर, मुनि शान्ति को प्राप्त हुए। 13 जैसे कि वज्र-चालक स्वर्ग-पति प्रसन्न होकर तृप्ति-कर जल-धाराएँ भेजता है, वैसे ही गुरु ने अपने उपदेश भेजे और प्रखर दीप्ति से पीड़ित वृषभ के समान पृथ्वी पर घूमते हुए उन्होंने अपने यश से दिशाओं को व्याप्त किया; तो भी वह यहाँ पड़े हुए हैं। 14 वह नर-सूर्य द्रविण-पति वैश्रवण के दल से परिवृत होकर अपने मार्गपर चले, और उन यशस्वी और तेजस्वी ने नदी (=सिन्धु) के समान सुवर्ण-राशि दी, तो भी उनका अस्त हुआ। 15 आज मुनि का निर्वाण होनेपर जगत् वैसे ही निष्प्रभ है जैसे कि कुहासे से भरी दिशाएँ, जैसे कि सूरज जिसकी किरणें बादलों से कट रही हों, जैसे कि आहुति पूरी होनेपर घी-रहित आग। 16 कुटिलता (= ग्रन्थि)-रहित होकर उन्होंने सत्य का (सीधा) मार्ग ग्रहण किया और बन्धन (= ग्रन्थि)-रहित होकर उन्होंने शम-धर्म प्राप्त किया। ऋद्धि द्वारा जीवन-धारण करने में समर्थ होनेपर भी उन्होंने शरीर नामक दुःख-निवास का परित्याग किया। 17 जैसे सूर्य अन्धकार को दूर करता है, वैसे ही अज्ञान को जीतकर और जैसे जल-धारा धूल को शान्त करती है, वैसे ही काम को शान्तकर, मुनि......चले गये, घूमते हुए दुःख-चक्र में फिर कभी लौटने को नही।
18 जन्मरूपी दुःख को नष्ट करने के लिए उनका जन्म हुआ था, शान्ति के लिए जगत् उनकी शरण में आया, वह उज्ज्वल तेज से चमके और उन्होंने विशिष्ट बुद्धि से प्रकाशित किया। 19 उन्होंने लोगों को श्रेय की ओर भेजा, उन्होंने पृथ्वी को अपने उत्तम गुणों से व्याप्त किया, उनके यश में वृद्धि हुई।¹⁰⁰ 20 अपनी विपुल विद्या के कारण वह निन्दा सुनकर उदास नही होते थे, वह दुखियों से दयापूर्वक बोलते थे, वह दूषित भोजन ग्रहण नही करते थे और अच्छा भोजन पाकर उन्हें आनन्द नही होता था। 21 वह अपनी चञ्चल इन्द्रियों को शान्त रखते थे और अपनी मानसिक शक्ति (इच्छा-शक्ति) के कारण ठीक ही विषयासक्त नही होते थे। दूसरों द्वारा अप्राप्त मार्ग को पाकर उन रसज्ञ ने नैष्क्रम्य-रस का आस्वादन किया। 22 उन्होंने वह दिया, जो पहले किसी मनुष्य ने नही दिया था और उनके दान, फल की इच्छा से प्रेरित नही होते थे; उन्होंने अविचल चित्त से राज्य छोड़ा और अपने गुणों से सज्जनों के चित्त आकृष्ट किये। 23 उन्होंने दृढ़तापूर्वक अपनी चञ्चल आँखों की रक्षा की। वह सदाचार द्वारा अपने चित्त की रक्षा किया करते थे। उन्होंने श्रेय की रक्षा एवं वृद्धि की। उन्हें किसी उत्पन्न धर्म (वस्तु) की अभिलाषा नही हुई। 24 बुरे कर्मों को बुरा समझकर उन्होंने छोड़ दिया और श्रेय द्वारा दोषरूपी शत्रुओं से अपने को मुक्त किया। उन्होंने बुद्धि द्वारा पापों को सर्वथा उन्मूलित किया, तो भी वह (मुनि), अनार्य अनित्यता के वशीभूत हुए। 25 उन्होंने ठीक-ठीक धर्म का पालन किया और आनन्दपूर्वक उत्तम निश्चय ग्रहण किये; तो भी वह शास्ता, जिन्हें ज्ञान का खजाना था, उस अग्नि के समान शान्त हो गये, जिनका इन्धनरूपी कोष समाप्त (उपभुक्त) हो गया हो। 26 गुरु वहाँ पड़े हुए हैं, जिन्होंने आठ के बारे में पाँच के समूह को अच्छी तरह जीता, जिन्होंने तीन को देखा, जिन्होंने त्रिविध आचरणों का अन्त किया, जिन्हें त्रिविधि दृष्टि थी, जिन्होंने एक की रक्षा की, जिन्होंने एक को प्राप्त किया, जिन्होंने एक का चिन्तन किया, जिन्होंने सात भारी चीजों (= गुरूणि ?) का परित्याग किया। 27 उन्होंने शान्ति के लिए मार्ग को प्रकाशित किया और कृपापूर्वक सज्जनों को श्रद्धावान् बनाया। उन्होंने पापरूपी वृक्षों को काटा और श्रद्धावानों को भवों से मुक्त किया।
¹⁰⁰ _ अर्थ अनिश्चित है।
114 अश्वघोष
28 अपने वचनामृत से उन्होंने जगत् को खूब तृप्त किया और क्षमा द्वारा क्रोध को जीता। उन्होंने अपनी शिष्यमण्डली को श्रेय में रमाया और श्रेय चाहनेवालों को सूक्ष्म परीक्षण में लगाया। 29 उन्होंने सज्जनों के भीतर धर्माङ्कुर उत्पन्न किया और वह उन्हें आर्य-मार्ग पर ले आये, जिसका सार है “कारण”; यद्यपि उन्होंने अनायों को लोकोत्तर तरीके से नही सिखाया तो भी उन्हें सद्धर्म के अतिरिक्त दूसरे मार्गपर नहीं स्थापित किया। 30 काशी में उन्होंने धर्म-चक्र-प्रवर्तन किया और अपने ज्ञान द्वारा जगत् को संतोष का दान दिया; जिन्हें दीक्षित करना था उनसे उन्होंने धर्माचरण कराया और हमारे हित के लिए हमें सुख दिया। 31 दूसरों को उन्होंने अदृष्टपूर्व तत्त्व का दर्शन कराया और धर्म पर चलनेवालों को उन्होंने गुणों से युक्त किया। दूसरे दर्शनों को खण्डनकर, युक्ति द्वारा उन्होंने लोगों को दुर्बोध अर्थ का बोध कराया। 