बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
DevanagariHindipublished122 पृष्ठ
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कुमार के माहात्म्य से ही प्रेरित होकर, अराड ने अपने शास्त्र का सङ्क्षिप्त निश्चय इस प्रकार कहा:- ॥15 ॥ श्रूयतामयमस्माकं सिद्धान्तः शृण्वतां वर । यथा भवति संसारो यथा चैव निवर्तते ॥१२.१६ “हे श्रोताओं में श्रेष्ठ, हमारा यह सिद्धान्त सुनिये कि कैसे यह संसार प्रवृत्त होता है और कैसे निवृत्त होता है ॥16 ॥ प्रकृतिश्च विकारश्च जन्म मृत्युर्जरेव च । तत्तावत्सत्त्वमित्युक्तं स्थिरसत्त्व परेहि तत् ॥१२.१७ हे स्थिर-सत्त्व, इसे समझिये; प्रकृति, विकार, जन्म, जरा व मृत्यु को ही सत्त्व कहा गया है ॥17 ॥ तत्र तु प्रकृतिं नाम विद्धि प्रकृतिकौविद । पञ्च भूतान्यहङ्कारं बुद्धिमव्यक्तमेव च ॥१२.१८ हे प्रकृति को जाननेवाले, उसमें पाँच (महा-) भूतों, अहङ्कार, बुद्धि और अव्यक्त को प्रकृति जानिये ॥18 ॥ विकार इति बुध्यस्व विषयानिन्द्रियाणि च । पाणिपादं च वाचं च पायूपस्थं तथा मनः ॥१२.१९ विषयों, इन्द्रियों, हाथ-पाँव, वाणी, गुदा, जननेन्द्रिय व मन को विकार समझिये ॥19 ॥ अस्य क्षेत्रस्य विज्ञानात्क्षेत्रज्ञ इति सञ्ज्ञि च । क्षेत्रज्ञ इति चात्मानं कथयन्त्यात्मचिन्तकाः ॥१२.२० और सञ्ज्ञावान् (= चेतनावान्, होशवाला) इस क्षेत्र को जानने के कारण क्षेत्रज्ञ है। और आत्मा की चिन्ता करनेवाले लोग आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं ॥20 ॥ सशिष्यः कपिलश्चेह प्रतिबुद्ध इति स्मृतः । सपुत्रः प्रतिबुद्धस्तु प्रजापतिरिहोच्यते ॥१२.२१ और इस संसार में शिष्यों-सहित कपिल ज्ञानी स्मरण किया गया है, उसने पुत्रों सहित ज्ञान प्राप्त किया और वह इस संसार में प्रजापति कहा जाता है ॥21 ॥⁵⁰ जायते जीर्यते चैव बाध्यते म्रियते च यत् । तद्व्यक्तमिति विज्ञेयमव्यक्तं तु विपर्ययात् ॥१२.२२ जो जन्म लेता है, बूढ़ा होता है, पीड़ित होता है और मरता है उसे व्यक्त समझना चाहिए और जो इसका विपरीत (उलटा) है उसे अव्यक्त समझना चाहिए ॥22 ॥ अज्ञानं कर्म तृष्णा च ज्ञेयाः संसारहेतवः । स्थितोऽस्मिंस्त्रितये जन्तुस्तत्सत्त्वं नातिवर्तते ॥१२.२३ अज्ञान, कर्म व तृष्णा संसार के कारण-स्वरूप हैं। इन तीनों गुणों में रहनेवाला प्राणी उस सत्त्व (= प्रकृति विकार जन्म जरा व मृत्यु) के पार नहीं जा सकता ॥23 ॥ विप्रत्ययादहङ्कारात्सन्देहादभिसम्प्लवात् । अविशेषानुपायभ्यां सङ्गादभ्यवपाततः ॥१२.२४ विप्रत्यय, अहङ्कार, सन्देह अभिसम्प्लव, अविशेष, अनुपाय, सङ्ग और अभ्यवपात के कारण (प्राणी उस सत्त्व के पार नहीं जा सकता) ॥24 ॥ तत्र विप्रत्ययो नाम विपरीतं प्रवर्तते । अन्यथा कुरुते कार्यं मन्तव्यं मन्यतेऽन्यथा ॥१२.२५ उसमें विप्रत्यय (= अविश्वास, मिथ्या विश्वास) विपरीत आचरण करता है, जो करना है उसे अन्यथा करता है, जो विचारना है उसे अन्यथा विचारता है ॥25 ॥ ब्रवीम्यहमहं वेद्मि गच्छाम्यहमहं स्थितः । इतीहैवमहङ्कारस्त्वनहङ्कार वर्तते ॥१२.२६ हे अहङ्कार-रहित, मैं बोलता हूँ, मैं जानता हूँ, मैं जाता हूँ, मैं खड़ा हूँ, इस प्रकार इस संसार में अहङ्कार होता है ॥26 ॥ यस्तु भावानसन्दिग्धानेकीभावेन पश्यति । मृत्पिण्डवदसन्देहे स इहोच्यते ॥१२.२७ हे सन्देह-रहित, जो परस्पर नहीं मिली हुई चीजों को मिट्टी के ढेले के समान एक (=ठोस) देखता है, वह इस संसार में सन्देह कहा जाता है ॥27 ॥ य एवाहं स एवेदं मनो बुद्धिश्च कर्म च । यश्चैवैष गणः सोऽहमिति यः सोऽभिसम्प्लवः ॥१२.२८ जो ही मैं हूँ वही यह मन बुद्धि कर्म है, और (मन बुद्धि व कर्म का) जो यह समूह है वहीं मैं हूँ, ऐसा जो है वह अभिसम्प्लव है ॥28 ॥ अविशेषं विशेषज्ञ प्रतिबुद्धाप्रबुद्धयोः । प्रकृतीनां च यो वेद सोऽविशेष इति स्मृतः ॥१२.२९ हे विशेषज्ञ, जो ज्ञानी व अज्ञानी के बीच तथा प्रकृति के बीच अविशेष (= अभेद, भेद नहीं) जानता है वह अविशेष स्मरण किया गया है ॥29 ॥
⁵⁰- “प्रतिबुद्धिरिति स्मृतिः” के स्थान में “प्रतिबुद्ध इति स्मृतः” रक्खा गया है। यह एक दुर्बोध श्लोक है। इस दुर्बोधता का कारण पाठ-दोष ही जान पड़ता है। श्लोक-संख्या 29, 40 और 22 को देखते हुए, इसके तीसरे चरण में “प्रतिबुद्ध” की जगह “अप्रतिबुद्ध” पढ़ना ठीक होगा। तब अर्थ यों हो—“और, इस संसार में शिष्यों- सहित कपिल ज्ञानी स्मरण किया गया है और पुत्रों सहित प्रजापति (भूतात्मा, मार) अज्ञानी कहा जाता है।” 62 अश्वघोष