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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

11 उसने समझा था कि सांख्य के अनुसार शरीर अवयवों का बना होता है और इसलिए स्थूल दोषों का ही नाश होता हैः किन्तु बुद्ध की शिक्षा के अनुसार स्थूल एवं सूक्ष्म (दोषों) का समान रूप से नाश होता है। 12 आत्मवाद मानने पर अहंवाद का परित्याग नही होता और इसलिए "अहं" रहता है। जब प्रदीप एवं सूर्य दोनों रहें, तब प्रकाश-विनाश का कारण (भला) क्या हो सकता है? 13-14 जैसे कमल के मूल काटने पर सूक्ष्म तन्तु एक दूसरे से उलझे रहते हैं वैसे ही उसने सांख्य-मार्ग को नैष्ठिक नही समझा, जब कि बुद्ध-मार्ग पत्थर काटने के समान है (पत्थर काटने से टुकड़े अलग अलग हो जाते हैं, एक दूसरे से लगे नही रहते हैं)। 15 तब ब्राह्मण ने अश्वजित् को प्रणाम किया और स्वयं अत्यन्त सन्तुष्ट होकर घर के लिए प्रस्थान किया, और क्रम से अपना भिक्षाटन पूरा करके गम्भीरता एवं बुद्धिमत्तापूर्वक वेणुवन की ओर चला। 16 उपतिष्य को इस तरह परम प्रसन्न होकर लौटते देखकर मौद्गल्यायन ने, जिसके कर्म उसकी विद्या एवं ज्ञान के अनुरूप थे, उससे कहाः- 17 "हे सन्न्यासिन्, (स्वयं) वही होते हुए आप दूसरे-जैसे क्यों हो गए? आप धीर और प्रसन्न होकर लौटै हैं? क्या आज आपने अमर-पद (अमृत) पा लिया है? यह ऐसी शान्ति अकारण नही।" 18 तब उसे तत्त्व बताते हुए उसने कहा "यह ऐसे होता है।" तब उसने कहा "मुझे शास्त्र कहिये।" इसपर उसने वे ही वचन उससे फिर कहे। उन्हें सुनकर उसमें भी सम्यक् दृष्टि उत्पन्न हुई। 19 कर्मों और आशयों (?) से उनके चित्त पवित्र हो जाने के कारण उन्होंने तत्त्व को हाथ में रखे दीप के समान देखा, और इसे जानने के कारण गुरु के प्रति उनके भाव अविचल थे, अतः उसी क्षण वे उन्हें देखने के लिए चले। 20 शिष्यों के साथ आते उन दोनों को दूर से ही देखकर महामुनि भगवान् ने भिक्षुओं से कहाः- "यहाँ आ रहे ये दोनों मेरे प्रधान शिष्य हैं, उनमें से एक ज्ञानी है और दूसरा दिव्य शक्तिवाला।" 21 तब शान्त ऋषि ने गम्भीर स्वर में उन दोनों से कहाः-"शान्ति के लिए यहाँ आये हुए भिक्षुओं, इस धर्म को ठीक-ठीक उचित रीति से ग्रहण करो।" 22 ज्यों ही तथागत ने ये वचन उनसे कहे कि त्रिदण्डी और जटाधारी ब्राह्मण बुद्ध के प्रभाव से काषायधारी भिक्षु बन गये। 23 इस तरह (काषाय) वस्त्र-युक्त होकर उन दोनों ने अपने शिष्यों के साथ शिर नवाकर सर्वज्ञ को प्रणाम किया। तब बुद्ध ने उन्हें धर्मोपदेश किया और वे दोनों काल-क्रम से नैष्ठिक-पद पर पहुँचे। 24 तब काश्यप-कुल के प्रदीप-स्वरूप एक ब्राह्मण ने, जो वर्ण रूप व धन से युक्त था, अपनी सम्पत्ति एवं सुन्दरी पत्नि का परित्याग किया, और वह काषाय वस्त्र पहनकर निर्वाण की खोज में चला। 25 उस सर्वस्व-त्यागी ने ब्रह्मपुत्रक चैत्य के समीप उत्तम सोने के बने पवित्र पताका-दण्ड के समान चमकते सर्वज्ञ को देखा; और विस्मित हो, हाथ जोड़े, उनके समीप गया। 26 उसने दूर से ही शिर नवाकर मुनि को प्रणाम किया, और हाथ जोड़कर उचित रीति से ऊँची आवाज में कहा-"मैं शिष्य हूँ, भगवान मेरे गुरु हैं, हे धीर, अन्धकार में मेरा प्रकाश बनिये।" 27 "(ज्ञान की) चाह उत्पन्न होने के कारण यह द्विज आया है, यह विशुद्धाशय एवं निर्वाण का इच्छुक है," ऐसा जानकर वाणी रूपी जल से चित्त को शान्त करनेवाले तथागत ने उसे कहा- "स्वागत।" 28 इन अक्षरों से उसकी थकावट मानो चली गई; नैष्ठिक पद की खोज करने के लिए वह यहाँ रहने लगा। उसका स्वभाव शुद्ध था, इसलिए मुनि ने उसके ऊपर कृपा की और सङ्क्षेप में उसके लिए धर्म की व्याख्या की। 29 मुनि ने सङ्क्षेप में ही धर्म की व्याख्या की और उसने अभिप्राय बिलकुल समझ लिया, अतः अपनी बुद्धि एवं विख्याति के कारण वह 'अर्हत् महाकाश्यप' कहलाया। 30 उसने पहले समझा था कि आत्मा 'मैं' और 'मेरा' दोनों ही है, और शरीर से भिन्न होते हुए भी शरीर में है। अब उसने आत्म-दृष्टि का परित्याग किया और इसे शाश्वत (नित्य) दुःख समझा। 31 उसने पहले शील-व्रत द्वारा पवित्रता पाना चाहा था और जो कारण नही, उसे कारण समझा था; अब उसने दुःख का स्वभाव समझा और वह मार्ग पर आया, और शील-व्रत को श्रेष्ठ मार्ग नही माना। ⁶⁷ 32 वह कुमार्ग पर भटका था और श्रेष्ठ मार्ग नही पा सका था; अब उसने चार सत्यों का क्रम देखा और संशय-शङ्काओं को सर्वथा काट डाला। 33 उन काम-वासनाओं की-जिनके बारे में संसार ने मूढ़ता (मोह) की है, करता है और करेगा- अपवित्रता एवं असारता देखकर, उसने कामनामक इन्द्रिय-विषयों को छोड़ा। 34 मानसिक मैत्री प्राप्तकर उसने मित्र और शत्रु में भेद नही किया और सब जीवों पर दया करता हुआ वह मन के भीतरी द्वेष (=व्यापाद) से भी मुक्त हो गया। 35 रूप और इसके प्रतिघातों पर आश्रित विविध सञ्ज्ञाओं को उसने छोड़ा और रूप में रहनेवाली बुराईयों को समझा; इसलिए उसने रूप-धातु की आसक्ति को जीता।

⁶⁷- शीलव्रत = क्रिया-कर्म, बाहरी आचार। 86 अश्वघोष

36 उसने पहचाना कि अरूप देवों की, जो मोहवश ध्यान को ही निर्वाण समझते हैं, अवस्था अनित्य है; शान्त होकर उसने निमित्त शून्य चित्त प्राप्त किया और अरूप-भव की आसक्ति छोड़ी। 37 उसने अनुभव किया कि महानदी (= सिन्धु) की बलवती धारा के समान बहते हुए चित्त की चञ्चलता विघ्न का मूल है; वीर्य के सहारे आलस्य छोड़कर उसने शान्ति प्राप्त की और वह पूर्ण (निर्मल ?) सरोवर के समान निश्चल हो गया। 38 उसने जीवन को असार अनात्म और नाशवान् (= व्ययधर्मा) देखा; किसी को छोटा-बड़ा या बराबर नहीं देखते हुए उसने मिथ्याभिमान छोड़ा;..। 39 ज्ञानरूपी अग्नि से अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर कर, उसने नित्य और अनित्य को (एक दूसरे से) भिन्न देखा और योग द्वारा अपनी विद्या को पूर्णकर, उसने अविद्या को अच्छी तरह काट डाला। 40 दृष्टि एवं भावना से युक्त होकर, वह दश (संयोजनों, बन्धनों) से मुक्त हुआ और अपना कार्य पूरा कर, वह शान्तिमय, हाथ जोड़े, बुद्ध को देखता खड़ा रहा। 41 अपने 3 शिष्यों के साथ-जो 3 विद्याओं के ज्ञाता (= त्रैविद्य) थे, जिन्होंने 3 (आस्रवों) को क्षीणकर दिया था, और जिन्होंने 3 (शील समाधि प्रज्ञा) को भलीभाँति प्राप्तकर लिया था- सुगत (तीसरे पर्व के) पूर्ण चन्द्रमा के समान शोभित हुए, जो 15वें मुहूर्त में 3 ताराओंवाले उस (ज्येष्ठा) नक्षत्र से युक्त हो, जिसका अधिपति (= अधिदेव) अनुजदेव (इन्द्र) है।⁶⁸ ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “महाशिष्यों की प्रव्रज्या” नामक 17वाँ सर्ग समाप्त ॥ अठारहवाँ सर्ग अनाथपिण्डद की दीक्षा 1 तब एक बार उत्तर की ओर से कोशल देश से एक धनी गृहपति आया। उसे गरीबों को धन देने की आदत थी। उसका प्रसिद्ध नाम सुदत्त था। 2 उसने सुना “ऋषि यहीं रहते हैं” और यह सुनकर उसने उन्हें देखना चाहा और रात में उनके समीप गया। उसने सुगत को प्रणाम किया। वह विशुद्धस्वभाव होकर आया है, यह जानकर उन्होंने उसे उपदेश दिया:- 3 “हे मनीषी, धर्म की प्यास से नींद छोड़कर रात में तुम मेरा दर्शन करने आये हो, इसलिए इस प्रकार आये हुए मनुष्य (= तथागत) के लिए नैष्ठिक-पद का प्रदीप ऊपर उठाया जाय। 4 (तुममें-) ये जो सद्गुण दिखाई पड़ते हैं इसका कारण है तुम्हारा (शुद्ध) आशय, तुम्हारा धैर्य, मेरे विषय में सुनकर (उत्पन्न) हुई तुम्हारी श्रद्धा और पूर्व-निमित्त द्वारा (शुद्ध) हुई तुम्हारी चित्त- वृत्ति। 5 जो उत्तम (वस्तु) है उसे दान करने से इस लोक में यश होता है और परलोक में फल, यह जानकर तुम्हें धर्म से प्राप्त होनेवाला कोष उचित समय पर भक्तिपूर्ण चित्त से सम्मानपूर्वक दान करना चाहिए। 6 शील ग्रहण कर अपना आचरण ठीक करो; क्योंकि शील का पालन एवं सम्मान करने से अधम अधःलोकों का भय जाता रहता और मनुष्य को ऊपर के स्वर्गों की प्राप्ति अवश्य होती है। 7 कामासक्तियों में होनेवाले अन्वेषण आदि के दुष्परिणामों को देखते हुए और त्याग-मार्ग के सुपरिणामों का अनुभव करते हुए, विवेक से उत्पन्न होनेवाली सच्ची शान्ति में लगो। 8 मौत व बुढ़ापे की पीड़ा के रहते संसार भटक रहा है, यह ठीक-ठीक देखकर जन्म-मुक्त शान्ति के लिए यत्न करो और जन्म के अधीन नही होने से वह (शान्ति) बुढ़ापे व मौत से (भी) रहित है।⁶⁹ 9 जैसे यह जानते हो कि अनित्यता के कारण लोगों को हरदम दुःख होता है, वैसे ही जानो के देवताओं को (भी) वही दुःख है। प्रवृत्ति में कुछ भी नित्यता नही है। 10 जहाँ अनित्यता है वहाँ दुःख है; ..... । तब जो (धातु अर्थात् धातुओं से बना शरीर) अनित्य दुःखमय एवं अनात्म है, उसमें 'मैं' या 'मेरा' कैसे हो सकता है? ⁷⁰ 11 इसलिए इस दुःख को दुःख, इसकी उत्पत्ति (= समुदय) को उत्पत्ति, दुःख निरोध को निरोध (= व्युपशम) और शुभ मार्ग को मार्ग समझो। 12 इस जगत् को दुःखमय एवं अनित्य जानो और मानव जाति को, कालरूपी आग से, जैसे असली आग से, बिलकुल दग्ध देखकर, तुम अस्तित्व एवं विनाश को समान रूप से अवांछनीय समझो। 13 इस जगत् को शून्य, 'मैं' या 'मेरा' से रहित, माया सदृश्य जानो और इस शरीर को संस्कारों (उत्पादकों, वस्तुओं) का परिणाम-मात्र विचारते हुए, इसे केवल तत्त्वों (= धातुओं) का बना हुआ समझो।

⁶⁸- काम-आस्रव, भव-आस्रव और अविद्या-आस्रव। ⁶⁹- जन्म-मुक्त शान्ति = वह शान्ति जिसकी प्राप्ति होनेपर फिर जन्म नही होता है। “न जायते शान्तिमवाप्य भूयः”—सौन्दरनन्द, सोलह 5। ⁷⁰- धातु के लिए देखिये—सौन्दरनन्द, सोलह 47-48। बुद्धचरित 87