32 सब कुछ अनित्य और अनात्म है, ऐसा उपदेश देकर और भवों में कुछ भी सुख नहीं है, ऐसा बतलाकर उन्होंने अपनी यश-पताका ऊँची उठाई और अभिमान के ऊँचे खम्भों को उलट दिया। 33 निन्दा से उनके चित्त में क्षोभ नहीं हुआ और किसी भी बात में उन्हें सांसारिक प्रवृत्ति की इच्छा नहीं हुई........। 34 स्वयं पार होकर उन्होंने डूबते हुए लोगों को पार किया; स्वयं शान्ति प्राप्तकर उन्हें शान्ति दी, जो क्षुब्ध थे; स्वयं मुक्त होकर उन्हें मुक्त किया जो बँधे हुए थे; स्वयं प्रकाश पाकर दूसरों के मोहान्धकार को प्रकाशित किया। 35 न्याय एवं अन्याय को जाननेवाले महामुनि जगत् को सदुपदेश से अनुगृहीत कर चले गये, जैसे कि आपत्काल में, जब कि जीव अन्याय-मार्गपर चलते हैं और उसी में प्रसन्न रहते हैं, धर्म चला जाता है? 36 संसार की दृष्टियों (मतों) को जीतकर भी, वह सजल मेघ के समान, पहाड़ पर के जङ्गल के समान, गौरवशाली वृद्ध पुरुष के समान और दीप्तिमान् युवक के समान, संसार की दृष्टि को आकृष्ट करते हुए चले। 37 ........वह परम शान्ति के मार्गपर चले, और श्रद्धावान् जगत्, जिसने उन्हें शान्ति प्राप्त करते देखा, आज उस स्नेही पुरुष के समान है जो पितृ-विहीन हो गया हो। 38 मार भी, जिसने अपने दल-बल के साथ मुनि को नष्ट करने के लिए प्रचण्ड क्रोध किया था, उनका मुकाबला न कर सका; तो भी उन्हें नष्ट करने के लिए प्रचण्ड क्रोध करनेवाला मार आज मौत से मिलकर उन्हें गिराने में समर्थ हुआ।
39 सब जीव जिनके लिए भव-चक्र का भय अबतक दूर नहीं हुआ है, देवताओं के साथ एकत्र हुए हैं और दुःख से अभिभूत हैं; क्योंकि शोक के परे जो उत्तम मार्ग है, वह उन्हें प्राप्त नहीं हुआ है। 40 सब जीवों को आलोकित करते हुए उन्होंने जगत् को ऐसे देखा, जैसे दर्पण में प्रतिबिम्बित हो और अपनी दिव्य श्रवण-शक्ति से उन्होंने दूर एवं निकट के, स्वर्ग तक के भी, सब शब्द सुने।¹⁰¹ 41 वह आकाश के नक्षत्र-प्रासाद पर चढ़े, पृथ्वी में बिना किसी बाधा के प्रविष्ट हुए, पानी पर बिना डूबे हुए चले और अपने शरीर से उन्होंने विविध रूप पैदा किये। 42 उन्हें अपने बहुत-से (पूर्व-) जन्म याद थे, जैसे कि यात्री को मार्ग के विविध विश्राम-स्थल याद रहते हैं और उन्होंने अपने चित्त से दूसरों के मानसिक व्यापारों को (=मनः प्रचारान्) जाना, जो इन्द्रियों की बोध-शक्ति के क्षेत्र से परे हैं (अर्थात् इन्द्रियों द्वारा नहीं जाने जा सकते)। 43 वह सब के साथ समान व्यवहार करते थे और सर्वज्ञ थे, उन्होंने सब आस्रवों (चित्त-मलों) को काट डाला और सब कार्य को पूरा किया, ज्ञान द्वारा उन्होंने दोषों को छोड़ा और ज्ञान-तत्त्व प्राप्त किया, तो भी वह यहाँ पड़े हुए हैं। 44 उन्होंने उन लोगों को दीक्षित किया, जिनके चित्त पटु थे और मन्द चित्तों को धीरे-धीरे पटुता की ओर प्रेरित किया। धर्म-ज्ञान द्वारा उन्होंने उन लोगों से पाप छुड़वाया। अब अमृत प्राप्त करने का धर्म कौन बतायेगा? 45 उत्पीड़ित और निराश जगत् की शान्ति के लिए कौन धर्म प्रदान करेगा? अपना कार्य पूरा कर कौन दयालु दूसरों को दोष-जाल काटेगा? 46 भवचक्र के महासागर में डूबे हुए जगत् की शान्ति के लिए उत्तम ज्ञान कौन बतायेगा? अज्ञान-मग्न संसार के सुख के लिए उत्तम-ज्ञान कौन बतायेगा? 47 उन संसारज्ञ के बिना यह संसार, प्रकाश-रहित दिवाकर के समान है या प्रवाह-रहित नदी (=सिन्धु) के समान या उस राजा के समान, जिसका राज्य नष्ट हो गया हो। 48 उन नर-श्रेष्ठ के बिना यह संसार बुद्धि-रहित विद्या के समान, विवेक-रहित परीक्षण के समान, प्रताप-रहित राजा के समान, क्षमा-रहित धर्म के समान, होकर भी नहीं है।
¹⁰¹ - 40-43:-40-42 में अभिज्ञाओं का वर्णन है और 43 में आस्रवक्षयज्ञान का; विशेष विवरण के लिए देखिए-अभिधर्मकोष 7.42
बुद्धचरित 115
