बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें35 शाश्वत कारण होने से इसमें कुछ विशेषता (= विशेष) नही हो सकती, इसलिए इसके फल (=विकार) में भी कोई विशिष्ट गुण नहीं हो सकता; और क्योंकि फल में विशिष्ट गुण पाये जाते हैं, इसलिए स्वभाव से उत्पत्ति नही। 36 स्वभाव उत्पादात्मक है, इसलिए फल के सम्बन्ध में नाश होने का कोई कारण स्थापित नही होता है; और क्योंकि फल का विनाश हम देखते हैं, इसलिए हमें मानना होगा कि कारण कुछ और ही है। 37 (पुनर्जन्म करने की) शक्ति के साथ सम्पर्क रहने के कारण नैष्ठिक मोक्ष चाहनेवाले यतियों को कुछ प्राप्त नही होता है; क्योंकि मनुष्य के स्वभाव का गुण है प्रवृत्ति, इसलिए परलोक में जाने के अतिरिक्त ये यति मुक्त कैसे हो सकते हैं? 38 यदि स्वभाव की विशेषता है उत्पत्ति, तब इसके फलों की भी समान रूप से वही विशेषता होगी, किन्तु इस संसार में फलों के बारे में हमेशा यह बात नही होती है; इसलिए स्वभाव उत्पादक नहीं है। 39 कहते हैं कि स्वभाव का कार्य चित्त (?) के लिए व्यक्त नही है, तो भी इसके फल व्यक्त बताये जाते हैं। इसलिए स्वभाव प्रवृत्ति का कारण नही है; क्योंकि यह निश्चित है कि संसार में कोई (व्यक्त) फल उसी कारण से निकल सकता है, जो समान रूप से व्यक्त है। 40 अचेतन स्वभाव के परिणाम घोड़े, बैल, खच्चर आदि चेतन प्राणी नहीं हो सकते; क्योंकि अचेतन कारणों से कोई चेतन उत्पन्न नहीं हो सकता। 41 जैसे सुवर्ण-हार (सुवर्ण का) विशिष्ट रूप है, वैसे ही स्वभाव के फल (= विकार) विशिष्ट रूप हैं; और क्योंकि फल तो विशिष्ट रूप है जब कि कारण विशिष्ट रूप नही है, इसलिए स्वभाव को उत्पादनशक्ति नही है। 42 यदि काल (समय) को संसार का ईश्वर माना जाय, तो (मुक्ति की) खोज करनेवालों के लिए मुक्ति नहीं। क्योंकि संसार का कारण शाश्वत रूप से उत्पादक होगा, जिससे मनुष्यों का अन्त होगा ही नहीं। 43 ... ... ... *44-46 ... ... .... 73 [74] 47 यदि कार्य के विषय में मनुष्य (= पुरुष) कारण होता, तो अवश्य ही सब किसी को इच्छित वस्तु मिल जाती; तो भी इस जगत् में कुछ इच्छाएँ अपूर्ण ही रह जाती हैं और लोग विवश होकर वही पाते हैं जो वे नहीं चाहते। 48 यदि अपने वश की बात होती, तो मनुष्य स्वयं बैल, घोड़ा, खच्चर या ऊँट होकर उत्पन्न नही होता; क्योंकि, मनुष्य इच्छित काम करते हैं और दुःख से घृणा करते हैं, इसलिए कौन अपने ऊपर स्वयं दुःख लेता? 49 यदि संसार में मनुष्य कर्ता होता, तो निश्चय ही वह अपने लिए प्रिय करता, अप्रिय नहीं; तो भी इच्छाओं की पूर्ति करने में चाहा और अनचाहा (इष्ट और अनिष्ट) दोनों ही किये जाते हैं, और यदि वह ईश्वर होता, तो कौन (स्वयं) अनचाहा करता? *50 मनुष्य अधर्म से डरता है और धर्म (शुभ) प्राप्त करने के लिए यत्न करता है, तो भी विविध दोषों द्वारा वह विवश (बेचारा) पथभ्रष्ट किया जाता है; इसलिए इस विषय में मनुष्य परतन्त्र है। *51 मनुष्य स्वतन्त्र नही, किन्तु परतन्त्र है; क्योंकि हम देखते हैं कि सर्दी, गर्मी, वर्षा, वज्र व बिजली के परिणाम उसके उद्योगों को विफल करते रहते हैं। अतः मनुष्य कार्यों का ईश्वर नहीं है। 52 क्योंकि, मिट्टी व पानी के सहारे तथा उचित ऋतु के सम्पर्क (योग) से अन्न पैदा होता है, और अग्नि काठ से उत्पन्न होती है और घी पाकर प्रदीप्त होती है, इसलिए अस्तित्व को कारण-रहित कहना ऐसा कारण का अभाव नही है। 53 यदि सांसारिक प्रवृत्ति अकारण होती तो मनुष्यों द्वारा कुछ काम नहीं होता। सब किसी को सब कुछ मिल जाता और ध्रुव है कि इस संसार में सार्वभौम सिद्धि होती। 73- 44-46 तीनों श्लोक प्रक्षिप्त जान पड़ते हैं। इनमें तत्कालीन सांख्य मत का खण्डन किया गया है। 74- जॉन्स्टन ने इनका अंग्रेजी अनुवाद इस प्रकार दिया हैः- 43. Some see the determining principle as the selfness in the matters which is one and is made manifold by the attributes; though they take their stand on a single cause, yet it has separate characteristics. 44. The attribute-theorist sees in the variety of attributes the operation of matter, which is born from a certain maturation. Since the cause is held to be not different (from the effect), one must conclude that the matters are ineffective. 45. Certainly the unmanifested, from which matter arises, cannot be the subject of a valid inference; for by perception we do not see in fact the development of a result which is manifest from that which is unmanifest. 46. As for the result which first arises from the unmanifest and comes into activity from the pair of manifest, from it (sc. the unmanifest?) which is postulated arises in this world the great one which is not postulated, and there ensue the defects of the Nature-hypothesis. बुद्धचरित 89