14 अनित्य जीवन से अपने मन को मुक्त करो और संसार में विविध योनियों को देखते हुए, भावना-द्वारा अपने चित्त को वितर्क-रहित शान्ति-परायण और राग-मुक्त (= विराग, विरज) करो। तब ‘अनिमित्त' का अभ्यास करो।” ⁷¹ 15 तब महर्षि का धर्म सुनकर उसने धर्माचरण का प्रथम फल पाया; और इसकी प्राप्ति होने से दुःखरूपी महासागर में से केवल एक बूँद उसके लिए रह गई। 16 गृहस्थ होते हुए भी उसने ज्ञान द्वारा श्रेय और तत्त्व (वास्तविक सत्य) का अनुभव किया जो अज्ञानी के लिए (सुलभ) नहीं है, चाहे वह तपोवन में हो या स्वर्ग में, चाहे वह तृष्णा-रहित मनुष्यों के झुण्ड (= वितृष्ण वन) में रहता हो या अरूप लोक के शिखर पर। 17 विविध मिथ्या दृष्टियों के जाल से तथा संसार के दुःखों से मुक्त नहीं होने के कारण वे अतत्त्वदर्शी नष्ट होते हैं और केवल रागरहित होनेवाले ही विशेष पद पर पहुँचते हैं। 18 अपने में सम्यक् दृष्टि उत्पन्न होनेपर उसने कुदृष्टियों का वैसे ही त्याग किया जैसे शरद् ऋतु का मेघ पत्थरों की झड़ी लगावे और ईश्वर आदि मिथ्या कारणों से संसार उत्पन्न होता है या यह (संसार) कारण-रहित है, ऐसा उसने नहीं माना। ⁷² *19 क्योंकि यदि (परिणाम से) कारण भिन्न प्रकार का है, तब उत्पत्ति (= उपपत्ति) नहीं हो सकती; और कारण नहीं है, (ऐसा मानना) भारी भूल है। इन बातों को विद्या (= श्रुत) एवं ज्ञान द्वारा क्रमशः जानकर वह तत्त्व का दर्शन करने में अवश्य ही संशय-रहित था। 20 यदि ईश्वर संसार को पैदा करता तो, इसमें व्यवस्थित कार्य पद्धति नहीं होती और लोग भव- चक्र में नहीं भटकते; जिस किसी योनि में जो जन्म लेता वह वहीं रहता। 21 देहधारी प्राणियों को अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं होता और न उसके लिए इच्छित वस्तु की ही उत्पत्ति होती है। जो कुछ भला-बुरा (= शुभाशुभ ?) देह-धारियों को होता वह ईश्वर होने के कारण ईश्वर में (भी) होता। 22 लोगों को ईश्वर के प्रति कुछ सन्देह नहीं होता और वे उसके प्रति पिता की तरह स्नेह अनुभव करते। अपने ऊपर विपत्ति आनेपर वे उसे बुरी बातें नहीं कहते, और संसार भाँति-भाँति के देवताओं की पूजा नहीं करता। 23 यदि उसकी सृष्टि में कोई सङ्कल्प (अभिप्राय) है, तो वह आज यहाँ ईश्वर नहीं; क्योंकि (तब) यह (सृष्टि) सङ्कल्प का परिणाम होता (ईश्वर का नहीं)। यदि सङ्कल्प की निरन्तर कार्यशीलता मानी जाय, तो वही (सङ्कल्प) ईश्वर होने का कारण होगा। 24 या यदि यह सृष्टि किसी सङ्कल्प से प्रवृत्त नहीं होती है, तो उस (ईश्वर) के काम बच्चे के-से कारण-रहित हैं और यदि ईश्वर को अपने पर अधिकार नहीं, तो उसे संसार पैदा करने की ही क्या शक्ति? 25 यदि वह स्वेच्छानुसार लोगों से दुःख-सुख अनुभव कराता है, तब किसी वस्तु में आसक्ति या उससे विमुखता उस (ईश्वर) को होती है और इसलिए अधिकार उसमें नहीं (बल्कि वस्तु में) रहता है। 26 लोग विवश होकर उसके अधीन होते और कार्यों का उत्तरदायित्व उसी पर होता। देहधारी के द्वारा कुछ भी नहीं किया जाता और कर्म-फल होता ही नहीं। कार्य के साथ सम्पर्क (= कर्मयोग) उस (ईश्वर) पर निर्भर करता। 27 यदि अपने कार्यों के कारण वह ईश्वर है, तब (क्योंकि उसके कार्यों में लोगों का भी भाग है, इसलिए) वह ईश्वर नहीं हो सकता। या यदि वह सर्वव्यापी (= विभु) एवं कारण-रहित है, तब समस्त जगत का ईश्वरत्व स्थापित होता। 28 या यदि ईश्वर के कार्य के अतिरिक्त कोई दूसरा कार्य है, तब इसी कारण उसके अतिरिक्त कोई दूसरा शक्तिशाली ईश्वर होगा। और यह निश्चित (= व्यवस्थित) नहीं कि उसके अतिरिक्त कोई दूसरा (ईश्वर) है; इसलिए जगत का कोई ईश्वर नहीं। 29 ईश्वर का स्रष्टा मानने से उठनेवाली परस्पर-विरोधी बातों को उसने देखा और स्वभाव के सिद्धान्त में भी वे ही दोष वर्तमान हैं। 30 स्वभाव-वाद, इंद्रप्रत्ययता (कार्य-कारण)-वादी के सिद्धान्तों (= आश्रय) को कुछ हद तक अस्वीकार करता है और कार्य के सम्बन्ध में कारण की कुछ शक्ति नहीं मानता है; किन्तु देखा जाता है कि बीज आदि विविध द्रव्यों से परिणाम (फल) पैदा होते हैं, इसलिए स्वभाव कारण नहीं है। 31 एक कर्ता विविध वस्तुओं का कारण नहीं हो सकता; इसलिए एकात्मक कहा जानेवाला स्वभाव सांसारिक प्रवृत्ति का कारण नहीं। 32 स्वभाव सर्वव्यापी है, ऐसा प्रतिपादित किया जाता है, इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि यह कोई परिणाम पैदा नहीं कर सकता; और ..... इसलिए स्वभाव उत्पत्ति का कारण नहीं। 33 क्योंकि यह सर्वव्यापी है, इसलिए कारण होने के कारण इसे सब चीजों का निरन्तर सार्वभौम कारण होना चाहिए; किन्तु फल के सम्बन्ध में (कारण के) व्यापार में हम एक सीमा देखते हैं; इसलिए स्वभाव उत्पत्ति का कारण नहीं। 34 यह स्थापित होता है कि यह निर्गुण है, इसलिए इसका फल निर्गुण होना चाहिए; किन्तु संसार में सब चीजों को हम सगुण देखते हैं, इसलिए स्वभाव सांसारिक प्रवृत्ति का कारण नहीं। ⁷¹- अनिमित्त = निर्वाण - अभिधर्मकोष 8.44 ⁷²- प्रवृत्तिदुःखस्य च तस्य लोके तृष्णादयो दोषगणा निमित्तं। नैवेश्वरो न प्रकृतिर्न कालो नापि स्वभावो न विधिर्यदृच्छा ॥- सौन्दरनन्द, सोलह 17। 88 अश्वघोष

35 शाश्वत कारण होने से इसमें कुछ विशेषता (= विशेष) नही हो सकती, इसलिए इसके फल (=विकार) में भी कोई विशिष्ट गुण नहीं हो सकता; और क्योंकि फल में विशिष्ट गुण पाये जाते हैं, इसलिए स्वभाव से उत्पत्ति नही। 36 स्वभाव उत्पादात्मक है, इसलिए फल के सम्बन्ध में नाश होने का कोई कारण स्थापित नही होता है; और क्योंकि फल का विनाश हम देखते हैं, इसलिए हमें मानना होगा कि कारण कुछ और ही है। 37 (पुनर्जन्म करने की) शक्ति के साथ सम्पर्क रहने के कारण नैष्ठिक मोक्ष चाहनेवाले यतियों को कुछ प्राप्त नही होता है; क्योंकि मनुष्य के स्वभाव का गुण है प्रवृत्ति, इसलिए परलोक में जाने के अतिरिक्त ये यति मुक्त कैसे हो सकते हैं? 38 यदि स्वभाव की विशेषता है उत्पत्ति, तब इसके फलों की भी समान रूप से वही विशेषता होगी, किन्तु इस संसार में फलों के बारे में हमेशा यह बात नही होती है; इसलिए स्वभाव उत्पादक नहीं है। 39 कहते हैं कि स्वभाव का कार्य चित्त (?) के लिए व्यक्त नही है, तो भी इसके फल व्यक्त बताये जाते हैं। इसलिए स्वभाव प्रवृत्ति का कारण नही है; क्योंकि यह निश्चित है कि संसार में कोई (व्यक्त) फल उसी कारण से निकल सकता है, जो समान रूप से व्यक्त है। 40 अचेतन स्वभाव के परिणाम घोड़े, बैल, खच्चर आदि चेतन प्राणी नहीं हो सकते; क्योंकि अचेतन कारणों से कोई चेतन उत्पन्न नहीं हो सकता। 41 जैसे सुवर्ण-हार (सुवर्ण का) विशिष्ट रूप है, वैसे ही स्वभाव के फल (= विकार) विशिष्ट रूप हैं; और क्योंकि फल तो विशिष्ट रूप है जब कि कारण विशिष्ट रूप नही है, इसलिए स्वभाव को उत्पादनशक्ति नही है। 42 यदि काल (समय) को संसार का ईश्वर माना जाय, तो (मुक्ति की) खोज करनेवालों के लिए मुक्ति नहीं। क्योंकि संसार का कारण शाश्वत रूप से उत्पादक होगा, जिससे मनुष्यों का अन्त होगा ही नहीं। 43 ... ... ... *44-46 ... ... .... 73 [74] 47 यदि कार्य के विषय में मनुष्य (= पुरुष) कारण होता, तो अवश्य ही सब किसी को इच्छित वस्तु मिल जाती; तो भी इस जगत् में कुछ इच्छाएँ अपूर्ण ही रह जाती हैं और लोग विवश होकर वही पाते हैं जो वे नहीं चाहते। 48 यदि अपने वश की बात होती, तो मनुष्य स्वयं बैल, घोड़ा, खच्चर या ऊँट होकर उत्पन्न नही होता; क्योंकि, मनुष्य इच्छित काम करते हैं और दुःख से घृणा करते हैं, इसलिए कौन अपने ऊपर स्वयं दुःख लेता? 49 यदि संसार में मनुष्य कर्ता होता, तो निश्चय ही वह अपने लिए प्रिय करता, अप्रिय नहीं; तो भी इच्छाओं की पूर्ति करने में चाहा और अनचाहा (इष्ट और अनिष्ट) दोनों ही किये जाते हैं, और यदि वह ईश्वर होता, तो कौन (स्वयं) अनचाहा करता? *50 मनुष्य अधर्म से डरता है और धर्म (शुभ) प्राप्त करने के लिए यत्न करता है, तो भी विविध दोषों द्वारा वह विवश (बेचारा) पथभ्रष्ट किया जाता है; इसलिए इस विषय में मनुष्य परतन्त्र है। *51 मनुष्य स्वतन्त्र नही, किन्तु परतन्त्र है; क्योंकि हम देखते हैं कि सर्दी, गर्मी, वर्षा, वज्र व बिजली के परिणाम उसके उद्योगों को विफल करते रहते हैं। अतः मनुष्य कार्यों का ईश्वर नहीं है। 52 क्योंकि, मिट्टी व पानी के सहारे तथा उचित ऋतु के सम्पर्क (योग) से अन्न पैदा होता है, और अग्नि काठ से उत्पन्न होती है और घी पाकर प्रदीप्त होती है, इसलिए अस्तित्व को कारण-रहित कहना ऐसा कारण का अभाव नही है। 53 यदि सांसारिक प्रवृत्ति अकारण होती तो मनुष्यों द्वारा कुछ काम नहीं होता। सब किसी को सब कुछ मिल जाता और ध्रुव है कि इस संसार में सार्वभौम सिद्धि होती। 73- 44-46 तीनों श्लोक प्रक्षिप्त जान पड़ते हैं। इनमें तत्कालीन सांख्य मत का खण्डन किया गया है। 74- जॉन्स्टन ने इनका अंग्रेजी अनुवाद इस प्रकार दिया हैः- 43. Some see the determining principle as the selfness in the matters which is one and is made manifold by the attributes; though they take their stand on a single cause, yet it has separate characteristics. 44. The attribute-theorist sees in the variety of attributes the operation of matter, which is born from a certain maturation. Since the cause is held to be not different (from the effect), one must conclude that the matters are ineffective. 45. Certainly the unmanifested, from which matter arises, cannot be the subject of a valid inference; for by perception we do not see in fact the development of a result which is manifest from that which is unmanifest. 46. As for the result which first arises from the unmanifest and comes into activity from the pair of manifest, from it (sc. the unmanifest?) which is postulated arises in this world the great one which is not postulated, and there ensue the defects of the Nature-hypothesis. बुद्धचरित 89

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*54 यदि दुःख-सुख अकारण होता, तो प्रत्येक को दुःख-सुख का भाग नहीं मिलता, और कारण के बिना दुःख-सुख बोध-गम्य होता ही नहीं, इसलिए यह जो "कारण-रहित" कहा जाता है कारण नहीं है। *55 उसने जाना कि ये और ऐसे ही अदृश्य कारण सांसारिक प्रवृत्ति के कारण नहीं हैं। उसने देखा कि संसार कारण-रहित नहीं है और उसने कारण-रहित होने के ये दोष समझे। 56 विविध चराचर जीव भी विविध कारणों के आश्रय से उत्पन्न होते हैं, संसार में कुछ भी कारण- रहित नहीं है, तो भी संसार सार्वभौम कारण को नहीं जानता है। 57 यह सुन्दर दान पाकर, सुदत्त ने आर्यधर्मा महर्षि के सद्धर्म को समझा और श्रद्धा में अविचल चित्त हो उनसे ये वचन कहेः— 58 “मेरा निवास श्रावस्ती नगर में है, जो धर्म के लिए विख्यात है और जहाँ हर्यश्व-वंश का अङ्कुर शासन करता है। वहाँ मैं आपके लिए एक विहार बनाना चाहता हूँ; आप कृपा-पूर्वक उस अनवद्य एवं उत्तम निवास को स्वीकार करें। 59 हे ऋषि, आप राज-महल में रहें या निर्जन वन में—इस ओर से आप उदासीन हैं, यद्यपि मैं यह जानता हूँ, तो भी, हे अर्हत्, मेरे ऊपर करुणा करके आप इसे निवास के लिए स्वीकार करें।” 60 तब उन्होंने जाना कि वह देना चाहता है और उसका मन मुक्त है, अतः आशय जाननेवाले निर्मल-चित्त मुनि ने परम शान्तिपूर्वक अपना आशय कहाः— 61 “(यद्यपि) तुम बिजली की भाँति चञ्चल सम्पत्ति-राशि के बीच (रहते) हो (तो भी) तुम्हारा निश्चय दृढ़ है और तुम देने पर तुले हुए हो। तब इसमें आश्चर्य नहीं कि तुम सत्य को देखो, क्योंकि, धर्म में तुम्हें स्वभावतः आनन्द आता है और दान देने में प्रसन्नता होती है। 62 जलते हुए घर से जो चीजें निकाली जाती हैं वे जलती नहीं (बच जाती हैं), उसी प्रकार कालरूपी अग्नि से जलते हुए संसार में मनुष्य जो कुछ दान करता है वह उसे लाभ होता है। 63 इसलिए उदार हृदय पुरुष दान को असली (= सम्यक्) विषयोपभोग समझते हैं। किन्तु कृपण मनुष्य धन-क्षय का डर देखकर दान नहीं करते, इस डर से कि कहीं उपभोग के लिए उन्हें कुछ न बचे। 64 उचित समय पर सत्पात्र को धन देना वीरता व अभिमानपूर्वक युद्ध करने के समान है। जिस मनुष्य का निश्चय श्रेष्ठ है वह यह जानता है, किन्तु दूसरे नहीं, और केवल वही दान देता है और निश्चयपूर्वक युद्ध करता है। 65 क्योंकि जो दान देने में आनन्दित होता हुआ संसार-यात्रा करता है वह दाता है और दान-द्वारा यश एवं सुनाम प्राप्त करता है, अतः उसकी उदारता के लिए सज्जन उसका सम्मान करते हैं और उसकी सङ्गति करते हैं।


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66 इस तरह वह संसार में सुखी है और दीर्घ दुःख के अभाव से पाप में नहीं पड़ता। क्योंकि वह सत्कर्म करने का सच्चा दावा करता है, इसलिए वह सदा प्रसन्न रहता है और मरते समय भयभीत नहीं होता। 67 इस लोक में दान का फल कुछ फूल हो सकता है, किन्तु परलोक में वह (दानी) दान का पारितोषिक पाता है। संसार-चक्र में घूमनेवाले मनुष्य के लिए दान के समान दूसरा मित्र नहीं। 68 जो (दानी) मर्त्यलोक या स्वर्ग में जन्म लेते हैं, वे अपने दान के कारण बराबरीवालों से ऊँचा पद पाते हैं; जो लोग घोड़े या हाथी होकर उत्पन्न होते हैं, वे भी (घोड़े या हाथियों के) प्रधान होकर दान का फल पाते हैं। 69 दान द्वारा उसे स्वर्ग प्राप्त होता है, उपभोग उसे घेरे रहते हैं और शील उसकी रक्षा करता है। जो मनुष्य शान्त है और स्वयं समझ-बूझकर (= ज्ञानपूर्वक) चलता है, वह स्वतन्त्र (= निराश्रय) है और बहु-संख्यक मनुष्यों के मार्ग से नहीं जाता। 70 अमृत पाने के लिए भी वह उदारता का आचरण करता है और दान की बात सोचने में (= स्मृ) उसे आनन्द आता है; उस आनन्द के कारण अवश्य ही उसका चित्त एकाग्र हो जाता है। 71 मानसिक एकाग्रता की इस सफलता (= समुदय) से वह धीरे-धीरे जन्म व निरोध का ज्ञान प्राप्त करता है; क्योंकि दूसरों को दान देने से दाता के हृदय में रहनेवाले दोष क्षीण हो जाते हैं। 72 कहा जाता है कि दाता दान दी जानेवाली वस्तुओं से आसक्ति पहले ही अलग करता है; और क्योंकि वह सस्नेह चित्त से दान करता है, इसलिए वह क्रोध व अभिमान का परित्याग करता है। 73 जो दाता (दान) पानेवाले का आनन्द देखकर प्रसन्न होता है और इसलिए कृपण नहीं है और जो दान-फल का चिन्तन करता है, उसकी अश्रद्धा (= नास्तित्व) व अज्ञानरूपी अन्धकार (= तमस्) नष्ट हो जाते हैं। 74 इसलिए दान देना निर्वाण (-साधना) का एक अङ्ग है, क्योंकि इसके द्वारा वह लोभ जीता जाता है, अनार्य जिसका आश्रय लेते हैं और वह तृष्णा जीती जाती है, जिसके द्वारा दान देने की आदत नष्ट होती है; क्योंकि इस (दान देने की आदत) के होनेपर दोषों के विनाश से निर्वाण होता है। 75 जैसे कुछ लोग छाया के लिए पेड़ पसन्द करते हैं, कुछ लोग फल के लिए और कुछ लोग फूल के लिए, वैसे ही कुछ लोग शान्ति के लिए अपने को दान देने में लगाते हैं, तो दूसरे लोग सम्पत्ति के लिए।