49 सुगत को खोकर संसार, सारथि द्वारा परित्यक्त रथ के समान, या कर्णधार द्वारा परित्यक्त नाव के समान या सेनापति द्वारा परित्यक्त सेना के समान, या नायक द्वारा परित्यक्त काफ़िले (=सार्थ) के समान, या वैद्य द्वारा परित्यक्त रोगी के समान है। 50 आज निर्वाण चाहनेवालों का दुःख वैसे ही है जैसे कि शरद् ऋतु में बिना बादल का आसमान जो चाँद से सूना हो, जैसे कि आकाश जिसमें हवा नहीं बह रही हो, जैसे कि उन लोगों का दुःख जो जीवित रहना चाहते हों (किन्तु मर रहे हों)।” 51 यद्यपि वह अर्हत् था, जिसने अपना अच्छा काम पूरा कर लिया था, तो भी जन्म (जीवन, संसार) की बुराइयों तथा गुरु के गुणों के बारे में उसने बहुत कुछ कहा; क्योंकि वह गुरु के प्रति कृतज्ञ था। 52 जो निष्काम नहीं हुए थे उन्होंने आँसू बहाये और भिक्षुओं ने धैर्य खोकर शोक किया; किन्तु जिनका (भव-) चक्र पूरा हो गया था उन्होंने सोचा कि जगत् मरणशील (व्ययधर्मा, नाशवान्) है और वे आत्मसंयम से विचलित नहीं हुए। 53 तब समाचार सुनकर, मल्ल लोग विपत्ति के बोझ से दबे हुए यथासमय तेजी से निकल आये और बाज की शक्ति से अभिभूत बगलों के समान वे कष्टपूर्वक बोले, “हा! त्राता!” 54 जब उन्होंने मुनि को प्रकाश-रहित सूर्य के समान वहाँ पड़ा हुआ देखा, तब मन के महा- अन्धकार के कारण वे रोये और भक्ति-वश ऊँचे स्वर से उन्होंने विलाप किया, जैसे सिंह के द्वारा गवांमति के मारे जानेपर गाय-बैल (रोते बिलखते हैं) 55 धर्म-गुरु का निर्वाण होनेपर जिन लोगों की आँखें आँसुओं से अभिभूत थीं और जो लोग अपने अपने विश्वास (पंथ) एवं स्वभाव के अनुसार शोक कर रहे थे, उनमें एक अत्यन्त तेजस्वी एवं धर्म-रत पुरुष था, उसने ये वचन कहेः— 56 “जिन्होंने सोये हुए जगत् (जीव-लोक) को जगाया, अब वह अन्तिम शय्या पर पड़े हुए हैं। धर्म की मूर्ति, यह पताका, गिरी हुई है, जैसे कि उत्सव का अन्त होनेपर इन्द्र की पताका (गिर पड़ती है)। 57 तथागतरूपी सूर्य ने बुद्धत्वरूपी तेज से, उद्योगरूपी गर्मी से, और ज्ञानरूपी सहस्र किरणों से, अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर किया; अब अस्त होकर इस (सूर्य) ने संसार में फिर अन्धकार फैला दिया। 58 अब जगत् का नेत्र निष्ठुरतापूर्वक बन्द हो गया, जिसने अतीत अनागत और वर्तमान को देखा; बाँध निष्ठुरतापूर्वक टूट गया, जिसने दुःखरूपी महासागर की .... तरङ्गों से हमें बचाया।” 59 इस तरह वहाँ कुछ लोगों ने दीनतापूर्वक विलाप किया, दूसरों ने रथ के घोड़ों के समान झुककर शोक किया, कुछ लोग रोये, दूसरे भूमि पर पड़े रहे। प्रत्येक आदमी ने अपने स्वभाव के अनुसार आचरण किया। 60 तब रोते हुए मल्लों ने बड़े बड़े हाथियों की सूड़ों के सदृश भुजाओं से मुनि को यथासमय एक नई बहुमूल्य एवं सुवर्ण-खचित पालकी (=शिविका) पर रक्खा। 61 तब समयोचित विधि से उन्होंने भाँति भाँति की मनोहर मालाओं एवं अति उत्तम सुगन्धों से उनका सम्मान किया और फिर स्नेह एवं भक्ति से उन सबने पालकी पकड़ी। 62 तब कोमलाङ्गी कुमारियों ने, जिनके नूपुर बज रहे थे, अपने ताम्रवर्ण हाथों से उस (पालकी) के ऊपर एक बहुमूल्य वितान धारण किया, जो बिजली की चमक से उज्ज्वल बादल के समान जान पड़ा। 63 उसी प्रकार कुछ लोगों ने श्वेत मालाओं से युक्त छत्र पकड़े, और दूसरों ने सोने से मढ़े सफेद चँवर डुलाये। 64 तब वृषभ की-सी लाल आँखोंवाले मल्ल पालकी को धीरे-धीरे ले जाने लगे, और श्रुति-सुखद तूर्य आकाश में बजने लगे, जैसे वर्षा-ऋतु में बादल गरज रहे हों। 65 दिव्य कुसुम, कमल और भाँति-भाँति के फूल आसमान से गिरे, मानो दिग्गजों से प्रकम्पित चित्ररथ-वन के वृक्षों द्वारा (वे फूल) गिराये गये हों।$^{102}$ *66 ऐरावत से उत्पन्न बड़े-बड़े हाथियों ने मणिमय भीतरी भागवाले कमल और जल-कण-वर्षा... ...मन्दारव फूल बरसाये। *67 तब गन्धर्वों की रानियों ने, जिनके शरीर आनन्द-मुहूर्त के लिए उत्पन्न हुए थे, लाल चन्दन को मिटाकर, श्वेत वस्त्र फेंके, जो लीलापूर्वक सजाये गये थे। 68 चञ्चल पताकाओं को ऊपर उठाये हुए और सब प्रकार की मालाएँ चारों ओर बिखरते हुए, वे पालकी (=शिविका) को मङ्गल के लिए (=शिवाय) मङ्गलमय (=शिवेन) मार्ग से सङ्गीत के साथ-साथ ले गये। 69 मुनि की दिव्य (पारमार्थिक) शक्ति के कारण सौ-सौ बार प्रणाम करते हुए और उनकी मृत्यु पर रोते हुए, मल्लों ने भक्तिपूर्वक पालकी ढोई और इस प्रकार इसे वे नगर के मध्य भाग से ले गये। 70 नाग-द्वार से बाहर होकर उन्होंने हिरण्यवती नामक नदी पार की और मुकुट नामक चैत्य के नीचे उन्होंने उनके यश के अनुरूप एक चिता बनाई। $^{102}$. पाद 2-4 की तुलना सौन्दरनन्द दो 53 के पाद 2-4 से कीजिए- “...पुष्पवर्षं पपात खात्। दिग्वारणकराधूतान्नानाच्चैत्ररथादिव ॥” 116 अश्वघोष
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[बायाँ स्तम्भ]
