भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 122 में से

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पृष्ठ 85

80 यदि आत्मा रहती, तो यह नित्य या अनित्य होती; दोनों (मतों) में ही बड़े-बड़े दोष हैं। 81 यदि इसे अनित्य माना जाय, तो कर्म-फल नहीं होगा; और पुनर्जन्म नहीं होने से निर्वाण हमें अनायास ही प्राप्त होगा। 82 यदि यह नित्य और सर्व-व्यापी रहती, तो न जन्म होता न मरण; क्योंकि सर्वव्यापी और नित्य शून्य का न उदय है न व्यय। 83 यदि ये आत्मा स्वभाव से सर्वव्यापी रहती तो कोई स्थान नहीं जहाँ यह नहीं होती; और इसका अस्त होनेपर सबको साथ ही निर्वाण प्राप्त होता। 84 स्वभाव से सर्वव्यापी होने के कारण यह कर्मशील नहीं होती और कर्म नहीं किया जाता; और कर्म नहीं करने से फल के साथ उन (कर्मों) का संयोग कैसे होता? 85 यदि आत्मा कर्म करती तो यह अपने को दुःख नहीं देती; क्योंकि अपना स्वामी आप होकर कौन अपने को दुःख देगा? 86 आत्मा को नित्य मानने से इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यह परिवर्तनशील नहीं; किन्तु क्योंकि यह दुःख-सुख अनुभव करती है, अतः हम देखते हैं कि इसमें परिवर्तन होता है। 87 ज्ञान-प्राप्ति और दोष-परित्याग से निर्वाण होता है; और क्योंकि आत्मा अकर्मशील एवं सर्वव्यापी है; इसलिए इसे निर्वाण प्राप्त नहीं होगा। 88 यह नहीं कहना चाहिए कि आत्मा है, क्योंकि वास्तव में इसका अस्तित्व नहीं है। 89 करणीय कार्य क्या है और कौन इसे करता है— यह स्पष्ट नहीं है, अतः आत्मा इस प्रकार (नित्य या अनित्य होकर) रहती है, ऐसा नहीं कह सकते; और इसलिए इसका अस्तित्व नहीं। 90 हे उत्तम श्रोता, इस उपदेश को सुनो कि भव-धारा इस शरीर को—जिसमें न करनेवाला है, न वेदना अनुभव करनेवाला (= वेदक), और न आदेश देनेवाला—धारण करती हुई कैसे बह रही है। 91 छः इन्द्रियों और उनके छः विषयों के आधार पर छः प्रकार की चेतना (सञ्ज्ञा, Consciousness) उत्पन्न होती है; और प्रत्येक तीन के लिए अलग-अलग स्पर्श उत्पन्न होता है; जहाँ से स्मृति इच्छा व कर्म प्रवृत्त होते हैं। 92 जैसे सूर्यकान्त-मणि जलावन और सूर्य का संयोग होने के कारण अग्नि उत्पन्न होती है, वैसे ही व्यक्ति पर अवलम्बित सब कर्म भी बुद्धि (Consciousness), इन्द्रियों और विषयों के आधार पर होते हैं। 93 जैसे बीज से अङ्कुर पैदा होता है और तो भी अङ्कुर का तादात्म्य बीज से नहीं होता और दो में से कोई एक दूसरे के बिना नहीं रह सकता, वैसे ही शरीर इन्द्रियों और चेतना का पारस्परिक सम्बन्ध है।”


94 जब मगध-राज ने मुनि-वर का परमार्थपूर्ण नैष्ठिक उपदेश सुना, तब उसमें निर्मल विरज एवं अद्वितीय धर्म-चक्षु उत्पन्न हुआ। 95 मुनि का उपदेश सुनकर मगध की राजधानी में रहनेवाले बहुत-से लोग तथा स्वर्ग के निवासी देवगण भी उस सभा में विशुद्धचित्त होकर अक्षर व अमर पद को प्राप्त हुए ॥ ॥ अश्वघोष-कृत-बुद्धचरित महाकाव्य का “अनेक शिष्य” नामक 16वाँ सर्ग समाप्त ॥ सत्रहवाँ सर्ग महाशिष्यों की प्रव्रज्या 1 तब (मगध के) राजा ने मुनि के रहने के लिए उज्ज्वल वेणुवन भेंट किया, और उनकी अनुमति से नगर को लौट गया; तत्त्व को समझकर वह बिल्कुल ही बदल गया था। 2 तब ज्ञान से उत्पन्न शुभ प्रदीप को निर्वाण के लिए धारण करते हुए बुद्ध, ब्रह्मा देवों और विविध लोकों के आर्यों के साथ, विहार में रहने लगे। 3 तब अश्वजित्, जिसने इन्द्रियरूपी घोड़ों का दमन कर लिया था, भिक्षा की खोज में राजगृह आया और अपने सौन्दर्य शान्ति एवं आकृति से (लोगों की) एक बड़ी भीड़ की आँखें आकृष्ट कीं। 4 कपिल सम्प्रदाय के बहुत शिष्योंवाले शारद्वतीपुत्र नामक सन्न्यासी ने उस शान्तेन्द्रिय को आते देखा और सड़क पर उसका अनुसरण करते हुए उसे यों कहाः— 5 “आपकी अभिनव आकृति एवं शान्ति देखकर मेरा चित्त अत्यन्त विस्मित है। यदि आप तत्त्व को जानते हों तो कहिए; आपके शिक्षक का क्या नाम है, वह क्या सिखाते हैं और वह कौन हैं?” 6 तब ब्राह्मण ने इस तरह सम्मानपूर्वक पूछा, तब अश्वजित् ने भी उसे कहाः—“मेरे गुरु इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए थे, वे सर्वज्ञ एवं अद्वितीय हैं। 7 मैं अज्ञानी हूँ और हाल में ही धर्म की शरण आया हूँ, अतः आपको (बुद्ध की) शिक्षा बताने में असमर्थ हूँ। तो भी वक्ताश्रेष्ठ महामुनि के वचनों का थोड़ा-सा ही अंश सुनिये। 8 “भगवान् ने कारणों से होनेवाले सब पदार्थों (= धर्मों) की व्याख्या की है। उन्होंने निरोध और निरोध-मार्ग की व्याख्या की है।” 9 अश्वजित् के ये शब्द सुनते ही उपतिष्य (शारद्वतीपुत्र) नामक द्विज की आँखें धर्म में खुल गईं और निर्मल सुखमय व पवित्र हो गईं। 10 पहले उसका मत था कि क्षेत्रज्ञ, अकृत अकर्मशील और ईश्वर है; सब चीजें कारणों के आश्रय से होती हैं—यह सुनकर उसने जाना कि आत्मा नहीं है और उसने तत्त्व को देखा। बुद्धचरित 85

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