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90 अश्वघोष

76 इसलिए खासकर गृहस्थ लोग द्रव्य-संचय नहीं करते, किन्तु अपने साधन के अनुसार दान देते हैं; और क्योंकि दान देना ही असार सम्पत्ति का सार है (सारादानं दानमाहुर्धनानां ⁷⁵) अतः सज्जनों के चलने का यही मार्ग है। 77 भोजन देनेवाला बल देता है, वस्त्र देनेवाला भी सौन्दर्य देता है, किन्तु जो धर्मात्माओं को निवास देता है वह संसार में सब कुछ देता है। *78 सवारी देनेवाला भी आराम देता है और दीप देनेवाला प्रकाश देता है। अतः जो नैष्ठिक धर्म का उपदेश देता है वह अमर पद देता है, जो छीना नहीं जा सकता, (=अहार्यममृतं पदं)। 79 कुछ लोग काम (उपभोगों) के लिए दान देते हैं, दूसरे सम्पत्ति के लिए, तीसरे यश के लिए, कुछ लोग स्वर्ग के लिए और दूसरे कृपण नहीं होने के लिए; किन्तु तुम्हारे इस दान का कोई गूढ़ उद्देश्य नहीं है। 80 इसलिए साधुवाद तुम्हें, जिसकी इच्छा ऐसी (उत्तम) है। अपनी इच्छा पूरी करके सन्तुष्ट हो जाओ। तुम यहाँ काम (=रजस्) व अज्ञानरूपी अन्धकार (=तमस्) के साथ आये थे और यहाँ से ज्ञान द्वारा विशुद्ध-चित्त होकर जाओगे।" 81 वह, जो कि (उचित) रास्ते से (चलकर) तत्त्व को ठीक-ठीक पा चुका था, परम प्रसन्न होकर विहार (बनाने) की बात से हार्दिक अनुराग करने लगा और उचित समयपर उपतिष्य के साथ चल पड़ा। 82 तब वह कौशल-राज की राजधानी में आया और विहार के स्थान की खोज में इधर-उधर घूमने लगा। तब उसने मनोहर वृक्षों से भरा भव्य एवं उपयुक्त जेत-वन देखा। 83 तब इसे खरीदने के लिए जेत के पास गया, जो इसमें इतना आसक्त था कि इसे बेच नहीं सकता था। उसने कहा- "यदि आप द्रव्य से इसे पूरा-पूरा ढक भी दें तो भी मैं आपको यह भूमि नहीं लेने दूँगा।" 84 तब सुदत्त ने उसे वहाँ कहा- "मुझे उपवन की जरूरत है" और इसके लिए आग्रह करने लगा। तब उसने इसे कोष से ढक दिया और इसे धर्म का व्यवहार समझते हुए खरीदा। 85 जब जेत ने उसे द्रव्य देते हुए देखा, तब वह बुद्ध के प्रति अत्यन्त अनुरक्त हो गया और तथागत के लिए सारा शेष उपवन दे दिया। 86 तब महर्षि उपतिष्य के साथ, जो निर्माण-कार्य का अध्यक्ष (नवर्मिक) नियुक्त हुआ, अनाथपिण्डद ने इसे जल्द तैयार करना चाहा और एक विशाल रूपोज्ज्वल विहार बनाना शुरू किया,


⁷⁵. देखिये जातकमाला, जातक 3, श्लोक 23।


87 जो उसकी सम्पत्ति शक्ति व ज्ञान का मूर्त आकार था, पृथ्वी पर आये हुए कुबेर-प्रासाद के भी समान था, उत्तर कौशल की राजधानी के समान सौभाग्य के समान था और तथागतत्व (प्राप्त होने) की भूमि के समान था। ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "अनाथपिण्डद की दीक्षा" नामक 18वाँ सर्ग समाप्त ॥ उन्नीसवाँ सर्ग पितापुत्र-समागम⁷⁶ 1 तब अपने ज्ञान से विविध दर्शनों के शिक्षकों को जीतकर मुनि क्रम से पाँच पर्वतों के नगर से (निकलकर) उस नगर की ओर चले जहाँ उनका राजा पिता रहता था। 2 तब हजार भिक्षु भी चले, जिन्हें उन्होंने उसी क्षण प्रव्रजित किया था। वह अपने पिता के राज्य में पहुँचे और उसे अनुगृहीत करने के लिये पितृ-नगर के समीप ठहर गये। 3 लक्ष्य सिद्धकर आर्य लौट आये हैं, यह आनन्द-प्रद समाचार अपने विश्वस्त गुप्तचरों से सुनकर पुरोहित व बुद्धिमान् मन्त्री ने राजा से सविनय निवेदन किया। 4 उनके आने की बात जानकर राजा आनन्दित हुआ और उन्हें देखने की इच्छा से वह सब नागरिकों के साथ चल पड़ा, शीघ्रता में वह साधारण शिष्टाचार (=धैर्य) भी भूल गया? 5 उसने कुछ दूर पर उन्हें शिष्यों से घिरा देखा, जैसे ऋषियों के बीच ब्रह्मा बैठा हो; और महर्षि के धर्म के प्रति आदर-भाव होने के कारण वह रथ से उतर गया और पैदल ही उनके समीप गया। 6 मुनि को देखकर वह उनके समक्ष घबड़ा गया और कुछ बोल न सका; क्योंकि वह उन्हें न तो 'भिक्षु' कहकर ही पुकार सकता था और न 'पुत्र' कहकर ही। *7 जब उसने उनका भिक्षु-वेष देखा और अपने शरीर पर के विविध आभूषणों का ख्याल किया, तब उसकी साँसें तेजी से चलने लगीं, और आँसू बहाते हुए उसने अस्पुट वाणी में विलाप किया:- 8 "उन्हें अपने समीप शान्तिपूर्वक निर्विकार होकर बैठे देखकर मैं पीड़ा से वैसे ही अभिभूत हो रहा हूँ, जैसे प्यास से आकुल पथिक, जो दूरवर्ती जलाशय के समीप जाकर उसे सूखा पावे। 9 जब कि मैं उनके उसी रूप को देख रहा हूँ, जैसे कोई अपने उस प्रिय जन की चित्रित आकृति को देखे, जो अब भी मन में याद है, किन्तु जो आवागमन के अन्त में है, तो मुझे कुछ आनन्द नही हो रहा है जैसे (मुझे देखकर) इन्हें कुछ आनन्द नही हो रहा है।


⁷⁶. चीनी त्रिपिटक तथा तिब्बती कञ्जुर के अन्तर्गत "रत्नकूट" (अर्थात् रत्नराशि) में 49 सूत्र हैं, जिनमें एक है 'पिता-पुत्र समागम' अर्थात् पिता शुद्धोदन के साथ शाक्य-मुनि का मिलन। इस सूत्र के कुछ अंश "शिक्षा- समुच्चय" में पाये जाते हैं।

[बुद्धचरित 91]

10 सब पर्वतों से परिवेष्टित पृथ्वी इनकी होनी चाहिये, जैसे कृतयुग में यह मान्धाता की थी; तो भी वह, जिन्हें राजा से भी याचना नहीं करनी चाहिये, अब दूसरों से भीख माँगकर जीते हैं। 11 वह यहाँ धैर्य में मेरु पर्वत से, दीप्ति में सूर्य से, कान्ति में चन्द्रमा से, गति में गजराज से और वाणी में वृषभ से बढ़कर है; तो भी पृथ्वी जीतने की जगह वह भिक्षा का अन्न खाते हैं।" 12 तब बुद्ध ने जाना कि अब भी उनका पिता उन्हें अपने मन में अपना पुत्र समझ रहा है और राजा (= लोकाधिदेव) के ऊपर करुणा करके वह उसके लिये आकाश में उड़ गये। 13 उन्होंने अपने हाथ से सूर्य का रथ स्पर्श किया और वह पवन-पथ (आकाश) में पैदल चले; उन्होंने अपने एक शरीर को अनेक में परिणत किया और फिर अनेक शरीरों को एक बनाया। 14 बिना किसी बाधा के उन्होंने पृथ्वी में ऐसे अवगाहन किया जैसे पानी में, और पानी की सतह पर ऐसे चले जैसे सूखी भूमि पर; और उन्होंने शान्त होकर पर्वत में प्रवेश किया और उसमें ऐसे निर्बाध होकर चले जैसे आकाश में चल रहे हों। 15 आधे शरीर से उन्होंने जल बरसाया और आधे से वह ऐसे प्रज्वलित हुए जैसे अग्नि से। गौरवपूर्वक चमकते हुए वह आकाश में ऐसे दिखाई पड़े जैसे पर्वत पर की उज्ज्वल ओषिधियाँ चमक रही हों। 16 इस तरह उन्होंने राजा के मन में आनन्द उत्पन्न किया, जो उनसे इतना अनुराग करता था, और आकाश में दूसरे सूर्य के समान बैठे हुए उन्होंने नरपति के लिये धर्म की व्याख्या की:- 17 "हे राजन्, मैं जानता हूँ कि अपनी दयालु प्रकृति के कारण आप मुझे देखकर दुःखी हो रहे हैं। पुत्रवान् होने का आनन्द छोड़िये और शान्त होकर आप मुझसे पुत्र की जगह धर्म ग्रहण कीजिये। 18 पूर्व में किसी पुत्र ने पिता को जो कभी नहीं दिया पूर्व में किसी पिता ने पुत्र से जो कभी नहीं पाया, जो राज्य अथवा स्वर्ग से भी अच्छा है, हे राजन्, आप उस परम उत्तम अमृत को जानें। 19 हे भूपति, कर्म का स्वभाव, कर्म की उत्पत्ति-भूमि (= योनि), कर्म का आश्रय और कर्म के विपाक से होनेवाला भाग पहचानिये और जगत् को कर्म के वशीभूत जानिये; इसलिये वह कर्म कीजिये जो हितकारी है। 20 जगत् के वास्तविक सत्य (= तत्त्व) पर विचार कीजिये। सत्कर्म मनुष्य का मित्र है और कुकर्म विपरीत (अर्थात् शत्रु)। (मरते समय) आपको सब कुछ छोड़ना पड़ेगा और निराश्रय हो अकेला ही जाना पड़ेगा, केवल कर्म आपके साथ जायेंगे। 21 स्वर्ग में या नरक में या पशुओं में या मर्त्य-भूमि में जीवलोक कर्म के आश्रय से चलता है। भव का कारण त्रिविध है, उत्पत्तिभूमि (= योनि) त्रिविध है और मनुष्यों द्वारा किये जानेवाले कर्म विविध हैं। 22 इसलिये अपने को सम्यक् रूप से अन्य पक्ष (द्विवर्ग) में लगाइये और शरीर व वाणी के व्यापार (कृत्य) शुद्ध कीजिये। मानसिक शान्ति के लिये यत्न कीजिये। यही आपका लक्ष्य है, दूसरा नही। 23 जगत् को समुद्र-तरङ्ग के समान चञ्चल जानते हुए और इसकी भावना करते हुए आपको (रूप-, अरूप-, व काम-) भव में आनन्द नही पाना चाहिये और कर्म-शक्ति क्षीण करने के लिए धार्मिक व श्रेयस्कर कर्म करना चाहिए। 24 विदित हो कि संसार सदा नक्षत्र-मण्डल के समान घूमता रहता है। अपनी पराकाष्ठा पार करके देवता भी स्वर्ग से गिरते हैं; तब मानवी सत्ता पर कौन कितना भरोसा करे? 25 निर्वाण-सुख को परम् सुख और आन्तरिक (= अध्यात्म) आनन्द का परमानन्द जानिये। वैभव-सुख साँपवाले घर के समान विपत्तिपूर्ण हैं, यह देखकर कौन आत्मवान् (संयतात्मा) व्यक्ति उसमें आनन्द पायेगा? 26 इसलिये इस जगत् को जलते हुए घर के समान विपत्ति-ग्रस्त देखिये और उस पद की खोज कीजिये जो शान्त एवं ध्रुव है, जहाँ न जन्म है न मौत, न श्रम है न दुःख। 27 दोषों की विपक्षी सेना को पराजित कीजिए, जिसके लिए सम्पत्ति राज्य अश्व घोड़े या हाथी की जरूरत नही है। एक बार उन्हें जीत लेनेपर जीतने के लिये कुछ और नही रह जाता है। 28 दुःख, दुःख-समुदय, (दुःख-) उपशम और उपशम-मार्ग को समझिये। इन चारों को पूर्णतः समझ लेने से महाभय व दुर्गत्तियों का निरोध होता है।" 29 सुगत के चमत्कार-प्रदर्शन से राजा का चित्त उपदेश (ग्रहण करने) के लिये उपयुक्त क्षेत्र पहले ही हो गया था, इसलिये अब सुन करके धर्म प्राप्त करनेपर रोमाञ्चित हो गया और हाथ जोड़कर उसने ये वचन कहे- 30 "आपके कार्य बुद्धिमत्तापूर्ण और सफल हैं; क्योंकि आपने मुझे महादुःख से मुक्त किया है। मैं, जो पहले विपत्तिपूर्ण पृथ्वी की प्राप्ति में दुःख-वृद्धि के लिए आनन्द पाता था, अब पुत्रवान् होने के फल में आनन्द पा रहा हूँ। 31 राज्य-लक्ष्मी का परित्याग कर आप ठीक ही (= स्थाने) चले गये। ठीक ही आपने कठोर श्रम किया और ठीक ही आप प्रिय ने प्रिय स्वजनों को छोड़ा और हमारे ऊपर करुणा की। 32 आर्त जगत् के हित के लिए आपने यह नैष्ठिक ज्ञान पाया है, जो पूर्व में देवर्षियों या राजर्षियों को प्राप्त नही हुआ। 33 यदि आप चक्रवर्ती सम्राट् होते तो आप मुझे यह आनन्द नही देते जो इस समय मैं, इन चमत्कारों एवं आपके धर्म को देखकर दृढ़तापूर्वक अनुभव कर रहा हूँ।

92 अश्वघोष

34 यदि आप इस जन्म में भी इस जीवन से बँधे रहते, तो चक्रवर्ती होकर आप मानव जाति का पालन करते, किन्तु अब मुनि होकर भव-चक्रके महादुःख को तोड़कर आप जगत् के लिए धर्मोपदेश कर रहे हैं। 35 इन ऋद्धियों एवं गम्भीर ज्ञान का प्रदर्शन कर और भव-चक्र की विपत्तियों पर पूर्ण विजय प्राप्तकर राज्य के बिना भी आप संसार के ईश्वर हो गये हैं, किन्तु राज्य-समृद्धि के रहते हुए भी आप वैसा नहीं होते, यदि आप असहाय होकर भव-चक्र में पड़े रहते।" 36 शाक्य-राज्य ने, जो उन करुणामय के धर्मोपदेश (ग्रहण करने) के योग्य हो गया था, ऐसी बहुत-सी बातें कहीं और यद्यपि वह राजा और पिता के पद पर था, तो भी उसने अपने पुत्र को प्रणाम किया, क्योंकि वह सत्य में प्रवेश कर चुका था। 37 बहुत से लोगों को, जिन्होंने मुनि का ऋद्धि-बल पर अधिकार देखा, जिन्होंने तत्त्व में प्रवेश करानेवाले शास्त्र को समझा और जिन्होंने राजा को-उनके पिता को-उनका सम्मान करते देखा, घर छोड़ने की इच्छा हुई। 38 तब कर्म-फल में स्थित बहुत से राजकुमारों ने उस धर्म-विधि को ग्रहण किया और वैदिक- मन्त्रों एवं मोह के बड़े-बड़े साधनों की उपेक्षा करके, रोते हुये प्रिय परिवारों का परित्याग किया। 39 आनन्द, नन्द, कृमिल, अनिरुद्ध, नन्द, उपनन्द, कुण्ठधान और शिष्यों का मिथ्या शिक्षक देवदत्त भी मुनि का उपदेश पाकर घर से निकल गये। 40 तब पुरोहित-पुत्र महात्मा उदायी ने उसी मार्ग का अनुसरण किया; और उन लोगों का निश्चय देखकर अत्रि-पुत्र (आत्रेय) उपाली ने भी उसी मार्ग पर चलने का इरादा किया। 41 अपने पुत्र की शक्ति देखकर राजा ने भी परम अमरत्व की धारा में प्रवेश किया और आसक्ति से विमुख होकर उसने राज्य अपने भाई को सौंपा और (स्वयं) महल में राजर्षि की तरह आचरण करते हुए रहने लगा। 42 इन तथा अन्य बन्धुओं, मित्रों एवं अनुयायियों को विनीत (दीक्षित) कर, बुद्ध ने उचित समय पर, पूरे आत्म-संयम के साथ, नगर में प्रवेश किया, जहाँ रोते हुए पुरवासियों ने उनका सत्कार किया। 43 राजा ने पुत्र सर्वार्थसिद्ध अपना कार्य पूरा करके नगर में प्रवेश कर रहे हैं, यह समाचार सुनकर महल की स्त्रियाँ द्वारों एवं वातायनों की ओर दौड़ीं। 44 काषाय वस्त्रधारी होनेपर भी उन्हें संध्याकालीन बादल से आधा ढके सूरज के समान चमकते देखकर, स्त्रियों ने आँसू बहाये और अपने कर-कमल जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। 45 उन्हें नीची-निगाह चेहरे से चलते तथा धर्म एवं शरीर-सौन्दर्य से प्रकाशित होते देखकर स्त्रियों ने दया एवं भक्ति प्रकट की और अश्रु-म्लान-आँखों से उन्होंने इस तरह विलाप कियाः-