71 तब उन्होंने चिता के ऊपर सुगन्धित वल्कलों, पत्तों, अगुरु, चन्दन और एलगज का ढेर लगा दिया और शोक से साँपों के समान लम्बी साँसे लेते हुए, चञ्चल आँखों से मुनि के शरीर को उसपर रख दिया।$^{103}$ 72 तब यद्यपि उन्होंने प्रज्वलित दीप को तीन बार उसमें लगाया, तो भी महामुनि की चिता में आग नही लगी, जैसे क्लीव राजा की, .... ....., राज्य-लक्ष्मी अग्नि ग्रहण नही करती है। 73 काश्यप, विशुद्ध चित्त से भावना करते हुए, मार्ग होकर आ रहा था और भगवान् के पवित्र अवशेषों को देखने की उसकी इच्छा-शक्ति के ही कारण आग नही लगी। 74 तब उस समय गुरु को देखने की इच्छा से शिष्य शीघ्र ही आ गया और जैसे ही उसने मुनिवर को प्रणाम किया कि अग्नि स्वयं प्रदीप्त हो उठी। 75 अग्नि से मुनि के शरीर के चर्म, मांस, बाल और अवयवों को, जो पापों से नही जले थे, जला डाला; किन्तु घी और जलावन की (पर्याप्त) मात्रा तथा हवा के रहनेपर भी यह हड्डियों को नही जला सकी। 76 तब उचित समय पर उन्होंने मृत महात्मा की हड्डियों को उत्तम जल से शुद्ध किया और मल्लों के नगर में सोने के घड़ों में उन (हड्डियों) को रखकर, उन्होंने प्रशंसा के स्तोत्र गाये:- $^{104}$ 77 “कलशों में उत्कृष्ट महाधातु है, जैसे कि महापर्वत की मणिमय धातु हो, और ये धातुएँ अग्नि से नष्ट नही हुईं, जैसे कि स्वर्ग में देवेन्द्र (ब्रह्मा) का धातु (कल्पान्त की अग्नि से नष्ट नही होता)।$^{105}$ 78 ये मैत्रीमय तथा कामाग्नि से नही जल सकने योग्य हड्डियाँ (= अस्थि) उन (तथागत या हड्डियों) की भक्ति के प्रभाव से रक्खी गई हैं, और शीतल होनेपर भी हमारे हृदय को गर्म कर रही हैं। 79 जिन्होंने इच्छा को जीता और जो संसार में अद्वितीय थे उनकी हड्डियाँ, उनकी पारमार्थिक शक्ति के कारण, विष्णु के (वाहन) गरुड़ द्वारा भी नही ढोये जा सकते, तो भी हम मानव उन्हें ढोते हैं। 80 अहो! संसार के नियम का प्रभाव निष्ठुर है और इसकी शक्ति के वशीभूत वह भी हुए, जिनकी शक्ति धर्म पर थी और इसलिए, जिनका यश सारी सृष्टि में व्याप्त हुआ उनके ये शारीरिक अवशेष इन घड़ों में रक्खे जाते हैं। 81 उनकी दीप्ति दूसरे सूर्य की दीप्ति के समान थी और इससे उन्होंने पृथ्वी को प्रकाशित किया। उनके शरीर का रङ्ग सुनहला था, तो भी अग्नि ने केवल बची हुई हड्डियों को ही छोड़ा है।
पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes): $^{103}$ - एलगज = इलायची या दालचीनी। $^{104}$ - “घड़ों में” बहुवचन है, एकवचन होना उचित था। $^{105}$ - ब्रह्मा का धातु = ब्रह्मा का पद।
[दायाँ स्तम्भ]
82 मुनि ने दोषों के बड़े बड़े पर्वतों को विदीर्ण किया, और जब उनपर दुःख आया, तो उन्होंने धैर्य नही छोड़ा; उन्होंने सब दुःख का निरोध किया, तो भी अग्नि ने उनके शरीर को जला ही डाला। 83 युद्ध में मल्ल दुश्मनों को रुलाते हैं, अपने आश्रितों के आँसू पोछते हैं, और प्रियजन के लिए भी आँसू बहाने से विरत रहते हैं, तो भी इस समय मार्ग पर आँसू बहाते हुए वे शोक कर रहे हैं।” 84 अभिमान एवं बाहुबल होनेपर भी उन्होंने विलाप किया और नगर में ऐसे प्रवेश किया, जैसे जङ्गल में और वीथि-वासियों (नागरिकों) द्वारा धातुओं की पूजा हो जानेपर, उन्होंने उनकी पूजा के लिए एक उज्ज्वल महल बनाया। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “निर्वाण की प्रशंसा” नामक 27वाँ सर्ग समाप्त॥ अट्ठाईसवाँ सर्ग धातु-विभाजन 1 कुछ दिनों तक उन लोगों ने विधिवत् समुचित रीति से धातुओं की पूजा की; तब उन धातुओं को लेने के लिए उस नगर में सात पड़ोसी राजाओं के दूत क्रम से आये। 2 तब यथासमय उनकी बात सुनकर मल्लों ने अभिमान-वश और धातुओं के प्रति भक्ति होने के कारण उन्हें नही देने का निश्चय किया, बल्कि युद्ध करना पसन्द किया। 3 तब उनका उत्तर जानकर सातों राजा, सात मारुतौं के समान, कुश के नाम से विख्यात उस नगर में अत्यन्त वेगपूर्वक अपनी सेनाओं के साथ आये, जो बढ़ती हुई गङ्गा की धारा के समान थीं। 4 तब उन राजाओं के घोड़ों का शब्द सुनकर नगर-निवासी जङ्गल से शीघ्रतापूर्वक नगर में घुसे गये, उनके चेहरे भयभीत थे । 5 तब राजाओं ने दूरवर्ती वनों में हाथियों को बाँधकर नगर को घेर लिया और उचित-रीति से व्यूह-रचना कर अच्छे मल्लों के प्रतिकूल आचरण किया। 6 तब वह नगरी, शोकाकुल स्त्री के समान, छत्ररूपी भुजाओं को ऊपर फेंककर और चँवररूपी सुन्दर एवं लम्बी पपनियों से द्वाररूपी आँखों को बन्दकर, शोक-मग्न हो गई। 7 जब सातों राजा एककार्य होकर अपने प्रताप से चमकने लगे, तब पृथ्वी आकाश के समान भयङ्कर हो गई, जिसमें सातों ग्रह एक साथ ही एक ही समय चमक रहे हों। 8 तब स्त्रियों की भी नाकें मदस्रावी हाथियों की गन्ध से, उनकी आँखें हाथियों की सूँड़ों द्वारा उड़ाई गई धूल से, और उनके कान घोड़ों हाथियों एवं दुन्दुभियों की ध्वनि से आक्रान्त हुए। 9 घेरे में चारों ओर युद्ध ही दिखाई पड़ता था, द्वार हाथियों और घोड़ों से घिर गये ।
