बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादश सर्ग अराड-दर्शन ततः शमविहारस्य मुनेरिक्षवाकुचन्द्रमाः । अराडस्याश्रमं भेजे वपुषा पूरयन्निव ॥१२.१ तब इक्ष्वाकु (-वंश का) चन्द्रमा शम-धर्म में विहार करनेवाले अराड के आश्रम में गया, उस (आश्रम) को वह (राज-कुमार) अपने रूप से मानो भर रहा था ॥1 ॥ स कालामसगोत्रेण तेनालोक्यैव दूरतः । उच्चैः स्वागतमित्युक्तः समीपमुपजग्मिवान् ॥१२.२ कालाम गोत्र के उस मुनि ने दूर से ही उसे देखकर जोर से 'स्वागत' शब्द कहा, और वह (कुमार) उसके समीप गया ॥2 ॥ तावुभौ न्यायतः पृष्ट्वा धातुसाम्यं परस्परम् । दारव्योर्मेध्ययोर्वृष्योः शुचौ देशे निषेदतुः ॥१२.३ वे दोनों न्यायपूर्वक परस्पर धातु-साम्य (= स्वास्थ्य) पूछकर पवित्र स्थान में काठ के दो पवित्र आसनों पर बैठ गये ॥3 ॥ तमासीनं नृपसुतं सोऽब्रवीन्मुनिसत्तमः । बहुमानविशालाभ्यां दर्शनाभ्यां पिबन्निव ॥१२.४ उस मुनि-श्रेष्ठ ने, सम्मान के कारण अपनी विकसित आँखों से, बैठे हुए उस राज कुमार को मानो पीते हुए कहा:— ॥4 ॥ विदितं मे यथा सौम्य निष्क्रान्तो भवनादसि । छित्त्वा स्नेहमयं पाशं पाशं दृप्त इव द्विपः ॥१२.५ “हे सौम्य, मुझे मालूम है कि आप किस प्रकार घर से निकले हैं। जैसे गर्वीला हाथी बन्धन को काटकर (निकलता है), वैसे ही स्नेहमय बन्धन को काटकर आप निकले हैं ॥5 ॥ सर्वथा धृतिमच्चैव प्राज्ञं चैव मनस्तव । यस्त्वं प्राप्तः श्रियं त्यक्त्वा लतां विषफलामिव ॥१२.६ आपका मन सब प्रकार से धैर्यवान् व ज्ञानवान् है जो आप विषाक्त फलवाली लता की तरह लक्ष्मी को तजकर आये हैं ॥6 ॥ नाश्चर्यं जीर्णवयसो यज्जग्मुः पार्थिवा वनम् । अपत्येभ्यः श्रियं दत्त्वा भुक्तोच्छिष्टामिव स्रजम् ॥१२.७ (इसमें कुछ) आश्चर्य नहीं कि बूढ़े होनेपर राजा लोग अपनी सन्तानों को उपभोग की गई झूठी माला की तरह राज्य-लक्ष्मी सौंपकर वन गये हैं ॥7 ॥
इदं मे मतमाश्चर्यं नवे वयसि यद्भवान् । अभुक्त्वाैव श्रियं प्राप्तः स्थितो विषयगोचरे ॥१२.८ इसे मैं आश्चर्य मानता हूँ कि आप, नई वयस में विषयों की गोचर-भूमि में रहते हुए, लक्ष्मी का उपभोग किए बिना ही आ गये हैं ॥8 ॥ तद्विज्ञातुमिमं धर्मं परमं भाजनं भवान् । ज्ञानप्लवमधिष्ठाय शीघ्रं दुःखार्णवं तर ॥१२.९ इसलिए इस परम धर्म को जानने के लिए आप उत्तम पात्र हैं; ज्ञानरूप नाव पर चढ़कर दुःखरूप सागर को शीघ्र पार कीजिए ॥9 ॥ शिष्ये यद्यपि विज्ञाते शास्त्रं कालेन वर्ण्यते । गाम्भीर्याद्व्यवसायाच्च न परीक्ष्यो भवान्मम ॥१२.१० यद्यपि शिष्य को जानने के बाद समय पर शास्त्र बताया जाता है, किन्तु आपकी गम्भीरता व निश्चय के कारण मैं आपकी परीक्षा नहीं करूँगा" ॥10 ॥ इति वाक्यमराडस्य विज्ञाय स नरर्षभः । बभूव परमप्रीतः प्रोवाचोत्तरमेव च ॥१२.११ अराड की यह बात जानकर वह नर-श्रेष्ठ परम प्रसन्न हुआ और उत्तर दिया:— ॥11 ॥ विरक्तस्यापि यदिदं सौमुख्यं भवतः परम् । अकृतार्थोऽप्यनेनास्मि कृतार्थ इव सम्प्रति ॥१२.१२ “विरक्त होनेपर भी आपकी जो यह अत्यन्त अनुकूलता है, अकृतार्थ होनेपर भी मैं इससे इस समय कृतार्थ-सा हूँ ॥12 ॥ दिदृक्षुरिव हि ज्योतिर्याियासुरिव दैशिकम् । त्वद्दर्शनमहं मन्ये तितीर्षुरिव च प्लवम् ॥१२.१३ आपके दर्शन को मैं वैसा ही मान रहा हूँ, जैसा कि देखने की इच्छा करनेवला प्रकाश को, यात्रा की इच्छा करनेवाला (मार्ग) बतानेवाले को, और (नदी) पार करने की इच्छा करनेवाला नाव को मानता है ॥13 ॥ तस्मादर्हसि तद्वक्तुं वक्तव्यं यदि मन्यसे । जरामरणरोगेभ्यो यथायं परिमुच्यते ॥१२.१४ इसलिए यदि आप कहने योग्य समझें, तो आपको वह कहना चाहिए जिससे यह व्यक्ति जरा मरण व रोग से मुक्त हो जाय" ॥14 ॥ इत्यराडः कुमारस्य माहात्म्यादेव चोदितः । सङ्क्षिप्तं कथयांचक्रे स्वस्य शास्त्रस्य निश्चयम् ॥१२.१५ बुद्धचरित 61