46 "शिर मुड़ाने से व फेंके हुए चिथड़े पहनने से यद्यपि उनका सुन्दर शरीर बदल गया है, तो भी अपने शरीर के सुनहले रङ्ग से वह व्याप्त हैं। वह जमीन की ओर देखते हुए चल रहे हैं। 47 जो श्वेत आतपत्र के नीचे आश्रय पाने योग्य थे, ...., ...., और जो विजेता होने योग्य थे, वह अब भिक्षा-पात्र लिए घूम रहे हैं। 48 जो घोड़े की पीठ पर उस छाते की छाया के नीचे, जो तमाल-पत्र-युक्त कपोलवाले सुन्दरी- मुख के समान उज्ज्वल हो, सवार होने योग्य थे, वह भिक्षा-पात्र धारण किये हुए पैदल जा रहे हैं। 49 जो विपक्षी राजकुमारों को विनीत (नम्र) करने योग्य थे और जो उज्ज्वल मुकुट पहनकर स्त्री- समूहों एवं अपने परिचारक-वृन्द द्वारा देखे जाने योग्य थे, वह आगे की ओर केवल जुए की दूरी तक जमीन देखते हुए ( = अवेक्षमाणो युगमात्रमुर्व्याः⁷⁷) चल रहे हैं। 50 यह उनका कैसा दर्शन है, ये कैसे भिक्षु-वेष हैं, कौनसा लक्ष्य वह खोज रहे हैं, सुख उनका शत्रु क्यों हो गया है कि वह व्रतों में आनन्द पायें, स्त्रियों और बच्चों में नहीं? 51 राजा की पुत्र-वधू यशोधरा निश्चय ही शोक से ग्रस्त हुई, तो भी उसने कैसा दुष्कर कर्म किया है कि अपने पति के इस आचरण का समाचार सुनकर वह जीती रही और विनाश को प्राप्त नहीं हुई। 52 रूप के अनुरूप ही चमकती हुई पुत्र की आकृति को, जो अब आभूषण-रहित (=विवर्ण) है, देखकर क्या नरपति भी अपने पुत्र से अनुराग करते हैं या उन्हें हानिकारक शत्रु समझते हैं? 53 अश्रु-जल से नहाये हुए अपने पुत्र राहुल का देखकर यदि वह उसमें आसक्त (अनुरक्त) नहीं होते हैं, तो भला कोई क्या सोचे इन दृढ़ व्रतों के बारे में, जिनके कारण मनुष्य अपने स्नेही स्वजन से विमुख होता है। 54 व्रतों के आचरण से न तो उनकी दीप्ति ही नष्ट हुई है, न उनके शरीर का रूप ही और न उनकी गति ही; और इन गुणों से चमकते हुए उन्होंने शान्ति प्राप्त की है तथा अपने को विषयों से अलग किया है।" 55 विविध मतावलम्बियों के समान भिन्न-भिन्न मत ग्रहण करती हुई स्त्रियों ने इस तरह बहुत विलाप किया। बुद्ध ने भी अनासक्त (कठोर, दृढ़) चित्त से अपने जन्म नगर में प्रवेश किया और भिक्षा प्राप्त कर वह न्यग्रोध-वन में लौट गये। 56 तृष्णा-रहित चित्त से तथागत ने अपने पितृ-नगर में भिक्षा के लिए प्रवेश किया था; और पूर्व में श्रेय नही करने से जिनके साधन अल्प थे और जो बहुत कम भीख दे सकते थे उन लोगों को मुक्त करने की, जिन श्रमणों को अपने चित्त पर संयम प्राप्त नहीं हुआ था और जिन्हें


⁷⁷- देखिये जातकमाला, जातक 4 श्लोक 4। बुद्धचरित 93

(भिक्षाटन के) ऐसे कामों से सन्तोष नही होता था उन्हें दृढ़ (समर्थ) करने की, संसार को “तुम्हारा मङ्गल हो” यह कह सकने की, और उसी प्रकार शास्त्रोपदेश करने की अपनी इच्छा उन्होंने याद रक्खी। ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "पितापुत्र-समागम" नामक 19वाँ सर्ग समाप्त ॥ बीसवाँ सर्ग जेतवन-स्वीकार 1 (कपिलवस्तु में) महा-जनसमूह पर दया दिखाने के बाद (बुद्ध) उस नगर की ओर चले, जो प्रसेनजित् के बाहु-बल से रक्षित था। 2 तब वह उस गौरव-पूर्ण जेत-वन में पहुँचे, जो अशोक के बिखरे फूलों से उज्ज्वल था, मत्त कोकिलों के कूजन से गुञ्जित था और कैलाश के बर्फ के समान उजले घरों की पंक्ति से युक्त था। 3 तब सुवर्ण एवं श्वेत माला से अलङ्कृत शुद्ध जल-कलश लेकर सुदत्त ने उचित समय पर तथागत को जेतवन भेंट किया। 4 तब शाक्य-ऋषि को देखने की इच्छा से राजा प्रसेनजित् जेतवन की ओर चला। वहाँ पहुँचकर उसने श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया और बैठकर उनसे निवेदन कियाः- 5 “हे ऋषि, इस नगर में आप ठहरने की इच्छा करते हैं, इससे निश्चय ही कोशल-निवासियों का सौभाग्य-उदय होगा। क्योंकि क्या वह देश, जो ऐसे तत्त्वदर्शी के आश्रय से वञ्चित है, चौपट या अभागा नहीं है? 6 आपके दर्शन से और हमारे ऊपर अनुग्रह करने के लिये हमारा प्रणाम आपके द्वारा स्वीकृत होने से हमें वह सन्तोष हो रहा है जो सज्जनों से मिलने पर भी लोगों को अनुभव नहीं होता है। 7 हवा जिस किसी चीज पर बहती है उसी का गुण (अर्थात् गन्ध) ग्रहण कर लेती है, और पक्षी, मेरु के सम्पर्क में आकर, अपना स्वाभाविक शरीर खो बैठते हैं और सुवर्ण में परिणत हो जाते हैं। 8 एक साधु पुरुष, जो इहलोक और परलोक के ईश्वर हैं, इसमें ठहरे हुए हैं, इसीलिये मेरा उपवन देखने में वैसा ही गौरवमय है जैसा कि त्रिशङ्कु का महल, जिसमें महर्षि गाधि-पुत्र (विश्वामित्र) का स्वागत हुआ था। 9 संसार के विविध लाभ अनित्य व विनाशवान् हैं, किन्तु वे असंख्य चीजें, जो आपके समीप होने से प्राप्त होती हैं, विनाशवान् नहीं हैं। 10 हे साधु, आपके शास्त्र का दर्शन हो, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई लाभ नही जाना जाता है। हे शास्ता, मैंने दुःख भोगा है और मैं राग एवं राजधर्म से पीड़ित हुआ हूँ।” 11 मुनि ने इन्द्र-सदृश राजा के ये और ऐसे ही दूसरे वचन कृपापूर्वक सुने और उसे लोभ एवं काम में आसक्त जानकर उसके मन को प्रेरित करने के लिये यों उत्तर दियाः- 12 “हे राजन्, ये बहुत अचरज की बात नहीं कि आप साधु ... के प्रति इस तरह कहें या ऐसा व्यवहार करें। 13 जो लोग नीचे से ... अपने हितैषी धर्मात्मा (= आर्य) पुरुषों के पास आना चाहते हैं ...। 14 हे भूपति, मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ, इसलिए कि आपकी मानसिक अवस्था ऐसी है। अतः आप मेरा उपदेश ग्रहण करें और वैसा करें जिससे यह सफल हो। 15 हे नरपति, जब काल (आप) राजा को बाँधकर खींचेगा, तब न तो स्वजन आपके पीछे जायँगे, न मित्र, न राज्य। सब लोग दुःखी व विवश होकर अलग हो जायँगे। केवल आपके कर्म ही छाया की भाँति आपके साथ जायँगे। 16 इसलिए यदि आप स्वर्ग व सुयश चाहते हैं, तो धर्मानुसार राज्य की रक्षा कीजिए। क्योंकि मोहवश धर्म को आकुल करनेवाले राजा के लिये स्वर्ग में थोड़ा-सा भी राज्य (स्थान) नहीं है। 17 इस संसार में धर्मानुसार राज्य की रक्षा करनेवाले कुशाश्व ने स्वर्ग प्राप्त किया, जब कि इस संसार में मोहवश धर्म से विमुख रहनेवाले नृपति निकुम्भ ने काशी में पृथ्वी में प्रवेश किया। 18 हे सौम्य, मैंने भले-बुरे कर्मों का यह दृष्टान्त आपको दिया। अतः अपनी प्रजाओं का सदा अच्छी तरह पालन कीजिए और खूब समझ-बूझकर उचित के लिए दृढ़तापूर्वक यत्न कीजिए। 19 मनुष्यों को कभी तङ्ग न कीजिए, अपने इन्द्रियों को कभी स्वतन्त्र न छोड़िये, पापियों का सङ्ग या क्रोध न कीजिए, अपने मन को बुरे रास्तों पर न भटकने दीजिए। 20 अभिमानवश धर्मात्माओं को कष्ट न दीजिए, मित्र-तुल्य तपस्वियों को उत्पीड़ित न कीजिए, पाप के प्रभाव में रहते हुए पवित्र व्रत मत ग्रहण कीजिए और बुरे विचारों (= कुदृष्टि) में मत पड़िए। 21 अशुभ का आश्रय न लीजिए, कुकर्मों में आसक्त न होइये, मद से अभिभूत (युक्त) न होइये, अप्रसन्नता या असहिष्णुता से न सुनिये, अपना यश क्षीण न कीजिये या अपना मन असत्य में न लगाइये, शास्त्र-सम्मत अंश से अधिक भूमि-कर न लीजिए। 22 मन को स्थिर रखिए और धर्म का पालप कीजिए, सज्जनों का सङ्ग कीजिए और ...; ऐसा कीजिए जिससे (इस जन्म में) उत्कर्ष प्राप्त कर फिर (जन्मान्तर में) आप उत्तम पद प्राप्त कर सकें। 94 अश्वघोष

23 वीर्य की रक्षा करते हुए, धैर्य रखते हुए, विद्या उपार्जन करते हुए, दोषों को जीतते हुए, मृत्यु को सदा स्मरण करते हुए, आप आर्य-पुरुष का कार्य करें और माहात्म्य-लाभ करके मार्ग प्राप्त करें। (= माहात्म्य-लाभाद् अधिगच्छ मार्गम्) 24 हे मित्र, आपको फिर वह कार्य करना चाहिए, जिससे इस फल की रक्षा (उत्पत्ति ?) होती है; क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य, जिसने (पूर्व में) यह कर्म किया है, उस बीज को बोता है जिसका फल वह देख चुका है। 25 इस जगत् में जो मनुष्य ऊँचे पद पर रहकर पाप में आसक्त होता है वह प्रकाश में है, किन्तु उनका चित्त अन्धकार में स्थित है; और जो मनुष्य धर्मरत (= धर्म-प्रधान) रहता हुआ भी मनुष्यों का प्रधान नहीं है वह अन्धकार में है किन्तु उसका चित्त प्रकाश में है। 26 जो कोई ऊँचे पद (या कुल) का होकर धर्माचरण करता है, उसका चित्त अत्यन्त विशद हो जाता है, और जो कोई नीच पद (या कुल) का होकर पापकर्म करता है, उसका चित्त अत्यन्त तमोमय हो जाता है। 27 इसलिए, हे राजन्, इन चार समूहों का अस्तित्व जानते हुए आपकी जैसी इच्छा हो वैसा यत्न करें, किन्तु यदि आप आनन्द-भोग करना चाहते हैं, तो आप अपने को निचली तीन श्रेणियों में पायेंगे, पहली (उत्तम) में नहीं। 28 किसी भी मनुष्य के लिए दूसरे के खाते कुशल कर्म करना असम्भव है, या यदि वह करे भी तो इसका फल दूसरे को नहीं मिलेगा। अपने ही कर्म का फल नष्ट नहीं होता है, किन्तु अपने ही द्वारा अनुभव किया जाता है, और जो किया नहीं जाता है उसकी फल-प्राप्ति वास्तविक नहीं मानी जाती है। 29 क्योंकि जो किया नहीं जाता है (= अकृत है) उसकी शक्ति नहीं है, इसलिए अकृत से परलोक में श्रेय नहीं मिलता है, और क्योंकि इससे जगत् में जन्म-विनाश (= विभव) नहीं होता है, अतः आप अपने को सत्कर्म-मार्ग में लगाये। 30 उस दुष्ट मनुष्य को, जो अत्यन्त पाप करता है, जीवलोक में आत्मसुख नहीं मिलता है। अपने ही खाते पाप करके परलोक में वह निश्चय ही स्वयं फल भोगेगा। 31 चार महापर्वत, हे महाराज, एक साथ आकर संसार को पीसते हैं, धर्मानुसार यथाशक्ति किये गये विविध कर्मों के आश्रय के बिना किया ही क्या जा सकता है? 32 उसी प्रकार जब जन्म जरा रोग और मृत्यु भी, ये चार, एक साथ आते हैं, तब सारा संसार विवश होकर चक्कर काटता है, जैसे चार पहाड़ों से घिरा हो। 33 जब यह दुःख हम बेबसों पर आता है और इसके विरुद्ध हमें आश्रय प्रतिरोध-शक्ति या त्राण नहीं मिलता है, तब अव्यर्थ व अक्षय धर्म ग्रहण करने के अतिरिक्त हमारे लिए (दूसरी) कोई ओषधि नहीं।


34 क्योंकि संसार अनित्य है और बिजली की चमक के समान क्षणिक इन्द्रिय-सुखों में आसक्त है और क्योंकि यह (संसार) मौत की अँगुली के अग्रभाग पर स्थित है, इसलिए मनुष्य को धर्माचरण नहीं करने का फल नहीं भोगना चाहिए। 35 वे अनेक नृप, जो महेन्द्र के समान थे, देव युद्धों में लड़े, वे शक्तिशाली और अभिमानी (?) थे, तो भी कालक्रम से वे दुःख के भागी हुए। 36 सब जीवों को धारण करनेवाली धरती भी नष्ट होती है, और मेरुपर्वत प्रलय-अग्नि से जल जाता है; महासागर सूख जाता है, फिर फेन के समान क्षणिक मर्त्य-लोक की विनाशशीलता का क्या कहना? 37 हवा जोरों से बहकर भी बन्द हो जाती है, सूरज जगत् को तपाकर भी अस्त हो जाती है, उसी प्रकार आग जलकर भी बूझ जाती है; जो कुछ है वह सब, मैं समझता हूँ, ऐसा ही है और परिवर्तनशील है। 38 यद्यपि इस शरीर का देर तक सावधानीपूर्वक पालन किया जाता है, और विविध उपभोगों से लालन किया जाता है, तो भी यह यहाँ ... कुछ ही दिनों तक रहनेवाला है। 39 विदित हो कि संसार की इस अवस्था में लोग, अभिमान एवं मद का पोषण करते हुए, समय पर ऊँची शय्याओं पर सोने के लिए लेटते हैं; आप उनपर न लेटें, किन्तु परम श्रेय के लिये जगे रहें। 40 भव-चक्र की निरन्तर चलती रहती डोलापर संसार चढ़ता है और असावधान रहता है, यद्यपि इस संसार का पतन ... निश्चित है। 41 उसका सेवन न करें जिसका परिणाम प्रिय नहीं होता है, वह न करें, जिसका फल बुरा होता है; वह मित्र मित्र नहीं है जो शुभ से युक्त नहीं है और वह ज्ञान ज्ञान नहीं है जो दुःख दूर नहीं कर सकता। 42 यदि आपको ज्ञान है, तो आपके लिए पुनर्जन्म नहीं, या यदि जन्म हो भी तो यह अरूप अवस्था में होगा; यदि आप शरीर धारण करते रहे, तो आप विषयों से मुक्त नहीं हो सकते, और काम-लोक (= काम-भव) अनित्य एवं अनर्थकारी है। 43 क्योंकि कर्म-शक्ति के अधीन होकर अरूप देव भी अस्थायी एवं काल के वशीभूत हैं, अतः अप्रवृत्ति में अपना चित्त लगाइये; यदि प्रवृत्ति नहीं, तो दुःख नहीं। 44 क्योंकि शरीर, जो कि चलना, खड़ा होना आदि विविध कार्यों पर आश्रित है, दुःख का मूल है, इसलिए ज्ञान के होने से-ज्ञान जो कि अरूप अवस्था के होने में सहायक है-शरीररूप ऋण से मुक्ति होती है।