बुद्धचरित 117
10 तब डरे हुए नगर-निवासियों ने साहस करके घबराहट छोड़ी और वे प्राकारों पर एकत्र हो गये; उनकी बर्चियां तलवारें और तीर शत्रुओं पर बाज के समान चमक रहे थे। 11 कुछ लोग उत्तेजित होकर गरजे, वैसे ही दूसरों ने एकत्र होकर शङ्ख फूँके। कुछ लोग इधर उधर तेजी से गए, वैसे ही दूसरों ने अपनी तेज तलवारें चमकाईं। 12 तब मल्लों को विजय-प्राप्ति के लिए लड़ने को तैयार तथा मल्लों (पहलवानों) के समान गरज गरजकर अपना अपना नाम बताते देखकर, उन योद्धाओं की पत्नियों ने एक ही साथ उनके चित्त ओषधि और पुरस्कार तैयार किये। 13 योद्धाओं की काँपती हुई स्त्रियों ने अपने पुत्रों को कवच पहनाये, जो युद्ध के अग्रभाग में जाना चाहते थे, और उन्होंने उनके लिए मङ्गल-कर्म किये, उन (स्त्रियों) के मुख उदास थे और आँसू अनियन्त्रित। 14 हरिणों के समान अधोमुख अन्य स्त्रियों ने अपने अपने पति के पास जाकर उस धनुष को पकड़ रखा, जिसे वह लेना चाहता था और रणोन्मुख वीर को देखते ही (उनके पग) रुक गये और वे न तो आगे ही गईं और न स्थिर ही खड़ी रहीं। 15 जब राजाओं ने मल्लों को इस तरह सुसज्जित एवं घड़े में बन्द साँपों के समान युद्ध के लिए निकलते देखा, तब उन्होंने युद्ध करने का निश्चय किया। 16 द्रोण नामक ब्राह्मण ने रथ हाथी घोड़े और पैदल सेना को उत्तेजित और युद्ध के लिए पूरा तैयार (कृतसङ्कल्प) देखा, और अपनी विद्वता एवं प्रेमपूर्ण दया के कारण उसने ये वचन कहे:- 17 “युद्धस्थल में आप तीरों से शत्रुओं के क्रोध और जीवन को शान्त कर सकते हैं, किन्तु किलों में रहनेवालों के साथ आप आसानी से वैसा नहीं कर सकते, उन शत्रुओं के साथ तो और भी नहीं जिनका चित्त (= कार्य) एक है। 18 यदि आप घेरा डालकर शत्रुओं को जीत भी लें, तो क्या दृढ़चित्त होकर उन्हें उन्मूलित करना तथा निर्दोष नगर-निवासियों को घेरे में डालकर हानि पहुँचाना धर्मसङ्गत है? 19 जैसे कि बिल में घुसते समय कृष्ण सर्प रास्ते में मिलकर एक दूसरे को काटते हैं, वैसे ही घेरा डालने से या तो आपकी एकान्त (पूरी) जीत नहीं होगी, या जो घेरे जायेंगे, उन्हीं की जीत होगी। 20 क्योंकि तुच्छ मनुष्य भी नगर के घेरे का समाचार सुनने पर उत्तेजित होकर बड़े काम के हो जायेंगे, जैसे कि थोड़ी सी भी आग जलावन पाकर बढ़ जाती है। 21 नगर में घिरकर भी धर्मात्मा मनुष्यों ने तपस्या द्वारा उन्हें पीछे हटाया, जो उनकी हत्या करने आये थे और अशक्त शस्त्रों के होनेपर भी उन्होंने धर्म-बल से कुश-नगर में करन्धम को जीता। 22 उन राजाओं को, जिन्होंने यश या राज्य (या विषय) के लिए सारी वसुधा को प्राप्त किया, इसे छोड़कर धूल में लौट जाना पड़ा, जैसे कि पोखर से पानी पीनेपर बैलों को चारागाह में लौट जाना पड़ता है। 23 अतः धर्म और अर्थ के लिए क्या जरूरी है, इसे ठीक ठीक देखकर आपको शान्तिपूर्ण उपायों (= साम) से प्रयत्न करना चाहिए; क्योंकि जो तीरों द्वारा जीते जाते हैं वे फिर प्रदीप्त हो सकते हैं; किन्तु जो शान्तिपूर्ण उपायों से जीते जाते हैं उनका विचार नहीं बदलता है। 24 यह सब आपकी शक्ति से परे है, आपकी सेना शत्रु की सेना का मुकाबला नहीं कर सकती। जिन शाक्य-मुनि का सम्मान करना आपको अभीष्ट है, उन्हीं के उपदेश के अनुसार आपको सहनशीलता (क्षमा) का आचरण करना चाहिए।” 25 यद्यपि वे राजा थे, तो भी उस भले मनुष्य ने उन्हें दृढ़तापूर्वक उपदेश दिया और ब्राह्मणोचित स्पष्टवादिता एवं प्रेमपूर्ण दया के साथ उन्हें वास्तविक हित की बात कही। तब उन्होंने उत्तर दिया:- 26 “आपके ये शब्द समयानुकूल और बुद्धिमत्तापूर्ण हैं और हमारी भलाई के लिए मित्रतापूर्वक कहे गये हैं; अब आपको हमारा आशय विदित हो, जिसका कारण है हमारी धर्म-रति और अपने बल का भरोसा। 27 नियमतः मनुष्य काम और क्रोध के कारण अथवा शक्ति या मृत्यु (हिंसा ?) के लिए कार्य-भार उठाते हैं; किन्तु हमने श्रद्धा से प्रेरित होकर (= साभिमाना:) केवल बुद्ध का सम्मान करने के लिए शस्त्र ग्रहण किया है। 28 शिशुपाल और चेदियों ने ... ... अहङ्कारवश कृष्ण के साथ युद्ध किया; तब जिन्होंने अहङ्कार को जीता उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन तक सङ्कट में डालें? 29 पृथ्वी पालन करनेवाले वृष्णि-अन्धक नामक राजाओं ने एक कन्या के लिए युद्ध किया, तब जिन्होंने काम (-वासना) का जीता उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन भी सङ्कट में डालें? 30 भृगु के पुत्र उस क्रोधी मुनि ने क्षत्रियों को उन्मूलित करने के लिए शस्त्र ग्रहण किया? तब जिन्होंने क्रोध को जीता उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन तक सङ्कट में डालें? 31 दैत्य, यद्यपि वह अत्यन्त भयङ्कर था, सीतारूपी (सीताभिधान) मृत्यु को ग्रहणकर विनाश को प्राप्त हुआ; तब जिन्होंने सब परिग्रह छोड़े उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन भी सङ्कट में डालें। 118 अश्वघोष
