बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
पृष्ठ 86, कुल 122 में से
संदर्भ में पढ़ें11 उसने समझा था कि सांख्य के अनुसार शरीर अवयवों का बना होता है और इसलिए स्थूल दोषों का ही नाश होता हैः किन्तु बुद्ध की शिक्षा के अनुसार स्थूल एवं सूक्ष्म (दोषों) का समान रूप से नाश होता है। 12 आत्मवाद मानने पर अहंवाद का परित्याग नही होता और इसलिए "अहं" रहता है। जब प्रदीप एवं सूर्य दोनों रहें, तब प्रकाश-विनाश का कारण (भला) क्या हो सकता है? 13-14 जैसे कमल के मूल काटने पर सूक्ष्म तन्तु एक दूसरे से उलझे रहते हैं वैसे ही उसने सांख्य-मार्ग को नैष्ठिक नही समझा, जब कि बुद्ध-मार्ग पत्थर काटने के समान है (पत्थर काटने से टुकड़े अलग अलग हो जाते हैं, एक दूसरे से लगे नही रहते हैं)। 15 तब ब्राह्मण ने अश्वजित् को प्रणाम किया और स्वयं अत्यन्त सन्तुष्ट होकर घर के लिए प्रस्थान किया, और क्रम से अपना भिक्षाटन पूरा करके गम्भीरता एवं बुद्धिमत्तापूर्वक वेणुवन की ओर चला। 16 उपतिष्य को इस तरह परम प्रसन्न होकर लौटते देखकर मौद्गल्यायन ने, जिसके कर्म उसकी विद्या एवं ज्ञान के अनुरूप थे, उससे कहाः- 17 "हे सन्न्यासिन्, (स्वयं) वही होते हुए आप दूसरे-जैसे क्यों हो गए? आप धीर और प्रसन्न होकर लौटै हैं? क्या आज आपने अमर-पद (अमृत) पा लिया है? यह ऐसी शान्ति अकारण नही।" 18 तब उसे तत्त्व बताते हुए उसने कहा "यह ऐसे होता है।" तब उसने कहा "मुझे शास्त्र कहिये।" इसपर उसने वे ही वचन उससे फिर कहे। उन्हें सुनकर उसमें भी सम्यक् दृष्टि उत्पन्न हुई। 19 कर्मों और आशयों (?) से उनके चित्त पवित्र हो जाने के कारण उन्होंने तत्त्व को हाथ में रखे दीप के समान देखा, और इसे जानने के कारण गुरु के प्रति उनके भाव अविचल थे, अतः उसी क्षण वे उन्हें देखने के लिए चले। 20 शिष्यों के साथ आते उन दोनों को दूर से ही देखकर महामुनि भगवान् ने भिक्षुओं से कहाः- "यहाँ आ रहे ये दोनों मेरे प्रधान शिष्य हैं, उनमें से एक ज्ञानी है और दूसरा दिव्य शक्तिवाला।" 21 तब शान्त ऋषि ने गम्भीर स्वर में उन दोनों से कहाः-"शान्ति के लिए यहाँ आये हुए भिक्षुओं, इस धर्म को ठीक-ठीक उचित रीति से ग्रहण करो।" 22 ज्यों ही तथागत ने ये वचन उनसे कहे कि त्रिदण्डी और जटाधारी ब्राह्मण बुद्ध के प्रभाव से काषायधारी भिक्षु बन गये। 23 इस तरह (काषाय) वस्त्र-युक्त होकर उन दोनों ने अपने शिष्यों के साथ शिर नवाकर सर्वज्ञ को प्रणाम किया। तब बुद्ध ने उन्हें धर्मोपदेश किया और वे दोनों काल-क्रम से नैष्ठिक-पद पर पहुँचे। 24 तब काश्यप-कुल के प्रदीप-स्वरूप एक ब्राह्मण ने, जो वर्ण रूप व धन से युक्त था, अपनी सम्पत्ति एवं सुन्दरी पत्नि का परित्याग किया, और वह काषाय वस्त्र पहनकर निर्वाण की खोज में चला। 25 उस सर्वस्व-त्यागी ने ब्रह्मपुत्रक चैत्य के समीप उत्तम सोने के बने पवित्र पताका-दण्ड के समान चमकते सर्वज्ञ को देखा; और विस्मित हो, हाथ जोड़े, उनके समीप गया। 26 उसने दूर से ही शिर नवाकर मुनि को प्रणाम किया, और हाथ जोड़कर उचित रीति से ऊँची आवाज में कहा-"मैं शिष्य हूँ, भगवान मेरे गुरु हैं, हे धीर, अन्धकार में मेरा प्रकाश बनिये।" 27 "(ज्ञान की) चाह उत्पन्न होने के कारण यह द्विज आया है, यह विशुद्धाशय एवं निर्वाण का इच्छुक है," ऐसा जानकर वाणी रूपी जल से चित्त को शान्त करनेवाले तथागत ने उसे कहा- "स्वागत।" 28 इन अक्षरों से उसकी थकावट मानो चली गई; नैष्ठिक पद की खोज करने के लिए वह यहाँ रहने लगा। उसका स्वभाव शुद्ध था, इसलिए मुनि ने उसके ऊपर कृपा की और सङ्क्षेप में उसके लिए धर्म की व्याख्या की। 29 मुनि ने सङ्क्षेप में ही धर्म की व्याख्या की और उसने अभिप्राय बिलकुल समझ लिया, अतः अपनी बुद्धि एवं विख्याति के कारण वह 'अर्हत् महाकाश्यप' कहलाया। 30 उसने पहले समझा था कि आत्मा 'मैं' और 'मेरा' दोनों ही है, और शरीर से भिन्न होते हुए भी शरीर में है। अब उसने आत्म-दृष्टि का परित्याग किया और इसे शाश्वत (नित्य) दुःख समझा। 31 उसने पहले शील-व्रत द्वारा पवित्रता पाना चाहा था और जो कारण नही, उसे कारण समझा था; अब उसने दुःख का स्वभाव समझा और वह मार्ग पर आया, और शील-व्रत को श्रेष्ठ मार्ग नही माना। ⁶⁷ 32 वह कुमार्ग पर भटका था और श्रेष्ठ मार्ग नही पा सका था; अब उसने चार सत्यों का क्रम देखा और संशय-शङ्काओं को सर्वथा काट डाला। 33 उन काम-वासनाओं की-जिनके बारे में संसार ने मूढ़ता (मोह) की है, करता है और करेगा- अपवित्रता एवं असारता देखकर, उसने कामनामक इन्द्रिय-विषयों को छोड़ा। 34 मानसिक मैत्री प्राप्तकर उसने मित्र और शत्रु में भेद नही किया और सब जीवों पर दया करता हुआ वह मन के भीतरी द्वेष (=व्यापाद) से भी मुक्त हो गया। 35 रूप और इसके प्रतिघातों पर आश्रित विविध सञ्ज्ञाओं को उसने छोड़ा और रूप में रहनेवाली बुराईयों को समझा; इसलिए उसने रूप-धातु की आसक्ति को जीता।
⁶⁷- शीलव्रत = क्रिया-कर्म, बाहरी आचार। 86 अश्वघोष