बुद्धचरित 95

४. दशम-चतुर्दश सर्ग: मार-विजय, सम्यक्-संबोधि (बुद्धत्व प्राप्ति) एवं धर्मचक्र-प्रवर्तन

45 क्योंकि काम (-वासना) के कारण संसार जन्म लेता है और उसके द्वारा अत्यन्त महादुःख भोगता है, इसलिए जब मनुष्य अपने को काम-भव से अलग (=विविच्य) करेगा, तब वह दुःख में आसक्त न होगा और न पीड़ित होगा। 46 इसलिए चाहे अरूप-देवों के बीच या रूप-देवों के बीच, जो कि काम के अधीन हैं ही पुनर्जन्म की शक्ति (विद्यमान) होने के कारण प्रवृत्ति बन्द नहीं होती है, फिर छः काम- वासनाओं के क्षेत्र में रहनेवालों की प्रवृत्ति कहाँ से बन्द होगी? 47 तीन भवों (काम-भव, रूप-भव, अरूप-भव) के इस तरह अनित्य दुःखमय अनात्म और सदा प्रज्वलित होनेपर लोगों के घुसने के लिए आश्रय-स्थल नहीं, जैसे कि उन चिड़ियों के लिए (आश्रय-स्थल नहीं) जिनका निवास-वृक्ष जल रहा हो। 48 यह परम ज्ञेय है, (इसके अतिरिक्त) और कुछ ज्ञेय नहीं है। यह उत्तम ज्ञान (=मति) है, (इसके अतिरिक्त) और कुछ ज्ञान नहीं है। यह उत्तम कार्य है, (ऐसा)...और कुछ नहीं माना जाता है। 49 निश्चय ही ऐसा नही सोचना चाहिये कि यह धर्म गृहस्थों के लिए नहीं है। वन में रहता हो या घर में, वास्तव में वही (जीता) है जो शान्ति प्राप्त करता है। 50 आतप से दग्ध मनुष्य पानी में प्रवेश करता है, बादल से सब किसी को सुख (आराम) मिलता है। जिसे प्रदीप है वह अन्धकार में देखता है। योग प्रमाण है, न कि उम्र (=वयस) या वंश।⁷⁸ 51 कुछ लोग, यद्यपि वे बुढ़ापे में (=वयसि) वन में रहते हैं, योगाभ्यास नही कर सकते और व्रत-भङ्ग करके दुर्गति को प्राप्त होते हैं; दूसरे लोग घर में रहकर भी अपने कर्मों को विशुद्ध करते हैं और सावधान (=अप्रमत्त) रहते हुए नैष्ठिक पद प्राप्त करते हैं। 52 अज्ञान (=तम) रूप सागर में, कुदृष्टियाँ ही जिसकी तरङ्गैं हैं और जन्म ही जिसका जल है, सङ्घर्ष करनेवाले लोगों के बीच केवल वही उस (सागर) से त्राण पाता है, जिसे स्मृति (=जागरूकता) एवं वीर्यरूपी पतवारों से युक्त प्रज्ञारूपी नाव है।" 53 इस तरह अत्यन्त विषयासक्त राजा ने सर्वज्ञ से यह धर्म-तत्त्व प्राप्त किया और अपने में यह विश्वास उत्पन्न होनेपर कि अकुशल राज्य अनित्य एवं चञ्चल है, वह मद-मुक्त हाथी की तरह गम्भीर होकर श्रावस्ती लौट गया। 54 भूपति ने उन्हें प्रणाम किया, यह जानकर दूसरे पण्डितों ने (=तीर्थिक) उन दसबल (शास्ता) को दिव्य शक्ति प्रदर्शन करने के लिये चुनौती दी; और जब पृथ्वी-पति ने उनसे वैसा करने के लिये अनुरोध किया, तब संयतात्मा (=जितात्मा) मुनि दिव्य शक्ति दिखाने को राजी हुए। 55 तब मुनि अपने प्रभा-वर्षी मण्डल के साथ ऐसे चमकने लगे, जैसे सूर्य ताराओं को निष्प्रभ कर रहा हो, और उन्होंने भाँति-भाँति की दिव्य शक्तियों द्वारा विविध मतों के शिक्षकों को पराजित करके सबको आनन्दित किया। 56 तब श्रावस्ती के लोगों द्वारा इस (ऋषि-प्रदर्शन) के लिये सम्मानित एवं पूजित होकर वह अनुत्तर माहात्म्यपूर्वक (वहाँ से) चल पड़े और अपनी माता के हित के लिये धर्मोपदेश करने के लिए स्वर्ग-लोक (=त्रिविष्टप) के ऊपर चढ़ गये। 57 तब मुनि ने अपने ज्ञान द्वारा स्वर्ग में रहनेवाली अपनी माता को दीक्षित किया; और वर्षा- ऋतु वहीं बिताकर तथा दिव्य देवों के शासक से उचित रीति से भिक्षा ग्रहणकर वह स्वर्ग-लोक से संकाश्य में उतरे। 58 देवगण, जो शान्ति प्राप्त कर चुके थे, अपने विमानों में खड़े रहे और अपनी आँखों से उनका अनुसरण किया; जैसे पृथ्वी पर गिर रहे हों, और उनका सम्मान करते समय पृथ्वी के अनेक राजाओं ने अपने मुख ऊपर उठाकर अपने मस्तकों से उनका स्वागत किया। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का "जेतवन-स्वीकार" नामक 20वाँ सर्ग समाप्त॥ इक्कीसवाँ सर्ग प्रव्रज्या-स्रोत 1 स्वर्ग में अपनी माता को तथा निर्वाण के इच्छुक दूसरे देवों (=दिवौकः) को दीक्षित करने के बाद मुनि पृथ्वी पर दीक्षा पाने योग्य लोगों को दीक्षित करते हुए घूमने लगे। 2 तब पाँच पर्वतों के बीच में स्थित नगर में विनायक ने ज्योतिष्क, जीवक, शूर, श्रोण और अङ्गद को विनीत (प्रव्रजित) किया। 3 उन्होंने राजपुत्र अभय, श्रीगुप्त, उपालि, न्यग्रोध, और दूसरों को, जो (नित्यता और विनाश के) दो अन्तों को मानते थे, उनके पूर्व-मतों से विमुख किया। 4 उन्होंने पुष्कर नामक गान्धार-राज को दीक्षित किया, जिसने धर्म-श्रवण करते ही राज्य-लक्ष्मी का परित्याग किया। 5 तब उन विपुल-पराक्रम ने विपुल पर्वत पर हैमवत और साताग्र यक्षों को दीक्षित किया। 6 जीवक के आम्र-वन में रात के समय पाँच सौ रानियों के साथ राजा (अजातशत्रु) को गुणदर्शी बुद्ध ने धर्म में स्थापित किया। 7 तब पाषाण-पर्वत पर शान्ति-परायण पारायण (नामक) ब्राह्मण आधी गाथा के सूक्ष्म अर्थ द्वारा दीक्षित हुआ।⁷⁹ ⁷⁸ - अन्तिम पाद का मूल यह हो सकता है-"योगः प्रमाणं न वयो न वंशः।" ⁷⁹ - इसका उत्तरार्ध चीनी अनुवाद से लिया गया है। 96 अश्वघोष

8 तब वेणु-कण्टक में उन्होंने नन्द की साध्वी मामा को प्रव्रजित किया, जो उत्तम जागरूकता (= सत्स्मृति)-द्वारा अपनी आँखों के आगे (गुप्त) कोषों को देखती थी। 9 तब स्थाणुमती गाँव में ब्राह्मण-श्रेष्ठ कूटदत्त, जो सब प्रकार के यज्ञ करना चाहता था, निर्वाण- धर्म में प्रवेश कराया गया। 10 तब विदेह पर्वत पर पञ्चशिख (गंधर्व-पुत्र), असुरों और देवों को (धर्म में) दृढ़ विश्वास हुआ। 11 तब अङ्ग नगर में पूर्णभद्र यक्ष तथा श्रेष्ठ, दण्ड, श्वेत, पिङ्गल व चण्ड (नामक) बड़े-बड़े साँप (= महानाग) दीक्षित हुए। 12 आपण नगर में केन्य व शेल (नामक) ब्राह्मण, जो (स्वर्ग में जन्म लेने के लिए) तप कर रहे थे, निर्वाण-पथ पर लाये गये। 13 सुह्मों के बीच भगवान् ने दिव्य शक्ति (ऋद्धि) के प्रभाव से अङ्गुलिमाल ब्राह्मण को विनीत किया, जो सौदास के समान क्रूर था ।⁸⁰ 14 भद्र में एक भद्र पुरुष के पुत्र से, जिसका नाम मेण्डक था, जिसकी आजीविका अच्छी थी, जो उदार दाता था और जो सम्पत्ति में पूर्णभद्र के समान था, सम्यक् दृष्टि ग्रहण कराई गई। 15 तब विदेह नगर में वक्ता-श्रेष्ठ ने उपदेश द्वारा ब्रह्मायु नामक व्यक्ति को जीता, जिसकी आयु ब्रह्मा की-सी लम्बी थी। 16 उन्होंने वैशाली के जलाशय में माँस-भक्षक (मर्कट नामक) राक्षस को तथा सिंह उत्तर व सत्यक-प्रमुख लिच्छवियों को भी दीक्षित किया। 17 तब अलकावती नगर में वह आर्यकर्मा, भद्र नामक एक सदाशय (उत्तम आशयवाले) यक्ष को धर्म-पथ पर लाये। 18 तब एक अत्यन्त अकुशल अटवी (जङ्गल) में बुद्ध ने आटविक यक्ष को और कुमार हस्तक को उपदेश दिया। *19 तब....नगर में निर्वाण-दर्शी ने नागायन यक्ष को निर्वाण कर उपदेश दिया और यक्ष-राज ने उन्हें प्रणाम किया। 20 गया में ऋषि ने टङ्कित ऋषियों को और खर तथा सूचीलोम नामक दो यक्षों को उपदेश दिया।⁸¹ 21 तब वाराणसी नगर में दसबलधारी ने कात्यायन नामक ब्राह्मण को प्रव्रजित किया, जो असित ऋषि का भागिनेय था। 22 तब वह अपनी दिव्य शक्ति से शूर्पारक नगर में गये और स्तवकर्णी श्रेष्ठी को उपदेश दिया, 23 जो उपदेश सुनते ही इतना श्रद्धालु हो गया कि वह मुनि-वर के लिए एक चन्दन-विहार बनाने लगा, जो सदा सुगन्धित एवं गगन-चुम्बी था। 24 तब उन्होंने तपस्वी कपिल को महीवती में विनीत किया, जहाँ एक शिला पर मुनि के पाँवों के चक्र-चिह्न देख पड़ते थे। 25 तब वरण में उन्होंने वारण (नामक) यक्ष को उपदेश दिया; उसी प्रकार मथुरा में भयानक गर्दभ दीक्षित हुआ। 26 तब स्थूलकोष्ठक नगर में विनायक ने राष्ट्रपाल कहे जानेवाले (व्यक्ति) को दीक्षित किया, जिसका धन राजा के धन के बराबर था। 27 तब वैरञ्जा में विरिञ्च-सदृश एक महासत्त्व दीक्षित हुआ और उसी तरह कल्माशदम्य में विद्वान् भारद्वाज। 28 फिर श्रावस्ती में मुनि ने सभिय, निर्ग्रन्थ नप्त्रीपुत्रों और अन्य तीर्थिकों (पंडितों) का अन्धकार दूर किया। 29 यहाँ भी ब्राह्मण याज्ञिक पुष्कलसादी एवं जातिश्रोणी तथा कोशल-राज बुद्ध-धर्म में लाये गये। 30 तब शेतविक की वन-भूमि में उत्तम-शिक्षक ने एक मैने को और एक सुगे को—द्विजों के समान विद्वान् दो द्विजों को—सिखाया। 31 तब....नगर में जङ्गली नागर तथा क्रूरकर्मा कालक व कुम्भीर शम-धर्म में लाये गये।⁸² 32 तब भार्गसों के बीच उन्होंने भेषक यक्ष को दीक्षित किया और नकुल के वृद्ध माता-पिता पर वैसा ही अनुग्रह किया। 33 कौशाम्बी में धनवान् घोषिल, कुब्जोत्तरा तथा दूसरी स्त्रियाँ और बहुत-से लोग दीक्षित हुए। 34 तब गान्धार देश में अपलाल (नामक) सर्प, जिसके इन्द्रिय विनय द्वारा शान्त हो गये, बुराई के परे चला गया। *35 तब मृत्यु (काल) के समान जलाने की इच्छा करनेवाले.... को दीक्षित कर बुद्ध ने क्रम से धर्मोपदेश किया। 36 इन तथा अन्य स्थलचारी अथवा नभचारी जीवों को दीक्षित करने से बुद्ध का यश बढ़ता ही गया, जैसे (पूर्णिमा आदि) पर्व में समुद्र। 37 उनका माहात्म्य देखकर देवदत्त को द्वेष हो गया और ध्यान-संयम खोकर उसने बहुत-से अनुचित काम किये। 38 कलुषित चित्त से उसने मुनि के सङ्घ में भेद खड़ा किया और भेद के कारण उनसे अनुराग करने के बदले उसने उन्हें क्लेश पहुँचाने का प्रयत्न किया।

⁸⁰ - सुह्म = हजारीबाग, संथाल-परगना जिलों का कितना ही अंश—बुद्धचर्या। उस देश के रहनेवाले लोग सुह्म कहलाते हैं। ⁸¹ - "टङ्कित ऋषि" से शायद "टङ्कित गुफाओं में रहनेवाले ऋषि" का अभिप्राय है। ⁸² - रिक्त स्थान में साकेत (अयोध्या) लिखा जा सकता है।

बुद्धचरित 97

39 तब गृध्रकूट पर्वत पर उसने वेगपूर्वक एक शिला लुढ़काई; किन्तु मुनि के ऊपर लक्ष्य होनेपर भी यह उनपर नही गिरी, किन्तु दो टुकड़ों में विभक्त हो गई। 40 राज-मार्ग पर उसने तथागत की ओर एक गजेन्द्र छोड़ा, जो प्रलयकालीन काले बादलों के समान गरज रहा था और जो चाँद के छिपने पर आकाश में बहनेवाली आँधी के समान दौड़ रहा था। 41 राजगृह के मार्ग उन लाशों से (पटकर) चलने योग्य नहीं रहे, जिनपर उसने अपने शरीर से चोट की थी, या जिन्हें उसने अपनी सूंड़ से ऊपर उठाया था या जिनकी अँतड़ियाँ उसके दाँतों द्वारा खींची जाकर ढेर की ढेर बिखेरी गई थीं।⁸³ 42 मांस की प्यास से उसने लोगों की जाँघें खोदीं और जब उसकी सूंड़ ने अँतड़ियों का स्पर्श किया, तब छुटकारा पाने के लिए उसने उन (अँतड़ियों) की मालाएँ खींचकर पत्थर की तरह आकाश में फेंकीं, उस समय उसके भयावने मस्तक, कानों व जीभ से लोहू चू रहा था। 43 नगर-निवासी आतंकित हुए और उससे डर गये, इसलिये कि वह रक्त-बिन्दुओं और सड़ते हुए (दुर्गंध-युक्त) रुधिर से लिप्त होकर तथा मस्तक पर व्याप्त मद-जल की गन्ध से युक्त होकर असीम क्रोध से घूम रहा था। 44 जब उन लोगों ने यम-दण्ड के समान भयानक उस मतवाले हाथी को देखा, जिसका चेहरा अविनय से फूला हुआ था, जो गरज रहा था और क्रोध से आँखें घुमा रहा था, तब राजगृह में हाहाकार मच गया। 45 कुछ लोग निराश होकर चारों ओर भागे, कुछ लोग ऐसी जगह छिप गये जहाँ वे देखे नही जा सकते थे और दूसरे ऐसे डरे कि दूसरा सब भय खोकर दूसरों के घरों में घुस गये। 46 हाथी कहीं बुद्ध को क्लेश न पहुँचावे, इस डर से कुछों ने अपनी जान की पर्वाह न की और उसके पीछे से वीरतापूर्वक चिल्लाये, जैसे कूदने को उद्यत सिंह गरज रहा हो। 47 उसी प्रकार दूसरों ने महावत का पुकारा, कुछों ने प्रार्थनापूर्वक अपने हाथ उठाये, कुछों ने तब उसे धमकाया भी और दूसरों ने उसके द्रव्य-प्रेम से प्रार्थना (अपील) की। 48 छज्जों से देखती हुई नवयुवतियाँ बाहुएँ फेंककर रोईं; कुछों ने डरकर सुवर्ण-कङ्कणयुक्त ताम्रवर्ण हाथों से आँखें मूँद लीं। 49 यद्यपि हत्या के अभिप्राय से हाथी आगे आ रहा था और रोते हुए लोग (मना करने के लिए) हाथ उठा रहे थे, तो भी सुगत शान्त एवं अविचल (-चित्त) होकर आगे ही बढ़े, न तो उन्होंने पाँव उठाना ही रोका, और न वे द्वेष के ही वशीभूत हुए।