32 उसी प्रकार एलि और पक, जिनकी पारस्परिक शत्रुता बढ़ती ही गई, (मोह-वश) नाश को प्राप्त हुए; तब जो मोह से मुक्त थे उनकी पूजा करने के लिए क्यों न हम अपना जीवन भी खतरे में डालें? 33 संसार में ये और बहुतेरे दूसरे युद्ध अनुचित कारणों से हुए; तब हम क्यों न लड़ें, जब कि हम बुद्ध की भक्ति से बँधे हुए हैं और यह (युद्ध) हमारे लिए हितकारी है? 34 यही हमारा उद्देश्य है; आप शीघ्र ही हमारा दूत बनकर जायें और अपनी सारी शक्ति लगाकर (= सर्वात्मना) प्रयत्न करें जिससे यह उद्देश्य बिना युद्ध किये ही सिद्ध हो जाय। 35 यद्यपि हम लड़ने के लिए तैयार हैं और हमें तेज तीर हैं, तो भी धर्मानुसार कहे गये आपके वचनों ने हमें रोक लिया है, जैसे कि मन्त्र साँपों को रोक लेते हैं जो अपने फैलते हुए विष को पी जाते हैं।" 36 “मैं ऐसा ही करूँगा” यह कहकर ब्राह्मण ने राजाओं का आदेश ग्रहण किया और नगर में प्रवेश किया; यथासमय उसने मल्लों से भेंट की और उनसे मिलकर उसने उचित समयपर उनसे ये वचन कहे- 37 “ये नृप, जिनके हाथों में तीर हैं और जिनके चमकीले कवच सूर्य के समान उज्जवल हैं, आपके इस नगर के द्वारों पर, मांस के टुकड़ों को चाटते हुए सिंहों के समान, उछलने को तैयार हैं। 38 म्यानों में रखी हुई अपनी तलवारों को तथा सुनहली पीठवाले अपने धनुषों को देखते हुए वे युद्ध की पुकार से नहीं डरते, किन्तु मुनि के धर्म का स्मरण करते हुए वे धर्म-विरुद्ध आचरण करने से डरते हैं। 39 वे कहते हैं 'आपको हमारे उद्देश्य का आदर करना चाहिए; क्योंकि हम राज्य या सम्पत्ति के लिए नही, अहङ्कार या शत्रुता से नही, किन्तु मुनि की भक्तिवश आये हैं। 40 मुनि समान रूप से हमारे और आपके गुरु थे; इसी कारण यह सङ्कट आया है। इसलिए यह बन्धु-वर्ग एकत्र हुआ है और मुनि की धातुओं की पूजा करने के एकमात्र उद्देश्य से यहाँ आया है। 41 धन की कृपणता उतना बड़ा पाप नही जितना कि धर्मानचरण की कृपणता। कृपणतापूर्वक बोलने का निश्चय करना पाप है और पाप तो धर्म का शत्रु है ही। 42 यदि आप देने का निश्चय नही करते हैं तो किले से निकलकर अपने अतिथियों की सेवा- शुश्रूषा कीजिए। जिनका बल (किले के) फाटकों में है, तीरों में नहीं, वे क्षत्रिय-वंश में उत्पन्न नही हुए हैं।' 43 राजाओं ने यही सन्देश आपको दिया है, और यह सद्भावना एवं साहस से भरा है। मैंने भी इस विषयपर अपने मन में स्नेहपूर्वक विचार किया है, अब मेरा वक्तव्य ध्यानपूर्वक सुनिये। 44 दूसरों के साथ विवाद करने से न सुख होता है, न धर्म; दुर्भावना को प्रश्रय न देकर शान्ति- मार्ग का अनुसरण कीजिए। क्योंकि मुनि क्षमा का उपदेश दिया करते थे, जिससे भक्ति की अग्नि सदा बढ़ती ही रहती है। 45 मनुष्य, अर्थ या काम, इन दो में से एक के लिए सङ्घर्ष करते हैं, किन्तु जो मनुष्य धर्म के निमित्त आर्य (साधु) हो गया है उसके लिए शम (शान्ति) और शत्रुता परस्पर-विरोधी हैं। 46 जिन्होंने स्वयं शान्ति प्राप्त कर उदार हृदय से जीवों को करुणा का उपदेश दिया उन करुणामय की पूजा करते हुए आप (दूसरों को) क्लेश पहुँचायें, यह आपके सिद्धान्त के प्रतिकूल है। 47 अतः धातुओं को देकर आप उनके साथ यश और धर्म के भागी बनें। इस प्रकार आप उनके मित्र बनेंगे और वे भी धर्म व यश प्राप्त करेंगे। 48 हम धर्मानुयायियों को, धर्म से गिरे हुए लोगों को प्रयत्नपूर्वक भी धर्म से युक्त करना चाहिए। क्योंकि जो दूसरों को धर्म से युक्त करते हैं वे धर्म को चिर-स्थायी बनाते हैं। 49 परम पवित्र मुनि ने कहा है कि धर्म का दान सब दानों से श्रेष्ठ है (= सर्वेषामेव दानानां धर्मदानं विशिष्यते); जो कोई भी धन-दान कर सकता है, किन्तु धर्म का दाता दुर्लभ है।" 50 जब उन्होंने (आचार्य) द्रोण के समान ज्ञानी ब्राह्मण (द्रोण) से विख्यात व आनन्ददायक धर्म वचन सुने, तब अत्यन्त लज्जित होकर एक-दूसरे को देखते हुए उन्होंने उस (ब्राह्मण) से कहा:- 51 “आपका निश्चय सन्मित्र का है और ब्राह्मणोचित गुणों से युक्त है। हम बुरे घोड़ों के समान कुमार्ग पर भटक रहे थे, किन्तु आपने हमें सन्मार्ग पर स्थापित किया। 