बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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*54 यदि दुःख-सुख अकारण होता, तो प्रत्येक को दुःख-सुख का भाग नहीं मिलता, और कारण के बिना दुःख-सुख बोध-गम्य होता ही नहीं, इसलिए यह जो "कारण-रहित" कहा जाता है कारण नहीं है। *55 उसने जाना कि ये और ऐसे ही अदृश्य कारण सांसारिक प्रवृत्ति के कारण नहीं हैं। उसने देखा कि संसार कारण-रहित नहीं है और उसने कारण-रहित होने के ये दोष समझे। 56 विविध चराचर जीव भी विविध कारणों के आश्रय से उत्पन्न होते हैं, संसार में कुछ भी कारण- रहित नहीं है, तो भी संसार सार्वभौम कारण को नहीं जानता है। 57 यह सुन्दर दान पाकर, सुदत्त ने आर्यधर्मा महर्षि के सद्धर्म को समझा और श्रद्धा में अविचल चित्त हो उनसे ये वचन कहेः— 58 “मेरा निवास श्रावस्ती नगर में है, जो धर्म के लिए विख्यात है और जहाँ हर्यश्व-वंश का अङ्कुर शासन करता है। वहाँ मैं आपके लिए एक विहार बनाना चाहता हूँ; आप कृपा-पूर्वक उस अनवद्य एवं उत्तम निवास को स्वीकार करें। 59 हे ऋषि, आप राज-महल में रहें या निर्जन वन में—इस ओर से आप उदासीन हैं, यद्यपि मैं यह जानता हूँ, तो भी, हे अर्हत्, मेरे ऊपर करुणा करके आप इसे निवास के लिए स्वीकार करें।” 60 तब उन्होंने जाना कि वह देना चाहता है और उसका मन मुक्त है, अतः आशय जाननेवाले निर्मल-चित्त मुनि ने परम शान्तिपूर्वक अपना आशय कहाः— 61 “(यद्यपि) तुम बिजली की भाँति चञ्चल सम्पत्ति-राशि के बीच (रहते) हो (तो भी) तुम्हारा निश्चय दृढ़ है और तुम देने पर तुले हुए हो। तब इसमें आश्चर्य नहीं कि तुम सत्य को देखो, क्योंकि, धर्म में तुम्हें स्वभावतः आनन्द आता है और दान देने में प्रसन्नता होती है। 62 जलते हुए घर से जो चीजें निकाली जाती हैं वे जलती नहीं (बच जाती हैं), उसी प्रकार कालरूपी अग्नि से जलते हुए संसार में मनुष्य जो कुछ दान करता है वह उसे लाभ होता है। 63 इसलिए उदार हृदय पुरुष दान को असली (= सम्यक्) विषयोपभोग समझते हैं। किन्तु कृपण मनुष्य धन-क्षय का डर देखकर दान नहीं करते, इस डर से कि कहीं उपभोग के लिए उन्हें कुछ न बचे। 64 उचित समय पर सत्पात्र को धन देना वीरता व अभिमानपूर्वक युद्ध करने के समान है। जिस मनुष्य का निश्चय श्रेष्ठ है वह यह जानता है, किन्तु दूसरे नहीं, और केवल वही दान देता है और निश्चयपूर्वक युद्ध करता है। 65 क्योंकि जो दान देने में आनन्दित होता हुआ संसार-यात्रा करता है वह दाता है और दान-द्वारा यश एवं सुनाम प्राप्त करता है, अतः उसकी उदारता के लिए सज्जन उसका सम्मान करते हैं और उसकी सङ्गति करते हैं।
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66 इस तरह वह संसार में सुखी है और दीर्घ दुःख के अभाव से पाप में नहीं पड़ता। क्योंकि वह सत्कर्म करने का सच्चा दावा करता है, इसलिए वह सदा प्रसन्न रहता है और मरते समय भयभीत नहीं होता। 67 इस लोक में दान का फल कुछ फूल हो सकता है, किन्तु परलोक में वह (दानी) दान का पारितोषिक पाता है। संसार-चक्र में घूमनेवाले मनुष्य के लिए दान के समान दूसरा मित्र नहीं। 68 जो (दानी) मर्त्यलोक या स्वर्ग में जन्म लेते हैं, वे अपने दान के कारण बराबरीवालों से ऊँचा पद पाते हैं; जो लोग घोड़े या हाथी होकर उत्पन्न होते हैं, वे भी (घोड़े या हाथियों के) प्रधान होकर दान का फल पाते हैं। 69 दान द्वारा उसे स्वर्ग प्राप्त होता है, उपभोग उसे घेरे रहते हैं और शील उसकी रक्षा करता है। जो मनुष्य शान्त है और स्वयं समझ-बूझकर (= ज्ञानपूर्वक) चलता है, वह स्वतन्त्र (= निराश्रय) है और बहु-संख्यक मनुष्यों के मार्ग से नहीं जाता। 70 अमृत पाने के लिए भी वह उदारता का आचरण करता है और दान की बात सोचने में (= स्मृ) उसे आनन्द आता है; उस आनन्द के कारण अवश्य ही उसका चित्त एकाग्र हो जाता है। 71 मानसिक एकाग्रता की इस सफलता (= समुदय) से वह धीरे-धीरे जन्म व निरोध का ज्ञान प्राप्त करता है; क्योंकि दूसरों को दान देने से दाता के हृदय में रहनेवाले दोष क्षीण हो जाते हैं। 72 कहा जाता है कि दाता दान दी जानेवाली वस्तुओं से आसक्ति पहले ही अलग करता है; और क्योंकि वह सस्नेह चित्त से दान करता है, इसलिए वह क्रोध व अभिमान का परित्याग करता है। 73 जो दाता (दान) पानेवाले का आनन्द देखकर प्रसन्न होता है और इसलिए कृपण नहीं है और जो दान-फल का चिन्तन करता है, उसकी अश्रद्धा (= नास्तित्व) व अज्ञानरूपी अन्धकार (= तमस्) नष्ट हो जाते हैं। 74 इसलिए दान देना निर्वाण (-साधना) का एक अङ्ग है, क्योंकि इसके द्वारा वह लोभ जीता जाता है, अनार्य जिसका आश्रय लेते हैं और वह तृष्णा जीती जाती है, जिसके द्वारा दान देने की आदत नष्ट होती है; क्योंकि इस (दान देने की आदत) के होनेपर दोषों के विनाश से निर्वाण होता है। 75 जैसे कुछ लोग छाया के लिए पेड़ पसन्द करते हैं, कुछ लोग फल के लिए और कुछ लोग फूल के लिए, वैसे ही कुछ लोग शान्ति के लिए अपने को दान देने में लगाते हैं, तो दूसरे लोग सम्पत्ति के लिए।
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