भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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इस शरीर में जो शून्य स्थान हैं पहले उनकी कल्पना करता है, तब (इसके) ठोस पदार्थों को भी शून्य समझता है ॥61 ॥ आकाशगतमात्मानं सङ्क्षिप्त्य त्वपरो बुधः । तदेवानन्ततः पश्यन्विशेषमधिगच्छति ॥१२.६२ दूसरा बुद्धिमान् पुरुष आकाश में स्थित अपने को (या आकाश में व्याप्त आत्मा को) सङ्क्षिप्त (= सङ्कुचित) कर, उसी को अनन्त की तरह देखता हुआ विशेष को प्राप्त करता है ॥62 ॥ अध्यात्मकुशलस्त्वन्यो निवर्त्यात्मानमात्मना । किञ्चिन्नास्तीति सम्पश्यन्नाकिञ्चन्य इति स्मृतः ॥१२.६३ अध्यात्म-कुशल दूसरा पुरुष आत्मा द्वारा आत्मा को निवृत्त कर “कुछ भी नही है” ऐसा देखता हुआ आकिञ्चन्य (=अकिञ्चन ?) स्मरण किया गया है ॥63 ॥ ततो मुञ्जादिषीकेव शकुनिः पञ्जरादिव । क्षेत्रज्ञो निःसृतो देहान्मुक्त इत्यभिधीयते ॥१२.६४ तब मुञ्ज से (निकली) सींक के समान, पिंजड़े से (निकले) पक्षी के समान, देह से निकला हुआ क्षेत्रज्ञ मुक्त कहा जाता है ॥64 ॥ एतत्परमं ब्रह्म निर्लिङ्गं ध्रुवमक्षरम् । यन्मोक्ष इति तत्त्वज्ञाः कथयन्ति मनीषिणः ॥१२.६५ यह परम ब्रह्म है, चिह्न-रहित, ध्रुव और अविनाशी है, जिसे तत्त्वज्ञ मनीषी मोक्ष कहते हैं ॥65 ॥ इत्युपायश्च मोक्षश्च मया सन्दर्शितस्तव । यदि ज्ञातं यदि रुचैर्यथावत्प्रतिपद्यताम् ॥१२.६६ इस तरह मोक्ष और उपाय मैंने आपको बतला दिये हैं; यदि इसे समझा और यदि रुचि हो, तो उचित रीति से इसे प्राप्त कीजिए ॥66 ॥ जैगीषव्योऽथ जनको वृद्धश्चैव पराशरः । इमं पन्थानमासाद्य मुक्ता ह्यन्ये च मोक्षिणः ॥१२.६७ जैगीषव्य, जनक, वृद्ध पराशर और दूसरे मोक्षवाले इस मार्ग से चलकर मुक्त हुए” ॥67 ॥ इति तस्य स तद्वाक्यं गृहीत्वा तु विचार्य च । पूर्वहेतुबलप्राप्तः प्रत्युत्तरमुवाच ह ॥१२.६८ उसका यह वचन सुनकर और विचार करके पूर्व जन्मों के हेतु-बल (=तीन कुशल-मूलों की शक्ति) से युक्त कुमार ने उत्तर दिया:- ॥68 ॥ श्रुतं ज्ञानमिदं सूक्ष्मं परतः परतः शिवम् । क्षेत्रज्ञस्यापरित्यागाद्वैम्येतन्नैष्ठिकम् ॥१२.६९


“यह सूक्ष्म ज्ञान सुना, जो उत्तरोत्तर कल्याण-कारी होता गया है। क्षेत्रज्ञ का परित्याग नही होने से इसे मैं नैष्ठिक नही समझता हूँ ॥69 ॥ विकारप्रकृतिभ्यो हि क्षेत्रज्ञं मुक्तमप्यहम् । मन्ये प्रसवधर्माणं बीजधर्माणमेव च ॥१२.७० विकार और प्रकृति से युक्त होनेपर भी क्षेत्रज्ञ में उत्पत्ति करने का धर्म (=गुण, स्वभाव) और बीज होने का धर्म रहता है, ऐसा मैं मानता हूँ ॥70 ॥ विशुद्धो यद्यपि ह्यात्मा निर्मुक्त इति कल्प्यते । भूयः प्रत्ययसद्भावादमुक्तः स भविष्यति ॥१२.७१ यद्यपि विशुद्ध आत्मा मुक्त समझा जाता है, प्रत्ययों (कारणों) के विद्यमान होने से वह फिर अमुक्त (=बद्ध) हो जायगा ॥71 ॥ ऋतुभूम्यम्बुविरहाद्यथा बीजं न रोहति । रोहति प्रत्ययैस्तैस्तैस्तद्वत्सोऽपि मतो मम ॥१२.७२ जैसे ऋतु भूमि व जल के अभाव से बीज अङ्कुरित नही होता है और उन उन प्रत्ययों के होने से अङ्कुरित होता है, वैसे ही मैं उसे भी मानता हूँ ॥72 ॥ यत्कर्माज्ञानतृष्णानां त्यागान्मोक्षश्च कल्प्यते । अत्यन्तस्तत्परित्यागः सत्यात्मनि न विद्यते ॥१२.७३ यह कि कर्म अज्ञान व तृष्णा के त्याग से मोक्ष पाने की कल्पना की जाती है, सो आत्मा के रहनेपर उसका अत्यन्त (=सम्पूर्ण) त्याग नही हो सकता ॥73 ॥ हित्वा हित्वा त्रयमिदं विशेषस्तूपलभ्यते । आत्मनस्तु स्थितियंत्र तत्र सूक्ष्ममिदं त्रयम् ॥१२.७४ इन तीनों को धीरे-धीरे छोड़ने से विशेष की प्राप्ति होती है, किन्तु जहाँ आत्मा की स्थिति है वहाँ ये तीनों सूक्ष्म रूप में रहते ही हैं ॥74 ॥ सूक्ष्मत्वाच्चैव दोषाणामव्यापाराच्च चेतसः । दीर्घत्वायुषश्चैव मोक्षस्तु परिकल्प्यते ॥१२.७५ दोषों के सूक्ष्म होने से, चित्त का व्यापार नही होने से, और (उस अवस्था में) आयु लम्बी होने से मोक्ष की (केवल) कल्पना कर ली जाती है ॥75 ॥ अहङ्कारपरित्यागो यश्चैष परिकल्प्यते । सत्यात्मनि परित्यागो नाहङ्कारस्य विद्यते ॥१२.७६ और अहङ्कार-परित्याग की जो यह कल्पना की जाती है, सो आत्मा के रहनेपर अहङ्कार का परित्याग नही हो सकता ॥76 ॥

बुद्धचरित 65