52 हमें अवश्य ही वैसा करना चाहिए जैसा कि आपने कहा है, क्योंकि दयालु मित्र का उपदेश ग्रहण करना उचित ही है। क्योंकि जो लोग मित्र के वचन की अवहेलना करते हैं वे पीछे विपत्ति में पड़कर शोक करते हैं।” 53 तब विप्र (= लोक धातु) को जाननेवाले बुद्ध की धातुओं को मल्लों ने आठ भागों में बाँटा और तब अपने लिए एक भाग रखकर, उन्होंने शेष सात भाग दूसरों को दे दिये, प्रत्येक के लिए एक। 54 मल्लों से इस प्रकार सम्मानित होकर राजा लोग भी, जिनका लक्ष्य सिद्ध हो गया, आनन्दपूर्वक अपने अपने देश को लौट गये। तब उन्होंने अपने अपने नगर में मुनि की धातुओं (को रखने) के लिए विधिवत् स्तूप बनाये। बुद्धचरित 119
55 तब अपने देश में मुनि के लिए एक स्तूप बनाने की इच्छा से द्रोण ने अपने हिस्से में घड़ा लिया और पिसल नामक लोगों ने भक्तिपूर्वक बची हुई राख ली।$^{106}$ 56 शुरु में श्वेत पर्वतों के समान आठ स्तूप थे, जिनके भीतर धातुएँ थीं। ब्राह्मण का घड़ावाला स्तूप नवाँ था और राखवाला दसवाँ। 57 प्रजा-सहित राजाओं ने और बच्चों-सहित ब्राह्मणों ने पृथ्वी पर मुनि के इन विविध स्तूपों की पूजा की, जिनपर पताकाएँ फहरा रही थीं और जो कैलास की बर्फीली चोटियों के समान दिखाई पड़ते थे। 58 अनेक भूपों ने स्तोत्र-गान, उत्कृष्ट सुगन्धियों, सुन्दर मालाओं और गीत-ध्वनि से स्तूपों की, जिनमें बुद्ध (= जिन) की धातुएँ थीं, उत्तम उपासना की। 59 तब कालक्रम से 500 अर्हत् 5 पर्वतों से चिह्नित नगर में एकत्र हुए और फिर से धर्म को अच्छी तरह संस्थापित (स्थिर) करने के लिए उन्होंने पर्वत के ऊपर मुनि के उपदेशों का सङ्ग्रह किया। 60 आनन्द ने ही महामुनि से सब उपदेश सुने थे, ऐसा निश्चयकर शिष्यों ने सङ्घ की सम्मति से उस वैदेह मुनि से शास्त्र (= प्रवचन) दुहराने के लिए कहा। 61 तब वह उन लोगों के बीच बैठ गया और "मैंने ऐसा सुना है" इस तरह कहते हुए तथा स्थान, प्रसङ्ग, समय और श्रोता की व्याख्या करते हुए, उसने उपदेशों को वैसे ही दुहराया जैसे कि वक्ता-श्रेष्ठ (बुद्ध) ने कहा था। 62 इस प्रकार अर्हतों के साथ उसने मुनि का धर्म-शास्त्र निश्चित किया और प्रयत्नपूर्वक इसका पूरा ज्ञान प्राप्त करनेपर ही मनुष्य दुःख के परे गये हैं, जा रहे हैं, और जायँगे। 63 काल-क्रम से धर्म-रत अशोक का जन्म हुआ; उसने अहङ्कारी शत्रुओं को शोकाकुल किया और दुःखी लोगों का शोक दूर किया, वह फूलों और फलों से लदे अशोक-वृक्ष के समान प्रियदर्शन था। 64 मौर्य-वंश के उज्ज्वल गौरव अशोक ने प्रजा की भलाई के लिए सम्पूर्ण पृथ्वी पर स्तूप बनाने का कार्य आरम्भ किया और इसलिए जो चण्डाशोक कहलाता था वह धर्म-राज अशोक बन गया। 65 उस मौर्य ने मुनि की धातुओं को सात स्तूपों से जिनमें वे रक्खी गई थीं, लेकर एक ही दिन में क्रम से 80,000 भव्य स्तूपों के बीच बाँट दिया, जो शरदृतु के उज्ज्वल मेघों के समान चमक उठे। 66 रामपुर में स्थित आठवाँ मूल स्तूप उस समय विश्वस्त नागों से रक्षित था और इसलिए राजा ने उस (स्तूप) से धातुओं को प्राप्त नही किया; किन्तु इससे उन (धातुओं) में उसकी श्रद्धा बहुत बढ़ गई। 67 चञ्चल राज्य-लक्ष्मी की रक्षा करते हुए भी और चित्त के लिए शत्रुस्वरूप उपभोगों के बीच रहते हुए भी, राजा ने काषाय-वस्त्र पहने बिना ही अपने चित्त को शुद्ध किया और प्रथम फल प्राप्त किया। 68 इस प्रकार जिस किसी ने जहाँ कहीं मुनि का सम्मान (पूजा) किया है, करता है, या करेगा उसे सज्जन-सुलभ परम फल प्राप्त हुआ है होता है या होगा। 69 हे बुद्धिमान् मनुष्यो, विदित हो कि बुद्ध के गुण ऐसे हैं कि समान मानसिक शुद्धि होनेपर, ऐहिक जीवन में मुनि का सम्मान करने से या उनके परिनिर्वाण के बाद उनकी धातुओं को प्रणाम करने से एक ही फल प्राप्त होता है।$^{107}$ 70 इसलिए उदारचेता करुणामय परम पूज्य मुनि की पूजा करनी चाहिए, जो लाभप्रद, सदा- अव्यर्थ, अविकारी (अपरिवर्तनशील) परम और उत्कृष्ट धर्म के ज्ञाता थे। 71 क्या इस जगत् में यह उचित नही कि कृतज्ञ बुद्धिमान् धर्मात्मा उन्हें धन्यवाद दें जिन्होंने, मनुष्यों के आशय की सम्यक् जानकारी रखते हुए, करुणावश, परोपकार के लिए महान् परिश्रम किया? 72 पृथिवी पर जरा और मरण के समान तथा स्वर्ग में वहाँ से गिरने के समान कोई विपत्ति नही, यह देखते हुए कौन सज्जन उतना पूज्य है जितना कि वह जिन्होंने विश्व की इन दो विपत्तियों को पहचाना? 