बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें10 सब पर्वतों से परिवेष्टित पृथ्वी इनकी होनी चाहिये, जैसे कृतयुग में यह मान्धाता की थी; तो भी वह, जिन्हें राजा से भी याचना नहीं करनी चाहिये, अब दूसरों से भीख माँगकर जीते हैं। 11 वह यहाँ धैर्य में मेरु पर्वत से, दीप्ति में सूर्य से, कान्ति में चन्द्रमा से, गति में गजराज से और वाणी में वृषभ से बढ़कर है; तो भी पृथ्वी जीतने की जगह वह भिक्षा का अन्न खाते हैं।" 12 तब बुद्ध ने जाना कि अब भी उनका पिता उन्हें अपने मन में अपना पुत्र समझ रहा है और राजा (= लोकाधिदेव) के ऊपर करुणा करके वह उसके लिये आकाश में उड़ गये। 13 उन्होंने अपने हाथ से सूर्य का रथ स्पर्श किया और वह पवन-पथ (आकाश) में पैदल चले; उन्होंने अपने एक शरीर को अनेक में परिणत किया और फिर अनेक शरीरों को एक बनाया। 14 बिना किसी बाधा के उन्होंने पृथ्वी में ऐसे अवगाहन किया जैसे पानी में, और पानी की सतह पर ऐसे चले जैसे सूखी भूमि पर; और उन्होंने शान्त होकर पर्वत में प्रवेश किया और उसमें ऐसे निर्बाध होकर चले जैसे आकाश में चल रहे हों। 15 आधे शरीर से उन्होंने जल बरसाया और आधे से वह ऐसे प्रज्वलित हुए जैसे अग्नि से। गौरवपूर्वक चमकते हुए वह आकाश में ऐसे दिखाई पड़े जैसे पर्वत पर की उज्ज्वल ओषिधियाँ चमक रही हों। 16 इस तरह उन्होंने राजा के मन में आनन्द उत्पन्न किया, जो उनसे इतना अनुराग करता था, और आकाश में दूसरे सूर्य के समान बैठे हुए उन्होंने नरपति के लिये धर्म की व्याख्या की:- 17 "हे राजन्, मैं जानता हूँ कि अपनी दयालु प्रकृति के कारण आप मुझे देखकर दुःखी हो रहे हैं। पुत्रवान् होने का आनन्द छोड़िये और शान्त होकर आप मुझसे पुत्र की जगह धर्म ग्रहण कीजिये। 18 पूर्व में किसी पुत्र ने पिता को जो कभी नहीं दिया पूर्व में किसी पिता ने पुत्र से जो कभी नहीं पाया, जो राज्य अथवा स्वर्ग से भी अच्छा है, हे राजन्, आप उस परम उत्तम अमृत को जानें। 19 हे भूपति, कर्म का स्वभाव, कर्म की उत्पत्ति-भूमि (= योनि), कर्म का आश्रय और कर्म के विपाक से होनेवाला भाग पहचानिये और जगत् को कर्म के वशीभूत जानिये; इसलिये वह कर्म कीजिये जो हितकारी है। 20 जगत् के वास्तविक सत्य (= तत्त्व) पर विचार कीजिये। सत्कर्म मनुष्य का मित्र है और कुकर्म विपरीत (अर्थात् शत्रु)। (मरते समय) आपको सब कुछ छोड़ना पड़ेगा और निराश्रय हो अकेला ही जाना पड़ेगा, केवल कर्म आपके साथ जायेंगे। 21 स्वर्ग में या नरक में या पशुओं में या मर्त्य-भूमि में जीवलोक कर्म के आश्रय से चलता है। भव का कारण त्रिविध है, उत्पत्तिभूमि (= योनि) त्रिविध है और मनुष्यों द्वारा किये जानेवाले कर्म विविध हैं। 22 इसलिये अपने को सम्यक् रूप से अन्य पक्ष (द्विवर्ग) में लगाइये और शरीर व वाणी के व्यापार (कृत्य) शुद्ध कीजिये। मानसिक शान्ति के लिये यत्न कीजिये। यही आपका लक्ष्य है, दूसरा नही। 23 जगत् को समुद्र-तरङ्ग के समान चञ्चल जानते हुए और इसकी भावना करते हुए आपको (रूप-, अरूप-, व काम-) भव में आनन्द नही पाना चाहिये और कर्म-शक्ति क्षीण करने के लिए धार्मिक व श्रेयस्कर कर्म करना चाहिए। 24 विदित हो कि संसार सदा नक्षत्र-मण्डल के समान घूमता रहता है। अपनी पराकाष्ठा पार करके देवता भी स्वर्ग से गिरते हैं; तब मानवी सत्ता पर कौन कितना भरोसा करे? 25 निर्वाण-सुख को परम् सुख और आन्तरिक (= अध्यात्म) आनन्द का परमानन्द जानिये। वैभव-सुख साँपवाले घर के समान विपत्तिपूर्ण हैं, यह देखकर कौन आत्मवान् (संयतात्मा) व्यक्ति उसमें आनन्द पायेगा? 26 इसलिये इस जगत् को जलते हुए घर के समान विपत्ति-ग्रस्त देखिये और उस पद की खोज कीजिये जो शान्त एवं ध्रुव है, जहाँ न जन्म है न मौत, न श्रम है न दुःख। 27 दोषों की विपक्षी सेना को पराजित कीजिए, जिसके लिए सम्पत्ति राज्य अश्व घोड़े या हाथी की जरूरत नही है। एक बार उन्हें जीत लेनेपर जीतने के लिये कुछ और नही रह जाता है। 28 दुःख, दुःख-समुदय, (दुःख-) उपशम और उपशम-मार्ग को समझिये। इन चारों को पूर्णतः समझ लेने से महाभय व दुर्गत्तियों का निरोध होता है।" 29 सुगत के चमत्कार-प्रदर्शन से राजा का चित्त उपदेश (ग्रहण करने) के लिये उपयुक्त क्षेत्र पहले ही हो गया था, इसलिये अब सुन करके धर्म प्राप्त करनेपर रोमाञ्चित हो गया और हाथ जोड़कर उसने ये वचन कहे- 30 "आपके कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण और सफल हैं; क्योंकि आपने मुझे महादुःख से मुक्त किया है। मैं, जो पहले विपत्तिपूर्ण पृथ्वी की प्राप्ति में दुःख-वृद्धि के लिए आनन्द पाता था, अब पुत्रवान् होने के फल में आनन्द पा रहा हूँ। 31 राज्य-लक्ष्मी का परित्याग कर आप ठीक ही (= स्थाने) चले गये। ठीक ही आपने कठोर श्रम किया और ठीक ही आप प्रिय ने प्रिय स्वजनों को छोड़ा और हमारे ऊपर करुणा की। 32 आर्त जगत् के हित के लिए आपने यह नैष्ठिक ज्ञान पाया है, जो पूर्व में देवर्षियों या राजर्षियों को प्राप्त नही हुआ। 33 यदि आप चक्रवर्ती सम्राट् होते तो आप मुझे यह आनन्द नही देते जो इस समय मैं, इन चमत्कारों एवं आपके धर्म को देखकर दृढ़तापूर्वक अनुभव कर रहा हूँ।
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