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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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76 इसलिए खासकर गृहस्थ लोग द्रव्य-संचय नहीं करते, किन्तु अपने साधन के अनुसार दान देते हैं; और क्योंकि दान देना ही असार सम्पत्ति का सार है (सारादानं दानमाहुर्धनानां ⁷⁵) अतः सज्जनों के चलने का यही मार्ग है। 77 भोजन देनेवाला बल देता है, वस्त्र देनेवाला भी सौन्दर्य देता है, किन्तु जो धर्मात्माओं को निवास देता है वह संसार में सब कुछ देता है। *78 सवारी देनेवाला भी आराम देता है और दीप देनेवाला प्रकाश देता है। अतः जो नैष्ठिक धर्म का उपदेश देता है वह अमर पद देता है, जो छीना नहीं जा सकता, (=अहार्यममृतं पदं)। 79 कुछ लोग काम (उपभोगों) के लिए दान देते हैं, दूसरे सम्पत्ति के लिए, तीसरे यश के लिए, कुछ लोग स्वर्ग के लिए और दूसरे कृपण नहीं होने के लिए; किन्तु तुम्हारे इस दान का कोई गूढ़ उद्देश्य नहीं है। 80 इसलिए साधुवाद तुम्हें, जिसकी इच्छा ऐसी (उत्तम) है। अपनी इच्छा पूरी करके सन्तुष्ट हो जाओ। तुम यहाँ काम (=रजस्) व अज्ञानरूपी अन्धकार (=तमस्) के साथ आये थे और यहाँ से ज्ञान द्वारा विशुद्ध-चित्त होकर जाओगे।" 81 वह, जो कि (उचित) रास्ते से (चलकर) तत्त्व को ठीक-ठीक पा चुका था, परम प्रसन्न होकर विहार (बनाने) की बात से हार्दिक अनुराग करने लगा और उचित समयपर उपतिष्य के साथ चल पड़ा। 82 तब वह कौशल-राज की राजधानी में आया और विहार के स्थान की खोज में इधर-उधर घूमने लगा। तब उसने मनोहर वृक्षों से भरा भव्य एवं उपयुक्त जेत-वन देखा। 83 तब इसे खरीदने के लिए जेत के पास गया, जो इसमें इतना आसक्त था कि इसे बेच नहीं सकता था। उसने कहा- "यदि आप द्रव्य से इसे पूरा-पूरा ढक भी दें तो भी मैं आपको यह भूमि नहीं लेने दूँगा।" 84 तब सुदत्त ने उसे वहाँ कहा- "मुझे उपवन की जरूरत है" और इसके लिए आग्रह करने लगा। तब उसने इसे कोष से ढक दिया और इसे धर्म का व्यवहार समझते हुए खरीदा। 85 जब जेत ने उसे द्रव्य देते हुए देखा, तब वह बुद्ध के प्रति अत्यन्त अनुरक्त हो गया और तथागत के लिए सारा शेष उपवन दे दिया। 86 तब महर्षि उपतिष्य के साथ, जो निर्माण-कार्य का अध्यक्ष (नवर्मिक) नियुक्त हुआ, अनाथपिण्डद ने इसे जल्द तैयार करना चाहा और एक विशाल रूपोज्ज्वल विहार बनाना शुरू किया,


⁷⁵. देखिये जातकमाला, जातक 3, श्लोक 23।


87 जो उसकी सम्पत्ति शक्ति व ज्ञान का मूर्त आकार था, पृथ्वी पर आये हुए कुबेर-प्रासाद के भी समान था, उत्तर कौशल की राजधानी के समान सौभाग्य के समान था और तथागतत्व (प्राप्त होने) की भूमि के समान था। ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "अनाथपिण्डद की दीक्षा" नामक 18वाँ सर्ग समाप्त ॥ उन्नीसवाँ सर्ग पितापुत्र-समागम⁷⁶ 1 तब अपने ज्ञान से विविध दर्शनों के शिक्षकों को जीतकर मुनि क्रम से पाँच पर्वतों के नगर से (निकलकर) उस नगर की ओर चले जहाँ उनका राजा पिता रहता था। 2 तब हजार भिक्षु भी चले, जिन्हें उन्होंने उसी क्षण प्रव्रजित किया था। वह अपने पिता के राज्य में पहुँचे और उसे अनुगृहीत करने के लिये पितृ-नगर के समीप ठहर गये। 3 लक्ष्य सिद्धकर आर्य लौट आये हैं, यह आनन्द-प्रद समाचार अपने विश्वस्त गुप्तचरों से सुनकर पुरोहित व बुद्धिमान् मन्त्री ने राजा से सविनय निवेदन किया। 4 उनके आने की बात जानकर राजा आनन्दित हुआ और उन्हें देखने की इच्छा से वह सब नागरिकों के साथ चल पड़ा, शीघ्रता में वह साधारण शिष्टाचार (=धैर्य) भी भूल गया? 5 उसने कुछ दूर पर उन्हें शिष्यों से घिरा देखा, जैसे ऋषियों के बीच ब्रह्मा बैठा हो; और महर्षि के धर्म के प्रति आदर-भाव होने के कारण वह रथ से उतर गया और पैदल ही उनके समीप गया। 6 मुनि को देखकर वह उनके समक्ष घबड़ा गया और कुछ बोल न सका; क्योंकि वह उन्हें न तो 'भिक्षु' कहकर ही पुकार सकता था और न 'पुत्र' कहकर ही। *7 जब उसने उनका भिक्षु-वेष देखा और अपने शरीर पर के विविध आभूषणों का ख्याल किया, तब उसकी साँसें तेजी से चलने लगीं, और आँसू बहाते हुए उसने अस्पुट वाणी में विलाप किया:- 8 "उन्हें अपने समीप शान्तिपूर्वक निर्विकार होकर बैठे देखकर मैं पीड़ा से वैसे ही अभिभूत हो रहा हूँ, जैसे प्यास से आकुल पथिक, जो दूरवर्ती जलाशय के समीप जाकर उसे सूखा पावे। 9 जब कि मैं उनके उसी रूप को देख रहा हूँ, जैसे कोई अपने उस प्रिय जन की चित्रित आकृति को देखे, जो अब भी मन में याद है, किन्तु जो आवागमन के अन्त में है, तो मुझे कुछ आनन्द नही हो रहा है जैसे (मुझे देखकर) इन्हें कुछ आनन्द नही हो रहा है।


⁷⁶. चीनी त्रिपिटक तथा तिब्बती कञ्जुर के अन्तर्गत "रत्नकूट" (अर्थात् रत्नराशि) में 49 सूत्र हैं, जिनमें एक है 'पिता-पुत्र समागम' अर्थात् पिता शुद्धोदन के साथ शाक्य-मुनि का मिलन। इस सूत्र के कुछ अंश "शिक्षा- समुच्चय" में पाये जाते हैं।

[बुद्धचरित 91]