73 जबतक जन्म है तबतक दुःख है, और पुनर्जन्म से मुक्ति के समान कोई सुख नही; कौन सज्जन उतना पूज्य है जितना कि वह जिन्होंने इस मुक्ति को प्राप्तकर संसार को दिया? 74 मुनि-श्रेष्ठ के प्रति सम्मान-भाव से, मुनि के शास्त्रानुसार, मनुष्यों के हित व सुख के लिए, न कि विद्वत्ता या काव्य-कौशल दिखाने के लिए, यह काव्य रचा गया। ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "धातु-विभाजन" नामक 28वाँ सर्ग समाप्त ॥ ॥ समाप्तसम्पूर्णबुद्धचरित ॥ $^{106}$ - पिसल के स्थान में "पिप्पल" पढ़ने का सुझाव जॉन्स्टन ने किया है, इसलिए कि मौर्य पिप्पलवनिक थे। चीनी अनुवाद में है "कुशीनगर के लोग"। 120 अश्वघोष $^{107}$ - "हे बुद्धिमान् मनुष्यो, विदित हो" या "बुद्धिमान् मनुष्य जानते हैं"।
परिशिष्ट 1 अतिरिक्त टिप्पणी एवं पाठान्तर
1.10 कक्षीवान्। “आसन्दीवद्दधी” (अष्टाध्यायी 8.2.12) इति निपात्यते, कक्षीवानृषिः। 1.18 अनुवाद और 13.56 क के आधार पर कोष्ठगत 'अदृश्यरूपाश्च' रखा है। 1.24 घ-अनुवाद के आधार पर रिक्त स्थान की पूर्ति की गई है। 1.61 संविष्टः = सुप्तः (रघुवंश 1.95)। देवी = पार्वती। अग्निपुत्र = कार्तिकेय। 2.1 पा० “जन्मजरान्तगस्य” 2.2 कृताकृत = घटिताघटित = गढ़ा हुआ और नहीं गढ़ा हुआ (चाँदी-सोना) - अमरकोष। 2.3 पद्म = दक्षिण दिशा में स्थित दिग्गज। मण्डल = राज्य, देश, हस्तिशाला, हाथियों का घेरा (दे० 5.23)। 2.7 ख-पा० “०मण्डितागः”। 2.25 घ- पा० 'वनं न यायादिति'। 2.33 घ- 'संविबभाज...' = या 'साधुओं की सेवा की'। 2.44 ख-अभिध्या = लोभ। अविवक्षीत्-वह् + सन् + लुङ्। 2.51 'स्वायंभुव सामवेदीय सूक्त का श्रद्धापूर्वक जप किया' - बंगला अनुवाद। 2.54 निपात-नि + पा + क्त। दे०- सो० 18.31 3.1 गीतैर्निबद्धानाि काननानि = संगीत से गूंजते हुए नगर-उद्यानों के बारे में; या उन उद्यानों के बारे में जिनके (सम्बन्ध में) गीत गाये जाते थे। 3.9 क-पा० '०पुष्पलाजं'। 3.26 ग-पा० 'प्रयातुं' के स्थान में 'प्रयान्तं'। 3.31 ख-पा० 'बालेन'-बालक होकर धूल में खेला। 3.53 ग-'स्याद् व्यत्यासो विपर्यासो व्यत्ययश्च विपर्यये'-अमरकोष। 3.57 घ-पा० 'प्रियः प्रियैस्'। 3.60 घ-पा० 'निर्हादवता'। 4.16 सम्भवतः 'काशिसुन्दरी' नाम नही, किन्तु विशेषण; इसका अर्थ होगा 'काशी की रूपवती (वेश्या)'। 4.38 घ-धीरलीलैया चेष्टितं = गम्भीरता का, स्थिर गति-विधि का। 4.56 क-उ + ईमाः = विमाः; पा० 'किं न्विमा'? ग-पा० 'संमता'। 5.8 ख-पा० 'निवर्त्य'।
5.19 ग-परिग्रह = घर स्वजन साथी सम्पति आदि बन्धन। 5.22 ग-पा० 'परिवर्त्य जनं'। 5.32 ख-लक्ष्म = प्रधान, योग्य। 5.40 निदर्शित = उदाहरण और दृष्टान्त देकर समझाये जानेपर। 5.52 शालभञ्जिका = शालवृक्ष (के काष्ठ) से बनाई गई मूर्ति। 5.53 पा० 'मणिकुण्डलदष्टगण्डलेखम्'। 5.55 योक्त्र = मुख का कोई आभूषण। 5.59 'स्पृष्टं स्फुटं प्रव्यक्तमुल्बणम्'-अमरकोष। 5.66 तदन्तरं = स्वभाव और बाह्य आभूषण का अन्तर; या सुयोग। 5.75 पा०- 'यथा ततुरुग्रश्रेष्ठ'। 5.84 क-पा० 'विकचपङ्कजो'। विकच = विकसित। घ-पा० 'पुनरहं'। 5.86 ग-पा० 'अकुरुत'। 6.34 ख-पा० 'यशोधर्मभृतां वरं'। 6.37 'उचितदर्शित्वात्' अन्तःपुर या छन्दक के लिए भी हो सकता है। शुभ वस्तुओं को ही देखनेवाले या शुभ संवाद ही सुननेवाले अन्तःपुर में। अथवा, न्यायोचित को देखनेवाला या उचित कर्म करनेवाला में (छन्दक)। 6.57-58 एनं और तं मुकुट के लिए प्रयुक्त हुआ है या असि के लिए? 8.48 से ज्ञात होता है मुकुट के लिए। 7.42 ख-पा० 'सङ्कीर्णधर्मे पतितो०'; 'सङ्कीर्णधर्मा पतितो०'। 7.43 घ-पा० 'बृहस्पतेरप्युदयावहः'। 7.50 बहुमानमीयुः = (उन तपस्वियों ने मन में) उनका बड़ा सम्मान किया। 8.13 रघुवंश 10.7 की व्याख्या में मल्लिनाथ द्वारा उद्धृत। 8.31 ख-'विषाद-जन्य बाष्प से अवरुद्ध वाणी में'। दे० 2.62 ग तथा 8.60 घ। 8.39 घ- 'श्रियं' = या 'राज्यलक्ष्मी को' 8.57 ग-या 'दान देने का अभ्यासी था, माँगने का नहीं'। 8.66 ग घ-'भूयो यथा मे जननान्तरेऽपि स्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः।'-रघुवंश 14.66। 9.21 घ-पा० 'वित्ताधिपत्यं'। विद् ज्ञाने क्त वित्तम्। 10.2 ख-धृतं च पूतं च = पोषित एवं पवित्रीकृत-बंगला अनुवाद (रथीन्द्र) 10.26 घ-'सहीया' यह शब्द केवल बौद्ध-साहित्य में ही पाया जाता है। 10.30 पा० 'स्ववंशप्रतिरूपरूपं' = अपने वंश के अनुरूप रूप को।
बुद्धचरित 121