50 शान्तिपूर्वक मुनि आगे आये; उस महागजेन्द्र को भी उन्हें स्पर्श करने की शक्ति नही थी, इसलिए कि अपनी मैत्री के कारण उनकी करुणा सब जीवों पर थी और इसलिए कि देवगण भक्तिवश उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। 51 दूर से ही गजेन्द्र को देखकर बुद्ध के पीछे पीछे जानेवाले शिष्य भाग गये। केवल आनन्द ने बुद्ध का अनुसरण किया, जैसे सहज स्वभाव विविध पदार्थों का अनुसरण करता है। 52 जब क्रुद्ध हाथी समीप आया तो मुनि के दिव्य प्रभाव से उसे होश हो गया, और अपना शरीर झुकाकर, उस पर्वत के समान जिसके पक्ष वज्र से विदीर्ण हुए हों, उसने अपना मस्तक पृथ्वी पर रक्खा। 53 जैसे सूरज अपनी किरणों से बादल को छूता है, वैसे ही मुनि ने अपने सुन्दर हाथ से, जो कमल के समान कोमल था और जिसकी सुगठित अङ्गुलियाँ (रेखा-) जाल से युक्त थीं, गजराज के माथे पर थपकी लगाई। 54 जब हाथी पानी से भरे बादल के समान उनके पाँवों पर झुका, तब ताल-पत्र-सदृश उसके (बड़े-बड़े) कानों को निश्चल देखकर मुनि ने उसे शम-धर्म का उपदेश दिया, जो बुद्धिधारी प्राणियों के लिए ही उपयुक्त है:— 55 “निरपराध (=नाग) की हत्या करने से दुःख होता है; हे हाथी, निरपराध को पीड़ित न करो। क्योंकि, हे हाथी निरपराध की हत्या करनेवाले का जीवन जन्म जन्म में आठ जन्म तक विकसित नही होता है। 56 काम मोह व घृणा, ये तीन दुर्जेय मद हैं; फिर भी मुनिगण मद-त्रय से मुक्त हैं। अतः इन तापों से अपने को मुक्त करो और दुःख के परे चले जाओ। 57 इसलिए ये अन्धकार-प्रेम (=तमःप्रसक्ति) त्याग करने के लिए मद-मुक्त होकर अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आओ। हे गजेन्द्र, काम की अधिकता से संसार-सागर के पङ्क में फिर मत गिरो।” 58 तब ये वचन सुनकर हाथी मद से मुक्त हो गया और फिर उचित मानसिक अवस्था पर लौट आया; और अमृत-पान करने पर रोग-मुक्त हुए के समान उसने उत्तम आन्तरिक (=अन्तर्गत) आनन्द प्राप्त किया। 59 गजेन्द्र ने तुरन्त मद का त्याग किया और शिष्य के समान मुनि को प्रणाम किया, यह देख कर कुछों ने वस्त्र से ढँकी बाहुएँ ऊपर फेंकीं और दूसरों ने भुजाएँ चमकाईं (घुमाईं, = √परभ्रि, √उल्लस् ), जिससे कपड़े गिर पड़े। 60 तब कुछों ने मुनि के आगे हाथ जोड़े और दूसरों ने उन्हें घेर लिया। कुछों ने उस बड़े हाथी के आर्यत्व की प्रशंसा की और दूसरों ने विस्मित होकर उसे थपकी लगाई।


⁸³ अमरावती में चित्रित इस दृश्य (Vogel—“भारत लङ्का और जावा में बौद्ध-कला”) का आधार ये ही श्लोक हैं—जौन्स्टन। 98 अश्वघोष

61 महल की स्त्रियों में से कुछों ने बहुमूल्य नये वस्त्रों से उन्हें सम्मानित किया तथा दूसरों ने उनपर भाँति-भाँति के अलङ्कारों तथा मोहक और नये हारों की झड़ी लगा दी। 62 जब काल-सदृश वह हाथी विनीत होकर खड़ा हुआ, तब जो (धर्म में) विश्वास नही करते थे वे मध्यम अवस्था में प्रविष्ट हुए, जो पहले से ही मध्यम अवस्था में थे उन्होंने विश्वास की एक विशिष्ट अवस्था प्राप्त की, और जो विश्वासी थे वे अत्यन्त दृढ़ हो गये। 63 तब अपने महल में खड़े अजातशत्रु ने गजेन्द्र को मुनि द्वारा विनीत होते देखा और वह विस्मय से अभिभूत हो गया; उसे प्रसन्नता हुई और बुद्ध में परम विश्वास हुआ। 64 जैसे कलियुग बीतने पर तथा कृतयुग शुरु होनेपर धर्म और अर्थ की वृद्धि होती है, वैसे ही मुनि अपने यश, ऋद्धियों (= चमत्कारों) एवं दुष्कर कर्मों से बढ़ने लगे। 65 किन्तु देवदत्त, द्वेषपूर्वक बहुत-से बुरे व पाप कर्म करके अधःलोग में गिरा, जो राजा और प्रजा द्वारा ब्राह्मणों एवं मुनियों द्वारा निन्दित है। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “प्रव्रज्या-श्रोत” नामक 21वाँ सर्ग समाप्त ॥ बाईसवाँ सर्ग आम्रपाली के उपवन में 1 जब वह वक्ता-श्रेष्ठ काल-क्रम से संसार पर अनुग्रह कर चुके और पृथ्वी को अपने धर्म से व्याप्त कर चुके, तब उनका चित्त निर्वाण की ओर गया। 2 तब मुनि यथासमय राजगृह से पाटलिपुत्र गये, जहाँ वह पाटलिपुत्र नामक चैत्य में ठहरे। 3 उस समय मगध-राज के मन्त्री वर्षाकार (वर्षकार) ने लिच्छवियों को शान्त रखने के लिए एक किला बनाया था। 4 तथागत ने देवताओं को वहाँ अपना कोष लाते देखा और भविष्यवाणी की : “यह नगर संसार भर में सर्वश्रेष्ठ होगा।” 5 वह उत्तम कर्मशील (कर्मी), वर्षाकार द्वारा उचित रीति से सम्मानित होकर, समुद्र की प्रधान पत्नी (महिषी) की ओर गये। 6 सूर्य के समान उज्ज्वल भगवान् जिस द्वार से निकले, उसे उस (वर्षाकार) ने गौतम-द्वार (के नाम) सम्मानित किया। 7 वह, जो कि (संसार-सागर) पार करना देख चुके थे, गङ्गातट पर आये और भाँति भाँति की नावों के साथ लोगों को देखकर उन्होंने सोचा:- 8 “प्रयत्नपूर्वक नदी पार करना मेरे लिए अनुचित होगा, इसलिए अपने ऋषि-बल से नाव के बिना ही मुझे स्वयं जाना चाहिए।” 9 इस तरह दर्शकों की दृष्टि से ओझल होकर वह तब अपने शिष्यों के साथ हवा की गति को भी मात करते हुए एक क्षण में उस पार चले गये। 10 क्योंकि मुनि जानते थे कि ज्ञानरूपी नाव से ही दुःखरूपी सागर पार किया जाता है, इसलिए उन्होंने इस (भौतिक) नाव का प्रयोग किये बिना ही गङ्गा पार की। 11 वह घाट, जहाँ से विनायक गङ्गा के उस पार गये, जगत में उनके गोत्र-नाम से (गोतम) तीर्थ होकर विख्यात है। *12 उन्हें देखकर पार होने के इच्छुक, पार हो रहे तथा पार हुए लोगों के मुख विस्मय से विकसित हुए। 13 तब बुद्ध गङ्गा तीर से कुटी नामक गाँव में गये और वहाँ धर्मोपदेश करके नादी गये। 14 उस समय वहाँ बहुत-से लोग मरे थे और मुनि ने बतलाया कि उनमें से कौन किस लोक में जन्मा और क्या होकर। 15 वहाँ एक रात रहकर श्रीघन (बुद्ध) वैशाली नगरी चले गये और आम्रपाली के प्रान्त में एक उज्ज्वल उपवन में ठहरे। 16 “तथागत यहीं हैं” यह जानकर आम्रपाली वेश्या एक साधारण रथ पर सवार हुई और अत्यन्त प्रसन्न होकर चली। 17 देव-पूजन-समय की एक कुलीन स्त्री के समान वह स्वच्छ श्वेत वस्त्र पहने हुए थी और मालाओं या अङ्गराग से रहित थी। *18 सौन्दर्य के अभिमान में वह अपने संयुक्त आकर्षणों से लिच्छवि कुल-पुत्रों की सम्पत्ति एवं चित्त आकृष्ट किया करती थी। 19 रूपवती वन-देवता के समान अपने सौन्दर्य एवं गौरव में आत्म-विश्वास करती हुई वह रथ से उतरी और तेजी से उपवन में घुस गई। 20 “उसकी आँखें चञ्चल हैं और उसके कारण कुलीन स्त्रियों को शोक होता है” यह देखकर सुगत ने दुन्दुभि की-सी वाणी में शिष्यों को आदेश दिया— 21 “यह आम्रपाली समीप आ रही है, जो दुर्बलों का मानसिक ताप है; स्मृतिरूपी रसायन से अपने अपने मन को वश में रखते हुए तुमलोग ज्ञान में स्थित हो जाओ। 22 स्मृति (अप्रमाद, सावधानी) एवं ज्ञान (प्रबोध) रहित पुरुष के लिए स्त्री के सान्निध्य (पड़ोस, समीपता) की अपेक्षा साँप या खुली तलवारवाले शत्रु का सान्निध्य अच्छा है। 23 बैठी हो या सोई, टहलती हो या खड़ी, चित्र-लिखित ही क्यों न हो, स्त्री (हर हालत में) पुरुषों के हृदय हरण करती है। 24 स्त्रियाँ विपत्ति (=व्यसन) से भी पीड़ित हों, या रोती हुई चारों ओर बाहु-लताएँ फेंक रही हों, या आकुल-केशपाश हो दग्ध हो रही हों, तो भी उसकी शक्ति उत्कृष्ट होती है। बुद्धचरित 99

25 बाहरी वस्तुओं का प्रयोग करती हुई वे अनेक आहार्य (बनावटी) गुणों से (लोगों को) ठगती हैं और अपने वास्तविक गुणों को छिपाती हुई वे मूर्खों को मोह में डालती हैं। 26 स्त्री को अनित्य दुःखमय अनात्म और अशुचि समझने से पण्डितों के चित्त उसे देखकर अभिभूत नही होते हैं। 27 जिन मनुष्यों के चित्त इन प्रलोभनों (आलय) से सुपरिचित होते हैं, जैसे कि पशु गोचर-भूमि से, वे दिव्य आनन्दों का आक्रमण होनेपर कैसे मोह में पड़ सकते हैं? 28 अतः प्रज्ञारूपी तीर लेकर, हाथों में वीर्यरूपी धनुष ग्रहण कर और स्मृतिरूपी कवच पहनकर विषयों की बातपर खूब सोचो। 29 बहकी हुई स्मृति से स्त्री की चञ्चल आँखों को देखने की अपेक्षा लोहे की गर्म काँटियों से अपनी आँखों को जला डालना अच्छा है। 30 यदि मरते समय तुम्हारा चित्त काम के अधीन हो, तो इससे तुम विवश होकर बाँधे जाओगे और पशु-योनि में या नरक में तुम्हारा जन्म होगा। 31 इसलिये इस भय को पहचानो और बाहरी लक्षणों (= निमित्त) पर ध्यान मत दो; क्योंकि वही ठीक-ठीक देखता है, जो शरीर में केवल (वास्तविक) रूप को देखता है। 32 जगत् में न तो इन्द्रिय ही विषयों को बाँधते हैं और न विषय ही इन्द्रियों को। उन (विषयों) के लिए जिस किसी को काम (पैदा) होता है, वह उससे बाँधा जाता है। 33 विषय और इन्द्रिय परस्पर आसक्त हैं, जैसे कि दो बैलों का जोड़ा एक जुए में जुता रहता है। *34 आँख आकृति को देखती है और चित्त उसपर विचार करता है, और उस विचार से विषय के बारे में काम उत्पन्न होता है और काम से मुक्ति (निष्कामता) भी। *35 तब विषयों की उचित परीक्षा नही करने से महा-अनर्थ होता है, इन्द्रियों के क्षेत्र में प्रवृत्ति (विषयासक्ति) सब विपत्तियों का घर है। 36 अतः स्मृति का त्याग नही करते हुए, परम सावधानी से चलते हुए, और अपने हित (= स्वार्थ) का ख्याल रखते हुए, तुम लोग मन से उत्साहपूर्वक भावना करो।” 37 जब उन्होंने अपने शिष्यों को, जो रूप के अन्त तक नही पहुँचे थे, इस प्रकार उपदेश दिया, तब आम्रपाली उन्हें देखकर हाथ जोड़े समीप आई। 38 शान्तचित्त मुनि को एक वृक्ष के नीचे बैठे देखकर उस (आम्रपाली) ने उन (मुनि) के द्वारा उपवन का उपभोग (= परिभोग) होने से अपने को अनुगृहीत माना। 39 तब अपनी चञ्चल आँखों को ठीक कर, उसने पूर्ण विकसित चम्पकपुष्प-सदृश मस्तक से मुनि को बड़ी श्रद्धा से प्रणाम किया। 40 जब सर्वज्ञ (मुनि) के आदेशानुसार वह बैठ चुकी, तब मुनि ने उसके समझने योग्य शब्दों में उसे कहाः-


41 “तुम्हारा यह आशय पवित्र है और तुम्हारा चित्त विशुद्धि द्वारा स्थिर है; तो भी रूपवती एवं युवती नारी में धर्म-पिपासा दुर्लभ है। 42 इसमें आश्चर्य का क्या कारण है कि धर्म, बुद्धिमान् पुरुषों को या विपत्ति-पीडि़त (= व्यसनाभिभूत) स्त्रियों को या संयतात्माओं (= आत्मवान) को या व्याधि-ग्रस्तों को आकृष्ट करे? 43 किन्तु यह असाधारण है कि विषयासक्त (= विषयैकरस) जगत् में स्वभावतः दुर्बलबुद्धि एवं चञ्चलचित्त युवती नारी धर्म-भाव का पोषण करे। 44 तुम्हारा चित्त धर्माभिमुख है, यही तुम्हारा सच्चा धन (= सदर्थ) है; क्योंकि जीवलोक अनित्य है, अतः धर्म को छोड़कर दूसरी कोई सम्पत्ति नही। 45 रोग स्वास्थ्य को गिराता है, उम्र जवानी को काटती है और मृत्यु जीवन अपहरण करती है; किन्तु धर्म के लिये ऐसी कोई विपत्ति नही। 46 (सुख की) खोज में मनुष्य को केवल प्रिय से वियोग और अप्रिय से संयोग होता है, इसलिये धर्म ही सर्वोत्तम मार्ग है। 47 दूसरों पर निर्भर होना महादुःख है और अपने पर आश्रित होना परम सुख; तो भी मानव-वंश में उत्पन्न सभी स्त्रियाँ दूसरों पर आश्रित हैं।⁸⁴ 48 इसलिए तुम उचित निष्कर्ष पर पहुॅंचो, क्योंकि पराश्रय एवं प्रसव के कारण स्त्रियों को अत्यन्त कष्ट होता है।” 49 उसने-जो उम्र में छोटी थी, किन्तु जो आशय बुद्धि एवं गम्भीरता में छोटी-जैसी नही थी- महामुनि के वचन प्रसन्नतापूर्वक सुने। 50 तथागत के धर्मोपदेश करने से उसने कामासक्त चित्त की अवस्था का परित्याग किया, स्त्रीत्व (स्त्री होने की दशा) को तुच्छ समझती हुई वह विषयों से विमुख हो गई, और अपनी जीविका के उपायों से उसे घृणा हो गई। *51 तब मञ्जरी से भरी आम्रशाखा के समान अपनी देह से प्रणिपात करते हुए उसने अपनी दृष्टि महामुनि में स्थिर की और फिर धर्म के प्रति विशुद्धदृष्टि होकर वह उठ खड़ी हुई। 52 नम्र स्वभाव होनेपर भी, धर्म-पिपासा से निरन्तर प्रेरित होती नारी ने अपने कर-कमलों को जोड़कर मृदु स्वर में कहा- 53 “हे भगवन्, आपने लक्ष्य प्राप्त कर लिया है और सांसारिक दुःख शान्त कर लिया है। अपने शिष्यों के साथ भिक्षाटन का समय मेरे लिये सफल करें.....जिससे मैं धर्मोपदेश लाभ करूँ।”


