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बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

52 जब उसने सब कर्त्तव्य (करणीय) पूरा किया, तब सर्वज्ञ ने वृषभ के-से ऊँचे स्वर में पूछा- “क्या तुमने ज्ञान प्राप्त किया?” उस महात्मा ने उत्तर दिया- “हाँ, मैंने आपका उत्तम विचार जाना।” 53 तब “हाँ, मैंने जाना” यह कहनेवाले कौण्डिन्य ने जगत् में (पहले-पहल) उस पद का ज्ञान ग्रहण किया और आर्य गुरु तथागत के भिक्षुओं में प्रधान धर्म-ज्ञाता हुआ। 54 पृथ्वी पर रहनेवाले यक्षों ने यह शब्द सुनकर गूँजती वाणी में घोषणा की- “यह ध्रुव है कि श्रेष्ठ दृष्टिमान् ने सब जीवों की अमर शान्ति के लिए धर्म-चक्र को अच्छी तरह चलाया। 55 शील इसके आरे (= अणि, कीलक) हैं, शम एवं विनय इसकी पुट्ठियाँ (= नेमि) हैं, यह बुद्धि (?) में विशाल है और स्मृति (जागरूकता) एवं मति (ज्ञान) से स्थिर है, लज्जा (= ह्री) इसकी नाभि है। गम्भीरता असत्य-अभाव तथा उपदेश की उत्तमता के कारण त्रिभुवन में उपदिष्ट होते समय यह धर्म-चक्र अन्य शास्त्रों द्वारा उलटाया नही जा सकता।” 56 पर्वत पर के यक्षों के शब्द सुनकर स्वर्ग के देव-सङ्घों ने ध्वनि ग्रहण की ओर उसी तरह परलोक से परलोक को ब्रह्मलोक तक यह जोरो से चढ़ गई। 57 महर्षि से 'तीनों लोग अनित्य हैं' यह सुनकर कुछ संयतात्मा (= आत्मवान्) देवगण (= दिवौकस) इन्द्रिय-विषयों से विरत हुए और चित्त में संवेग होने के कारण उन्होंने तीन भवों के विषय में शान्ति पाई।⁶⁴ 58 जब तीन लोकों (त्रिभुवन) की परम शान्ति के लिए स्वर्ग में और पृथ्वी पर धर्म-चक्र उस तरह चलाया गया, तब उस मुहूर्त में अनभ्र आकाश से फूलों से भरी जल-वृष्टि हुई और तीन लोकों के निवासियों ने बड़ी बड़ी दुन्दुभियाँ बजाईं ॥ ॥बुद्धचरित महाकाव्य का “धर्मचक्र-प्रवर्तन” नामक 15वाँ सर्ग समाप्त ॥ सोलहवाँ सर्ग अनेक शिष्य 1 तब सर्वज्ञ ने अध्रिजित् तथा अन्य संयतचित्त भिक्षुओं को निर्वाण-धर्म में स्थापित किया। 2 उन पञ्च-वर्गीय (भिक्षुओं) से घिरे (बुद्ध) आकाश के उस चन्द्रमा के समान शोभित हुए, जो सूर्याधिपति (जिसका अधिपति सूर्य है) नक्षत्र (हस्ता) के पाँच तारों से युक्त हो। 3 उस समय यश नामक कुल-पुत्र (या श्रेष्ठी के पुत्र) ने असावधानी से सोई हुई कुछ स्त्रियों को देखा और इससे उसके चित्त में संवेग हो गया। ⁶⁴- लोक (= भव) तीन हैं; रूप अरूप और काम। 82 अश्वघोष 4 “यह सब इतना कृपण है”, यह वचन कहकर, उज्ज्वल आभूषणों से चमकता हुआ, वह वहाँ गया जहाँ बुद्ध थे। 5 उसे देखकर मनुष्यों के आशय और दोष जाननेवाले तथागत ने कहा- “निर्वाण के लिए कोई निश्चित समय नही, यहाँ आओ और सौगत्य प्राप्त करो।” 6 जिनका यश दूर तक फैला हुआ था उनके ये वचन सुनकर, आतप से पीड़ित होकर नदी में प्रवेश करनेवाले के समान, उसने अत्यन्त मानसिक शान्ति पाई। 7 तब पूर्व कारण के बल से उसने उसी शरीर में (अर्थात् गृहस्थ वेष में ही) शरीर व मन से अर्हत्-पद (= अर्हत्त्व) का अनुभव किया। 8 जैसे खारे जल से स्वच्छ हुआ वस्त्र रङ्ग ग्रहण करता है वैसे ही उस निर्मल-चित्त ने सद्धर्म को सुनते ही पूरा-पूरा समझ लिया। 9 उन वक्ता-श्रेष्ठ (= वदतां वरः) ने, जो अपना कार्य पूरा कर चुके थे और जो अच्छे लक्ष्य को जानते (= जानन् सदर्थे) थे, अपने वस्त्रों के कारण उसे वहाँ लज्जित होते देखकर कहाः- 10 “भिक्षु-वेष धर्म का कारण नहीं है; जो सब जीवों को समान भाव से देखता है और जिसने शम एवं विनय द्वारा अपने इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह आभूषण पहनकर भी धर्म में विचरण करता है। 11 जो शरीर से घर को छोड़ता है चित्त से नही और जो काम के अधीन है, वह वन में रहने पर भी गृहस्थ समझा जाता है। 12 जो चित्त से जाता है किन्तु शरीर से नही और जो अनात्म है, वह घर में रहने पर भी वनवासी समझा जाता है। 13 जिसने यह सिद्धि पाई है वह मुक्त कहा जाता है, चाहे घर में रहता हो या भ्रमणशील भिक्षु हो गया हो। 14 जैसे विजय चाहनेवाला (राजा) विपक्षी सेना को जीतने के लिए कवच पहनता है, वैसे ही दोषों की विपक्षी सेना को जीतने के लिए आदमी (भिक्षु-) वेष ग्रहण करता है।” 15 तब तथागत ने उसे कहा- “यहाँ आओ, भिक्षु”। यह वचन सुनकर वह भिक्षु-वेष पहने हुए आया। 16 तब उसने अनुरक्त होने के कारण उसके मित्रों ने, जो संख्या में 50 और 3 और 1 (= 54) थे, धर्मलाभ किया। 17 जैसे क्षार से लिपे वस्त्र, जल के स्पर्श से तुरत साफ हो जाते हैं, वैसे ही पूर्व युगों में उनके कर्म पवित्र हो चुकने के कारण वे तुरत पूत हो गए। 18 उस समय शिष्यों की पहली टोली में कुल 60 हुए, जो अर्हत् भी थे; और तब अर्हतों द्वारा सम्यक् रूप से सम्मानित होकर उन अर्हत् ने उन्हें यों कहाः-

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