बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“आरम्भ में घर छोड़कर वह भिक्षु-वेश धारण करता है और सदाचार-व्यापी शील ग्रहण करता है ॥46 ॥ सन्तोषं परमास्थाय येन तेन यतस्ततः । विविक्तं सेवते वासं निर्द्वन्द्वः शास्त्रवित्कृती ॥१२.४७ जहाँ-तहाँ से जो कुछ मिल जाता है उसी से परम सन्तोष पाकर वह निर्द्वन्द्व शास्त्रज्ञ व बुद्धिमान् एकान्त निवास का सेवन करता है ॥47 ॥ ततो रागाद्भयं दृष्ट्वा वैराग्याच्च परं शिवम् । निगृह्णन्निन्द्रियग्रामं यतते मनसः श्रमे ॥१२.४८ तब राग से भय की (उत्पत्ति) और वैराग्य से परम कल्याण की (उत्पत्ति) देखकर इन्द्रिय-समूह का निग्रह करता हुआ वह मानसिक शान्ति के लिए यत्न करता है ॥48 ॥ अथो विविक्तं कामेभ्यो व्यापादादिभ्य एव च । विवेकजमवाप्नोति पूर्वध्यानं वितर्कवत् ॥१२.४९ तब वह काम व व्यापद (= पर-द्रोह-चिन्तन, क्रोध) आदि से रहित, विवेक-जन्य और वितर्क-युक्त पूर्व ध्यान प्राप्त करता है ॥49 ॥ तच्च ध्यानसुखं प्राप्य तत्तदेव वितर्कयन् । अपूर्वसुखलाभेन ह्रियते बालिशो जनः ॥१२.५० और उस ध्यान-सुख को पाकर, उसी की चिन्ता करता हुआ, मूर्ख आदमी अपूर्व सुख की प्राप्ति द्वारा अपहृत (पथभ्रष्ट) होता है ॥50 ॥ शमेनैवंविधेनायं कामद्वेषविगर्हिणा । ब्रह्मलोकमवाप्नोति परितोषेण वञ्चितः ॥१२.५१ काम-द्वेष-विरोधिनी ऐसी शान्ति द्वारा वह सन्तुष्ट होकर ब्रह्म-लोक प्राप्त करता है ॥51 ॥⁵¹ ज्ञात्वा विद्वान्वितर्कांस्तु मनःसङ्क्षोभकारकान् । तद्वियुक्तमवाप्नोति ध्यानं प्रीतिसुखान्वितम् ॥१२.५२ किन्तु वितर्क (= विचार) मन को क्षुब्ध करते हैं, ऐसा जानकर विद्वान् उन (वितर्कों) से वियुक्त और प्रीति-सुख से युक्त ध्यान प्राप्त करता है ॥52 ॥ ह्रियमाणस्तया प्रीत्या यो विशेषं न पश्यति । स्थानं भास्वरमाप्नोति देवेष्वाभास्वरेषु सः ॥१२.५३ उस प्रीति द्वारा हरण किया जाता हुआ जो विशेष को नहीं देखता है वह, आभास्वर देवों के बीच भास्वर (= उज्ज्वल) स्थान प्राप्त करता है ॥53 ॥ ⁵¹- = “वञ्चित” के स्थान में “सज्जितः” या “युक्त” बोधक कोई दूसरा शब्द होगा । यस्तु प्रीतिसुखात्तस्माद्विवेचयति मानसम् । तृतीयं लभते ध्यानं सुखं प्रीतिविवर्जितम् ॥१२.५४ जो उस प्रीति-सुख (प्रीति के सुख से) अपने मन को अलग करता है वह, सुखमय, किन्तु प्रीति-रहित तृतीय ध्यान प्राप्त करता है ॥54 ॥ यस्तु तस्मिन्सुखे मग्नो न विशेषाय यत्नवान् । शुभकृत्स्नैः स सामान्यं सुखं प्राप्नोति दैवतैः ॥१२.५५ जो उस सुख में मग्न होकर विशेष के लिए यत्न नही करता हे वह शुभकृत्स्न देवताओं के साथ सामान्य सुख प्राप्त करता है ॥55 ॥ तादृशं सुखमासाद्य यो न रज्यत्युपेक्षकः । चतुर्थं ध्यानमाप्नोति सुखदुःखविवर्जितम् ॥१२.५६ वैसा सुख पाकर जो अनुरक्त नही होता है, उदासीन रहता है, वह सुख-दुःख से रहित चतुर्थ ध्यान प्राप्त करता है ॥56 ॥ तत्र केचिद्व्यवस्यन्ति मोक्ष इत्यभिमानिनः । सुखदुःखपरित्यागादव्यापाराच्च चेतसः ॥१२.५७ उसमें सुख-दुःख का परित्याग होने से और चित्त का व्यापार नही होने से कुछ अभिमानी निश्चय करते हैं कि मोक्ष यही है ॥57 ॥ अस्य ध्यानस्य तु फलं समं देवैर्बृहत्फलैः । कथयन्ति बृहत्कालं बृहत्प्रज्ञापरीक्षकाः ॥१२.५८ ब्रह्म-ज्ञान के परीक्षक कहते हैं कि इस ध्यान का फल बृहत्फल देवों के साथ दीर्घ कालतक रहता है ॥58 ॥ समाधेर्व्युत्थितस्तस्माद्दृष्ट्वा दोषांश्शरीरिणाम् । ज्ञानमारोहति प्राज्ञः शरीरविनिवृत्तये ॥१२.५९ उस समाधि से उठकर, शरीर-धारियों के दोष देखकर बुद्धिमान् पुरुष शरीर-निवृत्ति के लिए ज्ञान (-मार्ग) पर आरूढ़ होता है ॥59 ॥ ततस्तद्ध्यानमुत्सृज्य विशेषे कृतनिश्चयः । कामेभ्य इव स प्राज्ञो रूपादपि विरज्यते ॥१२.६० तब उस ध्यान को छोड़कर, विशेष के लिए निश्चय कर बुद्धिमान् (पुरुष) काम की तरह रूप से भी विरक्त होता है ॥60 ॥ शरीरे खानि यान्यस्मिन्तान्यादौ परिकल्पयन् । घनेष्वपि ततो द्रव्येष्वाकाशमधिमुच्यते ॥१२.६१ 64 अश्वघोष