बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसङ्ख्यादिभिर्मुक्तश्च निर्गुणो न भवत्ययम्। तस्मादसति नैर्गुण्ये नास्य मोक्षोऽभिधीयते ॥१२.७७ और सङ्ख्या आदि से मुक्त नही होनेपर वह (=आत्मा) निर्गुण नही होता है, इसलिए निर्गुण न होनेपर इसे मोक्ष हुआ, ऐसा नहीं कह सकते ॥77॥ गुणिनो हि गुणानां च व्यतिरेको न विद्यते। रूपोष्णाभ्यां विरहितो न ह्यग्निरुपलभ्यते ॥१२.७८ गुणी व गुण जुदा-जुदा नही रह सकते। रूप व गर्मी से रहित अग्नि नही पाई जाती ॥78॥ प्राग्देहान्न भवेद्देही प्राग्गुणेभ्यस्तथा गुणी। तस्मादादौ विमुक्तः सन् शरीरी बध्यते पुनः ॥१२.७९ देह से पूर्व देही नही, उसी तरह गुणों से पूर्व गुणी नही, इसलिए शुरु में मुक्त होनेपर भी शरीरी (=आत्मा) फिर (शरीर में) बद्ध होता है ॥79॥ क्षेत्रज्ञो विशरीरश्च ज्ञो वा स्यादज्ञ एव वा। यदि ज्ञो ज्ञेयमस्यास्ति ज्ञेये सति न मुच्यते ॥१२.८० और शरीर-रहित क्षेत्रज्ञ ज्ञ (=जाननेवाला) या अज्ञ है। यदि ज्ञ है, तो इसके लिए ज्ञेय (जानने को शेष) है और ज्ञेय होनेपर यह मुक्त नहीं हैं ॥80॥ अथाज्ञ इति सिद्धो वः कल्पितेन किमात्मना। विनापि ह्यात्मनाऽज्ञानं प्रसिद्धं काष्ठकुड्यवत् ॥१२.८१ यदि आपके अनुसार अज्ञ साबित होता है, तो आत्मा की कल्पना करने से क्या (प्रयोजन)? आत्मा के बिना भी अज्ञान (का अस्तित्व) काठ व दीवार के समान सिद्ध है ॥81॥ परतः परतस्त्यागो यस्मात्तु गुणवान् स्मृतः। तस्मात्सर्वपरित्यागान्मन्थे कृत्स्नां कृतार्थताम् ॥१२.८२ क्योंकि एक एक करके त्याग करना गुणवान स्मरण किया गया है, इसलिए सर्व-त्याग से पूर्ण कृतार्थता होती है, ऐसा मैं मानता हूँ" ॥82॥ इति धर्ममराडस्य विदित्वा न तुतोष सः। अकृत्स्नमिति विज्ञाय ततः प्रतिजगाम ह ॥१२.८३ अराड का यह धर्म जानकर वह सन्तुष्ट नही हुआ, यह (धर्म) अपूर्ण है ऐसा जानकर वहाँ से चला गया ॥83॥ विशेषमथ शुश्रूषुरुद्रकस्याश्रमं ययौ। आत्मग्राहाच्च तस्यापि जगृहे न स दर्शनम् ॥१२.८४ तब विशेष सुनने की इच्छा से वह उद्रक के आश्रम में गया और आत्मा (के सिद्धान्त) को मानने के कारण उसका भी दर्शन उसने ग्रहण नही किया ॥84॥
सञ्ज्ञासञ्ज्ञित्वयोर्दोषं ज्ञात्वा हि मुनिरुद्रकः। आकिञ्चन्यात्परं लेभेऽसञ्ज्ञासञ्ज्ञात्मिकां गतिम् ॥१२.८५ सञ्ज्ञा (=चेतना) व असञ्ज्ञा (=अचेतना) का दोष जानकर उद्रक मुनि ने अञ्चिनता से परे सञ्ज्ञा असञ्ज्ञा-रहित मार्ग को प्राप्त किया ॥85॥ यस्माच्चालम्बने सूक्ष्मे सञ्ज्ञासञ्ज्ञे ततः परम्। नासञ्ज्ञी नैव सञ्ज्ञीति तस्मात्तत्रगतस्पृहः ॥१२.८६ क्योंकि सूक्ष्म सञ्ज्ञा-असञ्ज्ञा भी आलम्बन (=मानसिक या शारीरिक कर्म का आधार) है, उस (सूक्ष्म सञ्ज्ञा-असञ्ज्ञा) से परे न असञ्ज्ञा-युक्त और न सञ्ज्ञा-युक्त अवस्था है, इसलिए वह (उद्रक) उस (अवस्था) का अभिलाषी हुआ ॥86॥ यतश्च बुद्धिस्तत्रैव स्थितान्यत्राप्रचारिणी। सूक्ष्मापादी ततस्तत्र नासञ्ज्ञित्वं न सञ्ज्ञिता ॥१२.८७ और क्योंकि बुद्धि सूक्ष्म व अपटु (=कर्म रहित) होकर वहाँ रहती है, अन्यत्र नही जाती; इसलिए वहाँ न असञ्ज्ञा है, न सञ्ज्ञा ॥87॥ यस्माच्च तदपि प्राप्य पुनरावर्तते जगत्। बोधिसत्त्वः परं प्रेप्सुस्तस्मादुद्रकमत्यजत् ॥१२.८८ और क्योंकि उसे भी प्राप्त कर आदमी फिर संसार में लौट आता है, इसलिए परम पद पाने के इच्छुक बोधिसत्त्व ने उद्रक का त्याग किया ॥88॥ ततो हित्वाश्रमं तस्य श्रेयोऽर्थी कृतनिश्चयः। भेजे गयस्य राजर्षेर्नगरीसञ्ज्ञमाश्रमम् ॥१२.८९ तब श्रेय पाने की इच्छा से निश्चय कर, उसका आश्रम छोड़, उसने राजर्षि गय के नगरी नामक आश्रम का सेवन किया ॥89॥ अथ नैरञ्जनातीरे शुचौ शुचिपराक्रमः। चकार वासमेकान्तविहाराभिरतिर्मुनिः ॥१२.९० तब पवित्र पराक्रमवाले, एकान्त-विहार में आनन्द पानेवाले उस मुनि ने नैरञ्जना नदी के पवित्र तीर पर निवास किया ॥90॥ (आगतान् तत्र) तत्पूर्वं पञ्चेन्द्रियवशोड्ढतान्। तपः (-प्रवृत्तान्) व्रतिनो भिक्षून् पञ्च निरैक्षत ॥१२.९१ अपने से पहले ही वहाँ आये हुए पाँच भिक्षुओं को देखा; वे तपस्वी और व्रती थे, पाँच इन्द्रियों को वश करने के अभिमानी थे ॥91॥ ते चोपतस्थुर्दृष्ट्वात्र भिक्षवस्तं मुमुक्षवः। पुण्यार्जितधनारोग्यमिन्द्रियार्था इवेश्वरम् ॥१२.९२
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