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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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34 यदि आप इस जन्म में भी इस जीवन से बँधे रहते, तो चक्रवर्ती होकर आप मानव जाति का पालन करते, किन्तु अब मुनि होकर भव-चक्रके महादुःख को तोड़कर आप जगत् के लिए धर्मोपदेश कर रहे हैं। 35 इन ऋद्धियों एवं गम्भीर ज्ञान का प्रदर्शन कर और भव-चक्र की विपत्तियों पर पूर्ण विजय प्राप्तकर राज्य के बिना भी आप संसार के ईश्वर हो गये हैं, किन्तु राज्य-समृद्धि के रहते हुए भी आप वैसा नहीं होते, यदि आप असहाय होकर भव-चक्र में पड़े रहते।" 36 शाक्य-राज्य ने, जो उन करुणामय के धर्मोपदेश (ग्रहण करने) के योग्य हो गया था, ऐसी बहुत-सी बातें कहीं और यद्यपि वह राजा और पिता के पद पर था, तो भी उसने अपने पुत्र को प्रणाम किया, क्योंकि वह सत्य में प्रवेश कर चुका था। 37 बहुत से लोगों को, जिन्होंने मुनि का ऋद्धि-बल पर अधिकार देखा, जिन्होंने तत्त्व में प्रवेश करानेवाले शास्त्र को समझा और जिन्होंने राजा को-उनके पिता को-उनका सम्मान करते देखा, घर छोड़ने की इच्छा हुई। 38 तब कर्म-फल में स्थित बहुत से राजकुमारों ने उस धर्म-विधि को ग्रहण किया और वैदिक- मन्त्रों एवं मोह के बड़े-बड़े साधनों की उपेक्षा करके, रोते हुये प्रिय परिवारों का परित्याग किया। 39 आनन्द, नन्द, कृमिल, अनिरुद्ध, नन्द, उपनन्द, कुण्ठधान और शिष्यों का मिथ्या शिक्षक देवदत्त भी मुनि का उपदेश पाकर घर से निकल गये। 40 तब पुरोहित-पुत्र महात्मा उदायी ने उसी मार्ग का अनुसरण किया; और उन लोगों का निश्चय देखकर अत्रि-पुत्र (आत्रेय) उपाली ने भी उसी मार्ग पर चलने का इरादा किया। 41 अपने पुत्र की शक्ति देखकर राजा ने भी परम अमरत्व की धारा में प्रवेश किया और आसक्ति से विमुख होकर उसने राज्य अपने भाई को सौंपा और (स्वयं) महल में राजर्षि की तरह आचरण करते हुए रहने लगा। 42 इन तथा अन्य बन्धुओं, मित्रों एवं अनुयायियों को विनीत (दीक्षित) कर, बुद्ध ने उचित समय पर, पूरे आत्म-संयम के साथ, नगर में प्रवेश किया, जहाँ रोते हुए पुरवासियों ने उनका सत्कार किया। 43 राजा ने पुत्र सर्वार्थसिद्ध अपना कार्य पूरा करके नगर में प्रवेश कर रहे हैं, यह समाचार सुनकर महल की स्त्रियाँ द्वारों एवं वातायनों की ओर दौड़ीं। 44 काषाय वस्त्रधारी होनेपर भी उन्हें संध्याकालीन बादल से आधा ढके सूरज के समान चमकते देखकर, स्त्रियों ने आँसू बहाये और अपने कर-कमल जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। 45 उन्हें नीची-निगाह चेहरे से चलते तथा धर्म एवं शरीर-सौन्दर्य से प्रकाशित होते देखकर स्त्रियों ने दया एवं भक्ति प्रकट की और अश्रु-म्लान-आँखों से उन्होंने इस तरह विलाप कियाः-


46 "शिर मुड़ाने से व फेंके हुए चिथड़े पहनने से यद्यपि उनका सुन्दर शरीर बदल गया है, तो भी अपने शरीर के सुनहले रङ्ग से वह व्याप्त हैं। वह जमीन की ओर देखते हुए चल रहे हैं। 47 जो श्वेत आतपत्र के नीचे आश्रय पाने योग्य थे, ...., ...., और जो विजेता होने योग्य थे, वह अब भिक्षा-पात्र लिए घूम रहे हैं। 48 जो घोड़े की पीठ पर उस छाते की छाया के नीचे, जो तमाल-पत्र-युक्त कपोलवाले सुन्दरी- मुख के समान उज्ज्वल हो, सवार होने योग्य थे, वह भिक्षा-पात्र धारण किये हुए पैदल जा रहे हैं। 49 जो विपक्षी राजकुमारों को विनीत (नम्र) करने योग्य थे और जो उज्ज्वल मुकुट पहनकर स्त्री- समूहों एवं अपने परिचारक-वृन्द द्वारा देखे जाने योग्य थे, वह आगे की ओर केवल जुए की दूरी तक जमीन देखते हुए ( = अवेक्षमाणो युगमात्रमुर्व्याः⁷⁷) चल रहे हैं। 50 यह उनका कैसा दर्शन है, ये कैसे भिक्षु-वेष हैं, कौनसा लक्ष्य वह खोज रहे हैं, सुख उनका शत्रु क्यों हो गया है कि वह व्रतों में आनन्द पायें, स्त्रियों और बच्चों में नहीं? 51 राजा की पुत्र-वधू यशोधरा निश्चय ही शोक से ग्रस्त हुई, तो भी उसने कैसा दुष्कर कर्म किया है कि अपने पति के इस आचरण का समाचार सुनकर वह जीती रही और विनाश को प्राप्त नहीं हुई। 52 रूप के अनुरूप ही चमकती हुई पुत्र की आकृति को, जो अब आभूषण-रहित (=विवर्ण) है, देखकर क्या नरपति भी अपने पुत्र से अनुराग करते हैं या उन्हें हानिकारक शत्रु समझते हैं? 53 अश्रु-जल से नहाये हुए अपने पुत्र राहुल का देखकर यदि वह उसमें आसक्त (अनुरक्त) नहीं होते हैं, तो भला कोई क्या सोचे इन दृढ़ व्रतों के बारे में, जिनके कारण मनुष्य अपने स्नेही स्वजन से विमुख होता है। 54 व्रतों के आचरण से न तो उनकी दीप्ति ही नष्ट हुई है, न उनके शरीर का रूप ही और न उनकी गति ही; और इन गुणों से चमकते हुए उन्होंने शान्ति प्राप्त की है तथा अपने को विषयों से अलग किया है।" 55 विविध मतावलम्बियों के समान भिन्न-भिन्न मत ग्रहण करती हुई स्त्रियों ने इस तरह बहुत विलाप किया। बुद्ध ने भी अनासक्त (कठोर, दृढ़) चित्त से अपने जन्म नगर में प्रवेश किया और भिक्षा प्राप्त कर वह न्यग्रोध-वन में लौट गये। 56 तृष्णा-रहित चित्त से तथागत ने अपने पितृ-नगर में भिक्षा के लिए प्रवेश किया था; और पूर्व में श्रेय नही करने से जिनके साधन अल्प थे और जो बहुत कम भीख दे सकते थे उन लोगों को मुक्त करने की, जिन श्रमणों को अपने चित्त पर संयम प्राप्त नहीं हुआ था और जिन्हें


⁷⁷- देखिये जातकमाला, जातक 4 श्लोक 4। बुद्धचरित 93