⁸⁴ - मूल श्लोक बहुत कुछ ऐसा हो सकता हैः- पराश्रयो महादुःखं स्वाश्रयः परमं सुखम्। मनुवंशे समुत्पन्नाः सर्वाः स्त्रियः पराश्रिताः ॥


100 अश्वघोष

54 तब उसकी भक्ति देख और प्राणियों को आहार पर आश्रित जान, सुगत ने मौन धारण कर अपनी सम्मति दी तथा सङ्केत (= विकार) द्वारा अपना आशय प्रकट किया। 55 परम धर्म के अधिकारी बुद्ध को, जिनकी दृष्टि अवसर को पहचानती थी, उस धर्म-पात्र में अत्यन्त आनन्द हुआ, .... श्रद्धा द्वारा श्रेष्ठ लाभ होता है, यह जानते हुए उन्होंने उस (आम्रपाली) की प्रशंसा की। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का "आम्रपाली के उपवन में मुनि का आगमन" नामक 22वाँ सर्ग समाप्त॥ तेईसवाँ सर्ग आयु निश्चित करना 1 तब मुनि का आशय समझकर, वह उन्हें प्रणाम करके नगर को लौट गई। समाचार सुनकर, लिच्छवि बुद्ध को देखने आये। 2 कुछों के घोड़े, रथ, छत्र, हार, अलङ्कार और वस्त्र श्वेत थे तथा दूसरों के सुनहले रङ्ग के थे। 3 कुछों की सब चीजें वैदूर्य के समान पीली थीं, तो दूसरों की मयूर-पुच्छ के रङ्ग की। इस तरह अपने-अपने मन के अनुकूल उज्जवल परिधान (चमकीला पहनावा) पहनकर वे बाहर आये। 4 वे, जिनके शरीर पर्वत के समान विशाल थे और जिनकी बाहुएँ सुनहले जुए के समान थीं, स्वर्ग के शरीरधारी उज्जवल .... के सदृश जान पड़े। 5 जब वे रथों से उतरने के लिए खड़े हुए, तब संध्याकालीन बादल पर पड़नेवाली बिजली की छटाओं के समान वे चमके। 6 अपने तरङ्गित शिरोवेष्टनों (पगड़ियों) को झुकाते हुए उन्होंने धैर्यपूर्वक मुनि को प्रणाम किया; अभिमानी होनेपर भी वे धर्म की अभिलाषा से मानो गम्भीर होकर वहाँ खड़े हुए। 7 बुद्ध के पास उनका निर्मल मण्डल ऐसे चमका, जैसे अनभ्र (बादलरहित) सूर्य के सामने (प्रकाश में) इन्द्र-धनुष चमक रहा हो। 8 तब सिंह और दूसरे लोग पृथ्वी पर सिंहों की आकृति से युक्त तथा सोने से अलङ्कृत सिंहासनों पर बैठ गये, और तब पुरुष-सिंह ने उनसे कहा- 9 "धर्म के प्रति आपकी यह भक्ति मूल्य में आपके रूप, राज्य व बल आदि विशेषताओं से बहुत बढ़कर है। 10 आपके सौन्दर्य, भव्य वस्त्रों, आभूषणों या हारों की वैसी चमक नहीं है, जैसे कि शील आदि गुणों की। 11 मैं वृज्जियों को अनुगृहीत और भाग्यवान् समझता हूँ कि उनके अधिपति आप हैं, जो धर्म के ज्ञाता तथा विनय के इच्छुक हैं। 12 हे आर्य, धर्म में रहनेवाले (प्रजा-) पालक साधारणतः (आर्यावर्त के) भीतर के देशों में तथा अभागों के लिए दुर्लभ हैं। 13 इस देश पर धर्म का भी अनुग्रह है कि यह धर्म-ज्ञान के रक्षक महाभागों द्वारा पालित है। 14 इसलिए, जैसे नदी पार करने की इच्छा करनेवाली गौएँ (पशु) गवांपति (झुण्ड के सरदार) का अनुसरण करती हैं, वैसे ही राजाओं से रक्षित देश में (बसने के लिए) लोग इकट्ठे होते हैं। 15 यह शील हमेशा आप में रहना चाहिए जिससे आपका धन (= स्वार्थ ?) इहलोक या परलोक में काम द्वारा नही छीना जा सके। 16 शील का फल महान् है, - सन्तुष्ट चित्त, सम्मान, लाभ, यश, विश्वास, आनन्द एवं पारलौकिक सुख। 17 जैसे पृथिवी सब चराचर जीवों का आश्रय है, वैसे ही शील सब गुणों का उत्तम आश्रय है। 18 शील छोड़कर भी परम पद चाहनेवाले मनुष्य को, उड़ने की इच्छा करनेवाले पंख-विहीन प्राणी के समान या नदी पार करने की इच्छा करनेवाले नाव-रहित व्यक्ति के समान जानिये। 19 जो मनुष्य यशस्वी, रूपवान् धनवान् होकर भी शील से विमुख है, वह उस वृक्ष के समान है जो फूला-फला होनेपर भी काँटों से भरा हो। 20 कोई मनुष्य महल में रहता हो और उज्ज्वल वस्त्र-आभूषण पहनता हो, किन्तु, यदि वह शीलवान् है तो उसकी गति महर्षि की-सी है। 21 वे सब छद्मचारी (कपटी) समझे जायेंगे, जिन्होंने, काषाय या वल्कल वस्त्र पहनते हुए भी तथा ऋषियों की भाँति तरह-तरह से केशों को सजाते हुए भी, अपना शील नष्ट कर लिया है। 22 यद्यपि कोई मनुष्य प्रतिदिन तीन बार तीर्थ में नहाता हो, अग्नि में दो बार आहुतियाँ डालता हो, अग्नि के ताप से दग्ध होता हो, तो भी शीलवान् नही होनेपर वह कुछ नही है। 23 यद्यपि वह हिंसक पशुओं के आगे अपना शरीर समर्पित करता हो, पर्वत पर से अपने को गिराता हो, आग या पानी में कूदता हो, तो भी शीलवान् नही होनेपर वह कुछ नही है। 24 यद्यपि वह थोड़ा-सा फल-मूल खाकर रहता हो, मृग के समान तृण चरता हो, हवा पीकर जीना चाहता हो, तो भी शीलवान् नही होनेपर वह शुद्ध नही हो सकता। 25 दुःशील मनुष्य पशु-पक्षियों के समान है; वह धर्म का पात्र नही है, किन्तु पानी के चूते हुए पात्र के समान है। 26 इहलोक में उसे भय, अयश, अविश्वास एवं असन्तोष मिलते हैं और परलोक में वह विपत्ति भोगेगा। 27 इसलिए मरुभूमि के पथ-प्रदर्शक की तरह शील की हत्या नही होनी चाहिए; अपने पर भी आश्रित रहनेवाला दुर्लभ शील एक नाव है, जो मनुष्य को स्वर्ग ले जाती है। बुद्धचरित 101

28 जिसका चित्त दोषों से अभिभूत होता है, वह जीवन में सब कुछ खो बैठता है। शील में स्थित होकर दोषों का नाश करो और श्रद्धा का पोषण करो (या जो कुछ अच्छा है वह करो)। 29 इसलिए उन्नति चाहनेवाला आदमी पहले अपने को आत्मभाव (अहंभाव) से मुक्त करे; क्योंकि आत्मभाव गुणों को वैसे ही छिपाता है, जैसे धुँआ आग को। 30 गुण, वास्तव में होनेपर भी, अभिमान से अभिभूत होकर नही चमकते, जैसे बादलों से ढँके हुए तारे, सूरज व चाँद नहीं चमकते। 31 औद्धत्य लज्जा (= ह्री) को नष्ट करता है, शोक धैर्य को, बुढ़ापा सौन्दर्य को और आत्मभाव गुणों के मूल को। 32 द्वेष एवं अभिमान के कारण असुरगण देवों से पराजित होकर पाताल में फेंके गये और त्रिपुर नाश को प्राप्त हुआ। 33 वह मनुष्य बुद्धिमान् नही समझा जाता है, जो अनित्य जीवन में अपने को सबसे अच्छा, न कि बुरा, समझता है। 34 यद्यपि यह आकृति ही अस्थिर है तथा मनुष्य अनित्य व विनाशधर्मा है, तो भी “मैं ही” (अहमेव) यह सोचता हुआ वह अभिमान करता है- इसमें विवेक-शून्यता के अतिरिक्त और क्या है? 35 कामराग प्रबल प्रच्छन्न एवं सहजात शत्रु है, जो बुराई करनेवाले दुश्मन के समान मित्रता के वेष में प्रहार करता है। 36 कामराग की अग्नि तथा साधारण अग्नि समानरूप से दहनशील है, किन्तु कामराग की अग्नि प्रज्वलित होनेपर रात अवश्य लम्बी होगी। 37 कहा जाता है कि अग्नि की वैसी शक्ति नही है जैसी कि कामराग की अग्नि की; क्योंकि अग्नि जल से शान्त हो जाती है, किन्तु कामराग की अग्नि सम्पूर्ण सरोवर से भी नही। 38 आग से जङ्गल जलनेपर जङ्गल के वृक्ष समय पर उत्पन्न हो जाते हैं, किन्तु कामराग की अग्नि से दग्ध होनेपर मूर्खों में धर्म की उत्पत्ति नही होती है। 39 कामराग के कारण मनुष्य सुख खोजता है और सुख के लिए बुराई (अकुशल कर्म) करता है; बुराई करने से नरक में गिरता है। कामराग के समान शत्रु नही। 40 काम से इच्छा उत्पन्न होती है और इच्छा से कामासक्ति। कामासक्ति से मनुष्य को दुःख होता है। काम के समान शत्रु नही। 41 मूर्ख कामनामक महाव्याधि की पर्वाह नही करता और ... ... ... ... ... ... । 42 काम को अनित्य अपवित्र दुःखधर्मा एवं अनात्म समझकर यदि कोई मनुष्य अपने को उससे मुक्त भी कर ले, तो भी अपने कुमार्गगामी चित्त के कारण वह फिर काम के वशीभूत हो जाता है।

43 इसलिए वस्तु से अनुराग पैदा होनेपर जो कोई उसे वास्तविक अवस्था में (= यथाभूतं) देख सकता है, वह वास्तविकतादर्शी (= भूतदर्शी) कहा जाता है। 44 जैसे (किसी वस्तु के) गुणों को देखने से आसक्ति उत्पन्न होती है, वैसे ही इसके दोषों पर विचार करने से क्रोध (विमुखता ?) होता है। 45 इसलिए जो कोई क्रोध रोकना चाहे, वह अपने को विमुखता से प्रभावित न होने दे; क्योंकि जैसे आग से धुँआ निकलता है, वैसे ही विमुखता से क्रोध उत्पन्न होता है। 46 जैसे रूपवानों के लिए बुढ़ापा और आँखवालों के लिए अन्धेरा है वैसे ही क्रोध, धर्म अर्थ व काम का विफलीकरण तथा विद्या का शत्रु है। 47 क्रोध चित्त का घना अन्धकार है, मित्रता का प्रधान शत्रु है, सम्मानविनाशक और अपमानजनक है। 48 इसलिए क्रोध न कीजिए, यदि आप करते भी हों तो इसे छोड़ दीजिए। जैसे दंशधर्मा साँप के पीछे आप नही पड़ते हैं, वैसे ही क्रोध के पीछे न पड़े। 49 जो कोई मार्ग से बहके हुए रथ के समान क्रोध को लगाम लगाकर दृढ़तापूर्वक वश में रखता है उसी को मैं सच्चा सारथि समझता हूँ, दूसरे प्रकार का सारथि तो केवल लगाम पकड़नेवाला है। $^{85}$ 50 जो कोई क्रोध करना चाहता है और इसकी उत्पत्ति को रोकना नही चाहता है, क्रोध बीतने पर वह ऐसे जलता है जैसे आग छूने से। 51 जब मनुष्य क्रोध करता है तो पहले उसका ही चित्त जलता है; पीछे ज्यों ज्यों क्रोध बढ़ता जाता है त्यों त्यों, दूसरे भी, इससे जल सकते हैं या नही भी (जल सकते हैं)। 52 शरीर-धारी शत्रुओं के प्रति द्रोह करने से क्या लाभ, जब कि (शरीर-धारी प्राणियों का) संसार ही रोग आदि विपत्तियों से पीड़ित है? 53 इसलिए संसार को दुःख के वशीभूत जानकर आप लोगों को क्रोध रोकने के लिए सब जीवों के प्रति मैत्री एवं करुणा का आचरण करना चाहिए।” 54 उस समय उन्हें दोषों से भरा देखकर, बुद्ध ने उनके ऊपर करुणा की और उपदेश देकर, उन्हें फटकारा।

$^{85}$ - यो वे उप्पतितं कोधं रथं भन्तं' व धारये। तमहं सारथि ब्रूमि रस्मिग्गाहो इतरो जनो ॥ -धम्मपद कोधवग्गो, 17.2 अर्थ-“जो आए क्रोध को उसी तरह रोक ले, जैसे कोई मार्ग-भ्रष्ट रथ को; उस आदमी को मैं (असली) सारथी कहता हूँ; दूसरे लोग तो केवल रस्सी पकड़नेवाले हैं।” यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा। स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते ॥ -महाभारत, आदिपर्व।

102 अश्वघोष

55 जैसे अस्वस्थ मनुष्यों को रोग-मुक्त करने के लिए, वैद्य उनकी शारीरिक अवस्थाओं के अनुसार ओषधि-सेवन का आदेश देता है, 56 वैसे ही काम बुढ़ापा आदि रोगों से पीड़ित प्राणियों के आशय जानकर मुनि ने उन्हें तत्त्व-ज्ञान की ओषधि दी। 57 मुनि के ऐसे उपदेश से लिच्छवियों को आनन्द हुआ और उन्होंने सिर नवाकर उन्हें प्रणाम किया, जिससे उनकी रत्नमय चूड़ाएँ नीचे लटकने लगीं। 58 तब हाथ जोड़कर और कुछ कुछ देह नवाकर, उन्होंने अपने यहाँ आने के लिए बुद्ध से अनुरोध किया, जैसे देवताओं ने बृहस्पति से अनुरोध किया था। 59 जब मुनि ने उनसे निवेदन किया कि आम्रपाली की पारी पहले आई और बताया कि कुल-पुत्रों के निमित्त नीच कुलवालों को उनके अधिकारों से वञ्चित नहीं करना चाहिए। 60 उस स्त्री ने उन लोगों को पहले ही आकर वञ्चित कर दिया, यह जानकर उन्होंने तथागत का अत्यन्त सम्मान किया, और वे अपनी स्वाभाविक मानसिक अवस्था (क्रोध) पर लौट आये। 61 किन्तु जब तथागत ने उन्हें उपदेश दिया, तब उन्होंने मानसिक शान्ति प्राप्त की, जैसे मुनियों के मन्त्रों का ठीक ठीक उच्चारण करने से साँप का विष शान्त हो जाता है। 62 रात बीतनेपर आम्रपाली ने उनका आतिथ्य किया और (वर्षावास करने के लिए वह) वेणुमती गाँव को (गये)। 63 वर्षाऋतु वहाँ बिताकर महामुनि वैशाली लौट गये और मर्कट-जलाशय के किनारे बैठ गये। 64 वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गये और जब वह वहाँ विराज रहे थे तो मार उस वन में आया और उनके समीप जाकर कहा- 65 "पूर्व में, हे मुनि, नैरञ्जना नदी के तीर पर जब मैंने आपसे कहा था "आपने अपना काम पूरा किया, निर्वाण प्राप्त कीजिए" तब आपने वहाँ उत्तर दिया था:- 66 "मैं तबतक निर्वाण प्राप्त न करूँगा, जबतक पीड़ित प्राणियों की रक्षा न कर लेता हूँ और उनके द्वारा पाप-परित्याग (दोषक्षय) न करा लेता हूँ।" 67 अब बहुतों ने मुक्ति (निर्वाण) पाई, या उसी तरह पाना चाहते हैं या पायेंगे। इसलिए निर्वाण प्राप्त कीजिए।" 68 तब ये वचन सुनकर, अर्हत्-श्रेष्ठ ने उससे कहा, "तीन महीने में मैं निर्वाण प्राप्त करूँगा, अतः अधीर मत होओ।" 69 तब इस प्रतिज्ञा से अपनी इच्छा पूरी हुई जानकर, वह अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ से हट गया। 70 तब महामुनि ऐसे योग-बल से चित्त-समाधि में प्रविष्ट हुए कि उन्होंने अपनी शारीरिक आयु (जीवन) को छोड़ दिया और दिव्य शक्ति के प्रभाव से अभूतपूर्व तरीके से प्राण धारण किया।


