भारतकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

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नमस्कारवषट्कारौ प्रोक्षणाभ्युक्षणादयः । अनुपाय इति प्राज्ञैरुपायज्ञ प्रवेदितः ॥१२.३० नमस्कार, वषट्कार (= आहुति), सिञ्चन-आदि को, हे उपायज्ञ, बुद्धिमानों ने अनुपाय (= अनुचित उपाय) बताया है ॥३०॥ सज्जते येन दुर्मेधा मनोवाग्बुद्धिकर्मभिः । विषयेष्वनभिष्वङ्ग सोऽभिष्वङ्ग इति स्मृतः ॥१२.३१ जिससे दुर्बुद्धि पुरुष मन वाणी बुद्धि व कर्म द्वारा विषयों में आसक्त होता है, वह, हे आसक्ति-रहित, सङ्ग (= आसक्ति) स्मरण किया गया है ॥३१॥ ममेदमहमत्येति यद्दुःखमभिमन्यते । विज्ञेयोऽभ्यवपातः स संसारे येन पात्यते ॥१२.३२ “मेरा यह है, मैं इसका हूँ” इस दुःख के अभिमान को अभ्यवपात जानना चाहिए जिसके द्वारा संसार में पतन होता है ॥३२॥ इत्यविद्या हि विद्वांसः पञ्चपर्वां समीहते । तमो मोहं महामोहं तामिस्रद्वयमेव च ॥१२.३३ वह विद्वान् कहता है कि अविद्या पाँच पर्वों (= ग्रन्थियों) की होती है—तम, मोह, महामोह, और तामिस्र ॥३३॥ तत्रालस्यं तमो विद्धि मोहं मृत्युं च जन्म च । महामोहस्त्वसम्मोह काम इत्येव गम्यताम् ॥१२.३४ उनमें आलस्य को तम, जन्म व मृत्यु को मोह जानिये। हे मोह-रहित, काम ही महामोह है, ऐसा समझिये ॥३४॥ यस्मादत्र च भूतानि प्रमुह्यन्ति महान्त्यपि । तस्मादेष महाबाहो महामोह इति स्मृतः ॥१२.३५ जिस कारण इस (काम) में बड़े-बड़े प्राणी भी मूढ़ हो जाते हैं, इस कारण हे महाबाहो, यह महामोह स्मरण किया गया है ॥३५॥ तामिस्रमिति चाक्रोध क्रोधमेवाधिकुर्वते । विषादं चान्धतामिस्रमविषाद प्रचक्षते ॥१२.३६ हे क्रोध-रहित, क्रोध को तामिस्र कहते हैं और हे विषाद-रहित, विषाद को अन्ध-तामिस्र कहते हैं ॥३६॥ अनयाविद्यया बालः संयुक्तः पञ्चपर्वया । संसारे दुःखभूयिष्ठे जन्मस्वभिनिषिच्यते ॥१२.३७ पाँच पर्वोंवाली इस अविद्या से युक्त होकर मूर्ख मनुष्य दुःख-बहुल संसार में बार-बार जन्म लेता है ॥३७॥ द्रष्टा श्रोता च मन्ता च कार्यकारणमेव च । अहमित्येवमागम्य संसारे परिवर्तते ॥१२.३८ “द्रष्टा श्रोता चिन्तक व कार्य का साधक मैं ही हूँ” ऐसा समझकर वह संसार में भटकता है ॥३८॥ इहैभिर्हेतुभिर्धीमन् जन्मःश्रोतः प्रवर्तते । हेत्वभावात्फलाभाव इति विज्ञातुमर्हसि ॥१२.३९ इस संसार में इन कारणों से, हे धीमन्, जन्म को सोता चलता रहता है। कारण नही होने से फल नही हो सकता, ऐसा आपको जानना चाहिए ॥३९॥ तत्र सम्यङ्गतिर्विद्वान्मोक्षकाम चतुष्टयम् । प्रतिबुद्धाप्रबुद्धौ च व्यक्तमव्यक्तमेव च ॥१२.४० इसमें, हे मोक्ष के इच्छुक, सम्यक् बुद्धिवाले को (यह) चार जानना चाहिए-ज्ञानी-अज्ञानी और व्यक्त- अव्यक्त ॥४०॥ यथावदेतद्विज्ञाय क्षेत्रज्ञो हि चतुष्टयम् । आजवंजवतां हित्वा प्राप्नोति पदमक्षरम् ॥१२.४१ इन चारों को ठीक ठीक जानकर क्षेत्रज्ञ जन्म-मरण की वेगवती धारा को छोड़ देता है और अविनाशी पद प्राप्त करता है ॥४१॥ इत्यर्थं ब्राह्मणा लोके परमब्रह्मवादिनः । ब्रह्मचर्यं चरन्तीह ब्राह्मणांन्वासयन्ति च ॥१२.४२ इसके लिए संसार में परमब्रह्म-वादी ब्राह्मण ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं और ब्राह्मणों को इसकी शिक्षा देते हैं” ॥४२॥ इति वाक्यमिदं श्रुत्वा मुनेस्तस्य नृपात्मजः । अभ्युपायं च पप्रच्छ पदमेव च नैष्ठिकम् ॥१२.४३ उस मुनि की यह बात सुनकर राजा के पुत्र ने उपाय और नैष्ठिक पद के बारे में पूछा:- ॥४३॥ ब्रह्मचर्यमिदं चर्यं यथा यावच्च यत्र च । धर्मस्यास्य च पर्यन्तं भवान्व्याख्यातुमर्हति ॥१२.४४ “इस ब्रह्मचर्य का आचरण जैसे जितना और जहाँ करना चाहिए, और इस धर्म का जो अन्त है उसकी आप व्याख्या कीजिए।” ॥४४॥ इत्यराडो यथाशास्त्रं विस्पष्टार्थं समासतः । तमेवान्येन कल्पेन धर्ममस्मै व्यभाषत ॥१२.४५ अराड ने शास्त्रानुसार उसी धर्म को उसके लिए अन्य तरीके से सङ्क्षेप में स्पष्ट शब्दों में कहा:- ॥४५॥ अयमादौ गृहान्मुक्त्वा भैक्षाकं लिङ्गमाश्रितः । समुदाचारविस्तीर्णं शीलमादाय वर्तते ॥१२.४६ बुद्धचरित 63