भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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19 “हे भिक्षुओं, तुम सब दुःख के परे चले गए हो और अपना महान कार्य पूरा कर चुके हो। अब उनकी मदद करनी चाहिए, जो इस समय भी दुःखी है। 20 इसलिए तुम सब अकेला-अकेला इस पृथ्वी पर घूमो और लोगों के दुःख के प्रति दया-भाव से उन्हें धर्मोपदेश करो। 21 मैं स्वयं राजर्षियों की निवास-भूमि गया (= गय) की ओर काश्यप ऋषियों को विनीत करने के लिए जा रहा हूँ, जो अपनी सिद्धियों के कारण दिव्य शक्तियों से युक्त (= ऋद्धिमान्) हैं”। 22 तब उन (भिक्षुओं) ने, जिन्हें तत्त्व का दर्शन हो चुका था, उनकी आज्ञा से सब दिशाओं में प्रस्थान किया और द्वन्द्वों से मुक्त महर्षि सुगत गया की ओर गये। 23 तब क्रम से वह वहाँ पहुँचे और धर्म-वन (तपोवन?) के समीप जाकर उन्होंने कश्यप को मूर्त तप के समान वहाँ रहते देखा। 24 यद्यपि पर्वतों पर और उपवनों में रहने के स्थान थे, तो भी दशबल-धारी शास्ता ने उसे विनीत करने की इच्छा से उससे निवास-स्थान माँगा। 25, 26 ... ... ... ... ... ... $^{[65]}$ 27 तब सिद्ध को नष्ट करने के लिए बुरे आशय (= विषमस्थ) से उसने उन्हें अग्नि-शाला दी, जहाँ एक बड़ा साँप रहता था।$^{66}$ 28 रात को विषाक्त दृष्टिवाले साँप ने महामुनि को शान्त और निर्भय होकर वहाँ अपनी ओर देखते देखा और क्रोध से वह उनके ऊपर फुत्कार उठा। 29 उसके क्रोध से अग्नि-गृह में आग लग गई, किन्तु अग्नि ने मानो डर के मारे महामुनि के शरीर का स्पर्श नहीं किया। 30 जैसे महाकल्प के अन्त में अग्नि के शान्त होनेपर ब्रह्मा बैठा हुआ प्रदीप्त होता है, वैसे ही गौतम, अग्निशाला के सर्वथा प्रज्वलित होनेपर भी निर्भय (असंविग्न) रहे। 31 जब बुद्ध वहाँ बिना किसी हानि के निश्चल होकर बैठे रहे, तब साँप को विस्मय हुआ और उसने ऋषि-श्रेष्ठ को प्रणाम किया। 32 मुनि को वहाँ बैठा हुआ समझकर मृगदाव (तपोवन ?) के लोग अत्यन्त आर्त एवं दयाभिभूत हुए कि वैसा भिक्षु जल गया होगा। $^{65}$ - इनके फुटनोट में जॉन्स्टन ने लिखा हैः- There Seems to be a lacuna of uncertain length here, C giving a long account of the conversation. The line which W takes as the last of 26, I take to 24, understanding rub-tu-berten as pratiśraya. $^{66}$ - अग्नि-शाला = पानी गर्म करने का घर—बुद्धचर्या। 33 रात के बीतने पर विनायक ने अपने भिक्षा-पात्र में साँप को शान्तिपूर्वक ले लिया और काश्यप को दिखाया। 34 बुद्ध की शक्ति देखकर वह विस्मित हुआ, तो भी उसका विश्वास बना रहा कि शक्ति में उससे बढ़कर कोई नहीं। 35 तब उसका यह विचार जान, शान्त ऋषि ने समयासुकूल विविध रूप धारण कर उसके हृदय को पवित्र किया। 36 इसपर उसने ऋद्धि में बुद्ध को अपने से बड़ा माना और उसने उनका धर्म लाभ करने का निश्चय किया। 37 ओरुविल्व काश्यप का आकस्मिक हृदय-परिवर्तन देखकर उसके 500 अनुयायियों ने भी धर्म का आश्रय लिया। 38 जब गय (काश्यप) और नदी (काश्यप) का भाई (ओरुविल्व काश्यप) अपने शिष्यों सहित (दुःख के) पार चला गया और वल्कल वस्त्र फेंक चुका, तब वे दोनों (भाई) भी वहाँ पहुँचे और मार्ग पर आरूढ़ हुए। 39 तब गयशीर्ष पर्वत पर अनुयायियों सहित तीनों काश्यप भाईयों को ऋषि ने निर्वाण-धर्म का उपदेश दियाः- 40 “मोहरूपी धुएँ से ढ़की हुई तथा वितर्कों से पैदा होनेवाली राग-द्वेषरूपी अग्नि से सारा जगत् विवश होकर जल रहा है। 41 शान्ति एवं नेतृत्व के बिना इस तरह दोषों की अग्नि से जलता हुआ यह (जगत) जरा-मरण व रोग की अग्नियों से बार-बार निरन्तर उपभुक्त (नष्ट) हो रहा है। 42 इस जगत् का निराश्रय व विविध अग्नियों से दग्ध देखकर, बुद्धिमान् पुरुष को चित्त एवं इन्द्रियों से युक्त अपने शरीर पर संवेग होता है। 43 संवेग से उसे निष्कामता होती है और निष्कामता से मुक्ति, तब मुक्त होकर वह अपने को सब प्रकार से मुक्त हुआ जानता है। 44 भव-धारा का पूरा-पूरा परीक्षण कर, वह सन्यास ग्रहण करता है और अपना कार्य पूरा करता है; उसके लिए फिर जन्म नही”। 45 जब हज़ार भिक्षुओं ने भगवान् का यह उपदेश सुना, तब अनुपादान (उपदान के अभाव) के कारण उनके चित्त तुरन्त आस्रवों (मलों) से मुक्त हो गये। 46 तब अत्यन्त बुद्धिमान् (= महाप्रज्ञ) तीनों कश्यपों के साथ बुद्ध इस तरह शोभित हुए, जैसे धर्म का अवतार, दान, शील और विनय से घिरा हो। 47 तपोवन उन उत्तम ... से वञ्चित होकर निष्प्रभ हो गया, जैसे धन धर्म और आनन्द से रहित रोगी मनुष्य का जीवन फीका पड़ जाता है। बुद्धचरित 83