भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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48 तब मगध-राज के साथ अपनी पूर्व-प्रतिज्ञा याद कर, उन सबसे घिरे हुए ऋषि, राजगृह की ओर गये। 49 तब वेणुवन में तथागत का आगमन सुनकर, राजा अपने मन्त्रियों के साथ उन्हें देखने के लिए गया। 50 तब विस्मय से विकसित आँखोंवाली जनता, जीवन में अपनी अपनी स्थिति के अनुसार पैदल या सवारी पर पहाड़ी रास्ते से बाहर आई। 51 दूर से ही उत्तम ऋषि को देखकर, मगध-राज उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए शीघ्रतापूर्वक अपने रथ से उतर गया। 52 चँवर, व्यजन और परिजनों को पीछे छोड़, राजा ऋषि के पास गया, जैसे इन्द्र ब्रह्मा के पास जा रहा हो। 53 उसने सिर नवाकर महर्षि को प्रणाम किया, जिससे उसका मुकुट काँप उठा और उनकी अनुमति पाकर वह कोमल तृणों से आवृत पृथ्वी पर बैठ गया। 54 वहाँ लोगों के मन में हुआ— “अहो! शाक्य-ऋषि का प्रभाव! क्या ऋषि काश्यप भी उनके शिष्य हो गये"? 55 तब उनके मन (की बात) जानकर, बुद्ध ने काश्यप से कहा— “काश्यप कौन गुण देखकर तुमने अग्नि की पूजा छोड़ी"? 56 बलवान् बादल की-सी आवाज में जब गुरु ने उसे इस तरह उत्तेजित किया, तब हाथ जोड़कर भरी सभा में उसने जोरों से कहा:- 57 “अग्नि की पूजा करने का और उसमें आहुति देने का फल है संसार-चक्र में प्रवृत्ति एवं विविध मानसिक आधियों की सङ्गति; इसलिए मैंने अग्नि (-पूजा) छोड़ी। 58 विषयों की तृष्णा से, मन्त्रोच्चारण करने से और आहुति आदि देने से विषयों की तृष्णा दृढ़तर ही होती है; इसलिए मैंने अग्नि छोड़ी। 59 मन्त्रोच्चरण एवं अग्नि-आहुति द्वारा जन्म से मुक्ति नही होती और जन्म का दुःख महान् है; इसलिए मैंने अग्नि छोड़ी। 60 पूजा-कर्म और तप से श्रेय प्राप्त होता है, यह मिथ्या विश्वास है; इसलिए मैंने अग्नि छोड़ी। 61 मैं जन्म-मरण से मुक्त, सुखमय व अविनाशी (= अक्षर) पद को जानता हूँ; इसलिए मैंने अग्नि छोड़ी।” 62 विनीत (दीक्षित) हुए काश्यप का वैसा श्रद्धोत्पादक एवं तथ्यपूर्ण वचन सुनकर विनायक ने उसे कहा:- 63 “हे महाभाग, तुम्हारी विजय हो; तुमने विविध धर्मों में सबसे उत्तम धर्म प्राप्त किया, निस्सन्देह यह तुमने बड़ा अच्छा किया है। 64 जैसे महा-ऐश्वर्यशाली व्यक्ति अपने विविध कोषों का प्रदर्शन करता है वैसे ही अपनी विविध ऋद्धियाँ (दिव्य शक्तियाँ) दिखाकर सभा के लोगों के हृदय उत्तेजित करो”। 65 तब काश्यप ने कहा— “बहुत अच्छा” और अपने को अपने में ही सङ्कुचित कर पवन-पथ (आकाश) में पक्षी के समान उड़ गया। 66 वह ऋद्धि-विशारद आकाश में खड़ा रहा, जैसे वृक्ष के तने पर (खड़ा हो), इधर-उधर घूमा जैसे पृथ्वी पर (घूम रहा हो), बैठ गया जैसे शय्या पर (बैठा हो), और तब पड़ रहा। 67 कभी वह अग्नि के समान प्रज्वलित हुआ, कभी मेघ के समान पानी बरसाया, कभी एक ही साथ प्रज्वलित हुआ और पानी बरसाया। 68 जब चमकते हुए और पानी बरसाते हुए उसने लम्बे पग बढ़ाये, तब वह उस बादल के समान शोभित हुआ जो पानी बरसा रहा हो और चमकती बिजली से उज्ज्वल हो। 69 उसमें लगी हुई आँखों से लोगों ने उसे विस्मयपूर्वक देखा और उसे सम्मानपूर्वक प्रणाम करते हुए उन्होंने सिंह-गर्जन किये। 70 तब ऋद्धि-प्रदर्शन बन्द कर उसने शिर झुकाकर ऋषि को प्रणाम किया और कहा “मैं शिष्य हूँ, जिसने यह काम किया और मेरे गुरु (ये) भगवान् (बुद्ध) हैं”। 71 काश्यप, महर्षि को इस प्रकार प्रणाम कर रहा है, यह देखकर मगध-निवासियों ने निश्चय किया कि सुगत ही सर्वज्ञ हैं। 72 तब श्रेय में रमनेवाले उन (सुगत) ने भूमि को तैयार समझा और धर्म को सुनने के लिए इच्छुक श्रेण्य (बिम्बसार) से उसके हित के लिए कहा— 73 “हे पृथ्वीपति, हे जितेन्द्रिय महात्मन्, चित्त और इन्द्रियों के साथ रूप का उदय और अस्त (= व्यय) होता है। 74 धर्म-वृद्धि के लिए उनका उदय और व्यय ठीक ठीक जानना चाहिए और इन दो बातों को ठीक ठीक जानकर शरीर को ठीक ठीक समझो। 75 शरीर को उदय और व्यय के अधीन जान लेने से उपादान बिलकुल नही रहता और “मैं” या “मेरा” का भाव नही होता। 76 मानसिक कल्पनाओं के बाहर शरीर और इन्द्रियों की वास्तविकता नही है; दुःख होकर वे उदय होते हैं, दुःख होकर वे अस्त होते हैं। 77 यह सब “मैं” या “मेरा” नही है, ऐसा समझने पर परम अविनाशी निर्वाण प्राप्त होता है। 78 “मैं” आदि का अस्तित्व मानने के दोषों से मनुष्य मिथ्या आत्म-वाद में बँध जाते हैं और “आत्मा नही है” यह देखने पर वे कामनाओं से मुक्त होते हैं। 79 मिथ्या दृष्टि बाँधती है, सम्यक् दृष्टि मुक्त करती है। “आत्मा है” इस विचार में रहनेवाला यह जगत् सत्य को ग्रहण नही करता। 84 अश्वघोष