71 जिस घड़ी उन्होंने शारीरिक आयु का परित्याग किया उस घड़ी पृथ्वी माती हुई स्त्री के समान काँपी और दिशाओं से बड़ी बड़ी उल्काएँ गिरीं, जैसे अग्नि प्रज्वलित मेरु-पर्वत से पत्थरों की वर्षा हो रही हो। 72 उसी प्रकार इन्द्र के अग्निगर्भ एवं विद्युन्मण्डित वज्र चारों ओर निरन्तर प्रदीप्त हुए; और ज्वालाएँ सर्वत्र प्रज्वलित हुईं, जैसे कल्पान्तकालीन जगत् को जलाने की इच्छा कर रहीं हों। 73 पर्वतों ने, जिनकी चोटियाँ नष्ट हो गईं, ढेर के ढेर टूटे हुए वृक्ष चारों ओर बिखरे और आकाश में दुन्दुभियों से, जैसे वायुपूर्ण गुफाओं से, विषम ध्वनि निकली। 74 तब मर्त्यलोक दिव्यलोक एवं आकाश में हुए सार्वभौम संक्षोभ की घड़ी में महामुनि ने गम्भीर समाधि से निकल कर ये वचन कहे:- 75 "मेरा शरीर, जिसकी आयु मुक्त हो गई है, उस रथ के समान है, जिसका धुरा (अक्षाग्र, अक्षधुरा) टूट गया हो और मैं इसे अपनी शक्ति से ढो रहा हूँ। अपनी आयु के साथ मैं भव- बन्धन से मुक्त हूँ, जैसे अण्डे से निकलते समय अण्डे को फोड़नेवाला पक्षी (बन्धन से मुक्त होता है)।" ॥ बुद्धचरित महाकाव्य का "आयु निश्चित करना"⁸⁶ नामक 23वाँ सर्ग समाप्त ॥ चौबीसवाँ सर्ग लिच्छवियों पर अनुकम्पा 1 तब भूकम्प देखकर, आनन्द को रोमाञ्च हो गया; और "क्या होगा" इससे घबराकर ( = आगतवेगः) वह काँपने लगा और आर्त हो गया। 2 उसने कारण जाननेवाले सर्वज्ञ से इसका कारण पूछा। तब मुनि ने मतवाले साँड के स्वर में उसे कहा:- 3 "इस भूकम्प का कारण यह है कि मैंने पृथ्वी पर अपने दिन काट डाले हैं; मेरे जीवन के अब तीन महीने बचे हुए हैं (मेरी आयु अब से तीन महीने पर अधिष्ठित है)।" 4 यह सुनकर आनन्द अत्यन्त विचलित हो गया और उसके आँसू बहने लगे, जैसे किसी बड़े हाथी द्वारा तोड़े गये चन्दन-वृक्ष से रस बह रहा हो। 5 बुद्ध उसके स्वजन और गुरु थे, इस कारण उसे शोक हुआ और अत्यन्त दुःखी होकर उसने दीनतापूर्वक विलाप किया:- 6 "अपने गुरु का निश्चय सुनकर, मेरा शरीर मानो डूब रहा है, मेरी ग्रन्थियाँ ढीली हो रही हैं और धर्मोपदेश, जो कि मैंने सुना है, आकुल हो रहा है।


⁸⁶- शारीरायुःसंस्काराधिष्ठान = शारीरिक आयु के संस्कारों का अधिष्ठान = आयु पर अधिकार प्राप्त करना, या आयु निश्चित करना।

बुद्धचरित 103

7 अहो! पुरुष-शंसित (= नराशंस) तथागत शीघ्रता से निर्वाण की ओर जा रहे हैं, जैसे फटे- पुराने वस्त्रवाले, जाड़े से ठिठुरे हुए लोगों के लिए आग तेजी से बुझ रही हो। 8 पापों (= दोष) के महावन में भटके हुए शरीरधारी प्राणियों को मार्ग बतलाकर, पथ-प्रदर्शक अकस्मात् ही अदृश्य हो रहा है। 9 प्यास से पीड़ित मनुष्य लम्बे मार्ग पर चल रहे हैं और तब उनके मार्ग में स्थित शीतल जल का जलाशय हठात् ही सूख रहा है। 10 नीली पपिनयोंवाला निर्मल लोक-चक्षु, जो भूत वर्तमान एवं भविष्य को देखता है और जो ज्ञान से विकसित है, अब बन्द होने को है।⁸⁷ 11 अवश्य ही सूख रही लगी फसल के ऊपर जल बरसाकर बादल दूर हो रहा है (= √मज्ज)। 12 अज्ञानरूप अन्धकार के कारण मार्ग-भ्रष्ट प्राणियों के लिए चारों ओर चमकनेवाला प्रकाश अत्यन्त अकस्मात् ही शान्त हो रहा है।” 13 तब आनन्द के चित्त को शोकाकुल देखकर तत्त्वज्ञ-श्रेष्ठ ने, जो सान्त्वना देनेवालों में प्रधान थे, उसके लिए तत्त्व की व्याख्या की:– 14 “पहचानो, आनन्द, जगत् के वास्तविक स्वभाव को और शोक न करो। क्योंकि यह जगत् समष्टि है और इसलिए संस्कृत (उत्पन्न) होने के कारण अनित्य है। 15 मैंने पहले ही तुम्हें कहा है कि द्वन्द्वों में आनन्द पानेवाले प्राणियों को तुम्हें अत्यन्त स्नेह-रहित (?) अनुकम्पा के साथ देखना चाहिए। 16 जो कुछ उत्पन्न है वह संस्कृत और अनित्य है, किसी सहारे पर आश्रित होने के कारण इसे अपना आश्रय नहीं है। तब किसी के लिए भी नित्यत्व प्राप्त करना शक्य नहीं है।⁸⁸ 17 यदि पृथ्वी के प्राणी नित्य (स्थायी) होते तो, तो जीवन (= प्रवृत्ति) परिवर्तनशील नहीं होता; और तब मुक्ति (निर्वाण) की भी क्या जरूरत होती? क्योंकि अन्त वैसा ही होता जैसा कि आरम्भ। 18 या मेरे लिए तुम्हारी तथा अन्य लोगों की यह अभिलाषा ही क्या? . . .। 19 मैंने सम्पूर्ण मार्ग तुम्हें दृढ़तापूर्वक बतला दिया है। तुम्हें तथा (दूसरे) शिष्यों को समझना चाहिए कि बुद्ध कुछ छिपाते नहीं। 20 चाहे मैं रहूँ या निर्वाण प्राप्त करूँ, एक ही बात है, वह यह कि तथागत धर्म की मूर्ति (= धर्मकाय) हैं; यह मर्त्य शरीर किस काम का? ⁸⁷- “जो ज्ञान से विकसित है” इसकी जगह चीनी अनुवाद में है “जो प्रज्ञा द्वारा अन्धकार को दूर करता है”। ⁸⁸- “किसी नहीं है” की जगह चीनी अनुवाद में है “यह दीनतापूर्वक किसी सहारे पर आश्रित है।” 21 क्योंकि मेरे जाने के समय संवेग व अप्रमाद द्वारा पूर्ण श्रद्धा पूर्वक मेरा प्रदीप जलाया गया है, इसलिए धर्म का प्रकाश हमेशा रहेगा। 22 इसे अपना प्रदीप समझकर तुम्हें इसमें दृढ़ उत्साह के साथ लगना चाहिए; और निर्द्वन्द्व होकर अपना लक्ष्य (= स्वार्थ) पहचानो तथा अपने मन को दूसरी बातों का शिकार मत होने दो। 23 तुम्हें जानना चाहिए कि धर्म-प्रदीप है प्रज्ञा-प्रदीप, जिसके द्वारा चतुर व विद्वान् पुरुष अज्ञान दूर करता है, जैसे कि प्रदीप अन्धकार (दूर करता है)। 24 परम श्रेय प्राप्त करने के चार क्षेत्र (= गोचर) हैं—शरीर, वेदना, चित्त और अनात्मता। 25 अस्थि, चर्म, रक्त, स्नायु, मांस केश आदि से भरे इसे शरीर में गन्दगी देखनेवाले को शरीर के प्रति आसक्ति नहीं होती। 26 वेदनाएँ दुःख हैं और प्रत्येक वेदना भिन्न भिन्न कारणों से उत्पन्न होती है, ऐसा जो देखता है वह सुख के भाव (= सञ्ज्ञा) को जीत लेता है। 27 जो शान्त चित्त से (मानसिक) धर्मों की उत्पत्ति स्थिति व क्षय को देखता है, वह कुदृष्टि को ग्रहण नहीं कर सकता। 28 स्कन्धों की उत्पत्ति कारणों से होती है, ऐसा जो देखता है उसके लिए “अहं” में विश्वास (श्रद्धा) पैदा करनेवाला आत्मभाव बन्द हो जाता है। 29 दुःख अन्त करने का यही एक मार्ग है; इन चारों के बारे में उसी प्रकार (धर्म-) मार्ग पर सावधान रहो। 30 उसी तरह, मेरे उस पार चले जानेपर, जो लोग इस पर स्थित रहेंगे, वे उत्तम अहार्य एवं नैष्ठिक पद प्राप्त करेंगे।” 31 इस तरह विनायक ने आनन्द को उपदेश दिया; और यह समाचार सुनकर, बुद्ध की भक्ति से लिच्छवि वहाँ दौड़े आये। 32 दया एवं मुनि-भक्ति के कारण उनके चित्त संताप से अभिभूत हुए और यह समाचार सुनकर, उन्होंने तुरत उन कार्यों को, जिनमें वे व्यस्त थे, तथा साधारण आडम्बर (= ऋद्धि) को छोड़ दिया। 33 गुरु से बोलने की इच्छा से वे उन्हें प्रणाम करके एक ओर खड़े हो गये और उनकी बोलने की इच्छा जानकर गुरु ने उन्हें यों कहा– 34 “मेरे प्रति तुम लोगों के चित्त में जो कुछ हो रहा है वह सब मैं जानता हूँ; तुम लोग वही होते हुए भी मानो शोक से बदलकर अब.......। 35 लक्ष्मी के साथ रहते हुए भी तुम लोगों में बाहरी दीप्ति और धर्म का ज्ञान दोनों विद्यमान हैं। 36 यदि मुझसे कुछ सुनकर तुम लोगों ने ज्ञान प्राप्त किया है, तो अपने को शान्त करो और मेरे चले जाने (= व्यय) से दुःखी मत होओ। 104 अश्वघोष

37 क्योंकि जीवन (=प्रवृत्ति) अनित्य व संस्कृत है, इसलिए वे नश्वर परिवर्तनशील असार और अविश्वसनीय हैं; उनमें कुछ भी स्थायित्व नही है। 38 वसिष्ठ, अत्रि और दूसरे सभी तपस्वी (ऊर्ध्वरेतस्) काल के वशीभूत हुए। यहाँ का अस्तित्व ही विनाशक है। 39 पृथ्वीपति मान्धाता, वासवतुल्य वसु और भाग्यशाली (=महाभाग) नाभाग (पञ्च-) महाभूतों में मिल गये। 40 मार्ग पर चलनेवाला ययाति भी, भव्य रथवाला भगीरथ, निन्दा व अयश प्राप्त करनेवाले कौरव, राम गिरिरजस, अज, 41 ये महात्मा महर्षि और महेन्द्र के समान अनेक दूसरे लोग नाश को प्राप्त हुए; क्योंकि ऐसा कोई नही जिसका नाश नही होता। 42 सूर्य अपने स्थान से च्युत होता है, सम्पत्तिशाली देवगण पृथ्वी पर आये, शत शत इन्द्र चले गये; क्योंकि कोई सदा नही रहता। 43 दूसरे सब सम्बुद्धों ने जगत् को प्रकाशित कर उन दोषों के समान, जिनका तेल क्षीण हो गया हो, निर्वाण प्राप्त किया। 44 भविष्य में तथागत होनेवाले सब महात्मा भी, उन अग्नियों के समान, जिनका जलावन जल गया हो (=भुक्तेन्धनाः), निर्वाण प्राप्त करेंगे। 45 इसलिए मुझे भी मुक्ति की खोज करनेवाले वनवासी तपस्वी के समान चला जाना चाहिए; क्योंकि मैं जो इस व्यर्थ शारीरिक अस्तित्व (=नाम-रूप) को घसीटूँ, इसका कोई कारण नही। 46 क्योंकि इस रमणीय वैशाली से, जिसमें कुछ लोग दीक्षित होने को हैं ही, मेरा आशय प्रस्थान करने का है, इसलिए तुम्हें दूसरे पथ का अनुसरण न करना चाहिए (या अन्यमनस्क न होना चाहिए)। 47 अतः इस जगत् को निराश्रय दीन व अनित्य जानो; और निष्काम भाव से रहते हुए संवेग प्राप्त करो। 48 इस तरह संक्षेप में, जब क्रम से तथागत फिर न देख पड़ें, तब कुबेर की दिशा (उत्तर) की ओर बढ़ो, जैसे कि जेठ महीने में सूर्य (उत्तर की ओर बढ़ता है)।” 49 तब लिच्छवि अश्रुपूर्ण आँखों से उनके पीछे पीछे जाने लगे; और आभूषणों-भरी मोटी भुजाओं से उन्होंने हाथ (=करतल) जोड़कर विलाप किया:– 50 “अहो! विशुद्ध-सुवर्ण-सदृश गुरु का शरीर, जो 32 लक्षणों से युक्त है, भग्न होगा। करुणामय भगवान् भी अनित्य हैं। 51 बेचारे बछड़े, जिन्हें अबतक होश (बुद्धि) नही हुआ है, दूध के अभाव में प्यासे हैं, और ज्ञान की दुधार गाय, अहो! उन्हें अति शीघ्रता से छोड़ रही है। 52 मुनि वह सूर्य हैं, जिनके ज्ञानरूपी प्रकाश ने प्रदीप-रहित मनुष्यों का मोहान्धकार दूर कर दिया है, और यह सूर्य हठात् ही अस्त होगा। 53 जब कि जगत् में अज्ञान-धारा जहाँ तहाँ बह रही है, धर्म का दूरव्यापी बाँध शीघ्र ही टूट रहा है। 54 करुणामय महाभिषक् को उत्तम ज्ञानरूपी ओषधि है, तो भी मानसिक आधियों से पीड़ित जगत् को छोड़कर वह प्रस्थान करेंगे। 55 मन के हीरों से अलङ्कृत और प्रज्ञारूपी आभूषणों से भूषित इन्द्र-पताका का पतन होगा, जब कि उत्सव के अवसर पर लोग इसके प्यासे ही हैं। 56 दुःख-भागी जगत् के लिए, जो भव-चक्र के बन्धनों से बँधा हुआ है, यह मुक्ति-द्वार है और मौत इसे दृढ़तापूर्वक बन्द कर देगी।” 57 इस प्रकार अश्रु-आविल आँखों से लिच्छवियों ने विलाप किया और जब वे उनके पीछे पीछे जाने लगे, तो मुनि ने उन्हें फिर लौटा दिया। 58 तब मुनि का निश्चय जानकर वे शान्त हो गये और अत्यन्त शोकित होकर उन्होंने लौटने का विचार किया। 59 वे, जो सोने के पहाड़ के समान सुन्दर थे, मुनि के पाँव पड़ते समय कर्णिकार वृक्षों के समान शोभित हुए जिनके फूल हवा में हिल रहे हों। 60 उनके हृदय उनमें अनुरक्त थे, उनके पाँव लड़खड़ा रहे थे, और धारा के विरुद्ध चलती हुई तरङ्गों के समान, वे आगे बढ़े बिना ही लौट गये। *61 .... .... , मुनि में उनका आनन्द और मुनि के प्रति उनकी श्रद्धा अविचल थी। *62 जङ्गल के गवांमति के चले जानेपर महावृषभों के समान वे खड़े हो होकर दशबलधारी की ओर बार बार देख रहे थे। 63 तब तथागत में लगे चित्त से और अत्यन्त कान्तिहीन शरीर से वे शोकित होकर पैदल ही जाने लगे, जैसे अन्त्य कर्म के मृत-स्नान के लिए जा रहे हों।⁸⁹ *64 लिच्छवि (लाचार होकर) अपने महलों में लौट आये और यद्यपि उन्होंने धनुषों से, जिनका निशाना कभी चूका नही, शत्रुओं को पराजित किया था, यद्यपि वे अभिमानी एवं बलवान् थे, यद्यपि वे संसार में साम्राज्य पाने के लिए यत्न करते थे और यद्यपि सुख के साधनों पर उनका अधिकार महान् था, तो भी वे विषण्णवदन थे। ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “लिच्छवियों पर अनुकम्पा” नामक 24वाँ सर्ग समाप्त ॥ ⁸⁹ - किसी के मरनेपर स्नान करनेवाले को “अपस्नात” या “मृतस्नात” कहते हैं। बुद्धचरित 105